रविवार, 10 दिसंबर 2017

इसाई अत्याचार एवं मिथ्याचरण : सेण्ट थॉमस की झूठी कब्र तथा कपालीश्वर शिव मंदिर का विध्वंस

महाभारत, कालिदास के रघुवंश सहित अनेक प्राच्य प्राचीन स्रोतों में वर्णित प्राग्ज्योतिषपुर (कामरूप नाम से भी प्रसिद्ध) के बारे में दो मत हैं – एक पश्चिमी तटीय क्षेत्र में कहीं तो दूसरा उत्तर पूर्वी क्षेत्र में वर्तमान गौहाटी के निकट। यह भी सम्भव  है कि एक नाम के दो क्षेत्र रहे हों। प्राचीन भारत की पश्चिमी सीमा कभी वर्तमान अफगानिस्तान एवं ईरान की सीमा के निकट थी, इसके लिये परोक्ष प्रमाण हमें पूरब के प्राग्ज्योतिष से मिलता है। वह क्षेत्र भारत का कभी पूर्वी सीमांत था।
पूरब से सम्बंधित कालिका पुराण में एक उल्लेखनीय संदर्भ है – अत्रैव हि स्थितो ब्रह्मा प्राङ् नक्षत्रं समर्ज ह। ततः प्राग्ज्योतिषाख्येयं पुरी शक्रपुरीसमा॥ ब्रह्मा द्वारा प्राग्ज्योतिष क्षेत्र में नक्षत्रों के सृजन की कथा उस बहुत पुरानी ज्योतिष परम्परा का सङ्केत देती है जिसके अवशेष सूर्य पूजा के रूप में इस क्षेत्र में मिलते हैं। मार्कण्डेय पुराण महाशैल कामरूप के गुरुविशाल नामक वन का उल्लेख सूर्य आराधना के क्षेत्र के रूप में करता है – तस्माद्गुरुविशालाख्यं वनं सिद्धनिवेषितं। कामरूपे महाशैले गम्यतां तत्र वै लघु॥ गुरुविशाल की पहचान आज के गुरुदाचल से की गयी है। 
भारत मुख्यभूमि के लगभग मध्य से जाती कर्क रेखा के आस पास तो प्राचीन ज्योतिष प्रेक्षण के कई केंद्र थे किंतु उज्जैन को ही प्राथमिकता क्यों दी गई? इसका उत्तर उसके देशांतर में है जोकि लगभग 75.75 है। पुराने प्राग्ज्योतिष-कामरूप का देशान्तर लगभग 91.75 अंश लिया जा सकता है। अंतर हुआ - 16 अंश। उज्जैन से 16 अंश पश्चिम हुआ 59.75 अंश जो कि वर्तमान अफगानिस्तान ईरान की सीमा से किञ्चित ही आगे है।
यह निश्चित हुआ कि अफगान ईरान सीमा से लेकर असम तक के भौगोलिक भाग के केंद्र पर उज्जैन स्थित है अर्थातजब उज्जैन को इस रूप में मान दिया गया तो भारतवर्ष की निजी पश्चिमी मानसिक सीमा में आज के अफगानिस्तान ईरान सीमा वाला क्षेत्र था, खुरासान का क्षेत्र।
समुद्री व्यापार और सैन्य अभियान देखें तो आज का बंदर-ए-अब्बास यहाँ से बहुत दूर नहीं है। 

इतिहास बता रहा है कि पर्सिया के राजा दारा का सेनापति सिलाकस इसी पत्तन से भारत अभियान को निकला था। 


तीसरी सदी में भी वर्तमान अफगान-ईरान की सीमा  तक पहुँचना ग्रीको-रोमनों द्वारा ΙΝΔΙΕ India पहुँचना कहा जाता था। एक समय उस क्षेत्र एवं आज के अफगानिस्तान में पारसी भी रहते थे।

मेरो: पार्श्वमहं पूर्वे वक्ष्याम्यथ...दक्षिण के पूजा संकल्प में 'मेरो: दक्षिणपार्श्वे' सुन कर जिज्ञासा जगी कि मेरु कैसे? क्यों? घूम फिर कर महाभारत पहुँचा जिसमें भीष्मपर्व में भौगोलिक साक्ष्यों के साथ कल्पना विस्तार भी खूब हुआ है। मूलत: पूरा विवरण भारत केंद्रित ही रहा होगा किंतु कालांतर में पौराणिक विस्तार प्रकृति ने सबको गड्डमगड्ड कर दिया हो तो आश्चर्य नहीं। एक स्थान का वर्णन आता है - कालाम्र। काला अम्ब नाम से एक पुराना स्थान हिमांचल प्रदेश में मिलता है जिसकी संगति कालाम्र से लगाई जा सकती है (महाभारत का चित्र में संलग्न विवरण देखें)। पानीपत में भी काला अम्ब है किंतु वह उतना पुराना नहीं लगता। हिमाचल के काला अम्ब के बारे में वहाँ के लोगों का विवरण महाभारत से मिलता जुलता पाया है। अब कल्पना कीजिये एक विशाल 'मेरु' की जो लगभग कर्क रेखा पर स्थित प्राचीन नक्षत्र विद्या केंद्र उज्जैन पर केंद्रित रहा हो और उससे चारो दिशाओं में एक एक देशांतर और अक्षांश रेखायें निस्सृत हों। मध्य क्षैतिज रेखा विंध्य पर्वत माला के आसपास ही होगी। आर्यावर्त के केंद्रीय भाग को यदि इस कल्पित 'मेरु पर्वत' शंकु का आधारक्षेत्र मानें तो उसके आधार पर महाभारत में बताये सारे क्षेत्र पहचाने जा सकते हैं, चाहे उत्तरकुरु हो, चाहे जम्बूद्वीप, चाहे इळावर्त, चाहे और कोई वर्ष। उल्लेखनीय है कि जो लंका ज्योतिष के पुराने ग्रंथों की गणना का आधार रही, वह पुराने सिंहल द्वीप या आज के श्रीलंका से मेल नहीं खाती। जब हम इस तथ्य पर ध्यान देते हैं कि नीचे वाली रेखा केरल के पास है और केरल गणित एवं ज्योतिष का स्वनामधन्य केंद्र रहा है तो बातें और स्पष्ट तो होती ही हैं, तमिळ क्षेत्र में रह गया संकल्प शेष 'मेरो: दक्षिणपार्श्वे' भी स्पष्ट हो जाता है। उसी पर्व में अन्यत्र समानता देखिये:  06007011 तस्य पार्श्वे त्विमे द्वीपाश्चत्वारः संस्थिताः प्रभो। भद्राश्वः केतुमालश्च जम्बूद्वीपश्च भारत॥ 06007011e उत्तराश्चैव कुरवः कृतपुण्यप्रतिश्रयाः 06007012a विहगः सुमुखो यत्र सुपर्णस्यात्मजः किल। स वै विचिन्तयामास सौवर्णान्प्रेक्ष्य वायसान्॥ 06007013a मेरुरुत्तममध्यानामधमानां च पक्षिणाम्। अविशेषकरो यस्मात्तस्मादेनं त्यजाम्यहम्॥06007029a मेरोस्तु पश्चिमे पार्श्वे केतुमालो महीपते। 06007040c हिरण्यशृङ्गः सुमहान्दिव्यो मणिमयो गिरिः। 06007041a तस्य पार्श्वे महद्दिव्यं शुभं काञ्चनवालुकम्। 06008002a दक्षिणेन तु नीलस्य मेरोः पार्श्वे तथोत्तरे। 06008002c उत्तराः कुरवो राजन्पुण्याः सिद्धनिषेविताः। 


शीर्षक देख एवं अब तक के लिखे को पढ़ कर आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि किसी दूसरे विषय का लेख त्रुटि वश लग गया है क्या? उत्तर है नहीं। इसाई-मिशनरी-जोशुआ-मतांतरण का छल भराखेल है ही ऐसा कि उसे उजागर करने के लिये इतनी गहराई तक जाना पड़ेगा। यह दर्शाना होगा कि यूरोप के लुटेरों के लिये India शब्द का अर्थ वह नहीं था जो आज की भौगोलिक सीमा में सङ्कुचित हो सके। यह आवश्यक है ताकि आप एक गहरे छल  को समझ सकें।
इस तथ्य से आगे वह झूठ आकार लेता है जो तमिलनाडु में आज ब्राह्मण द्वेष तथा इसाई धर्म प्रचार का आधार बना हुआ है।
210 ई. में लिखी गल्प पुस्तक Acts Of Thomas में इसा
Christ का जुड़वा भाई थॉमस उसके द्वारा दासत्व में बेच दिया जाता है, वह अन्द्रोपोलिस नामक पश्चिम एशियाई नगर में आता है, राजा को धोखा देता है, सुन्दर लौण्डे के लिये शैतान से भिंड़ जाता है, बोलने वाले गदहे से इसा का नाम बुलवाता है तथा अन्त में स्त्रियों के प्रति किये अपराधों के कारण लम्बी विधिक प्रक्रिया के पश्चात मृत्युदंड पाता है।
उसकी कब्र उसी क्षेत्र के एडेसा नामक स्थान पर लाई जाती है। पर्सिया, अफगान एवं सीरिया में उसके अनुयायी इसाई पैदा हो जाते हैं। 
उस क्षेत्र से भगाये जाने पर चौथी सदी में वे एक दूसरे 'थॉमस काना' के नेतृत्व में सीरियाई इसाईभारत में शरण लेते हैं।
सदियाँ बीतती हैं तथा दक्षिण भारत के कुछ भागों पर पुर्तगाली अधिकार होता है। तब कृतघ्नता की अब्राहमी परम्परा का निर्वाह करते हुये झूठ का संचार आरम्भ होता है जिसके दो उद्देश्य होते हैं -–एक, पुर्तगालियों द्वारा मन्दिर ध्वंस एवं धार्मिक अत्याचारों को छिपाना तथा दूसरा, लोगों को मसीही बनाना।
थॉमस के नाम का एक मालाबरी (वर्तमान केरल) चर्च दिखा उसे 52 ई. में भारत आया बताया जाने लगता है। मालाबार से पूर्वी तट पर आ तमिळ क्षेत्र में घुसपैठ कर मइलापुर के प्रसिद्ध प्राचीन कपालीश्वर शिव मन्दिर को पुर्तगाली तोड़ देते हैं तथा उस पर चर्च बना कर वहाँ थॉमस को शहीद हुआ बता उसकी कब्र भी बना दी जाती है!
उसे मारने वाला किसे बताया जाता है? एक ब्राह्मण को!
जो थॉमस तीसरी सदी का गल्प है, जो दक्षिण भारत कभी नहीं आया, जो कहानी में भी सदियों पहले भारत के पश्चिमी सीमांत अफगान के पारसियों के सम्पर्क में आया बताया गया जिसकी पुष्टि स्वयं पोप वेनेडिक्ट करता है, वह सुदूर दक्षिण में सदियों पश्चातएक ब्राह्मण द्वारा मारा जा कर मन्दिर के गर्भ गृह में शहीद हो विराजमान हो जाता है! नेहरू सहित समस्त वामपंथी इतिहासकार उसे 52 ई. का भारतीय बताने लगते हैं! सदियों की दूरी के एक कल्पित एवं एक समनामधारी, दो थॉमसों मिला, एक बना कर जटिल तथा ऐसा लुभावना मिथक गढ़ा जाता है जो भारत की आत्मघाती सेकुलर शिक्षा तंत्र से निकले लोगों को जँचे, जिस पर वे सहज ही विश्वास कर लें।
गल्प में थॉमस को भाले द्वारा वधित बताया गया था जिसे उनकी भाषा में लिखा गया है -
‘be ruhme’ । वही ‘be ruhme’, ‘brahmin’ अनुवादित हो गया। मक्कारी आई समझ में?
कपालीश्वर मन्दिर के ध्वंस की कोई बात ही नहीं करता, थॉमस शहीद बना इसाई सहानुभूति बटोर रहा है तथा दक्षिणी ब्राह्मण आर्य अत्याचारी ब्राण्डेड हो अपनी ही धरती पर आक्रान्ता धर्म का विस्तारक बना घृणित है। इसाई पंथ तमिळ धर्म है तथा हिन्दू धर्म बाहरी आरोपण!!
यह आज के तमिलनाडु का यथार्थ है। समूचा तमिलनाडु इसाई मिशनरियों की चपेट में है। एक दूसरी कहानी भी चल रही है आदि शङ्कर द्वारा नागार्जुनकोण्डा के बौद्धों के कथित विनाश की। उस पर अन्य समय लिखूँगा।

यह ध्यान देने योग्य है कि इसा या क्राइस्ट या जोशुआ भी एक काल्पनिक चरित्र है। उसके कश्मीर आने या वहाँ उसकी कब्र होने या पुनर्जीवन के पश्चात वहाँ उसका विवाह होने आदि आदि मिथ्या प्रचारों के पीछे भी इसाइयों का षडयंत्र है। उत्तर भारत को अपनी चपेट में वे ले ही रहे हैं, पंजाब प्रमाण है। अब तो बनारस में भी उसके आगमन के प्रचार करने लगे हैं!
यह वास्तविकता है कि काल्पनिक इसा के काल्पनिक जन्मदिन 25 दिसम्बर पर इसाइयों से अधिक हिंदू मोद मनाने लगे हैं। वे बच्चे जो सेण्ट थॉमस, सेण्ट पॉल, सेण्ट जेवियर्स आदि के प्राउड एलुमिनाइ होते हैं या होने की प्रक्रिया में होते हैं, क्रिसमस पर मारे प्रसन्नता के फूले नहीं समाते! अपनों को ही सांस्कृतिक रूप से अपनों के विरुद्ध कैसे किया जाता है, भारत में पसरता क्रिसमस उसका ज्वलंत प्रमाण है। बता दूँ कि 1953 तक सेण्ट जेवियर्स भारत का apostle था तथा थॉमस पूरब का। उस सन् थॉमस की 'पदावनति' कर उसे भारत का apostle बना दिया गया! कारण ऊपर की कथा के आधार को दृढ़ करना था। 

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संदर्भ :  
(1) मार्कण्डेय पुराण
(2) कालिका पुराण
(3) The Myth of Saint Thomas and the Mylapore Shiva Temple - Ishwar Sharan
(4) Sculpture : The True Reflector of the Society - Shodhaganga
(5) A History of Assam - E A Gait  

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