अशफाक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अशफाक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

..जिस स्पिरिट के साथ मैं लिख रहा हूँ वह आप लोगों में नहीं है।


"मेरी सोगवार माँ, भाइयों, बहनों और अजीजों !
यह खत जब तुम्हारे हाथ में पहुँचेगा तब न मालूम तुम्हारा हाल क्या होगा। न मालूम उस वक्त मैं जिन्दा या राही-ए-अदम हो चुका होउँगा। मुझे पूरा इतमिनान है कि जेल के हुक्काम यह खत जरूर रवाना कर देंगे। जबकि यह मरने वाले की ख्वाहिश है। बहरहाल मैं लिख रहा हूँ, अब खुदा आलिम है कि क्या हो।
 खैर, आखिरी हुक्म आ गया है, अब दो-एक रोज के मेहमान हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मैं तख्त-ए-मौत पर खड़ा हुआ यह खत लिख रहा हूँ, मगर मैं मुतमइन व खुश हूँ कि मालिक की मर्जी इसी में थी। 
बड़ा खुशकिस्मत है वह इंसान जो कुर्बान गाहे वतन पर कुर्बान हो जाए। गो कि यह फिकरा जिस स्पिरिट के साथ मैं लिख रहा हूँ वह आप लोगों में नहीं है। 
यूँ आप को तकलीफ महसूस होगी। 
मेरी गजलियात मकान पर मौजूद होंगी। वह आज से बहुत पहले की लिखी हुई हैं, उनको पेशीनगोई समझिएगा और वैसा ही होना था जो कलम से निकला। 
मेरे सुकून की वजह मेरी बेगुनाही है और यकीन रखिए कि अशफाक का दामन इंसानी खून के धब्बों से पाक साफ है। "
_____________________________________________________________
यह आखिरी खत है भारत भू के अमर सपूत क्रांतिकारी अशफाक उल्ला खाँ वारसी का जिन्हें 27 वर्ष की आयु में ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी सत्ता ने काकोरी ट्रेन डकैती और हत्या के अभियोग में 19 दिसम्बर 1927 को फैजाबाद जेल में फाँसी पर लटका दिया था।  
आज नमन और श्रद्धांजलि । 
मृत्यु के साये में भी 'अपने शब्दों' से इतना जुड़ाव, उनकी इतनी फिक्र ! सचमुच हममें वह स्पिरिट नहीं है। 
जाने क्यों आँखें नम हो रही हैं ...
____________________________________________________________    

आभार अमर उजाला  उनकी याद दिलाने के लिए।