गुरुवार, 15 जुलाई 2010

रानी का डंडा - अंत

पिछले भाग से जारी .... 
(2)
गोरकी असल में एक भूतपूर्व एथलीट थी जिसका खेल जगत में योगदान भारत की फुटबाल टीम से कम नहीं था। घटित के तेज बहाव से निज़ात पाकर उसने अपने को ट्रैक्टर की चाल पर लुढ़कता पाया। संतुलन के लिए उसे कभी पाँड़े तो कभी रजुआ की देह का सहारा लेना पड़ रहा था। रजुआ मन ही मन भैया जी को गरियाए जा रहा था – कौन ज़रूरत रहे चिक्कन सड़क बनववले के ? सड़क खराब होती तो हचका जोर होता और सहारा देने के बहाने जाने कितनी बार गोरकी को अँकवार में ले चुका होता! ड्राइवर ने गेयर बदला और एक्सीलेटर चाँपा। पुराने आयशर के इंजन ने रेस लगाई – फट, फट , फट , फट .......... फट, फट,फट...... । डांस के प्रोग्राम के बारे में सोचता पाँड़े चिल्लाया,”बहानचो, अजुए सब कलाकारी देखइबे? एकदम सिलो चलाउ।“ सहारा लेती गोरकी ने कुछ संतुलन पाया तो आखिरी मदद के तौर मोबाइल निकाला हालाँकि उसे उम्मीद कम ही थी। पाँड़े ने देखा तो फिस्स से हँस दिया और अपनी जान में गोरकी को समझ आए उस तरह से बोला,”मैडम जी, इहाँ इसका नेटवरक नहीं चलेगा। बात करने के लिए उँचास छत पर जाए के परी...”। पाँड़े ने अपना चमचमाता चाइना मोबाइल निकाला तो गोरकी दंग रह गई। पाँड़े ने फुल वाल्यूम में गाना लगाया – “चोरबजारी दो नयनों की ...“
नाचsss रानी! अरे नाचsss!! गोरकी को यह आदमी अट्रैक्टिव लगने लगा था । भरी भींड़, सरकारी अधिकारी, पुलिस – इन सबके बीच पाँड़े द्वारा अपहरण कमाल प्रभावकारी था ही। यह सोच कि – लेट हैव फन, गोरकी ने पहला ठुमका लगाया तो भींड़ पगला उठी। पाँड़े के इशारे से ट्रैक्टर बन्द हो गया और रजुआ, बहोरना, पाँड़े, गोरकी ट्रॉली पर अजीबोग़रीब बेताल ताल हीन नाच में जुट हो गए।
लाला ने सफारी सूट पहने एक अधिकारी के सामने ठुमकना शुरू किया तो एक कार्यकर्ता ने अधिकारी का हाथ पकड़ उसे नचाना शुरू कर दिया। समाँ बँध गया। ट्रॉली पर गीत की धुन पर नाचते लोग तो नीचे जमीन पर तोंद लड़ाते लाला, अधिकारी, कार्यकर्ता ... पाँड़े के हाथ में रानी का डंडा रह रह ऊँचा उछ्ल रहा था। सोनमतिया की माई गुलगुल हो हँसे जा रही थी। बाकी औरतें लीन थीं – धन धन रानी !
(3)
ट्रैक्टर पहुँचने में देर होता जान भैया जी ने ह्विस्की का एक घूँट निगला और लखटकिया मोटरसाइकिल पर सवार हो चले। सड़क का काम खत्म होने के तुरंत बाद बड़े शौक से यह मोटरसाइकिल दिल्ली से मँगाए थे और उसे बहुत कम ही निकालते थे। रास्ते में ही जो नज़ारा दिखा उसकी कल्पना उन्हें भी नहीं थी।
पाँड़े होनहार था। उससे सतर्क भी रहना पड़ेगा। ऐसे पालतू कटहे बनने में देर नहीं लगाते।
मोटरसाइकिल को ट्रॉली के बगल में खड़ी कर भैया जी दहाड़े,”बन्द कीजिए यह भड़ैती।“ नाच को ब्रेक लग गया। पाँड़े सकपका कर नीचे उतर कर रानी का डंडा उनके हाथ में देने लगा। गोरकी तो ऑ स्ट्रक! अभी तक जिसे हीरो समझ रही थी वह तो प्यादा निकला! ये कौन आया? स्मार्टी। थंडरबर्ड बाइक ! वाव !!
रानी के डंडे को हाथ में ले उस पर उपेक्षा की एक दृष्टि डाल भैया जी अधिकारी सम्बोधन मुद्रा में आ गए,”इतने पावन अवसर पर आप लोगों को मसखरी सूझ रही है? भारत के किसी गाँव में पहली बार यह .. यह .... आया है। शर्म कीजिए आप लोग। इज़्ज़त बख्शने के बजाय नौटंकी? इंस्पेक्टर साहब ! अच्छा हुआ कि आप एस्कार्ट में हैं नहीं तो ये लोग तो इसका, इसका ... पीछे से लाला फुसफुसाए- बेटन... हाँ, बेटन की बेइज्जती ही कर डालते! चलिए आप लोग। वहाँ बेटन का विधि विधान से स्वागत होगा।” बाइक स्टार्ट करते भैया जी ने लाला पर कृतज्ञ दृष्टि डाली। रानी के डंडे को डंडा कहना पड़ता ! कितनी बेशर्मी होती !! लाला ने बचा लिया। उन्हें नाम भूल कैसे गया था?       
    
जुलूस चुपचाप चल पड़ा। घर के बगल से गुजरा तो रमपतिया भी लाठी ठेगता पीछे पीछे चल पड़ा। मार गई फसल लिए कोई किसान खलिहान जा रहा था क्या?   
(4)
भैया जी ने लव मैरेज किया था। दिल्ली की सरदारन जब दुलहिन होकर आई थी तो लड्डू तो बाद में बँटे, प्रायश्चित स्वरूप गाय का गुह मूत पहले ग्रहण करना पड़ा। जाति बिरादरी से बाहर करने के बजाय इसी पाँड़े के बाप ने यह रास्ता निकाला था। वक़्त के साथ दुलहिन ने अपने को ऐसा बदला कि लोग बाग सन्न हो गए। साड़ी पहने आधा सिर ढके जब दुलहिन तुलसी चौरा पर पयकरमा करती थीं तो लगता जैसे सछात देवी हों ! घर बाहर सब सँभालती दुलहिन आदमी जन की ‘दुलहिन भैया’ हो गई। आज कोठी के रजदुआरे पर दुलहिन आरती थाल सजाए खड़ी थीं।
भैया जी मोटरसाइकिल पर आते सबसे आगे दिखे पीछे टट्टर टाली पर गोरकी समेत सभी लोग। अगल बगल मोटरसाइकिलें, टाली के पीछे कारें और सबसे पीछे टीवी वाले। उनकी महतारी ने देखा तो उन्हें लगा कि टी वी वाले किशन कन्हैया महभारत में रथ दौड़ा रहे हों! जेवनार फेवनार भाखने लगीं।       
  
दुलहिन ने बुदबुदाते हुए रानी के डण्डे की आरती उतारने को दीप बालना ही चाहा कि भैया जी ने रोक दिया। पाँड़े को इशारा मिला और तुरत फुरत टी वी वाले कैमरा सैमरा तान कर तैयार हो गए। भैया जी ने फिटर्रे के कान में फुसफुसी की – लाइव और रिकार्डिंग दोनों । उसने सहमति में सिर हिलाया ही था कि दो अधिकारी आ कर भैया जी के आगे गिड़गिड़ाने लगे,”सर ! अब तक ठीक था लेकिन टेलीकास्ट हुआ तो ग़जब हो जाएगा। हम कहीं के न रहेंगे।“
भैया जी ने प्रेमिल स्वर में कृपा की वर्षा की,” अगर टेलीकास्ट नहीं हुआ तो आप लोग यहीं के हो के रह जाएँगे।“
शांति छा गई।
भैया जी डण्डे को लिए थंडरबर्ड पर सवार हो गए। बगल में गोरकी ओठ निपोरे आ सटी। दुलहिन ने दीप जला डण्डे को तिलक लगाया और आरती उतारने लगीं। पुरोहित जी ने स्वस्तिवाचन प्रारम्भ किया,” स्वस्ति नो इन्द्रो ..स्वस्ति नो पूषा...”।
फिटर्रे मनई ने माइक ले गद्गगद स्वरों में जोर जोर से रोदन सा पाठ शुरू किया,”दिव्य है यह दृश्य! ऐसा भारत के गाँव में ही सम्भव है। इतनी सरलता, इतनी आत्मीयता, इतना प्रेम और कहीं देखने को नहीं मिला। मैं भाव विह्वल हो रहा हूँ। राष्ट्रकवि की पंक्तियाँ याद आ रही हैं – अहो ! ग्राम्य जीवन ..... “
सबसे पीछे खड़ा रमपतिया आँखें पोछता बुदबुदाया,”अब बस अखबार में ही आस है।“

सारे तमाशे का अंत जब शंख ध्वनि से हुआ तो वापस लौटते तमाशबीनों में रमपतिया दूर सबसे आगे हो गया। ढलते सूरज के कारण लाठी ठेगते रमपतिया का साया राह पर कुछ अधिक ही लम्बा लग रहा था। सरकारी गाड़ियों ने लौटने में जो तेजी दिखाई वैसी तेजी अगर आज़ादी के बाद काम करने में दिखाई गई होती तो आज ....
हाइवे पर पहुँच कर अम्बेसडरों में मोबाइल पर बिन पूछे जाने किन किनको सफाई दी जा रही थी। जो चुप थे वे ट्रांसफर और सस्पेंसन से बचने की राह जोह रहे थे। गोरकी ने राह में उछ्लते छौने को देख ड्राइवर को कोंचा,” इट वाज ए रियल फन!” और आँख मार कर हँसते हुए गोद में पड़े बेटन को सहलाने लगी। भैया जी ...   
(5)
घर पहुँचते पहुँचते रमपतिया की तबियत खराब हो गई। खाँसी को किसी तरह काबू कर वह लेटा तो जो आँख लगी वह अधराति खुली। बाहर आया और अचानक दिन का देखा सुना नए नए अर्थ ले उसके दिमाग में घुमड़ने लगा। जब गाँव में यह हाल है तो शहरों में क्या होगा? निज़ाम, प्यादे, खिलाड़ी, समूची सरकारी मशीनरी, प्राइवेट पूँजीपति सभी बेटन बेटन ... उसने गिना। अखबार पढ़े हुए तीन महीने छ: दिन हो गए थे। करिखही रात को घूरते हुए तय किया कि आज अखबार लाएगा, पढ़ेगा और पढ़ाएगा। साइकिल तो अब चलने चलाने से रही। पैदल ही लक्ष्मीपुर स्टेशन को चल पड़ा। गाड़ी आने तक तो पहुँच ही जाएगा।

टेसन पर चाय पानी की तैयारी में जुटे मिसिर की दुकान पर ताजे और पुराने अखबारों को पढ़ कर वह तरो ताज़ा हो गया। मिसिर के बहुत रोकने पर भी वह अखबार हाथ में लिए गाँव को वापस हो लिया। आसमान में घनी बदरी छाई हुई थी। सुबह सुबह बला की उमस थी।

(6)
रजुआ ने घर घर घूम रमपतिया का सन्देशा पहुँचा दिया और दस बजते बजते एक छोटी भीड़ उसके दरवाजे पर इकठ्ठी हो गई। चौकी पर लेटे लेटे ही रमपतिया ने कहना शुरू किया,” अंत आ पहुँचा है। आप सब से भेंट करना था और अपना फर्ज अदा करना था सो बुला लिया। बड़ छोट सब माफ कर दें। महीनों के बाद आप को अखबार सुनाना अच्छा लगेगा। इस बार खबर नहीं, खबर का अर्क बाटूँगा।  कल जो रानी का डण्डा आया था वह साधारण नहीं था। गए ज़माने की रानी, सात समन्दर पार की अब की रानी, अपने देश की रानी और इस प्रदेश की रानी और उनके निज़ाम ....” खाँसी आई तो मुँह से खून निकल पड़ा... रुक कर पोंछते हुए उसने पूरा किया ,”सब एक ही थैले के चट्टे बट्टे। डंडे की माया सभत्तर है। यह डंडा मन्दिर में शीश नवाता है और लाइन में लगे लोगों की जेबें भी साफ करता है। कॉमनवेल्थ का प्रतीक है यह। कॉमन माने सबका और वेल्थ माने धन – सबका धन। घूम घूम कर खेल खेल में सन्देश फैला रहा है। धन तो सबका है। चाहे यहाँ रहे या वहाँ, क्या फर्क पड़ता है? बहोरना की जेब का हजार और बाहर देश के खाते में हजार करोड़ सब बराबर हैं। सबके हैं – इधर उधर से क्या?  बिधायक का टट्टर, लाला का लोन, सोनमतिया की माँ का पेंशन, गन्ने का पेमेंट ... यह सब छोटी बाते हैं। या तो मिलते नहीं, जो मिलें तो हजार बन्दिशें ! सरकार की माली हालत दुरुश्त है। बाहर साख मज़बूत हुई है। हम अब धनी कहाने लगे हैं। देखिए न, नरेगा के नाम पर सरकार आप सबकी दारू बोटी का जुगाड़ भी तो कर रही है!मालिक लोग खाते खाते कुत्तों के आगे भी तो फेंक देते हैं ! है कि नहीं? ” रुक कर उसने पानी पिया और मुँह से आते खून को फिर पोंछ दिया।
“स्कूल में बँटते खाने को किसी ने चखा कभी? पढ़ाई लिखाई फैलाने के लिए रानी ने जो धन यहाँ भेजा था उससे लोगो ने एसी, टीवी और जाने क्या क्या खरीद डाले! 2400 करोड़ रूपए के भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है। रानी के प्रधानमंत्री ने तो कह दिया है कि इस बार अनुदान में भारी कटौती होगी। भारत के धनी लोग ग़रीबों की मदद करें। ...ग़रीबों की मदद में उसने यहाँ डण्डा भेज दिया है। पूरा देश पगलाया स्वागत में जमींदोज हो रहा है और उधर दिल्ली खुदी पड़ी है। उसके गड्ढों में रोज करोड़ो डाले जा रहे हैं। गड्ढे हैं कि भर ही नहीं रहे।  जिन ताल पोखरों की गहराई बढ़ा कर, बन्धा बना कर आप लोग गुलगुल हैं, उनमें पानी कहाँ से आएगा? इसके लिए पैसा आ कहाँ से रहा है? कभी सोचा? .... कौन यहाँ ग़रीब नहीं है? धनिक भी बिखरे पड़े हैं - अफरात लेकिन उनसे मदद मिलेगी आप को?” उसकी आँखों की चमक दुगुनी हो चली थी जैसे भभकता दिया बुझने की तैयारी में हो!
“... माया से निकलिए। डंडे की मार को समझिए। दिल्ली तो फिर सज सँवर जाएगी, नौटंकी भी खत्म हो जाएगी। लेकिन डण्डे के झंडाबरदारों ने आप की जो हालत हमेशा के लिए गढ़ कर फाइलों में रख दी है, उसका क्या ? ....” चुप हुआ और मुँह खुल गया।           
अखबार के पन्ने हवा से इधर उधर उड़ने लगे। रमपतिया ने हिचकी ली, उसका मुँह और खुल गया। पास खड़े लोगों ने देखा खुले गले में खून का भभका उपराया और फिर भीतर चला गया। बात बेबात दाँत चियारने वालों की तरह उसकी बतीसी उभर आई। आँखों की चमक आसमान ताकती रह गई और सिर अकड़ गया जैसे किसी भदेस मजाक पर मज़ा लेते आदमी को फ्रेम कर दिया गया हो। भैया जी के कार्यकर्ता ने उसके चेहरे पर अपना गमछा डाल दिया। गुमुन्द बदरी से टपाटप बूँदे गिरने लगी थीं।        
दूर राजधानी में तीखी धूप में ही अचानक बारिश शुरू हो गई। गोरकी ने रानी के डंडे को भीगने से बचाने के लिए रंग बिरंगी छतरी तान काला चश्मा चढ़ाया और दूरस्थ कैमरे के लिए बेपरवा पोज देने में व्यस्त हो गई।
 
... मुँह में गमछा ठूँसे भीगता बहोरना सोचे जा रहा था,”इस देश को एड्स हो गया है। जुलूस निकलते रहेंगे कभी बैनरों के साथ और कभी डंडे के साथ। बीमारी वैसी की वैसी रहेगी। ... भगवान रमपतिया जैसी मौत किसी को न दे।“ (समाप्त)          

34 टिप्‍पणियां:

  1. एक डंडा के चलते पूरा भारत पुराण हो गया -पता नहीं मेरी भाभी को अपने यह सुनाया या नहीं मगर आपकी भाभी ने दोनों अंकों को पूजा श्रवण मुद्रा में सुना और सेंटी हो गयीं -आपकी समकालीन ग्राम्य जीवन की इतनी सूक्ष्म पकड़ अचम्भित करने वाली है ,चरित्र चित्रण तो ..बलि जाऊं ! सोच रहा हूँ कि आप कौन चरित्र से आयीदेंटीफाई होते हैं और मैं अगर गाँव रुक गया होता तो क्या होता -और कुछ ब्लॉग शख्शियतों से भी ज़रा चूल से चूल मिलाने में लगा हूँ -मगर इन जीवंत पात्रों के सामने सब भुच्चड हो गए हैं -गोरकी भी आखिर कुछ तो कर रही -बेचारी डंडा ही थामे रही इतना देर /समय -ईहाँ तो उहौ शऊर नायं केहुंके ....और बनती हैं ठकुराईन सबै ....
    बा भैया साहित्य रच दिए हो ..और का कही ...!

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  2. अपनी बात:
    भाँग, भाटिन और भदेस की धरती में आए इस डंडे की कहानी कहना मुझ जैसे फालतू कथ्थक के लिए भी एक चरम यातनादायी अनुभव था।
    भला हो अरविन्द जी और अमरेन्द्र जी का जो टीस को दबाते हँसते हँसते लिख गया। मुझे नहीं पता कि शिल्प और कथ्य की दृष्टि से यह कहानी क्या है या इसके गुण दोष क्या हैं लेकिन इसकी पीर बहुत पुरानी कविता 'नरक के रस्ते' (http://kavita-vihangam.blogspot.com/2009/12/blog-post_29.html) से जुड़ती है, यह पता है। खुद भोगा जो है!
    इतने वर्षों के बाद भी गाँव कमोबेश वैसे ही हैं - बिजली के खम्भे हैं लेकिन बिजली नहीं। मोबाइल है लेकिन ढंग का सिगनल नहीं। टीवी है लेकिन केवल दूरदर्शन। नाली में रहते हुए कीड़ों की मौज है। ऐसे में शहरी तिलस्म और पूँजी की चमक ने जो ऐब्सर्डिटियाँ उपजाई हैं, अति कष्टकारी हैं। इक्के दुक्के प्रगति के उदाहरण दिखा लोग संतोष जताते हैं लेकिन उन्हें शायद पता नहीं होता कि यह देश अपनी सम्भावनाओं का अति अति लघु भी उपजा नहीं पा रहा...
    आभारी हूँ 'अमर उजाला' के 12 जुलाई के पृष्ठ 12 की रिपोर्ट का जो नासूर सी टभकती पीर को अभिव्यक्ति मिली। चित्र भी उसी अखबार से लिए हैं।

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  3. बेटन रानी का,
    डण्डा निशानी का,
    हम कभी गुलाम थे,
    बड़े धैर्यवान थे।

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  4. रानी डंडा आया जाने भू्चाल आ गया,
    दिल्ली से गांव तक,
    बहुत अच्छे तरीके के आपने प्रस्तुत किया।
    पढ कर आनंद आ गया।

    शुभकामनाएं

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  5. डंडा पुराण बहुत भाया। बहुत सी बीमारियां दवा के बदले डंडे से ठीक होती हैं, लेकिन जिस अंडास रोग का जिक्र आप कर गये वो लाईलाज है। और हम लोगों ने तो वैसे भी डंडे की पूजा करके उसे साधने का फ़ार्मूला ईजाद कर लिया है।
    आज की पोस्ट से थोड़ा हटकर आपकी भारत बंद वाली पोस्ट और सरकार के फ़्री LPG कनेक्शन की ताजी योजना पर आपके विचार कभी जानने को मिले तो शायद सब्सिडी देने लेने की सरकारी नीतियों का कोई नया आयाम और दिखे।
    आभार।

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  6. समा =आकाश ,आसमान
    समां =मंज़र,नज़्ज़ारा,दृश्य
    समाअ=श्रवण,वज्द करना,झूमना,गाना बजाना !
    शमा =मोमबत्ती

    पहले मायावी थे अब माया है आगे फिर मायावी होंगे, सम्मोहित भीड़ें मुक्त नहीं हुआ करती ! जो तिलस्म के प्रति जागरूक होता दिखा उसे आपनें बीमारी से मार डाला ! पता नहीं मैं भी क्या उल जलूल बकनें लग गया !

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  7. @ अली जी,
    धन्यवाद। उर्दू में अपनी लेखनी थोड़ी तंग है। बताने के लिए धन्यवाद। सुधार दिया है।

    जगे ज़मीर को अगर एक सप्ताह भी ढोते रहे तो पागल होना तय है। इस ऐब्सर्ड व्यवस्था में हर जागरूक तिल तिल मरने को अभिशप्त है आर्य! रमपतिया तो भाग्यशाली था जो अंतिम मृत्यु को प्राप्त हो गया।

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  8. आज पढ़कर ठहरा सा हूँ .. टीपता हूँ फिर ... टीपने के लिए तटस्थ होना जरूरी है न ... उसी का अभ्यास कर रहा हूँ ... आता हूँ फिर ...

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  9. अंत वाले नंबर ६ पेराग्राफ के छक्के , जो वर्तमान परिस्थितियों पर एक बेहतरीन कटाक्ष है , के साथ ख़त्म हुई एक बहुत ही उम्दा कथा. बहुत बढ़िया.

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  10. गाँव और शहर में अब इतना फर्क कहाँ रहा ...
    वही आपका निरंकुश निर्मम सत्य साहित्य की शक्ल में आ खड़ा हुआ ...

    स्तब्ध ...!

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  11. राव साहब ,
    मूर्त तौर पर बेटन का डंडा गांवों में नहीं जा रहा है , पर सबसे ज्यादा असर गांवों तक ही जा रहा है | ठीक जैसे किसी भी डंडे का सबसे ज्यादा असर गांवों तक रहा है | इसका प्रमाण है आजादी के ६० साल बाद भी गांवों का उसी दशा में बने रहना | भौतिक बदलाव ठहरा है और चिंतन भी ठहरा है | आप एक रचनाकार के तौर पर सफल रहे हैं कि इस डंडे की अमूर्त-पहुंचन को देख सके हैं , महसूस कर सके हैं | कथा के सूत्र में एब्सर्दिती को रख सके हैं | गांवों के पात्रों की नजर से आपने देखा है इसलिए चित्रण बहुत जीवंत बन सका है | इन गाँव के पात्रों की कुल क्षमता कितनी है , आपने इसका यथार्थ उल्लेख किया है | ये कितना बोल सकते हैं , कितना हंस सकते हैं , कितना मूर्ख बन सकते हैं , कितना जी सकते हैं , कितना मर सकते हैं ..आदि आदि | सफल कथाजाल कहूंगा |

    @ आदरणीय अली जी ,
    जागरूक पात्र रमपतिया का मर जाना जरूरी है , नहीं तो रचना मर जाती | क्या यथार्थ में रमपतिया नहीं मरता ! रचनाकार ने इस पात्र को मार कर सर्वाधिक न्याय किया है | एक रचना की दृष्टि से इससे अच्छी मृत्यु क्या होती रमपतिया की | वह मर के ज्यादा जी रहा है संवेदन प्रक्रिया में ! एक दृष्टि यह भी है लेखन/लेखक की , रूसी कथाकार चेखव का मानना है कि रचनाकार को जैसा है वैसा रख देना चाहिए , समाधान को ( हल देने की ) रखने की योजना उसका काम नहीं | राव साहब ने तो उसी यथार्थ को रखा है | देखा जा सकता है कि रेणु 'मैला आँचल' में बामनदास को कैसे मारते हैं , इससे ज्यादा अमर मौत क्या होगी उनके उस प्रिय पात्र की ! ऐसे समय पर मुझे फिराक साहब का एक शेर अक्सर याद आता है ---
    '' यूँ तो जिन्दगी जिन्दगी से हार गयी
    लेकिन मौत मौत से बाजी मार गयी | ''

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  12. रानी का बेटन और उस पर चला यह कथानक....मजेदार तो है ही....कई अमूर्त बातों की ओर भी ले गया जो कि प्रत्यक्ष तौर पर नहीं नजर आतीं।

    @ रजुआ मन ही मन भैया जी को गरियाए जा रहा था – कौन ज़रूरत रहे चिक्कन सड़क बनववले के ? सड़क खराब होती तो हचका जोर होता और सहारा देने के बहाने जाने कितनी बार गोरकी को अँकवार में ले चुका होता! ड्राइवर ने गेयर बदला और एक्सीलेटर चाँपा। पुराने आयशर के इंजन ने रेस लगाई – फट, फट , फट , फट .......... फट, फट,फट...... । डांस के प्रोग्राम के बारे में सोचता पाँड़े चिल्लाया,”बहानचो, अजुए सब कलाकारी देखइबे?

    मजेदार रहा......

    शानदार पोस्ट है यार....एकदम झक्कास।

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  13. @ आदरणीय अमरेन्द्र जी

    प्रश्न ये कि रचना समाजोन्मुखी हो या समाज रचना शिल्प का मुखापेक्षी ? शायद साहित्यकार इसे बेहतर समझें पर मेरे मन में जो बात आई वो मैंने कही !

    मेरा ख्याल है कि गिरिजेश जी किसी सन्देश के इर्द गिर्द कथानक को बुन रहे थे परन्तु उनके कथा परिदृश्य में , छाये गहन अन्धकार के दरम्यान आशा की छोटी सी किरण , विरोध का कदम ताल किये बिना शेष हुई ! क्या ये ठीक है कि एक कतरा विरोध भी जीवित ना रहा ? और मृत्यु भी ऐसी जो संघर्ष की नहीं अपितु व्याधि की ?

    चलिये माना कि ये तय करना रचनाकार का काम है कि पात्र का अस्तित्व और भूमिका कहां तक विस्तार पायें ! फिर तो रचना से शत प्रतिशत अन्धकार / नैराश्य के सिवा क्या हासिल हुआ ?

    सामाजिक जीवन और प्रतिकूलतम परिस्थितियों में भी प्रतिपक्ष के सम्पूर्ण सफाये का ये आंकड़ा यथार्थ तो हरगिज भी नहीं है !

    अगर आप को लगता है कि दुनिया के किसी भी समाज या गांव में आलोक और अन्धकार के दरम्यान ०:१०० का अनुपात हो सकता है तो
    निश्चय ही मैं गलत हूं ?

    वर्ना रचना शिल्प की मृत्यु बेहतर होती :)

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  14. गाँव के अधकचरे विकास? को अपनी आँखों से देखा है इन पांच सालो में अत्यधिक तेजी से मशीनों का उपयोग करने को मिला है \बांध के रूपमे अपनी जमीन के मुआवजे को बेरहमी से खर्च करते पाया है |
    कितु आपकी इस कहानी ने जैसे सारेविकास को उसके साथ उपजे दर्दो को बेहद ईमानदारी और स्पष्टता के साथ अंकित कर दिया है रानी के डंडे द्वारा \

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  15. आपकी इस रचना ने सम्मोहित कर डाला. आभार.

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  16. भारतीय मनीषा आशावादी रही है ..पश्चिमी कहानियां जहाँ प्रायः दुखांत होती हैं भारतीय कहानियों में एक किरण झिलमिलाती रहती है ...भस्मासुर से अंततः महादेव बचा लिए जाते हैं मगर फ्रैकेंन्स्तींन में नायक की दर्दनाक मृत्यु हो जाती है ...मुझे लगता है रचना की सोद्येश्ता होनी चाहिए ....कोई किरण दिखनी चाहिए और इसलिए कुछ सायास भी रचा जाना चाहिए ,
    वैसे यह घनघोर विवादित विषय है ...

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  17. sahiye me....rampatiya jaiso ka to ihe hashar hona tha aur hota rahegaa....


    ek baat aur ....ee hamara man na hai ki jinke oopar ee vyangva likhe hain unme itna akal naam ki cheej to hai nahi ki samajh sakein.....

    kuchh aisa kariye ki ii moti buddhi walo k andar bhi kuchh prakash faile.....matlab inme kuchh halchal ho!

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  18. भाग [ १ / २ ] ... ...
    @ आदरणीय अली जी ,
    शिल्प की मृत्यु करके प्रभावहीन आशावादिता बचाने का क्या मतलब ? .. इन परिस्थितियों में खामखाँ को किसी को नायक बना कर समाजोन्मुखी रचना का ताना-बाना बुनना खुशफहमी को जिला सकता है पर संवेदना को झिंझोड़ नहीं सकता ..
    @ फिर तो रचना से शत प्रतिशत अन्धकार / नैराश्य के सिवा क्या हासिल हुआ ?
    --- यह अगर समाज को हासिल नहीं हुआ तो रचना ही हासिल क्यों करे ! विदर्भ के किसानों की हत्याएं किस आशावादिता को बखानें , आर्य !

    एब्सर्दिती को दिखाना था , ऐसा शिल्प प्रस्फुटित हुआ .. गौर करने लायक है की यहाँ किसी पात्र को नायक मानना गलती है , पूरा गाँव ही नायक है , जितना जीवित है उतना ही मर रहा है , जीने के आशावाद से बड़ा है मरण का यथार्थ ! .. बदलाव की पीडाभारी प्रतीक्षा !.. राजनीतिक प्रतिरोध के नाम पर भैया जैसे पात्र ही होते हैं गाँव में , जिनकी 'पोलीटिकल विल' की हकीकत वही है जिसे राव साहब ने दिखाया है .. गुडगाँव -दिल्ली की प्रेमविवाह करके पहुँची छोरी अपनी क्रांतिकारी चेतना को फुस्स कर बैठी है , संभव हो उसने कभी मेट्रोपोलिटन में स्त्रीवाद को लेकर आवाज उठायी हो , पर आज वही है उसका यथार्थ गाँव में ! .. और पात्र भी तो उसी यथार्थ को रख रहे हैं , जिसमें आशा की किरण छलावा है , इसलिए उनकी बातों में लहजे से लेकर 'कंटेंट' तक में एब्सर्दिती के लक्षण हैं !

    [ जारी ....... ]

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  19. भाग [ २ / २ ] ... ...

    आदरणीय अली जी ,
    अब आते हैं पात्र रमपतिया पर ..
    कथानक में मौजूद सभी पात्रों में सर्वाधिक समझदार सा - बोलता सा वही है , 'मीडिया' का प्रभाव भी तो है , इससे मोहभंग भी तो हो ..
    प्रश्न है कि वह ऐसा क्यों बोलता है और एड्स से क्यों मरता है ?
    उसे पता हो गया है कि अब वह ज्यादा जीने को नहीं रहेगा , समझौतों से भरी उसकी जिन्दगी शीघ्र ही ख़त्म होने को है , इसलिए वह जो समझ पा रहा है वह सत्य 'बक' रहा है , अन्य किसी पात्र में यह साहस नहीं हो सकता , इसे ऐसे ही रखा जा सकता था !
    सवाल है मरना एड्स बीमारी से क्यों ?
    गांवों में पहुँच रहे इस 'राजरोग' से ज्यादा प्रासंगिक क्या होता , ग्रामीनेओं में सरकार के जागरूकता अभियान की असलियत भी खोलता हुआ , अन्डास !! .. मैं गाँव से हूँ जानता हूँ कि शहर से फैलती हुई यह मौत-बेल कैसे गाँव जा रही है , उदाहरण आखों में तैर रहे हैं ! ऐसा व्यक्ति 'रानी के डंडा' पर जो निगाह रखेगा वह ज्यादा अहम् है , आर्य !

    @ भारतीय मनीषा का आशावाद वर्तमान परिस्थिति में फुस्स हो चका है . इसके लिए सुधारवाद/आशावाद से यथार्थवाद की ओर बढ़े प्रेमचंद के साहित्य को देखें ! सुनें गबन का देवीदीन खटिक क्या कहता है , सुनें गोदान के दातादीन की पुरोहिती को लेकर की गयी भविष्यवाणी , समझें कफ़न के घीसू और माधव की नादानी (?) ... देखें मुक्तिबोध के अँधेरे में का जुलूस .. ६० के दशक के बाद के मोहभंग को भारतीय मनीषा से अलग करना कितना न्याय होगा ? .. आशावाद के डंडे को १९ वी सदी के पहले हांकते रहें तो बेहतर पर बाद के 'डंडों' पर आशावाद की चमक नहीं है ...... 'रानी के डंडे' में भी नहीं !

    [ ... ... समाप्त ]

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  20. 'चोरबजारी दो नयनों की' बहुत पसंद है न आपको? मैं समझ रहा हूँ क्या सोच-सोच के लिखा गया है :)

    'अरे नाचsss!!' हे हे... चाँपे रहिये चार नंबर गियर में.

    गाय का गुह मूत :)

    सबके धन की बात के बाद तो मामला सीरिया हो गया... थोडा और घुमाना था ना डंडा.

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  21. @ अभिषेक ओझा

    मैं न बदला तू न बदली दिल्ली सारी देख बदल गई
    ...
    ...
    रंग बिरंगा पानी पी के सीधी साधी कुड़ी बिगड़ गई।

    पब्लिक इशारे नहीं समझ पाती वीरू ! बड़ी ट्रेजेडी है।

    निसाखातिर रहें आप का धन सुरक्षित है ;)

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  22. @ आदरणीय अमरेन्द्र जी

    आपने संभवतः गौर नहीं किया , जो मैंने लिखा !

    "अगर आप को लगता है कि दुनिया के किसी भी समाज या गांव में आलोक और अन्धकार के दरम्यान ०:१०० का अनुपात हो सकता है तो निश्चय ही मैं गलत हूं ?"

    मैं उसे नायक बतौर नहीं ! देखता मेरा मंतव्य केवल ऊपर की "पंक्तियों" में देखा जाये !

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  23. @ आदरणीय अली जी ,
    शायद हम कोई भी एक दूसरे पर गौर नहीं कर पा रहे हैं ! :-)

    एक रचना में अँधेरे की बात की है मैंने , उस अँधेरे को दिखाने की इमानदारी ! रचना में यह अनुपात व्यवस्था देखना आवश्यक नहीं लगता ! मुक्तिबोध के 'अँधेरे में' रचना में क्या यह अनुपात व्यवस्था दिखेगी ! फिर ऐसी टाइप की रचना में अनुपात व्यवस्था का क्या तुक ?

    नायक आपने नहीं देखा ठीक ही किया , पर यहाँ पर कहाँ से / किस पात्र से / किस संवाद से / किस भूमि से आलोक /सकारात्मक/भारतीय सुखान्त/ आशावाद ... आदि आदि की योजना हो ? यह भी तो नहीं समझ में आ रहा है !

    और ऐसे ही हम लोग लगे रहे तो मजाजीवी इन बतकहियों को 'गाय का गुह मूत' से प्रकारान्तरित करते रहेंगे ! : -)

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  24. उसने तय किया कि कल से गाँव में वह अखबार बाँटेगा और पढ़ कर सुनाएगा भी।

    अली सा,
    बस अंत में उपर का वाक्य जोड़ना था और आशा की किरण दिखाई देती। पर उससे क्या हासिल? कहानी ऐब्सर्डिटी को लेकर चलती है। बहुत कुछ अमरेन्द्र जी कह चुके हैं। दुहराना ठीक नहीं है।
    सोद्देश्यता और संघर्ष की सम्भावनाएँ क्या एक कहानी के अंत से ही शेष हो सकती हैं? जो यथार्थ स्थापित सा हो चला है, उसे जस का तस रख देना ताकि लोग सिहरें , सम्वेदनाएँ जुम्बिश लें क्या पर्याप्त नहीं है? सबसे बड़ी बात यह कि मुझे अपने प्रति ईमानदार रहना था।
    गाँव में बेटन के वाकई पहुँचने की जरा कल्पना करें! हमारे रहनुमाओं को यह कल्पना भी नहीं है तभी तो वे समझते हैं कि 70% जनसंख्या के लिए न खेल हैं और न उन्हें इस तथाकथित खेल भावना से कुछ लेना देना है। कहीं वे सही भी हैं - उन्हीं का किया धरा तो गाँवों में दिख रहा है। उनसे बेहतर कौन जानता है? ... ग़ुलाम मानसिकता तो देखिए - लखनऊ में एक पूँजीपति बेटन का अपहरण कर लेता है और सारा प्रशासन तमाशा देखता रह जाता है! रायबरेली में डंडे को छूने भर के लिए मार पीट हो जाती है!! सारनाथ में ध्यानस्थ बुद्ध के आगे डंडा रखा जाता है !!! - कितनी ऐब्सर्डिटियाँ चाहिए बच खुच गई आस को भी पलीता लगा उड़ा देने के लिए? ऐसी घटनाएँ हमें विराट ऐब्सर्डिटी का एहसास रह रह करा जाती हैं। ... मुक्तिबोध के आत्मसम्भवा से कुछ नहीं होने वाला ... सर्वजन जुलूस अब दिनदहाड़े निकलता है, रात की जरूरत नहीं। कलीमुद्दीपुर बार्डर पर अब बामनदास नहीं मरेंगे ... चिथड़े बाँधने के लिए चेथरिया पीर नहीं जाना, कहीं भी बाँधा जा सकता है और चमत्कार का बस इंतज़ार किया जा सकता है, बस इंतज़ार। ..

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  25. अली सा और अमरेन्द्र जी,
    आप लोगों की समालोचक दृष्टि ने मुझे प्रसन्नता दी है। संतोष हुआ है कि हिन्दी ब्लॉगरी में इतनी समृद्ध आलोचनाएँ और विमर्श हो सकते हैं। यकीन मानिए मुझे आस की किरण दिखाई दे रही है। ऐसे मित्र हों जिनके साथ रह कर अपने को निखारा जा सके - इससे अच्छा भाग्य क्या हो सकता है! आज हिमांशु पाण्डेय जी की कमी खल रही है। जाने उनका ब्रॉडबैण्ड खराब हुआ है कि वे त्याग चुके हैं .... हिन्दी ब्लॉगरी के लिए क्षति होगी यदि आशंका सच है।
    @ मज़ाजीवी
    ये ब्लॉग देखने चाहिए।
    http://ojha-uwaach.blogspot.com/
    http://kuchh-baatein.blogspot.com/
    अभिषेक जी ब्लॉग जगत के रत्न हैं। जिस तरह से पहले भाग में 'मो सम कौन' ने मोछउखरनी में निहित इशारे को समझा वैसे ही अभिषेक जी ने गीत के चयन में अंतर्निहित इशारों को समझा है। इस रचना में बहुत कुछ बिखरा पड़ा है। मैं रौ में लिख गया, अब खुद महसूस कर रहा हूँ। कहानी की मॉडुलेरिटी पर भी नज़र गई है। यह अंशों 2,3,4,5,6 में से हर किसी पर समाप्त की जा सकती है और हर बार कुछ अलग से प्रभाव छोड़ेगी।

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  26. @गिरिजेश जी
    अरे मैं तो आया था बात को और लंबा तानने के हिसाब से पर रचनाकार खुदै आ गये अब उनकी 'रचना' जो ना करै :)
    गिरिजेश भाई बहस तभी हो पाई जब आपने मौक़ा दिया !
    @अमरेन्द्र भाई :)

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  27. @ अली सा,
    रचवैयों को कोई रोक पाया है? आप लोग जारी रहिए। मैंने सोचा कि अपनी बात कह दूँ। सबसे अच्छी रचना 'सेल्फ ड्रिवेन'होती है। आप को मज़बूर कर खुद को रचवा जाती है :)

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  28. रानी का डंडा फिर चल गया । दिल्ली में वैट बढ़ गया । तेल की कीमतें बढ़ गयीं ।

    गजब ढाये है रानी का डंडा ।

    इसे कहते हैं सर्वश्रेष्ठ व्यंग । बहुत बहुत आभार ।

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  29. वर्डप्रेस पर प्राप्त टिप्पणी:
    Congratulations! Awestruck. Beautiful. Took me lots of time to read. Hindi mein haath tang nahin hai par monitor pe annkhe nahin tikti. Will rate it in Phanishwarnath Renu's "PanchLaat" (Petromax). ...प्रायश्चित स्वरूप गाय का गुह मूत पहले ग्रहण करना पड़ा। जाति बिरादरी से बाहर करने के बजाय इसी पाँड़े के बाप ने यह रास्ता निकाला था। Maila Anchal- Justification of pre marital pregnancy as to save the future progeny...

    गोरकी असल में एक भूतपूर्व एथलीट थी जिसका खेल जगत में योगदान भारत की फुटबाल टीम से कम नहीं था। ... lovely...

    Though I don't get to read much contemporary literature in Hindi and vernacular but I guess Hindi bloggers should vote for best stories and then could together think of shooting short stories into short films. I am serious.

    Sad to see only two women commented.

    Thanks again for a wonderful weekend gift.

    Peace,

    Desi Girl

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  30. दोनो भाग पढ़ा.
    हास्य-व्यंग्य की भरमार के बीच आखिर तलवारें खिच ही गईं. ग्रामीण बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होने वाली गालियों का सटीक प्रयोग इसे सजीवता प्रदान करने में सहायक हुए हैं.
    अली सा का विरोध और अमरेन्द्र जी का तर्क दरअसल एक सिक्के के दोनो पहलुओं को उजागर करते हैं.
    मुझे तो रमपतिया का मरना कहीं से नहीं खलता. यह तो ठहरे हुए पानी में पत्थर फेंकने जैसा ही है..या कहें भगत सिंह का संसद में गूँगे-बहरों को जगाने के लिए किया गया बम विस्फोट..!
    ..अभी भी बहुत गरीब और बहुत अनपढ़ है, हमारे देश की आम जनता. जो कुछ कर सकते हैं, वे हिज़ड़ों की तरह सुविधाओं की चादर ओढ़े सो रहे हैं. उनको जगाने के लिए जरूरी था रमपतिया का मरना.
    ..इसे पढ़कर देर से आने का मुझे भी अफसोस है.
    ..बधाई.

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  31. @अगर टेलीकास्ट नहीं हुआ तो आप लोग यहीं के हो के रह जाएँगे।

    @अब बस अखबार में ही आस है।

    @दिल्ली खुदी पड़ी है। उसके गड्ढों में रोज करोड़ो डाले जा रहे हैं। गड्ढे हैं कि भर ही नहीं रहे।

    @जुलूस निकलते रहेंगे कभी बैनरों के साथ और कभी डंडे के साथ। बीमारी वैसी की वैसी रहेगी। ... भगवान रमपतिया जैसी मौत किसी को न दे।


    बेहद खूबसूरत!

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  32. आज दोनों अंक पढ़े। बहुत बड़ी रेंज है। बहुत खूब! बधाई!

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