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बुधवार, 1 अगस्त 2018

जाति एवं उत्कृष्टता

प्राय: जाति एवं वर्ण के ले कर लम्बे लम्बे विमर्श, वाद, विवाद, कलह, मनोमालिन्य आदि होते रहते हैं। दो आत्यंतिक विचार भी प्रचलित हैं - भारत की दुर्दशा जाति व्यवस्था के कारण  हुई एवं भारत में जाति व्यवस्था थी ही नहीं, अंग्रेजों की देन है। कहना न होगा कि दोनों व्यर्थ के बकवाद से अधिक महत्व नहीं रखते। 
जाति का अर्थ किसी भौगोलिक क्षेत्र में विकसित विशिष्ट लक्षणों वाले मानव समूह से है। जातियाँ वैविध्य को दर्शाती हैं - यक्ष, देव, नाग, किन्नर, गंधर्व इत्यादि जातियाँ हैं। वर्ण की अवधारणा एवं व्यवस्था जाति की परवर्ती है, तब की जब कि क्षेत्र विशेष में रहने वाला मानव समाज इतना उन्नत हो गया कि उसे कार्य विभाजन की आवश्यकता पड़ी। 
भारत भूमि का ऐतिहासिक विस्तार आज के अफगान-ईरान सीमा से ले कर कामरूप तक था। उत्तर में उत्तर कुरु को तज भी दें तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक। इस एक भूमि की अवधारणा शनै: शनै: विविध जातियों के परस्पर सम्पर्क, संघर्ष, समायोजन एवं सामञ्जस्य से विकसित हुई। एक बार हो गई तो सहस्राब्दियों तक सुरक्षित रही। स्पष्ट है कि ऐसा समाज जब वर्ण विभाजन करेगा तो उसमें विविध जातियों के गुणसूत्र रहेंगे। बंगाल के ब्राह्मण के गुणसूत्र वहीं के किसी अन्य वर्ण से सारस्वत क्षेत्र के ब्राह्मण से अधिक मेल खायेंगे। भारत वंश का यही सच है, इससे आगे वितण्डा, जातिवाद, जन्मना श्रेष्ठता भाव, अहङ्कार इत्यादि हैं जिनके तर्क वितर्क न केवल अंतहीन हैं अपितु पतनकारी भी।
कार्य विभाजन के साथ ही विविध जातियाँ वर्णसाम्यता की दिशा में अग्रसर हुईं, हो भी गयीं अर्थात शताब्दियों पश्चात जाति कोई भी रही हो, न तो उसकी स्मृति रही, न उससे कोई जुड़ाव। लम्बे कालखण्ड का वर्ण ही जाति विशेष हो गई। 
उन्नत समाज व्यवहार संहितायें रखता ही है। स्मृतियाँ वही संहितायें हैं। यहाँ संहिता का अर्थ वेद संहिता से नहीं, विधानों के सम्यक एकत्रीकरण से है। वे उस व्यवस्था को अभिलिखित करती हैं जिसमें जाति-वर्ण के ऐक्य को सुनिश्चित रखने के लिये विविध विधान बनाये गये। समाज की दीर्घजीविता एवं शांति हेतु यह आवश्यक भी था। एक पीढ़ी से दूसरी, तीसरी ... को प्रवाहित कुशलता अल्पसाध्य थी, उत्कृष्टता को दीर्घजीवी भी बनाती थी एवं नवोन्मेष हेतु आवश्यक वातावरण भी सुनिश्चित करती थी। उदाहरण के लिये रथकार का पुत्र भी शिल्पी रथकार हो, इसमें अधिक सरलता है, समाज एवं तंत्र पर अल्प बोझ है। राजन्य का पुत्र रथकार बने तो पहले से चली आ रही कुशलता का लोप तो होगा ही, श्रमसाध्य भी होगा एवं सातत्य टूटेगा। ऐसा नहीं था कि अपवाद नहीं थे, किंतु वे अपवाद ही रहे। स्मृतियाँ इसी कारण उपनयन एवं शिक्षा आरम्भ का समय, वटुकों के वस्त्र, दण्ड आदि को उसके पिता के वर्ण से निर्धारित करती हैं। यह नैरंतर्य का सूचक है कि तू उत्पन्न हुआ इस जाति विशेष में, अत: तुझे ऐसे ही, यही सीखना है, यदि नहीं करेगा तो पतित हो जायेगा। पतित का सामाजिक बहिष्कार होता था या वह समाजबाह्य हो जाता था।
इस व्यवस्था की यदि एकमात्र विशेषता देखी जाय तो वह है - उत्कृष्टता Excellence। यहीं राजा एवं राजन्य की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे उस पारिस्थितिकी को बनाये रखना है जो प्रत्येक जाति में, प्रत्येक उत्पादन कर्म में, प्रत्येक शिक्षा पद्धति में उत्कृष्टता सुरक्षित रखे। राजन् शब्द रञ्जन से जुड़ता है, यह रञ्जन मनोरञ्जन मात्र नहीं, प्रत्येक क्षेत्र में 'सुख समृद्धि शांति निरामयता' की स्थापना एवं दीर्घजीविता है जिससे समस्त समाज एवं राज्य तंत्र कल्याणकारी हो, वृद्धिपरक हो - राजन् [राज्-कनिन् रञ्जयति रञ्ज्-कनिन् नि ˚]। इसके साथ ही रक्षण है जो दुष्टों का दलन एवं सज्जनों की सुरक्षा है, क्षत से सुरक्षा करने वाला क्षात्र कर्म। राजा एवं राजन्य वर्ग में ये दोनों समाहित किये गये जिसके कारण ही अच्छा राजा विष्णु रूप माना गया, वह जो पोषण करता है, वह जो अत्याचारियों से रक्षा करता है, उसके लिये चाहे जो करना पड़े ! 
शब्द देखें तो यह सूक्ष्म संकल्पना उद्घाटित होती है। अच्छे राजा द्वारा शासित प्रदेश 'राजन्‍वत्'  है किंतु सामान्य राजा, जिसमें कि कोई उत्कृष्टता नहीं, द्वारा शासित प्रदेश 'राजवत्' है। एक अर्द्ध 'न' के अंतर से वरेण्य एवं रूढ़ में अंतर स्पष्ट कर दिया गया है। 
सामान्य प्रजा पहले विश् कहलाती थी, वैश्य उसी से है - कृषि, पशुपालन एवं शिल्प इत्यादि में रत रहने वाला बहुसंख्यक समाज। इसी से विशेषज्ञता एवं शिल्प कुशलता वाले कुशीलव निकले जिनका सामान्य स्तर सेवा करने वाला शूद्र हुआ। प्रजा से ही रक्षा करने वाले क्षत्रिय हुये एवं उन्हें निर्देशित करने वाले, विधि विधान के संयोजक पुरोहित ब्राह्मण। राजा या क्षेत्र विशेष का मुखिया  विश्पति कहा गया, उसकी पत्नी विश्पत्नी - जो विश् अर्थात प्रजा का पालन करने के कारण पूज्य है, आदरणीय है। 
अनेक प्रकार से कु-व्यञ्जित पुरुष सूक्त में राजन्य रूपी बाहु एवं वैश्य रूपी ऊरू अर्थात जानु (जंघे) पर ध्यान दें। राजन्य का आजानुबाहू होना शुभ लक्षण माना गया। इसके मूल में वही भाव है कि राजन्य वह जिसकी परास वैश्य तक हो। 
ऐसा राजा उत्कृष्टता को सुनिश्चित करता है, धरती पर विष्णु का रूप होता है। इस आदर्श ने प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता सुनिश्चित की। व्यापारी, सार्थवाह गण, कुशीलव उपनिवेश इत्यादि इतने शक्तिशाली थे कि राजसभा में उनका सम्माननीय प्रतिनिधित्व था। राजा मनमानी करते हुये निरङ्कुश नहीं हो सकता था। जो हुये, उनकी दुर्गति सुनिश्चित की गयी। राजा का कोश ही उसकी शक्ति है जो कि कराधान से भरता है। कराधान तब ही बढ़ेगा जब कृषक, वैश्य, शिल्पी, समृद्ध होंगे, फले फूलेंगे। 
स्पष्ट होता है कि 'उत्कृष्टता एवं कुशलता' इस व्यवस्था की देन थे एवं यह भी कि कोई भी जाति अपने पर लज्जित नहीं थी। इस्लामी आक्रान्‍ताओं ने इस शक्ति से सामञ्जस्य कर ही राज्य किया एवं अंग्रेजों की चतुर वणिक बुद्धि ने इस शक्ति को भारत को उपनिवेश बनाये रखने के मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा पाया। इस शक्ति को विविध उपायों द्वारा जिनमें कि दमन, दुष्ट कराधान एवं वैमनस्य वपन प्रमुख थे, उन्हों ने नष्ट कर दिया जिससे भारत आज तक उपरा नहीं पाया है। 
जाति आधारित आधुनिक मञ्चों में किसी को भी इसकी समझ है, प्रतीत नहीं होता। उत्कृष्टता की साधना के स्थान पर प्रयास जातिवादी राजनीतिक समूह प्रभाव सुनिश्चित करने की है जिसकी भीड़ आधारित लोकतन्‍त्र में सुनी जाय। ध्यान इस पर अधिक है जो कि प्रगति की मूलभूत आवश्यकता के विरुद्ध जाता है। पुराने का गौरव गान करते हुये वर्तमान स्थिति को विस्मृत कर देना हानिकारक है। प्रत्येक जाति अपने गौरव पुरुष ढूँढ़ने, बनाने एवं स्थापित करने में लगी है, बिना इस पर विचार किये कि सहस्राब्दियों के भारतीय इतिहास में किसी भी समूह को ऐसा करने की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ी, अब क्यों पड़ रही है? 
ब्राह्मणों पर बहुत लिखा गया, लिखा जा रहा है किन्तु उस राजन्य वर्ग का क्या जिसे कि ब्रह्मविद्या का पोषक माना गया, जिसे कि कभी ब्राह्मण ग्रंथों ने ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ घोषित किया? यह वर्ग भी पतनोन्मुख है। तामस, अनावश्यक उग्रता, मद्यपता एवं क्षुद्रता इसके लक्षण हो गये हैं। महाराणा का घोष करने वाले जानते तक नहीं कि महाराणा ने अपने अल्प शासन काल में ही उत्कृष्टता के कितने आयामों का स्पर्श किया। राजपूत का पूत उस संतति परम्परा हेतु है जो पुरखों की थाती सँभाले, उत्कृष्टता में उनसे आगे बढ़े अन्यथा काहे का राज,  काहे का राजपूत?  ज्ञान के अभाव में झूठा गर्व हास्यास्पद तो लगता ही है, युवाओं को दिशा भी नहीं देता, उल्टे गर्त में ही ढकेलता है। 
राज शब्द राजति, प्रकाशित होने का भी अर्थ रखता है, उत्कृष्टता होगी तो प्रकाशित होगी ही। किसी भी जाति ने निकृष्टता को आदर्श नहीं बनाया, बड़ी सामान्य सी बात है किन्‍तु वही आँखों से ओझल है। 
ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य; जो भी अपने को इन तीन जातियों में मानते हैं, यदि जाति आधारित मञ्चों को ही सब कुछ मान बैठे हैं तो भयानक भूल कर रहे हैं। स्वीकार कर रहे हैं कि वे चुक गये, उनके पुरखों का प्रभाव मर गया। 
ऐसे मञ्च अनुपयोगी हैं, ऐसा नहीं है किन्‍तु एक देश के रूप में, एक समाज के रूप में उत्कृष्टता सुनिश्चित करने में गौण भूमिका ही रखेंगे। यदि आप ऐसे किसी मञ्च से जुड़े हैं तथा वहाँ जय परशुराम, जय रावण, जय महाराणा; जैसी जय जय मात्र है तो बाहर आयें। जाति का गौरव तब ही बढ़ेगा जब उत्कृष्टता होगी, देश का भी नाम होगा जो कि द्विजता का अर्हण होगी। प्रतिद्वन्द्विता में शूद्र न बनें। भार्गव राम ने या महाराणा ने या अग्रसेन महाराज ने जय जाति, जय जाति उद्घोष कर अपने को स्थापित नहीं किया था। 
चेतें ! आप की सन्‍तानों के लिये आगत समय कठिन होने वाला है। अब्राहमी पंथ वैधानिक संरक्षण में आप को दिन प्रतिदिन काटने में लगे हुये हैं। जाति से जुड़े रहते हुये भी दृष्टि को व्यापक विराट बनायें, सूक्ष्म आक्रमणों पर ध्यान दें एवं उत्कृष्टता में लग जायें। एक साथ उठें, खण्ड खण्ड नहीं। ऐसे उदाहरण हैं जहाँ विविध जाति समूह एक उद्देश्य के साथ व्यापक एवं सूक्ष्म, दोनों स्तरों पर एक साथ लड़ते हैं, उपाय भले भिन्न हों, उद्देश्य एक है। दूजा कोई मार्ग नहीं।    
  

मंगलवार, 25 मई 2010

अथ ब्लॉगर जनगणना

आज हमारे गाँव में जनगणना का प्रथम चक्र प्रारम्भ हुआ। नए प्रावधान के अनुसार हम 4 प्राणियों को फॉर्म 2 में प्रवेश दे सदा सदा के लिए हमारी जड़ काट दी गई। मुझे आज दुहरा दु:ख है - जड़ से कट जाने का कम और गाँव जवार में राजपूतों की संख्या में 4 की कमी का अधिक । मैंने यह पता लगाने को कहा है कि जो जनगणना करने आया था वह किस जाति का था (बहुत गहरा पेंच है इसमें, आप लोग समझ रहे होंगे)?
जाति की संख्या कम होने के बहुत नुकसान होते हैं । कलऊ में संख्याबल ही बल है। संघे शक्ति कलौयुगे -यहाँ संघ से अर्थ आर एस एस या भारत नहीं है। हमारे महाज्ञानी पुरखों ने यह  भाँप लिया था कि कलऊ में संघ का अर्थ जातिगत संख्या होगा सो यह बता गए कि शक्ति का स्रोत क्या होगा ! अब यह हमलोगों की बेवकूफी कि सदियों की ग़ुलामी और तिरसठ सालों की आ-जा-दी के कारण उनकी सीख के मर्म को भूलने लगे थे। संघी लोगों को जनता की इस भुलक्कड़ी पर बहुत मलाल  था। पंचायतें कर कर जवान जवानियों को लटकाने, झोपड़ी फूँकने, जिन्दा जलाने, नंगे दौड़ाने आदि आदि के बाद भी जनता को अपना बल याद नहीं रह पा रहा था सो बिचारे बहुत दु:खी थे कि जनगणना का साल आ गया ! कहीं किसी संघी को सूझा और वह चिल्लाया - "पौ बारह" ... शुरू हुई जाति आधारित जनगणना । संघी लोग बहौत खुश हैं। अब यह उल्लू की दुम सरीखी जनता कभी जाति भूल नहीं पाएगी। पता नहीं जो कारड बन रहा है उसमें जाति का कॉलम होगा कि नहीं ? गिरिजेश राव राजपूत, सतीश यादव अहिर, सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ब्राह्मण (बहुत बड़ा हो गया लेकिन दक्खिनी नामों से छोटा ही है) - कितना क्यूट लगेगा ! हम अपनी परम्परा को भूल चले थे, अब याद रहेगी हमेशा - वो ही परम्परा, समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा।
तो आज मुझे सूझा कि क्यों न ब्लॉगरों की भी जाति आधारित गणना की जाय ? अब सबसे पूछना ठीक नहीं (मुई अभी तक इस मामले में सीखी गई शरम नहीं गई जब कि मास्साब लोग गली मोहल्ले एकदम बेहिचक पूछे जा रहे हैं - का  हो ज्ञान चचा ! तोहार जात का है?) । इसलिए अनुमान के आधार पर सूची लगा रहे हैं। जिन्हें आपत्ति हो वे अपनी आपत्ति टिप्पणियों के माध्यम से दर्ज करा सकते हैं। उनकी जाति 'बदल' मेरा मतलब 'सही' कर दी जाएगी । जो लोग अपने को किसी जाति का नहीं मानते वे लोग यह बता सकते हैं कि वे क्या लिखाना चाहेंगे लेकिन 'जाति' होनी ज़रूर चाहिए। कॉलम खाली मत छोड़ना सुद्धन ! जिनके नाम छूट गए हैं वे अपना नाम दर्ज करा सकते हैं। हिन्दू धर्म के अलावा अन्य धर्मों के लोगों का भी आह्वान है, अपनी जाति अवश्य लिखाएँ। तो शुरू करते हैं :
नाम जाति
.... :) ....?? (यह पंक्ति बाद में जोड़ी गई है)
सिद्धार्थ ब्राह्मण
सतीश यादव
ज्ञानदत्त गिरिजेश ब्राह्मण राजपूत 
अरविन्द ब्राह्मण
स्वप्न मंजूषा ब्राह्मण
अभय ब्राह्मण
अनुराग ब्राह्मण, देव(टिप्पणी के बाद संशोधित, क्षमा देव! ) 
राजीव ब्राह्मण
अभिषेक ब्राह्मण
वाणी ब्राह्मण
मनोज ब्राह्मण
शास्त्री ब्राह्मण
पंकज ब्राह्मण
पंकज ब्राह्मण
पूजा ब्राह्मण
प्रवीण ब्राह्मण
प्रवीण ब्राह्मण
दिनेश ब्राह्मण
मीनू कायस्थ
अनूप ब्राह्मण
अशोक ब्राह्मण
रचना ब्राह्मण
संजीव ब्राह्मण
रवीन्द्र कायस्थ
पंकज ब्राह्मण
राज राजपूत
अमरेन्द्र   ब्राह्मण (फोन द्वारा नाम ग़ायब रहने की शिकायत के बाद प्रविष्टि की गई। क्षमा प्रभु! )
महफूज  राजपूती पठान ((टिप्पणी के बाद जोड़ा गया। अर्ज किया है,"लागी छूटे ना sss")   
सतीश  कायस्थ 
गिरिजेश ज्ञानदत्त राजपूत ब्राह्मण
दिव्या (टिप्पणीकार)  गर्वीली भारतीय ( Proud Indian) - जिस तरह से ब्राह्मण, राजपूत, पठान आदि कई प्रकार के होते हैं वैसे ही भारतीय  कई प्रकार के होते हैं जिनमें 'गर्वीला/ली' भी एक प्रकार है। 
समीर लाल  कायस्थ (टिप्पणी में अनुरोधात्मक आदेश के बाद जोड़ा गया। अनजाने में छूट गया था। अन्यथा न लेते हुए कृपा दृष्टि बनाए रखें।) 
अली सैय्यद नामालूम 
प्रशान्त  पता नहीं
प्रवीण  गर्वीला विशुद्ध भारतीय शू्द्र (इत्ता बड़ा जाति नाम पहली बार देखे हैं)
फ़िरदौस  आदम 
डी. के. ब्राह्मत्व 
पंकज  ई 
सूची बनाते हुए अचानक पाया कि ब्राह्मणों की हिन्दी ब्लॉगरी में भागेदारी कुछ अधिक ही है। निष्कर्ष जब इतना स्पष्ट हो तो सूची पूरी करने की खानापूरी कौन करे सो वैसे ही छोड़ दिया। ब्लॉग मतलब बवाल। ब्राह्मण बहुत बवालकारी होते हैं। छोटे से इस डाटाबेस से सिद्ध भी हो गया। इस क्रांतिकारी निष्कर्ष पर अब गली गली में फैली परशुराम सभाएँ इस क्षत्रिय का गला रेतने न निकल पड़ें । 'बवाल कटने, कटाने और काटने' पर जन्मसिद्ध अधिकार मानने वाले राजपूत भाई लोग अपना ऐसा अपमान होता देख क्षत्रिय महासभा के बैनर तले मुझे सबक सिखाने न निकल पड़ें !
अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए और यादवों, कायस्थों आदि का इतना कम प्रतिनिधित्त्व देखते हुए मैं जयचन्दी इस्टाइल में इन जातियों के लिए ब्लॉग जगत में आरक्षण का प्रस्ताव रखता हूँ। साथ ही ये प्रस्ताव भी रखता हूँ:
(1) ब्राह्मणों ने इस मुफ्त सुविधा को हड़प लिया है। लिहाजा यह तय पाया जाय कि ब्राह्मण ब्लॉगरों को प्रतिदिन कुल पोस्ट संख्या की 10% से अधिक पोस्ट संख्या की अनुमति न दी जाय। इस संख्या में भी सरयूपारीण, कान्यकुब्ज, मैथिल, नम्बूदरी, गौड़ीय आदि की संख्या के हिसाब से आंतरिक आरक्षण तय किया जाय।
(2) टिप्पणियों की संख्या में भी यही सिस्टम लागू किया जाय। ब्राह्मण ब्लॉगरों के लिए यह आवश्यक कर दिया जाय कि 9 ग़ैरजातीय ब्लॉगों पर टिप्पणी करने के बाद ही सजातीय ब्लॉग पर टिप्पणी कर सकें।
(3) जाति आधारित ब्लॉग संघ बनाए जाँय - राजपूत चिट्ठाकार संघटन, कान्यकुब्ज ब्राह्मण ब्लॉगर महासभा, श्रीवास्तव कायस्थ ब्लॉग असोसिएशन । ब्लॉगस्पॉट पर इस तरह के पंजीकृत संघटनों को स्पेस आवंटन उनकी जाति संख्या के व्युत्क्रमानुपाती हो ताकि कम प्रतिनिधित्त्व वाली जातियाँ आगे आ सकें।
(4) ब्लॉगवाणी पर पसन्द/नापसन्द के लिए हर व्यक्ति को पहले अपनी जाति बतानी होगी। उसके बाद यदि वह किसी सजातीय पर एक पसन्द का चटका लगाता है तो किसी विजातीय ब्लॉग पर स्वचालित प्रक्रिया से दो नापसन्दगी का चटका लग जाएहा। यदि कोई किसी विजातीय को पसन्द करता है तो उसकी ब्लॉग पोस्ट पर दो नापसन्दगी का चटका लगेगा। यदि कोई किसी विजातीय पर नापसन्द का चटका लगाता है तो उसके सजातीय किसी अन्य ब्लॉग पर स्वचालित प्रक्रिया के तहत दो पसन्द का चटका लग जाएगा...
ब्लॉग प्लेटफॉर्म की इस छोटी सी जगह में जाति आधारित गणना करते दिमाग इतनी खुराफातें सोच बैठा। जब लोगों के पास अरबों का डाटा बेस हो जाएगा तो क्या कुछ नहीं सोचा जा सकता !
इस देश को चला रहे और उनकी सरपरस्ती में चल रहे बन्दरों के हाथ एक बहुत घातक उस्तरा लगने वाला है। आस्तिकों से निवेदन है कि अपने भगवान से इस देश की पहले से ही बहुत गहरी खुद चुकी जड़ों के लिए दुआ करें। नास्तिकों से अपील है कि जन को शिक्षित करें। सवर्णों से अपील है कि यह सुनिश्चित करें कि उनकी संख्या अधिक से अधिक लिखाई जाय। ज़रूरत पड़े तो तफरीह करते बंगलादेशियों की मदद लें। अवर्णों से अपील है कि जाति आधारित जनगणना के विरोधियों को भरे चौराहे पकड़ पकड़ पीटें । ... हद है ऐब्सर्डिटी की ! 

मंगलवार, 18 मई 2010

सबरन मंजूर मिसरा नामंजूर

मेरे ससुर जी करीब करीब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। बेटे बेटियाँ सब अपनी अपनी जगह जीवनयापन में लगे हैं। घर में कुल जमा दो परानी। बड़े शौक से शहरी मॉडल पर आधुनिक घर बनवाए - बेटे , बहुएँ, बेटियाँ  आएँ तो कोई कष्ट न हो। पॉवर बैक अप की चौचक व्यवस्था - दो इनवर्टर, एक जनरेटर और अब सोलर की तैयारी है। मतलब कि गुड़गाँव से भी बेहतर। डिश टीवी, वाशिंग मशीन वगैरह सब लगे हैं। 
बेटों के यहाँ गुड़गाँव में एजेंसी द्वारा रखा गया सेवक शादी में गाँव आया तो प्रस्ताव हुआ कि वहीं रह जाय। गुड़गाँव में तो दूसरे भी मिल जाएँगे। गाँव देहात में तो अब ढूँढ़े नहीं मिलते। टंच व्यवस्था देख कर और वेतन भी उतना ही जारी रखने की बात पर असमिया सेवक 'सबरन' गाँव में ही रह गया। साल भर के भीतर ही अपने व्यवहार और ईमानदारी के कारण घर का सदस्य जैसा हो गया। साले जब आते तो मजाक करते - कुछ दिनों में ही यह हमलोगों को घर में घुसने नहीं देगा ! ... 
दूर देस के ये जवान साल भर में एक बार अपने गाँव जाते हैं। सबरन भी गया और अब लौट कर आने का नाम नहीं ले रहा। पता चला है कि उसकी माँ चाय बगान में काम करती थी। अब सेवानिवृत्त हुई है तो अपनी जगह उसे लगा दिया है। रु.300 प्रति सप्ताह और राशन मिलेगा। सुबह 5 बजे से रात तक की ड्यूटी। यहाँ मिलते थे रु.2500 प्रति माह और रहना, खाना, कपड़ा लत्ता सब मुफ्त। पाँच में से एक यह बेटा भी घर रहेगा, अब शादी भी होगी ...
... स्वाभाविक है कि दूसरे सेवक की खोज हो। गोरखपुर किसी एजेंसी में कहा गया था। बहुत खोज के बाद कोई मिला तो एजेंसी वाले ने फोन किया। ससुर जी ने फोन उठाया ,
" ... ज़रा लड़के से बात कराइए।"
" ए मिसरा! हे आव, बतिया ल sss"
ससुर जी ने सुना और मना कर दिया।
"अरे ! जब उसे कोई समस्या नहीं तो आप को क्या आपत्ति?" 
"नहीं, दूसरा ढूँढ़िए।" 
 सासू जी ने पूछा तो उन्हों ने बताया कि पंडित (ब्राह्मण) था। दोनों सहमत हैं कि जूठा धोना, पोंछा लगाना, झाड़ू देना यह सब काम ब्राह्मण से नहीं कराएँगे। तब तक गाँव से ही ढूँढ़ कर  किसी औरत को  पार्ट टाइम  लगा लेंगे। हालाँकि उसके लिए निहोरा भी करना पड़ेगा। 
सबरन मंजूर है और मिसरा नामंजूर। सोच रहा हूँ ससुर जी से पूछूँ," सबरन की जाति आप पूछे थे? कहीं वह भी तो... "      

मंगलवार, 4 मई 2010

असहमति - जाने किससे

-एक वयस्क सुशिक्षित लड़की एक वैसे ही लड़के से बिना किसी सावधानी के शारीरिक सम्बन्ध बनाती है, गर्भवती होती है और तीन महीने (मतलब कि शिशु को जन्म देने को मानसिक रूप से तैयार) तक मृत्युपर्यंत गर्भ धारण रखती है। क्या उसका अपने माँ बाप के प्रति, जो कि पुराने विचारों के थे और वैसे ही समाज में रहते थे, कोई दायित्त्व नहीं था ?

-लड़का खुलेआम टेसुए बहाता, हीरो बना घूम रहा है। लड़की के पोस्टमार्टम के समय क्या यह आवश्यक नहीं था कि गर्भ का डी एन ए परीक्षण कराया जाता ताकि लड़के का पिता होना सिद्ध हो सकता और उसको क़ानून के शिकंजे में लिया जा सकता ?

- एक आतंकवादी जिसने खुलेआम सैकड़ों हजारों लोगों की उपस्थिति में राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ा, सैकड़ों की हत्या की, पूरी मशीनरी को बन्धक बनाए रखा; महीनों तक की क़ानूनी प्रक्रिया के बाद और 45 करोड़ उसके उपर खर्चने के बाद दोषी ठहराया जाता है और फिर भी फैसला सुरक्षित रखा जाता है। उसी देश में उक्त लड़की की हत्या के लिए उसके माँ बाप पर आरोप लगता है और सभी उन्हें दोषी मानने लगते हैं। क्या न्यायालय के फैसले के आने तक उन्हें उनके हाल पर छोड़ नहीं देना चाहिए ? अरे उनकी इकलौती लड़की मरी है, रहम करो। क्या कहा? घर बुला कर मार दिया ! निर्णय लेने के पहले प्रतीक्षा कर लीजिए न ।

- एक आरुषि नामक लड़की की हत्या हुई थी। क्या आप बताएँगे कि आज कल उस केस में क्या हो रहा है? क्या प्रगति है?

- कहीं ऐसा तो नहीं कि सारा बवाल बस इस लिए है कि मरने वाली पत्रकार थी और उसे मारने का पहला कदम लेने वाला ( उसे गर्भवती कर) उसका कथित प्रेमी भी पत्रकार है? कहीं प्रेमी अपने को बचाने के लिए जमात इकठ्ठी कर यह नौटंकी तो नहीं फैला रहा? कहीं ऐसा तो नहीं होगा न कि कल सुबूत मिले कि लड़के ने उसके साथ छिप कर शादी कर ली थी ?

- कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी घटनाएँ बच्चे की परवरिश का जिम्मा राज्य के सिर नहीं होने से हो रही हैं ? यह पुरातन समाज तेजी से बदलते माहौल के साथ कदम नहीं मिला पा रहा तो कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके लिए विवाह संस्था ही दोषी है ?

- आप में से कितने गिरिजेश अपने नाम से 'राव' हटाने को और अपने बच्चे को भी जाति सूचक उपनामों से मुक्त करने को तैयार हैं? ..मैं गिन रहा हूँ। संख्या बहुत कम है। .. तो भैया बहिनी! आप लोग उपनाम तक हटाने को तैयार नहीं; जाति व्यवस्था पर इतनी हाय तौबा क्यों?

- सार्वजनिक स्थानों पर दिन में खुलेआम सेक्स सम्बन्ध बनाते (जी हाँ, अब यह होने लगा है) कितने कुँवारे जोड़ों को आप ने टोका है ? मेरा मतलब यह है कि बच्चों पर क्या प्रभाव पडता होगा, यह सोचा है आप ने ? न न , सिनेमा वगैरह से इतर मामला है यह । कल अगर आप का बच्चा आप से पूछ बैठे तो क्या कहेंगे उसे ? वो जो कुत्ते करते हैं न वही कर रहे हैं - ऐसा कह पाएँगे आप ? ..सेक्स एजूकेसन। ... बच्चे सम्भोग करने के पहले उसकी ज़िम्मेदारी तो समझें...

बहुत से विचार गड्डमगड्ड हो रहे हैं। शायद मुझे आराम की जरूरत है। पाखंडी ऊर्जा क्षय अधिक करता है।