गोरकी असल में एक भूतपूर्व एथलीट थी जिसका खेल जगत में योगदान भारत की फुटबाल टीम से कम नहीं था। घटित के तेज बहाव से निज़ात पाकर उसने अपने को ट्रैक्टर की चाल पर लुढ़कता पाया। संतुलन के लिए उसे कभी पाँड़े तो कभी रजुआ की देह का सहारा लेना पड़ रहा था। रजुआ मन ही मन भैया जी को गरियाए जा रहा था – कौन ज़रूरत रहे चिक्कन सड़क बनववले के ? सड़क खराब होती तो हचका जोर होता और सहारा देने के बहाने जाने कितनी बार गोरकी को अँकवार में ले चुका होता! ड्राइवर ने गेयर बदला और एक्सीलेटर चाँपा। पुराने आयशर के इंजन ने रेस लगाई – फट, फट , फट , फट .......... फट, फट,फट...... । डांस के प्रोग्राम के बारे में सोचता पाँड़े चिल्लाया,”बहानचो, अजुए सब कलाकारी देखइबे? एकदम सिलो चलाउ।“ सहारा लेती गोरकी ने कुछ संतुलन पाया तो आखिरी मदद के तौर मोबाइल निकाला हालाँकि उसे उम्मीद कम ही थी। पाँड़े ने देखा तो फिस्स से हँस दिया और अपनी जान में गोरकी को समझ आए उस तरह से बोला,”मैडम जी, इहाँ इसका नेटवरक नहीं चलेगा। बात करने के लिए उँचास छत पर जाए के परी...”। पाँड़े ने अपना चमचमाता चाइना मोबाइल निकाला तो गोरकी दंग रह गई। पाँड़े ने फुल वाल्यूम में गाना लगाया – “चोरबजारी दो नयनों की ...“
नाचsss रानी! अरे नाचsss!! गोरकी को यह आदमी अट्रैक्टिव लगने लगा था । भरी भींड़, सरकारी अधिकारी, पुलिस – इन सबके बीच पाँड़े द्वारा अपहरण कमाल प्रभावकारी था ही। यह सोच कि – लेट हैव फन, गोरकी ने पहला ठुमका लगाया तो भींड़ पगला उठी। पाँड़े के इशारे से ट्रैक्टर बन्द हो गया और रजुआ, बहोरना, पाँड़े, गोरकी ट्रॉली पर अजीबोग़रीब बेताल ताल हीन नाच में जुट हो गए।
लाला ने सफारी सूट पहने एक अधिकारी के सामने ठुमकना शुरू किया तो एक कार्यकर्ता ने अधिकारी का हाथ पकड़ उसे नचाना शुरू कर दिया। समाँ बँध गया। ट्रॉली पर गीत की धुन पर नाचते लोग तो नीचे जमीन पर तोंद लड़ाते लाला, अधिकारी, कार्यकर्ता ... पाँड़े के हाथ में रानी का डंडा रह रह ऊँचा उछ्ल रहा था। सोनमतिया की माई गुलगुल हो हँसे जा रही थी। बाकी औरतें लीन थीं – धन धन रानी !
(3)
ट्रैक्टर पहुँचने में देर होता जान भैया जी ने ह्विस्की का एक घूँट निगला और लखटकिया मोटरसाइकिल पर सवार हो चले। सड़क का काम खत्म होने के तुरंत बाद बड़े शौक से यह मोटरसाइकिल दिल्ली से मँगाए थे और उसे बहुत कम ही निकालते थे। रास्ते में ही जो नज़ारा दिखा उसकी कल्पना उन्हें भी नहीं थी।
पाँड़े होनहार था। उससे सतर्क भी रहना पड़ेगा। ऐसे पालतू कटहे बनने में देर नहीं लगाते।
मोटरसाइकिल को ट्रॉली के बगल में खड़ी कर भैया जी दहाड़े,”बन्द कीजिए यह भड़ैती।“ नाच को ब्रेक लग गया। पाँड़े सकपका कर नीचे उतर कर रानी का डंडा उनके हाथ में देने लगा। गोरकी तो ऑ स्ट्रक! अभी तक जिसे हीरो समझ रही थी वह तो प्यादा निकला! ये कौन आया? स्मार्टी। थंडरबर्ड बाइक ! वाव !!
रानी के डंडे को हाथ में ले उस पर उपेक्षा की एक दृष्टि डाल भैया जी अधिकारी सम्बोधन मुद्रा में आ गए,”इतने पावन अवसर पर आप लोगों को मसखरी सूझ रही है? भारत के किसी गाँव में पहली बार यह .. यह .... आया है। शर्म कीजिए आप लोग। इज़्ज़त बख्शने के बजाय नौटंकी? इंस्पेक्टर साहब ! अच्छा हुआ कि आप एस्कार्ट में हैं नहीं तो ये लोग तो इसका, इसका ... पीछे से लाला फुसफुसाए- बेटन... हाँ, बेटन की बेइज्जती ही कर डालते! चलिए आप लोग। वहाँ बेटन का विधि विधान से स्वागत होगा।” बाइक स्टार्ट करते भैया जी ने लाला पर कृतज्ञ दृष्टि डाली। रानी के डंडे को डंडा कहना पड़ता ! कितनी बेशर्मी होती !! लाला ने बचा लिया। उन्हें नाम भूल कैसे गया था?
जुलूस चुपचाप चल पड़ा। घर के बगल से गुजरा तो रमपतिया भी लाठी ठेगता पीछे पीछे चल पड़ा। मार गई फसल लिए कोई किसान खलिहान जा रहा था क्या?
(4)
भैया जी ने लव मैरेज किया था। दिल्ली की सरदारन जब दुलहिन होकर आई थी तो लड्डू तो बाद में बँटे, प्रायश्चित स्वरूप गाय का गुह मूत पहले ग्रहण करना पड़ा। जाति बिरादरी से बाहर करने के बजाय इसी पाँड़े के बाप ने यह रास्ता निकाला था। वक़्त के साथ दुलहिन ने अपने को ऐसा बदला कि लोग बाग सन्न हो गए। साड़ी पहने आधा सिर ढके जब दुलहिन तुलसी चौरा पर पयकरमा करती थीं तो लगता जैसे सछात देवी हों ! घर बाहर सब सँभालती दुलहिन आदमी जन की ‘दुलहिन भैया’ हो गई। आज कोठी के रजदुआरे पर दुलहिन आरती थाल सजाए खड़ी थीं।
भैया जी मोटरसाइकिल पर आते सबसे आगे दिखे पीछे टट्टर टाली पर गोरकी समेत सभी लोग। अगल बगल मोटरसाइकिलें, टाली के पीछे कारें और सबसे पीछे टीवी वाले। उनकी महतारी ने देखा तो उन्हें लगा कि टी वी वाले किशन कन्हैया महभारत में रथ दौड़ा रहे हों! जेवनार फेवनार भाखने लगीं।
दुलहिन ने बुदबुदाते हुए रानी के डण्डे की आरती उतारने को दीप बालना ही चाहा कि भैया जी ने रोक दिया। पाँड़े को इशारा मिला और तुरत फुरत टी वी वाले कैमरा सैमरा तान कर तैयार हो गए। भैया जी ने फिटर्रे के कान में फुसफुसी की – लाइव और रिकार्डिंग दोनों । उसने सहमति में सिर हिलाया ही था कि दो अधिकारी आ कर भैया जी के आगे गिड़गिड़ाने लगे,”सर ! अब तक ठीक था लेकिन टेलीकास्ट हुआ तो ग़जब हो जाएगा। हम कहीं के न रहेंगे।“
भैया जी ने प्रेमिल स्वर में कृपा की वर्षा की,” अगर टेलीकास्ट नहीं हुआ तो आप लोग यहीं के हो के रह जाएँगे।“
शांति छा गई।
भैया जी डण्डे को लिए थंडरबर्ड पर सवार हो गए। बगल में गोरकी ओठ निपोरे आ सटी। दुलहिन ने दीप जला डण्डे को तिलक लगाया और आरती उतारने लगीं। पुरोहित जी ने स्वस्तिवाचन प्रारम्भ किया,” स्वस्ति नो इन्द्रो ..स्वस्ति नो पूषा...”।
फिटर्रे मनई ने माइक ले गद्गगद स्वरों में जोर जोर से रोदन सा पाठ शुरू किया,”दिव्य है यह दृश्य! ऐसा भारत के गाँव में ही सम्भव है। इतनी सरलता, इतनी आत्मीयता, इतना प्रेम और कहीं देखने को नहीं मिला। मैं भाव विह्वल हो रहा हूँ। राष्ट्रकवि की पंक्तियाँ याद आ रही हैं – अहो ! ग्राम्य जीवन ..... “
सबसे पीछे खड़ा रमपतिया आँखें पोछता बुदबुदाया,”अब बस अखबार में ही आस है।“
सारे तमाशे का अंत जब शंख ध्वनि से हुआ तो वापस लौटते तमाशबीनों में रमपतिया दूर सबसे आगे हो गया। ढलते सूरज के कारण लाठी ठेगते रमपतिया का साया राह पर कुछ अधिक ही लम्बा लग रहा था। सरकारी गाड़ियों ने लौटने में जो तेजी दिखाई वैसी तेजी अगर आज़ादी के बाद काम करने में दिखाई गई होती तो आज ....
हाइवे पर पहुँच कर अम्बेसडरों में मोबाइल पर बिन पूछे जाने किन किनको सफाई दी जा रही थी। जो चुप थे वे ट्रांसफर और सस्पेंसन से बचने की राह जोह रहे थे। गोरकी ने राह में उछ्लते छौने को देख ड्राइवर को कोंचा,” इट वाज ए रियल फन!” और आँख मार कर हँसते हुए गोद में पड़े बेटन को सहलाने लगी। भैया जी ...
(5)
घर पहुँचते पहुँचते रमपतिया की तबियत खराब हो गई। खाँसी को किसी तरह काबू कर वह लेटा तो जो आँख लगी वह अधराति खुली। बाहर आया और अचानक दिन का देखा सुना नए नए अर्थ ले उसके दिमाग में घुमड़ने लगा। जब गाँव में यह हाल है तो शहरों में क्या होगा? निज़ाम, प्यादे, खिलाड़ी, समूची सरकारी मशीनरी, प्राइवेट पूँजीपति सभी बेटन बेटन ... उसने गिना। अखबार पढ़े हुए तीन महीने छ: दिन हो गए थे। करिखही रात को घूरते हुए तय किया कि आज अखबार लाएगा, पढ़ेगा और पढ़ाएगा। साइकिल तो अब चलने चलाने से रही। पैदल ही लक्ष्मीपुर स्टेशन को चल पड़ा। गाड़ी आने तक तो पहुँच ही जाएगा।
टेसन पर चाय पानी की तैयारी में जुटे मिसिर की दुकान पर ताजे और पुराने अखबारों को पढ़ कर वह तरो ताज़ा हो गया। मिसिर के बहुत रोकने पर भी वह अखबार हाथ में लिए गाँव को वापस हो लिया। आसमान में घनी बदरी छाई हुई थी। सुबह सुबह बला की उमस थी।
(6)
रजुआ ने घर घर घूम रमपतिया का सन्देशा पहुँचा दिया और दस बजते बजते एक छोटी भीड़ उसके दरवाजे पर इकठ्ठी हो गई। चौकी पर लेटे लेटे ही रमपतिया ने कहना शुरू किया,” अंत आ पहुँचा है। आप सब से भेंट करना था और अपना फर्ज अदा करना था सो बुला लिया। बड़ छोट सब माफ कर दें। महीनों के बाद आप को अखबार सुनाना अच्छा लगेगा। इस बार खबर नहीं, खबर का अर्क बाटूँगा। कल जो रानी का डण्डा आया था वह साधारण नहीं था। गए ज़माने की रानी, सात समन्दर पार की अब की रानी, अपने देश की रानी और इस प्रदेश की रानी और उनके निज़ाम ....” खाँसी आई तो मुँह से खून निकल पड़ा... रुक कर पोंछते हुए उसने पूरा किया ,”सब एक ही थैले के चट्टे बट्टे। डंडे की माया सभत्तर है। यह डंडा मन्दिर में शीश नवाता है और लाइन में लगे लोगों की जेबें भी साफ करता है। कॉमनवेल्थ का प्रतीक है यह। कॉमन माने सबका और वेल्थ माने धन – सबका धन। घूम घूम कर खेल खेल में सन्देश फैला रहा है। धन तो सबका है। चाहे यहाँ रहे या वहाँ, क्या फर्क पड़ता है? बहोरना की जेब का हजार और बाहर देश के खाते में हजार करोड़ सब बराबर हैं। सबके हैं – इधर उधर से क्या? बिधायक का टट्टर, लाला का लोन, सोनमतिया की माँ का पेंशन, गन्ने का पेमेंट ... यह सब छोटी बाते हैं। या तो मिलते नहीं, जो मिलें तो हजार बन्दिशें ! सरकार की माली हालत दुरुश्त है। बाहर साख मज़बूत हुई है। हम अब धनी कहाने लगे हैं। देखिए न, नरेगा के नाम पर सरकार आप सबकी दारू बोटी का जुगाड़ भी तो कर रही है!मालिक लोग खाते खाते कुत्तों के आगे भी तो फेंक देते हैं ! है कि नहीं? ” रुक कर उसने पानी पिया और मुँह से आते खून को फिर पोंछ दिया। “स्कूल में बँटते खाने को किसी ने चखा कभी? पढ़ाई लिखाई फैलाने के लिए रानी ने जो धन यहाँ भेजा था उससे लोगो ने एसी, टीवी और जाने क्या क्या खरीद डाले! 2400 करोड़ रूपए के भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है। रानी के प्रधानमंत्री ने तो कह दिया है कि इस बार अनुदान में भारी कटौती होगी। भारत के धनी लोग ग़रीबों की मदद करें। ...ग़रीबों की मदद में उसने यहाँ डण्डा भेज दिया है। पूरा देश पगलाया स्वागत में जमींदोज हो रहा है और उधर दिल्ली खुदी पड़ी है। उसके गड्ढों में रोज करोड़ो डाले जा रहे हैं। गड्ढे हैं कि भर ही नहीं रहे। जिन ताल पोखरों की गहराई बढ़ा कर, बन्धा बना कर आप लोग गुलगुल हैं, उनमें पानी कहाँ से आएगा? इसके लिए पैसा आ कहाँ से रहा है? कभी सोचा? .... कौन यहाँ ग़रीब नहीं है? धनिक भी बिखरे पड़े हैं - अफरात लेकिन उनसे मदद मिलेगी आप को?” उसकी आँखों की चमक दुगुनी हो चली थी जैसे भभकता दिया बुझने की तैयारी में हो!
“... माया से निकलिए। डंडे की मार को समझिए। दिल्ली तो फिर सज सँवर जाएगी, नौटंकी भी खत्म हो जाएगी। लेकिन डण्डे के झंडाबरदारों ने आप की जो हालत हमेशा के लिए गढ़ कर फाइलों में रख दी है, उसका क्या ? ....” चुप हुआ और मुँह खुल गया।
अखबार के पन्ने हवा से इधर उधर उड़ने लगे। रमपतिया ने हिचकी ली, उसका मुँह और खुल गया। पास खड़े लोगों ने देखा खुले गले में खून का भभका उपराया और फिर भीतर चला गया। बात बेबात दाँत चियारने वालों की तरह उसकी बतीसी उभर आई। आँखों की चमक आसमान ताकती रह गई और सिर अकड़ गया जैसे किसी भदेस मजाक पर मज़ा लेते आदमी को फ्रेम कर दिया गया हो। भैया जी के कार्यकर्ता ने उसके चेहरे पर अपना गमछा डाल दिया। गुमुन्द बदरी से टपाटप बूँदे गिरने लगी थीं।
दूर राजधानी में तीखी धूप में ही अचानक बारिश शुरू हो गई। गोरकी ने रानी के डंडे को भीगने से बचाने के लिए रंग बिरंगी छतरी तान काला चश्मा चढ़ाया और दूरस्थ कैमरे के लिए बेपरवा पोज देने में व्यस्त हो गई।
... मुँह में गमछा ठूँसे भीगता बहोरना सोचे जा रहा था,”इस देश को एड्स हो गया है। जुलूस निकलते रहेंगे कभी बैनरों के साथ और कभी डंडे के साथ। बीमारी वैसी की वैसी रहेगी। ... भगवान रमपतिया जैसी मौत किसी को न दे।“ (समाप्त)
