बुधवार, 6 दिसंबर 2017

रामजन्मभूमि रामजन्मस्थान मंदिर का इतिहास - निर्माता गहड़वाल राजा

वंश्यन्तदेव कुलमाकुलतानिवृत्तिनिर्व्यूढम[प्रतिम] विक्रमजन्मभूमिः।
यत्रातिसाहससहस्रसमिद्धधामा मा नो जनिष्ट जगदिष्टतमोत्तमश्रीः॥ 
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टंकोत्खातविशालशैलशिखरश्रेणीशिलासंहति-
व्यूहैर्विष्णुहरेर्हिरण्यकलशश्रीसुन्दरं मन्दिरम्।
पूर्वैरप्यकृतं ….. नृपतिभिर्येनेदमत्यद्भुतम्
संसारार्णवशीघ्रलंघनलघूपायान्धिया ध्यायता॥ 
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उद्दामसौधविबुधालयनीमयोध्यामध्यास्य तेन नयनिह्नुत वैशसेन।
साकेतमण्डलमखण्डमकारि कूपवापीप्रतिश्रयतडागसहस्रमिश्रम्॥
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ऊपर की पंक्तियाँ उस शिलालेख से ली गयी हैं जो 6 दिसम्बर 1992 को ध्वस्त ढाँचे में मिला था। उसके अनुसार गोविंदचंद्र गहड़वाल के सामंत मेघसुत अनयचंद्र ने रामजन्मस्थान का मंदिर बनवाया था। स्पष्ट है कि कालांतर में मुसलमानों ने उसे ही ध्वस्त किया। 
गोविंदचंद्र के बाबा चन्द्रदेव गहड़वाल के चन्द्रावती अभिलेख के अनुसार वह काशी, कुशिका (कन्नौज), उत्तर कोशल (अयोध्या) एवं इन्द्रस्थानियक (?) के पवित्र स्थलों के अभिरक्षक थे (1090 ई.)।
मीर बाकी द्वारा ध्वस्त श्रीराम जन्मस्थान स्थित विष्णु हरि मन्दिर से प्राप्त अभिलेख का समय 11वीं - 12वीं सदी है। इस वंश का आधिपत्य 1237 से आगे तब तक रहा जब मुसलमानों ने आक्रमण कर काशी के मन्दिरों को ध्वस्त कर दिया। 
इस वंश में अन्य राजा मदनपाल, गोविन्दचन्द्र, विजयचन्द्र, जयचन्द्र, हरिश्चन्द्र, अदक्कमल्ल हुये। जयचन्द्र पृथ्वीराज के समकालीन थे। भाँट गाथाओं के विपरीत, जयचन्द्र की कथित गद्दारी के कोई प्रमाण नहीं मिलते। 
चित्र में दर्शाया गया निष्क गोविंदचन्द्र का है। साम्राज्य की समृद्धि स्पष्ट है।
एक अन्य रोचक तथ्य यह है कि बारहवीं सदी तक भी भारत धरा पर बौद्ध धर्म बना हुआ था, जनता एवं राज परिवारों द्वारा संरक्षित था। गोविंदचंद्र की चार रानियाँ थीं - नयनकेलि देवी, गोसल्ला देवी, कुमार देवी तथा वसंता देवी। कुमारदेवी बौद्ध थीं एवं वसंतादेवी महायानी बौद्ध थीं। दिल्ली राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी हुई बौद्ध वज्रतारा की बलुये पत्थर की प्रतिमा का चित्र नीचे दिया हुआ है जो कि इन्हीं गहड़वालों द्वारा बनवाई गयी थी। 

कुमार देवी के एक अभिलेख में तुरुष्कों (तुर्कों) से काशी की रक्षा हेतु गोविंदचंद्र को स्वयं हर (शङ्कर जी) द्वारा भेजा गया बताया गया है। 
गोविंदचंद्र के चंदेल राजा मदनवर्मन से अच्छे सम्बंध थे जिसकी पुष्टि मदनवर्मन के अभिलेख से होती है। 
चंदेलों ने शैव, शाक्त एवं जैन तीन पंथों का संरक्षण किया तो गहड़वालों ने वैष्णव, शैव एवं बौद्ध सम्प्रदायों का। 
बौद्ध रानी द्वारा शैव काशी की रक्षा हेतु लिखवाया गया अभिलेख तत्कालीन धर्म मान्यताओं के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। 
बौद्धों का नाश ब्राह्मणों ने नहीं, बारहवीं सदी से भीतरी भारत में घुस आये मुसलमानों ने किया, यह सिद्ध हो जाता है, साथ ही यह भी कि तब तक भारत में विभिन्न मत मतांतर सामञ्जस्य में रह रहे थे। 
मार्क्सवादियों ने जान बूझ कर जाने कितने तथ्य छिपा दिये, विकृत किये या नष्ट कर दिये। उन्हें मुसलमानों को बचाने के लिये ब्राह्मणों को बौद्ध संहारक दर्शाना था। 
विडम्बना ही है कि आज भीम भीम कहते नवबौद्ध अपने संहारक मीम के साथ गोटियाँ बैठाने में लगे हुये हैं। इतिहास! इतिहास!!

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