caste लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
caste लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

जाति एवं जातिवाद से आगे क्या

पिछले भाग से आगे ... 


कभी कभी एक वाक्य ही आप को बहुत गहराई तक सोचने पर विवश कर देता है, आप की धारणाओं को तोड़ देता है। सम्भवत: यह घटना पहले भी लिख चुका हूँ, लोहार एवं ब्राह्मण परिवारों में कलह हुआ , बात बढ़ी नहीं क्यों कि समझदारी दोनों पक्षों में थी। उस समय अशिक्षित लोहार गृहणी ने एक बात कही - वे लोग ब्राह्मण हैं, बारह गुण वाले, हम लोग विश्वकर्मा हैं, बीस गुण वाले, क्षत्रिय छत्तीस। जाने क्यों यह हास्यास्पद वाक्य मन में कहीं स्थिर सा हो गया, साथ ही यह भी कि तब तो शूद्र शत अर्थात सौ गुणों वाले होंगे जो कि वैविध्य देखते ठीक ही लगता है। उसी समय सम्भवत: अज्ञेय की 'शेखर एक जीवनी' में एक प्रसंग मिला जिसमें खा पी कर सो जाने पर एक घर की महिला अपने बालक को रटवाती थी - हम लोग _________ हैं। समझे? लेखक के संकेत से उसका अंत्यज होना समझ में आता है।    
जैसे एक गुहा खुली हो, मुझे वे वाक्य गर्वबोध लगे। सहस्राब्दियों में पसरे वैविध्य भरे भारतीय इतिहास का एक बहुत बड़ा सच खुलता चला गया - अपनी जाति पर गर्व, जाति खोने का भय एवं जाति कर्म बनाये रखने का उद्योग - भारत की दीर्घजीविता के महत्वपूर्ण कारणों में से हैं। जिस जाति व्यवस्था पर ब्रिटिश काल से ही सुधारकों ने अकूत पानी डाला, एवं आज भी डाले जा रहे हैं, वह जाती क्यों नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत बचा ही इस वैविध्य के कारण? 
गर्वबोध उत्कृष्टता का था। लोहार अपने काम में पीढ़ियों से अर्जित दक्षता रखता था, वयनजीवी भी, प्राय: प्रत्येक जाति के साथ क्रमश: उत्कृष्ट होते जाने का सच साथ था। ब्रिटिश आगमन से पूर्व तक सदियों के आक्रमण एवं लूट अनाचार को झेलता भारत आर्थिक रूप से समृद्ध बना रहा, सामाजिक शक्ति बनी रही। संस्कृति भी सम्पदावान होती रही तो क्यों भला? कारण जाति व्यवस्था में अंतर्निहित उत्कृष्टता थी। प्रत्येक जाति अपना योगदान कर रही थी तो क्यों भला? प्रशासन तंत्र स्वस्थ था। आक्रांता मुसलमानों ने भी इस व्यवस्था से बहुत अधिक छेड़ छाड़ की हो, नहीं लगता। उनके माथे कलंक है कि कुछ प्रतिरोधी जातियों को वञ्चित कर घृणित जीवन जीने पर विवश किया किन्‍तु सुचिंतित ढंग से हर क्षेत्र में आक्रमण घुसपैठ कर विकृतिकरण के साथ साथ पीढ़ियों से अर्जित कौशल का समूल नाश करने का काम अंग्रेजों ने किया। उन्हों ने शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन कर भारतीय जन को आत्महीनता एवं आत्मघृणा से पूरित मानसिक दास बनाया जो कि आज तक चला आ रहा है। 
उनके आने से पहले की एक सहस्राब्दी भारतीय प्रतिरोध, जिजीविषा एवं शक्ति की ज्वलंत उदाहरण है जिसे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने पूर्णत: उलट चित्रित किया है। शक, हूण, इस्लामी आक्रमणों के साथ सभ्यतायें समूल नष्ट हो गयीं किंतु भारत बना रहा तो अपने प्रबल प्रतिरोधी भाव के कारण। 
यदि आप मानते हैं कि भारतीय सेनाओं में मात्र राजपूत ही थे तो भयानक भूल कर रहे हैं। वनवासियों से ले कर ब्राह्मणों तक, भारत की प्रत्येक जाति अपनी भूमि, अपनी संस्कृति एवं अपनी संतति की सुरक्षा हेतु लड़ी तब हम आज  जीवित बचे हुये हैं। जिससे जो हो सका, शत प्रतिशत से भी अधिक किया, तब हम आज बचे हुये हैं। 
हीनता बोध के पुरोधा इतिहासकार उदाहरण देते हैं कि युद्ध हो रहा था, जनता देख रही थी या धन ले कर किसी भी पक्ष में भारतीय लोग लड़ जाते थे, उनमें राष्ट्रीय भावना नहीं था आदि आदि। 
युद्ध प्रशिक्षित सेनायें लड़ती हैं, उनमें सामान्य जनता का क्या काम? क्या यह सच नहीं कि प्रत्येक जाति के सैनिक लड़े? वे क्या भावप्रवण नहीं थे? साधारणीकरण बुद्धिजीवी के पास उपलब्ध सबसे घातक अस्त्र होता है, जिसके अनुप्रयोग में कम्युनिस्ट इतिहासकार निष्णात हैं। 
धन ले कर कुछ भी करने वाले तो सदा से रहे हैं, आज भी हैं। इस कारण से यदि आधुनिक काल बुरा नहीं तो मध्य काल कैसे हो गया बंधु! शत प्रतिशत आदर्श की बात कर हीनता बोध से भरता चरम श्रेणी की धूर्तता है, अन्य कुछ नहीं। मूल भाव देखना होता है कि क्या था? भारत आदर्शों की दृष्टि से उस समय भी आदर्श था एवं सम्पूर्ण सभ्य विश्व में उसकी कीर्ति बनी हुयी थी। 
विविध जातियों के रहने का लाभ यह था कि किसी एक के नाश या पराभव से सब कुछ का नाश नहीं होने वाला था। भारत पुन: पुन: उठ खड़ा होता था तो इसके पीछे सञ्जीवनी जाति व्यवस्था ही थी जिसने धूर्त अंग्रेजों को मौलिक विकृतियों की स्थापना हेतु विवश किया कि वाणिज्यिक एवं आर्थिक दोहन के साथ भारत पर शासन तब ही सम्भव है, जब जाति केंद्रित उत्कृष्टता को नष्ट भ्रष्ट कर निर्वात को अपने अनुकूल तत्वों से भर दिया जाय। बहुत ही सधे हुये ढंग से उन सबने यह सुनिश्चित किया। 
आज भारत उनके बनाये विधान द्वारा शासित है। अंग्रेज का अर्थ अंग्रेज एवं उनके मानस पोषितों से लें। यह विधान समानता वादी है, सिद्धांतत:, दिखाने को सब को समान अवसर उपलब्ध हैं किंतु वास्तविकता यह है कि जाति एवं पंथ आधारित विशेष प्रावधान इतने सुगढ़ हैं कि सामान्य जन देख देख सीझते रहते हैं। लोकतंत्र के नाम पर भींड़तंत्र में धनबल एवं जनबल की चलती है। पुरानी उत्कृष्टता रही नहीं, कुशीलव, शिल्पी एवं उत्पादक समाज ने हीनता बोध से ग्रसित हो कोड़ियों व्यवसाय अब्राहमी पंथों के हाथ दे दिये, ले दे कर या तो श्रम बेंचना बचा या बढ़ती जनसंख्या के बोझ से आक्रांत भूमि का एक टुकड़ा जिसका सस्य उत्पादन न तो पर्याप्त है, न मूल्यवान। यह दशा द्विज कहलाने वाले अधिकतर त्रिवर्ण की भी है। ऐसे में समाज विकासशील भले दिखे, विकसित नहीं हो सकता। 
हताशा की स्थिति में बीते कुछ बीसेक वर्षों में जाति आधारित जातिवादी सङ्गठनों की बाढ़ सी आ गयी है - जन बल होने का भ्रामक बोध इसका कारण है। कहते हैं कि श्रेष्ठताबोध एवं हीनताबोध एक ही निष्क के दो पक्ष होते हैं। इसका जातिवादी संगठनों से उपयुक्त उदाहरण हो ही नहीं सकता। ऐसा तब है जब विधान को सत्तर वर्ष भी नहीं हुये ! 
इससे आप अपने पुरखों की स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं जब आक्रांता उनके राजा बन बैठते थे, समाज का संतुलन डाँवाडोल हो जाता था एवं आदर्श विपथगामी। भारत की, उनकी शक्ति एवं बुद्धिमत्ता इसमें थी कि परिवर्तित होती सदियों में परिवर्तित होते हुये उन्हों ने स्वयं को जीवित तो रखा ही, समृद्ध भी बनाये रखा। आप में वह शक्ति नहीं रही जिसके कारण आप जातिवादी संगठनों को उन्मुख होते हैं, वे संगठन जिन पर अधिकांशत: धन बल वालों का प्रभुत्व है, जो आप का उपयोग अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु करते हैं।  
प्राचीन ग्रंथों के सावधान अवगाहन से बहुत से सत्य झाँकते दिख जाते हैं, सबसे बड़ा सत्य यह है कि वेदों के अतिरिक्त समस्त ग्रंथों में सामयिक परिवर्तन परिवर्द्धन होते रहे। समाज की शक्ति उसकी नम्यता, आघातवर्द्धनीयता एवं नित्यता थी। वे जन मृषा का प्रसार करते हैं जिनके अनुसार किसी व्यास, किसी पराशर या किसी मनु के द्वारा जो शास्त्र रचे गये वे तब से यथावत हैं, उनमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। ऐसे जन समाजद्रोही कहे जाने चाहिये क्यों कि वे आप को शक्ति से वञ्चित कर रहे होते हैं। शक्तिवञ्चना आक्रमण का ही दूसरा पक्ष है, लक्ष्य वही निर्बल निरीह बनाये रखना या बना देना। 
इन शास्त्रों में बहुत सी ऐसी बातें मिलती हैं जो समसामयिक निकष पर घृणित ठहरती हैं। वे पूर्णत: घृणित मन्तव्य से रची गईं, ऐसा नहीं है। ऊपर सत्तर वर्षों में ही जो स्थिति हुई है, लिख चुका हूँ। ऐसी ही जाने कितनी स्थितियों का सामना शताब्दियों में पसरे भारतीय जन ने किया एवं अपने विधान, अपने शास्त्र आवश्यकतानुसार परिवर्तित परिवर्द्धित किये। यह उनकी शक्ति थी। जो विधान अप्रासङ्गिक हो गये थे, उनके त्याग के उल्लेख शास्त्रों में भी मिलते हैं अत: आज अप्रासंगिक हो गये विधानों को लेकर रोना एवं आक्रोश मूर्खता एवं हीनताबोध के अतिरिक्त कुछ नहीं। नया विधान है, उसमें कैसे आप समृद्ध, निरामय एवं प्रगतिगामी होते हुये स्वयं को, परिवार को, समाज को, राष्ट्र को आगे ले जा सकते हैं, यह विचार का विषय है, बीते हुये पर वक्षताड़न करना नहीं।    
जाति पर ही शास्त्रों में एक महत्वपूर्ण पक्ष मिलेगा - शूद्र स्वयं को शूद्र कहने में लज्जा का अनुभव नहीं करते थे। क्यों ? क्यों कि उनके पास उत्कृष्टता का बल था, कौशल था, आत्मविश्वास एवं आत्मगौरव का पीढ़ियों से सञ्चित भाव था; समृद्धि तो थी ही। आप को शूद्र राजाओं के भी उल्लेख मिलेंगे। ऐसे समझें कि उत्पादक एवं शिल्पी समाज के दरिद्र रहते हुये कोई भी देश 'सोने की चिड़िया' नहीं हो सकता। यदि ये फलते फूलते नहीं रहेंगे तो धन आयेगा कहाँ से? 
बिना इस मीमांसा में पड़े हुये कि ऐसे अंश कब आये होंगे, यदि हम आगे दिये कतिपय उदाहरणों पर ध्यान दें कि ऐसा कभी सुदूर भूत में हुआ था तो सुंदर सचाइयाँ उद्घाटित होती हैं। 
भारत काल में मंत्री विदुर नीति का उपदेश एवं अपनी विचार अभिव्यक्ति पूरे विश्वास के साथ करने के पश्चात कहते हैं कि मैं शूद्र हूँ, मुझे श्रुति अधिकार नहीं है, अत: मैं आगे नहीं कह सकता। पुराण प्रवक्ता सूत लोमहर्षण कहते हैं कि प्रतिलोमज (ब्राह्मण माता एवं क्षत्रिय पिता की संतान) होते हुये भी हमें ऋषि समाज को सुनाने का गौरव मिला है। मौर्य काल में चाणक्य लिखते हैं कि पुराणों के सूत प्रतिलोमज सूतों से भिन्न हैं एवं वे ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों से विशिष्ट हैं। विष्णु पुराण सौति को महामुनि एवं जगद्गुरु जैसी संज्ञाओं से विभूषित करता है।  
सहस्राब्दियों की परास के इन कुछ उद्धरणों से जो स्पष्ट होता है, वह यह है कि विविध जातियों को अपनी निजी जाति को ले कर हीनता बोध न था एवं समस्त व्यवस्था लचीली थी, प्रवाही थी तथा उसमें सामयिक यथार्थ के अनुकूल बने रहने का गुण  था। ऐसा जब तक रहा, भारत बना रहा। अंग्रेजों के 'इण्डिया' में उत्कृष्टता गई, गौरव बोध गया, समृद्धि भी गयी, बच गया भङ्ग समूह-बोध जो कि विविध जातियों को जातिवादी संगठनों की ओर आकर्षित करता है। 
जाति उन्मूलन एवं जातीय वर्चस्व स्थापना जैसी वायवीय संकल्पनाओं को तज 'उत्कृष्टता' की साधना करें, जाति चाहे जो हो। यह मार्ग पहले भी प्रभावी था, आज भी है। भारत के नाम में ही 'भा', भासमान प्रकाश है, हम अन्धकार में कभी नहीं रहे, हमें केवल अंधकार युग की संतति बताया जाता रहा है जिसका उद्देश्य औपनिवेशिक स्वार्थपूर्ति रहा एवं अब निहित स्वार्थ वश भींड़ तंत्र में सत्ता में बने रहना है। आँखें खोलिये, भासमान भारत पुकार रहा है। 
आप उत्कृष्ट होंगे तो जाति, समाज एवं देश, सभी उत्कृष्ट होंगे। ऐसे में सबका स्वार्थ भी सधेगा या नहीं?


बुधवार, 1 अगस्त 2018

जाति एवं उत्कृष्टता

प्राय: जाति एवं वर्ण के ले कर लम्बे लम्बे विमर्श, वाद, विवाद, कलह, मनोमालिन्य आदि होते रहते हैं। दो आत्यंतिक विचार भी प्रचलित हैं - भारत की दुर्दशा जाति व्यवस्था के कारण  हुई एवं भारत में जाति व्यवस्था थी ही नहीं, अंग्रेजों की देन है। कहना न होगा कि दोनों व्यर्थ के बकवाद से अधिक महत्व नहीं रखते। 
जाति का अर्थ किसी भौगोलिक क्षेत्र में विकसित विशिष्ट लक्षणों वाले मानव समूह से है। जातियाँ वैविध्य को दर्शाती हैं - यक्ष, देव, नाग, किन्नर, गंधर्व इत्यादि जातियाँ हैं। वर्ण की अवधारणा एवं व्यवस्था जाति की परवर्ती है, तब की जब कि क्षेत्र विशेष में रहने वाला मानव समाज इतना उन्नत हो गया कि उसे कार्य विभाजन की आवश्यकता पड़ी। 
भारत भूमि का ऐतिहासिक विस्तार आज के अफगान-ईरान सीमा से ले कर कामरूप तक था। उत्तर में उत्तर कुरु को तज भी दें तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक। इस एक भूमि की अवधारणा शनै: शनै: विविध जातियों के परस्पर सम्पर्क, संघर्ष, समायोजन एवं सामञ्जस्य से विकसित हुई। एक बार हो गई तो सहस्राब्दियों तक सुरक्षित रही। स्पष्ट है कि ऐसा समाज जब वर्ण विभाजन करेगा तो उसमें विविध जातियों के गुणसूत्र रहेंगे। बंगाल के ब्राह्मण के गुणसूत्र वहीं के किसी अन्य वर्ण से सारस्वत क्षेत्र के ब्राह्मण से अधिक मेल खायेंगे। भारत वंश का यही सच है, इससे आगे वितण्डा, जातिवाद, जन्मना श्रेष्ठता भाव, अहङ्कार इत्यादि हैं जिनके तर्क वितर्क न केवल अंतहीन हैं अपितु पतनकारी भी।
कार्य विभाजन के साथ ही विविध जातियाँ वर्णसाम्यता की दिशा में अग्रसर हुईं, हो भी गयीं अर्थात शताब्दियों पश्चात जाति कोई भी रही हो, न तो उसकी स्मृति रही, न उससे कोई जुड़ाव। लम्बे कालखण्ड का वर्ण ही जाति विशेष हो गई। 
उन्नत समाज व्यवहार संहितायें रखता ही है। स्मृतियाँ वही संहितायें हैं। यहाँ संहिता का अर्थ वेद संहिता से नहीं, विधानों के सम्यक एकत्रीकरण से है। वे उस व्यवस्था को अभिलिखित करती हैं जिसमें जाति-वर्ण के ऐक्य को सुनिश्चित रखने के लिये विविध विधान बनाये गये। समाज की दीर्घजीविता एवं शांति हेतु यह आवश्यक भी था। एक पीढ़ी से दूसरी, तीसरी ... को प्रवाहित कुशलता अल्पसाध्य थी, उत्कृष्टता को दीर्घजीवी भी बनाती थी एवं नवोन्मेष हेतु आवश्यक वातावरण भी सुनिश्चित करती थी। उदाहरण के लिये रथकार का पुत्र भी शिल्पी रथकार हो, इसमें अधिक सरलता है, समाज एवं तंत्र पर अल्प बोझ है। राजन्य का पुत्र रथकार बने तो पहले से चली आ रही कुशलता का लोप तो होगा ही, श्रमसाध्य भी होगा एवं सातत्य टूटेगा। ऐसा नहीं था कि अपवाद नहीं थे, किंतु वे अपवाद ही रहे। स्मृतियाँ इसी कारण उपनयन एवं शिक्षा आरम्भ का समय, वटुकों के वस्त्र, दण्ड आदि को उसके पिता के वर्ण से निर्धारित करती हैं। यह नैरंतर्य का सूचक है कि तू उत्पन्न हुआ इस जाति विशेष में, अत: तुझे ऐसे ही, यही सीखना है, यदि नहीं करेगा तो पतित हो जायेगा। पतित का सामाजिक बहिष्कार होता था या वह समाजबाह्य हो जाता था।
इस व्यवस्था की यदि एकमात्र विशेषता देखी जाय तो वह है - उत्कृष्टता Excellence। यहीं राजा एवं राजन्य की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे उस पारिस्थितिकी को बनाये रखना है जो प्रत्येक जाति में, प्रत्येक उत्पादन कर्म में, प्रत्येक शिक्षा पद्धति में उत्कृष्टता सुरक्षित रखे। राजन् शब्द रञ्जन से जुड़ता है, यह रञ्जन मनोरञ्जन मात्र नहीं, प्रत्येक क्षेत्र में 'सुख समृद्धि शांति निरामयता' की स्थापना एवं दीर्घजीविता है जिससे समस्त समाज एवं राज्य तंत्र कल्याणकारी हो, वृद्धिपरक हो - राजन् [राज्-कनिन् रञ्जयति रञ्ज्-कनिन् नि ˚]। इसके साथ ही रक्षण है जो दुष्टों का दलन एवं सज्जनों की सुरक्षा है, क्षत से सुरक्षा करने वाला क्षात्र कर्म। राजा एवं राजन्य वर्ग में ये दोनों समाहित किये गये जिसके कारण ही अच्छा राजा विष्णु रूप माना गया, वह जो पोषण करता है, वह जो अत्याचारियों से रक्षा करता है, उसके लिये चाहे जो करना पड़े ! 
शब्द देखें तो यह सूक्ष्म संकल्पना उद्घाटित होती है। अच्छे राजा द्वारा शासित प्रदेश 'राजन्‍वत्'  है किंतु सामान्य राजा, जिसमें कि कोई उत्कृष्टता नहीं, द्वारा शासित प्रदेश 'राजवत्' है। एक अर्द्ध 'न' के अंतर से वरेण्य एवं रूढ़ में अंतर स्पष्ट कर दिया गया है। 
सामान्य प्रजा पहले विश् कहलाती थी, वैश्य उसी से है - कृषि, पशुपालन एवं शिल्प इत्यादि में रत रहने वाला बहुसंख्यक समाज। इसी से विशेषज्ञता एवं शिल्प कुशलता वाले कुशीलव निकले जिनका सामान्य स्तर सेवा करने वाला शूद्र हुआ। प्रजा से ही रक्षा करने वाले क्षत्रिय हुये एवं उन्हें निर्देशित करने वाले, विधि विधान के संयोजक पुरोहित ब्राह्मण। राजा या क्षेत्र विशेष का मुखिया  विश्पति कहा गया, उसकी पत्नी विश्पत्नी - जो विश् अर्थात प्रजा का पालन करने के कारण पूज्य है, आदरणीय है। 
अनेक प्रकार से कु-व्यञ्जित पुरुष सूक्त में राजन्य रूपी बाहु एवं वैश्य रूपी ऊरू अर्थात जानु (जंघे) पर ध्यान दें। राजन्य का आजानुबाहू होना शुभ लक्षण माना गया। इसके मूल में वही भाव है कि राजन्य वह जिसकी परास वैश्य तक हो। 
ऐसा राजा उत्कृष्टता को सुनिश्चित करता है, धरती पर विष्णु का रूप होता है। इस आदर्श ने प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता सुनिश्चित की। व्यापारी, सार्थवाह गण, कुशीलव उपनिवेश इत्यादि इतने शक्तिशाली थे कि राजसभा में उनका सम्माननीय प्रतिनिधित्व था। राजा मनमानी करते हुये निरङ्कुश नहीं हो सकता था। जो हुये, उनकी दुर्गति सुनिश्चित की गयी। राजा का कोश ही उसकी शक्ति है जो कि कराधान से भरता है। कराधान तब ही बढ़ेगा जब कृषक, वैश्य, शिल्पी, समृद्ध होंगे, फले फूलेंगे। 
स्पष्ट होता है कि 'उत्कृष्टता एवं कुशलता' इस व्यवस्था की देन थे एवं यह भी कि कोई भी जाति अपने पर लज्जित नहीं थी। इस्लामी आक्रान्‍ताओं ने इस शक्ति से सामञ्जस्य कर ही राज्य किया एवं अंग्रेजों की चतुर वणिक बुद्धि ने इस शक्ति को भारत को उपनिवेश बनाये रखने के मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा पाया। इस शक्ति को विविध उपायों द्वारा जिनमें कि दमन, दुष्ट कराधान एवं वैमनस्य वपन प्रमुख थे, उन्हों ने नष्ट कर दिया जिससे भारत आज तक उपरा नहीं पाया है। 
जाति आधारित आधुनिक मञ्चों में किसी को भी इसकी समझ है, प्रतीत नहीं होता। उत्कृष्टता की साधना के स्थान पर प्रयास जातिवादी राजनीतिक समूह प्रभाव सुनिश्चित करने की है जिसकी भीड़ आधारित लोकतन्‍त्र में सुनी जाय। ध्यान इस पर अधिक है जो कि प्रगति की मूलभूत आवश्यकता के विरुद्ध जाता है। पुराने का गौरव गान करते हुये वर्तमान स्थिति को विस्मृत कर देना हानिकारक है। प्रत्येक जाति अपने गौरव पुरुष ढूँढ़ने, बनाने एवं स्थापित करने में लगी है, बिना इस पर विचार किये कि सहस्राब्दियों के भारतीय इतिहास में किसी भी समूह को ऐसा करने की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ी, अब क्यों पड़ रही है? 
ब्राह्मणों पर बहुत लिखा गया, लिखा जा रहा है किन्तु उस राजन्य वर्ग का क्या जिसे कि ब्रह्मविद्या का पोषक माना गया, जिसे कि कभी ब्राह्मण ग्रंथों ने ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ घोषित किया? यह वर्ग भी पतनोन्मुख है। तामस, अनावश्यक उग्रता, मद्यपता एवं क्षुद्रता इसके लक्षण हो गये हैं। महाराणा का घोष करने वाले जानते तक नहीं कि महाराणा ने अपने अल्प शासन काल में ही उत्कृष्टता के कितने आयामों का स्पर्श किया। राजपूत का पूत उस संतति परम्परा हेतु है जो पुरखों की थाती सँभाले, उत्कृष्टता में उनसे आगे बढ़े अन्यथा काहे का राज,  काहे का राजपूत?  ज्ञान के अभाव में झूठा गर्व हास्यास्पद तो लगता ही है, युवाओं को दिशा भी नहीं देता, उल्टे गर्त में ही ढकेलता है। 
राज शब्द राजति, प्रकाशित होने का भी अर्थ रखता है, उत्कृष्टता होगी तो प्रकाशित होगी ही। किसी भी जाति ने निकृष्टता को आदर्श नहीं बनाया, बड़ी सामान्य सी बात है किन्‍तु वही आँखों से ओझल है। 
ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य; जो भी अपने को इन तीन जातियों में मानते हैं, यदि जाति आधारित मञ्चों को ही सब कुछ मान बैठे हैं तो भयानक भूल कर रहे हैं। स्वीकार कर रहे हैं कि वे चुक गये, उनके पुरखों का प्रभाव मर गया। 
ऐसे मञ्च अनुपयोगी हैं, ऐसा नहीं है किन्‍तु एक देश के रूप में, एक समाज के रूप में उत्कृष्टता सुनिश्चित करने में गौण भूमिका ही रखेंगे। यदि आप ऐसे किसी मञ्च से जुड़े हैं तथा वहाँ जय परशुराम, जय रावण, जय महाराणा; जैसी जय जय मात्र है तो बाहर आयें। जाति का गौरव तब ही बढ़ेगा जब उत्कृष्टता होगी, देश का भी नाम होगा जो कि द्विजता का अर्हण होगी। प्रतिद्वन्द्विता में शूद्र न बनें। भार्गव राम ने या महाराणा ने या अग्रसेन महाराज ने जय जाति, जय जाति उद्घोष कर अपने को स्थापित नहीं किया था। 
चेतें ! आप की सन्‍तानों के लिये आगत समय कठिन होने वाला है। अब्राहमी पंथ वैधानिक संरक्षण में आप को दिन प्रतिदिन काटने में लगे हुये हैं। जाति से जुड़े रहते हुये भी दृष्टि को व्यापक विराट बनायें, सूक्ष्म आक्रमणों पर ध्यान दें एवं उत्कृष्टता में लग जायें। एक साथ उठें, खण्ड खण्ड नहीं। ऐसे उदाहरण हैं जहाँ विविध जाति समूह एक उद्देश्य के साथ व्यापक एवं सूक्ष्म, दोनों स्तरों पर एक साथ लड़ते हैं, उपाय भले भिन्न हों, उद्देश्य एक है। दूजा कोई मार्ग नहीं।