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बुधवार, 3 जून 2009

कड़वी 'करी' (भाग – 1)

बहुत ही भारी मन से लिख रहा हूँ।

जिस आस्ट्रेलिया में समूचे विश्व से छात्र अध्ययन हेतु आते हैंवहाँ केवल भारतीयों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा हैउन्हें करी‘ अचानक इतनी कड़वी क्यों लगने लगी हैकहीं ऐसा तो नहीं कि यह समस्या बहुत दिनों से थी और अचानक बढ़ोत्तरी के कारण इस पर सब का ध्यान गया है?

जातीय या नस्लीय घृणा किसी न किसी रूप में समूचे विश्व में पाई जाती है जिसके तार देशों के इतिहास और समाज की रचना से जुड़ते हैं। लेकिन यदि यह बेकाबू हो कर घृणित और हिंसक रूप ले ले तो पूरी व्यवस्था पर प्रश्न उठते हैं। मानव की गोरी प्रजाति का इतिहास ऍइवेंचरलालचशोषण और संहार के द्वारा नई व्यव्स्थाओं को जन्म देने का रहा है। अमेरिका के रेड इंडियन्स और आस्ट्रेलिया के ऐबोरिजिंस के साथ जो हुआ वह इतिहास की चीज है। आज भले उन्हें संरक्षण दिया जाय या उनकी संस्क़ृति को पर्यटन उद्योग को बढ़ाने के लिए पोषित किया जाय लेकिन ऐसा करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ीसुनियोजित नस्लीय विनाश के कारण।

उस मानसिकता के अंश ठीक उसी तरह आज भी इन विकसित राष्ट्रों में मौजूद हैं जिस तरह शूद्र और नारी घृणा या दमन के अंश आज भी भारतीयों की मानसिकता में हैं। सभ्यता की कसौटी यह है कि वह हमारे मन के बर्बर को कितना नियंत्रित रखती है और उसका कितना परिष्कार करती है। इस मामले में एक सभ्य राष्ट्र के रूप में आस्ट्रेलिया असफल रहा है। हम क्या करें?

सहज ही मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय छात्र इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैंअन्याय और अत्याचार को मात्र इस लिए सहना कि पुलिस केस बन जाने पर आस्ट्रेलिया की नागरिकता मिलने में कठिनाई आ सकती हैकहाँ तक क्षम्य हैक्या यह प्रवृत्ति स्वयं में पराजय के बीज नहीं लिए हुए हैयदि ऐसा करते हुए एक समूह वहाँ का नागरिक बन भी जाता है तो खोए हुए आत्मसम्मान को वापस कैसे पाएगा?अपने जेनेटिक प्रिंट से तो उसे छुटकारा तो नहीं मिलेगारहेगा तो ब्राउन‘ या कलर्ड स्किन‘ वालों का ही समूह नउपर से अन्याय को बर्दास्त करने वाली छवि भी जुड़ जाएगी। जो लोग भारत की नागरिकता छोड़ने का मन बना ही चुके हैंउनसे सहानुभूति क्यों होनी चाहिएपिटें या मरें उनकी बलाहमें क्या?

काश समस्या इतनी सरल होती!

आस्ट्रेलिया में जो कुछ हुआ या हो रहा है और उससे जिस तरह से हम निपट (या निपटा?) रहे हैंवह भारत की एक राष्ट्र के रूप में छवि को प्रभावित कर रहा है। या यूँ कहें कि एक राष्ट्र के रूप में भारत की और उसके नागरिकों की इतर विश्व में जो छवि है उससे इसका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। यह समस्या दोधारी है भारत की और समूचे विश्व की।

पहले भारत।

भारतीयों के उपर उनके बहुत ही कायर और समर्पणशील नए इतिहास का बोझ है। कूटनीति या अधिक उपयुक्त कहें तो विदेशनीति नैतिकता की पाठशाला नहीं होती। नैतिकता और उदात्तता की बातें इस क्षेत्र में केवल मुखौटे और छ्द्म सौहार्द्र के लिए की जाती हैं। दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत ने ऐसा एक भी उदाहरण संसार के सामने नहीं रखा जिससे एक परिपक्व और मज़बूत राष्ट्र की छवि संसार के सामने आए।

संयुक्त राष्ट्र में काश्मीर का मामला ले जानाशांति और नि:शस्त्रीकरण की बकवास करते करते इतना लापरवाह और आत्ममुग्ध हो जाना कि जब हमला हो तो सैनिकों को लड़ने के लिए ढंग के हथियार भी न मिलेंएकदम कमाण्डिंग स्थिति में रहते हुए भी समर्पण किए हुए सैनिकों के बदले एक पुरानी गलती को ठीक नहीं करनाचन्द आतंकवादियों द्वारा अपहृत हवाई यात्रियों की रिहाई के लिए घुटने टेक देना . . .

यह सब संघनित हो कर विश्व के सामने हमें एक निहायत ही कमजोर और पिलपिले राष्ट्र की सिद्धि दे चुके हैं। ऐसे राष्ट्र के नागरिकों के लिए विकसित देशों के निवासी क्या सम्मान रखेंगेंइन घटनाओं के लिए हमें आस्ट्रेलियाई सत्ता को घुटने पर ला देना चाहिए था लेकिन हम क्या कर रहे हैं औपचारिक विरोध उसके राजदूत को देश छोड़्ने पर विवश कर देना थाहम क्या कर रहे हैंमान मनौवलहम सह दे रहे हैं उन नस्लभेदी जानवरों को हमारे साथ कुछ भी करो। हम ऐसे ही रहेंगें। हिम्मत है तो वे जरा चीन या जापान के नागरिकों के साथ ऐसा कर के देखें वे सोच भी नहीं सकते जब कि उन जानवरों के पास उनके साथ ऐसा करने के लिए कुछ अधिक ही कारण‘ हैं। ऐसा क्यों हैइसलिए कि उनको नहींउनकी सरकार को पता चलेगा कि नागों को छेड़ना कितना घातक होता हैएक बार फिर प्रश्न उठता हैजब मालूम है कि उनकी सरकार संकट में मदद के लिए कुछ नहीं करेगीये भारतीय वहाँ जाते ही क्यों हैं? . . . जारी