चित्राभार: अमर उजाला
(यदि अमर उजाला के व्यवस्थापक वर्ग को आपत्ति हो तो कृपया यहाँ बताएँ, पोस्ट हटा दी जाएगी। )
उस पत्रकार को सैल्यूट जिसने यह फोटो ली।
ऑटो के फर्श पर ठूँसी गई घायल युवती और उसके उपर पैर रख कर सीट पर बैठे पुलिस वाले की निजता का सम्मान करते हुए मैंने यह फोटो धुँधली कर दी है (हालाँकि इसे आप आज के अमर उजाला में देख सकते हैं।) लेकिन प्रशासन 'मानवता' का सम्मान करना कब सीखेगा? प्रश्न उठते हैं:
(1) क्या घायलों को त्वरित मेडिकल या एम्बुलेंस मुहैया कराने की व्यवस्था है ?
(2) यदि नहीं तो पुलिस वाले यदि उन्हें जल्दी से हॉस्पिटल ले जाना चाहें तो क्या उन्हें स्वतंत्रता है कि हुए खर्च की परवाह न करें? क्या हुए खर्च का भुगतान त्वरित और उचित ढंग से होगा?
(3) विधि, तंत्र की व्यवस्थाएँ और माहौल क्या ऐसे हैं कि पुलिस ऐसे मामलों में परिणति की परवाह किए बिना संवेदनशीलता और त्वरा के साथ निर्णय ले?
(4) मृत हो या जीवित, मानव शरीर को सम्मान देना चाहिए, इस बात की ट्रेनिंग (संस्कार की बात तो आजकल दकियानूसी मानी जाती है) क्या प्रशासनिक कर्मचारियों को दी जाती है?
