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शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

लोक : भोजपुरी - 5 : घुमंतू जोगी - जइसे धधकेले हो गोपीचन्द, लोहरा घरे लोहसाई

पिछली कड़ियाँ: 
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अघोरियों और अत्रि-अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय की अवधूत परम्परा बहुत प्राचीन रही है। ऋक्, साम और वाजसनेयि संहिता में इनके संकेत मिलते हैं। सांसारिकता को तज चुके और सामाजिक व्यवस्था के उलट रहने और व्यवहार करने वाले अवधूत संन्यासी पश्चिम में दूर गान्धार देश (वर्तमान अफगानिस्तान) से ले कर पूरब में कामरूप अहोम (असम) देश तक और उत्तर में कश्मीर से ले कर दक्षिण में महाराष्ट्र तक विचरते और लोक जीवन को गहराई तक प्रभावित करते पाये जाते रहे हैं। पंजाब की जालन्धर नगरी योगी जलन्धरनाथ की कर्मभूमि थी। इनके प्रमाण इतने प्रबल हैं कि गुजराती कन्हैयालाल मुंशी ने अपने उपन्यास भगवान परशुराम में परशुधारी राम जामदग्नेय(परशुराम) को अघोरियों के साथ जीते, उनसे अतीन्द्रिय शक्तियों को ग्रहण करते और अंतत: उन्हीं शक्तियों के प्रयोग द्वारा सहस्रबाहु का वध करते प्रदर्शित किया है।
इसी परम्परा विकास की एक कड़ी है हठयोगी नाथपंथियों की। सनातन मान्यताओं और सामाजिक संस्कारों को चुनौती देते, संझा सधुक्कड़ी उजड्ड बानी बोलते, चमत्कार दिखाते, वीभत्स गालियों को बकते और लोकरंजन करते पूर्वी उत्तरप्रदेश के जोगीड़े और कबीरे आज भी हैं। कबीरों से वैरभाव रखने वाली जोगी परम्परा अपने को महायोगी शिव से जोड़ती है। ‘नाथ’ शब्द का अर्थ शरण देने वाले शिव से लिया जाता है।
हठयोग द्वारा शरीर को साध पंचमहाभूत काया का अतिक्रमण कर प्रकृति के पाँच तत्त्वों क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर पर विजय और तत्पश्चात कुंडलिनी जागरण द्वारा महासमाधि – नाथों की क्षात्र परम्परा बहुरंगी रही है। एक ओर ये वाममार्गी पंचमकारों का निषेध करते हैं तो दूसरी ओर दो महासिद्धों मछिन्दर(मत्स्येन्द्रनाथ) और गोरखनाथ के रूप में तिब्बती महायानी और बज्रयानी बौद्ध परम्परा में भी स्थान पाते हैं। गोरखपुर की गोरखनाथ पीठ आज भी सक्रिय है और समस्त पूर्वी उत्तरप्रदेश और नेपाल में इसका प्रभाव है। यह परम्परा जाति पाति में विश्वास नहीं रखती। नाथ गुरु द्वारा दीक्षित योगी नाद परम्परा के माने जाते हैं तो गृहस्थ योगियों के पुत्र बिन्द(दु) परम्परा के।
जगविख्यात त्रिशतकों शृंगार, नीति और वैराग्य के रचयिता राजा भर्तृहरि(लोक में भरथरी नाम से प्रसिद्ध) नाथ परम्परा से जुड़े हैं। उनके भांजे राजा गोपीचन्द उनके साथ नौ महासिद्धों में स्थान रखते हैं। लोक में इनका बहुत प्रभाव रहा है। आश्चर्य होता है जब संतों की निर्गुण और सगुण भक्तिधारा भी इनसे निकसती दिखाई देती है। गुरु गोरखनाथ (गो = इन्द्रिय, रख – रखवाला अर्थात इन्द्रिय संयमी) को साधना की नई तकनीकों के आविष्कार का श्रेय प्राप्त है। त्रियाराज में अखंड भोग भोगते पतित हो चुके अपने गुरु मछिन्दरनाथ का उन्हों ने उद्धार किया:  
चेत मछिन्दर गोरख आया, अगम निगम हिय हेला जी
एतियो नींद में सोया नाथ जी, आप गुरू हम चेला जी।
उनका प्रभाव इतना व्यापक रहा है कि ओशो रजनीश ने कहा है:
“बिना गोरख के न कबीर होते और न नानक, न दादू होते, न वाजिद, न फरीद और न मीरा।“
इसलिये कबीर जब गाते हैं ‘अवधूता जुगन जुगन हम जोगी, हमहीं सिद्ध, समाधि हमहीं’, तो इसमें हमें बहुत से संकेत छिपे समझने चाहिये।  
नाथ परम्परा की दीक्षा बहुत कारुणिक होती है। संन्यास लेने पर विवाहित व्यक्ति को गुदड़ी और खिचड़ी की पहली भीख अपनी पत्नी से माँगनी होती है तो कुँवारे को अपनी माँ से। घर त्याग चुके संन्यासी को जीने के लिये केवल भोजन और कपड़ों की आवश्यकता होती है जिनकी पूर्ति भीख में मिली गुदड़ी (लुगरी) और खिचड़ी (अन्न का पंचमेल) से होती है। पहली भीख से प्रारम्भ हुई यह यात्रा बारह वर्षों तक चलती है। बारह वर्ष तक जोगी दुबारा अपने गाँव नहीं आता। आता भी है तो एक बार और उसके बाद पंचमहाभूतों के इस संसार में विरम जाता है कि इससे मुक्त हो सके।
ये घुमंतू जोगीड़े अपने सिद्धों की गाथा गाते फिरते रहते हैं। घुमंतू वीरगाथाओं की परम्परा सारे संसार में पाई जाती है लेकिन संन्यासीगाथाओं की परम्परा सम्भवत: केवल भारत में ही है। इनके लोकलुभावन गीत प्राय: करुणरस प्रधान होते हैं जिनमें संन्यास ले चुके पुरुष परिवारी के दुख में सीझती स्त्रियों की मनोदशा भी वर्णित होती है। इनकी कहानियों में विरोधाभासों की विविधता होती है और लोकरंजक कौतुक चमत्कारों की बहुलता भी। गैरिक वेश, सारंगी और तप का सम्मोहन कुछ ऐसा होता है कि लोग मुँह बाये सुनते रहते हैं।
राजा भर्तृहरि की बहन मैनावती के पुत्र गोपीचन्द ने 12 वर्ष की अवस्था में ही संन्यास ले लिया। लोकमान्यता दो प्रकार से है – एक, स्वयं माँ ने उन्हें प्रेरित किया; दूसरी, उन्हें गुरु ने प्रेरित किया। उनकी गाथा ऊपर वर्णित समस्त क्षेत्र में जोगी गाते फिरते रहे हैं। देखिये सन् 1880 के दशक के पंजाब में एक अंग्रेज क्या बताता है? संन्यास लेने के पहले स्नान करते गोपीचन्द को देख माँ मैनावती की प्रतिक्रिया:
करन लगे अश्नान राव ने, चन्दन चौक बिछाई
चमकत बदन कनक जैसा, और मुख चन्दर की नियाई
निकसा भान गगन में, सूरज की एक जोत छिप छाई
हे मिरग नैन, कंठ कोइल, मुख ना उपमा कही जाई
मोरी बैठी, नैन निहारी, मैनावती माई
टप टप आँसू परे धरन पर, थमत नहीं थमाई।‘ 
चित्राभार : सतीश पंचम
... सौ से भी अधिक वर्षों के पश्चात दूर पूर्वी उत्तरप्रदेश के रामकोला कस्बे की एक दुपहर है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करता एक किशोर गाते हुये जोगी को अपनी माँ के साथ सुन रहा है। ...
 बारह वर्ष की कच्ची अवस्था में गोपीचन्द संन्यास ले पहली भीख की गुदड़ी माँगने माँ के सामने हैं। माँ क्या करे? लुगरी बगल में दबा कर पुत्र को मनाने का अन्तिम प्रयास करती है। आज वह गर्वीली रानी नहीं, एक माँ भर है – सीधी साधी साधारण। उसके तर्क और उसकी मनावन सब आम स्त्रियों जैसे ही हैं। जोगी तर्कातीत हो गया है – रानी झोपड़ी में रहने वाली साधारण माँ रह गई है जिसने अपने पुत्र को वैसे ही पाला है जैसे कोई मजदूरन। उसे मौसमी उपद्रवों की भी चिंता है। भोजपुरी में कहते  हैं – कोखियासन यानि कि कोख की ममता। ममता की अग्निस्वभावी उपमा लोक की देन है। कोख में आग और आँखों में पानी! आगी-पानी का यह संगम जाने कैसा हठयोग है!   
 गाता हुआ श्वेत श्मश्रुधारी गैरिकवसन घुमंतू वृद्ध जोगी जाने कितनी माताओं से अपने को जोड़ लेता है! उसके स्वर में कष्टप्रद जीवन की पीर है, घर बैठी दुख झेलती स्त्रियों की ममता है और आँखों में बैरागी सूखा पड़ा हुआ है। वह स्थितप्रज्ञ है या पीर के उस स्तर तक पहुँच चुका है जिसके आगे जो है वह अकह्य है?  
माँ ने भीख वाली गुदड़ी को किनारे रख पुत्र को समझाना शुरू किया है – बेटे! माँ की कोख में आज तुमने अग्नि धधका दी। तुम्हारे निर्णय  से माँ की कोख वैसे ही धधक रही है जैसे लोहार की भट्ठी । दुख की रह रह फूँक है और दाह बढ़ता है, चुकता है, बढ़ता हैबेटा भी तो बैराग की भट्ठी में तपने को जा रहा है।   
अरे धइली हो गुदरिया माई, बाबू के समझाई
माइ के कोखिया अगिया हो बेटा, आज दिहल धधकाई॥1॥
जइसे धधकेले हो गोपीचन्द, लोहरा घरे लोहसाई
अरे वइसे धधकल माइ के, कोखिया तर अगिनी ॥2॥
आज माँ महलनिवासिनी नहीं, ग्राम निवासिनी है। वह कहती है – गाँव  में आग लगती है तो गाँव वाले बुझा देते हैं लेकिन माँ के कोख की अग्नि को कौन बुझायेगा? किस कारण मुझसे रूठ गये बेटे? मुझे क्यों तज रहे हो? माँ से बताओ तो सही!   
गँउवा के अगिया रहते हो बेटा, गाँव के लोग बुताई
बाकिर माई के कोखिया के अगिया, दुनिया में कोइ न बुताई॥3॥ 
कवने करनवा ए गोपीचन्द, तेजत बाड़ माई
मनवा के किरोधवा हो बेटा, देब बतलाई॥4॥ 
गोपीचन्द कहते हैं कि इसे विधि का लिखा मानो माँ! लुगरी दे भीख देने की रस्म का निबाह करो। बेटे को भुला दो। ऐसा समझना कि तुम्हारी कोख से कोई पुत्र पैदा ही नहीं हुआ था। इतना सुन माँ झर झर रोने लगती है – अरे बेटे! तुम्हारी सूरत मैं कैसे भुला दूँ?
कहें समझावें गोपीचन्द, जनि रोव हो माई
का करबू करमवा में ब्रम्हा, लिखलें हमरे जोगी॥5॥ 
बरहे बरसवा ले रजवा, लिखलें रहले हो माई
तेरहे बरसवा में जोगी, हो गइलीं हो माई॥6॥
अरे देइ द लुगरिया ए माई, बेटा के द बिसराई
अस मन जनिह कोखिया में बबुआ, पैदा भइलनि नाहीं॥7॥ 
झर झर झर झर रोवे लगली, गोपीचन्द के माई
अरे तोहरा सुरतिया हो बबुआ, कइसे हम बिसराईं?8॥ 
समझाती दुखिया माँ अब वह कहती है जिसे कोई भी माँ कहने से बचती है। क्या करे, और कोई चारा भी तो नहीं!
 तुम्हें बहुत तपस्या और देवी देवता की आराधना के बाद पाया। देवस्थानों पर सिर पटकते पटकते मेरा ललाट घिस गया। नौ महीने तुम्हें मैंने गर्भ में ढोया। दसवें में तुम पैदा हुये तो तेल और उबटन लगा कर तुम्हें पोसा।
आज माँ दास दासियों की सेवा लेती रानी नहीं है, एक आम माँ है जिसने अपने पुत्र को तेल और उबटन स्वयं लगा कर पोसा है।        
अरे बड़ बड़ तपेसवा क के, तोहरा के जनमाई
जहवाँ देखलीं हो देबिय देवता, सिरवा हम झुकाईं॥9॥
अरे सिरवा पटकते माइ के, लिलरा गइलें खियाई
नव महिनवा गरभ में ढोवलीं, हम असरा लगाईं॥10॥ 
दसवे महिनवा कोखिया में, लिहल मोर अवतार
अरे तेल अबटन लगा के, बबुआ हो तोहके पोसीं॥11॥
उसकी व्यथा हर ग़रीब माँ की व्यथा हो गई है। वह कहती है कि माघ और पूस के घनघोर जाड़े में तुम्हें आग की आँच सेंक मैंने गर्म रखा, जाड़े की ठंड से बचाया। जेठ बैसाख की तपती धूप में तुम्हारे सिर अपनी आँचल की छाँव की। तुम्हें दूध पिला इसलिये बड़ा किया कि गाढ़े दिन मेरे काम आओगे। माँ के पास अब कुछ नहीं बचा। तुमने उसका आसरा ही तोड़ दिया। हारी हुई माँ और क्या कहे?    
मघवा पुसवा जड़वा बेटा, अगिया के आहे सेकीं
ठंढा जड़वा सितिया हो बाबू, तोहरा के बचाईं॥12॥  
जेठवा बइसाख घमवा, हम अँचरा ओढ़ाईं
सात दुधवा हो गोपिचन्द, तोहरा के पियाईं॥13॥  
अरे दुधवा पिया के हो बेटा, हम कइलीं सयान
जनलीं माइ के गार्हे दिनवा, बबुआ अइहें कामे॥14॥
माँ की ममता हिलोर लेती है। उसे जोगी जीवन के कष्ट ध्यान में आते हैं। समृद्धि में पले पुत्र का कोमल शरीर उन्हें झेल पायेगा?
बहुत दुख हैं बेटे इस जीवन में! किसी दिन समय कुसमय भोजन मिलेगा तो किसी दिन खेत में चने की डाल से चना तोड़ ही पेट भरना पड़ेगा। तुम्हारी कोमल देह कुम्हला जायेगी। तुम माँ के इकलौते बेटे हो, भीख माँगते द्वार द्वार भटकोगे।
माँ का कलेजा फट गया है।
तवनो हमार असरवा तुड़ल, बनि गइल हो जोगी
जोगी होके जइब हो बबुआ, बड़ा दुखवा बीती॥15॥  
कहियो भोजनियाँ मीली,  जुनिया कुजूनी
कहियो मुठि भर चाना फुटहा, तुरलब हो डारी॥16॥
अरे कोमल बदनिया बाबू, ओ रे जइहें कुम्हिलाई
माई के हो एकलवता बेटा, जइब केकरे द्वारे॥17॥ 
गायक जोगी की अपनी व्यथा मैनावती की जुबानी बह निकली है।
दूसरे की माँ को माँ कहोगे, दूसरे की बहन को बहन। कोई कड़वा बोलेगी तो कोई झुँझलायेगी। कोई प्रेम से बैठायेगी तो कोई हृदय की कठोर मिलेगी। जोगी घरदुआर पर अकेली स्त्रियों से अपनी करुणा डोर जोड़ लेता है, कहता है कि साधू का दर्द छोटा होता है और धर्म ही उसकी पूँजी होती है।   
आन के माई के माई कहब, आन के बहिना के बोहिनी
केहु माई तीत बोलिहें,  केहुअ झपिलाई॥18॥  
केहू माई बहिनिया हो गोपीचन्द, प्रेम से बइठाई
केहु माई बहिना मिलिहें, हिरदया के कठोर॥19॥  
छोटी साधु दरदिया हो बाबू, लिहलें धरमी पूँजी 
माँ के इतना समझाने पर भी गोपीचन्द नहीं मानते। जो नियति में लिखा है, उसे कौन मिटा सकता है?
अरे एतना समझावेले माई, बबुआ समझेलें नाहीं
करम करे लिखलका हो माई, दुनिया में कोइ ना मेटाई॥20॥
... जोगी यह गाते हुये चला गया –
‘आगि के महलिया तोहरी, कइसे आईं हो जोगी? ...
आँखें डबडबाती रह गईं। 
    

(इस ऑडियो को कैसेट से लिया है। गुणवत्ता ठीक नहीं है। कुछ क्षणों में पीछे किंवाड़ खुलने, बच्चों के खेलने और प्रचार के भी धीमे स्वर सुनाई देते हैं। सारंगी और उससे लगे करताल की ध्वनि शोर सी हो गई है। अपेक्षित प्रभाव और समझ के लिये हेडफोन लगा कर सुनें। Audacity सॉफ्टवेयर से जितना ठीक मुझसे हो पाया, किया। अनुज cooleditpro सॉफ्टवेयर पर प्रयास कर रहा है। कुछ बेहतर हुआ तो अवश्य लगाऊँगा। सम्प्रति इसी से काम चलाइये।  क्या कोई इसे ठीक कर मेरे पास भेज सकता है?)


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गुरुवार, 30 जुलाई 2009

दूसरा दिन : बाउ मण्डली और बारात एक हजार

पिछले भाग से जारी...
(प)
सुद्धन यानि सदानन्द।दुबली लम्बी शरीर, गौर वर्ण। भूरे बाल और भूरी आँखों के कारण लोग ‘कैरा’ भी कहते थे। शौकिया पढ़ाकू खेतिहर थे । संस्कृत, इतिहास, पुराण, गणित और ज्योतिष के ज्ञाता। माँझी टोले के निवासी – बाउ के गोत्र से नीचे और उम्र में पाँच साल बड़े। बाउ ने दूसरे दिन के जनवासे के लिए चेताया तो हँस दिए ,’देखल जाई (देखा जाएगा)’।
विवाह संस्कार प्रारम्भ होने पर गीत गाने के लिए जब माँ ने झलकारी की ओर देखा तो वह सो चुकीं थीं। जिन पाँच औरतों को झलकारी ने श्रम आयोजन से मुक्त कर दिया था, सुरसतिया की तीन सहेलियों के साथ बस वही मड़वे(मण्डप) में थीं। गाँव का शायद यह पहला विवाह था जिसमें इतना सन्नाटा था। थका हारा नारी समाज अपने अपने घरों में सुख की नींद सो रहा था – लड़ाई जो जीती जा चुकी थी।
माँ ने कढ़ाया (आलाप लिया)
उठीं राजा रामचन्नर ऊठीं हे SSS
जब भैया करइहें पनिगरहन तबही रउरा बिहअब
जब बाबा दिहें कन्यादान तबही रउरा बिहअब हे SS”
हजारों हजार साल पहले राम ने सीता से विवाह किया था। आज तक परम्परा स्मृति में है वह विवाह। राम और सीता के कर्म और साथ साथ भोगे दु:खों की कारुणिक अनुभूति ने जैसे हर विवाह में अपना स्थान बना लिया था। इन गीतों के बहाने जैसे दुल्हे दुल्हन दोनों को दाम्पत्य जीवन की भारी जिम्मेदारियों से आगाह किया जाता था।
कोने में बैठे मिसिर धीमे धीमे जाने क्यों राम लला नहछू गाने लगे। एकमात्र श्रोता थे – बाउ। हूँ, हूँ SS|
सप्तपदी प्रारम्भ हुई।
“जब बियहब हे राम तब बियहब हे राम
सातो फेरवा लगाइब तबही रउरा बिहअब”
हरिहर ने समाप्त कर सिन्दूरदान के लिए मंडप खाली कर दिया। इस सबसे महत्त्वपूर्ण अवसर के लिए वेदों में कोई मंत्र नहीं थे। अत्यंत गोपनीय यह कर्मकाण्ड केवल नारी समाज की गवाही में होता था। क्या इसीलिए सिन्दूर इतना महत्त्वपूर्ण है?
हाथे के सिन्होरवा लेहले सखी सब ठाढिSS रे
उठि राजा राम चन्नर करीं सेनुरदान हे SS”
भोर की लाली फैलने के पहले ही सिन्दूरदान हो गया। सिन्दूर लगाते समय सारा सिन्दूर सुरसती के नाक के नीचे तक उतर गया। कहते हैं ऐसी दुल्हन पति की बड़ी दुलारी होती है।
बाउ मगन हो गए- “भइल बियाह मोर करबे का (विवाह तो सम्पन्न हो गया, अब क्या)”?
(फ)
दूसरा दिन। जैसा कि तय था, बड़े सबेरे भुरकुआ (भोर का तारा) की जगमग रहते ही सुक्खल सबकुछ ले हाजिर हो गया। बारात में राशन और लौना (ईंधन) पहुँचा कर बाउ ने बैलों की सेवा चालू की। पठ्ठों ने बहुत साथ दिया था।
अब जरा उनका भी परिचय हो जाय। एक था गोलवा (पीली रंगत लिए नीची तरफ मुड़ी सींगों वाला)। एकदम सुद्धा (सीधे स्वभाव वाला), बच्चों का प्यारा और भारी शरीर के बावज़ूद बला का तेज भागने वाला। बाउ ने इसे कभी नहीं नाथा (नकेल, नाक की बीच की हड्डी छेद कर पहनाई गई रस्सी जानवरों को नियंत्रित करने के लिए प्रयुक्त)
दूसरा था धौरा (धवल शरीर, सुन्दर लम्बी सींगें तलवार की तरह)। उग्र, ग़जब का मरखाह (सींग से मारने वाला)। बाउ के अलावा किसी की क्या मज़ाल जो पास भी फटके। छरहरे शरीर का होने पर भी जोतने और भार उठाने में प्रवीण। एक बहुत ही मार्के की बात थी कि दोनों बैलों में कभी लड़ाई नहीं हुई। बाउ कहते थे कि किसी गड़ुवान(गाड़ीवान) का जबरपन (बल और नियंत्रण) जानना हो तो पता करो कि उसके बैल आपस में लड़ते हैं क्या?
(ब)
अचानक ही गाँव में नगाड़े बजने लगे। पता चला कि बारात के मालिक नाहर सिंह ने घुड़दौड़ देखने को सभी गाँवों को न्यौता दिया है। बाउ ने जिस समय सुना उस समय बैलों की मालिश और नहान खत्म कर उनके सींगों को कड़ुवे तेल और सिन्दूर से चमका रहे थे।
यह तो अज़ीब बात थी। दूसरे दिन का पूर्वाह्न तो बाराती आराम करने और नाच देखने में बिताते थे और अपराह्न मरजाद जनवासे में। इसी दरमियान दिन में दुल्हा खीर खवाई (विशेष निमंत्रण पर दुल्हा बारात से वापस ससुराल आता था। मूँज घास के बने मंडप में जिसमें विवाह सम्पन्न हुआ होता था, बैठ कर खीर या दही चिउड़ा खाता और उपहार इकठ्ठा करता । रिसियाने (रूठने) की परम्परा होती और दुल्हा तब तक रिसियाया रहता था जब तक मुँह माँगा उपहार न मिल जाय। कई बार तो बारात से बुज़ुर्गों को आकर समझाना पड़ता था) से निपट लेता था।
गाँव में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि कोई बारात वाला कुछ अनूठा करे और नगाड़ा बजवा कर देखने को बुलवाए। बाउ ने मन को समझाया ,” अइसन बरातियो त आजु ले नाहीं आइल रहलि हे (ऐसी बारात भी तो आज तक नहीं आई थी)।“ जल्दी जल्दी बैलों को निबटा कर कमर पर गमछा बाँधते हुए खलिहान की तरफ झड़क (तेज कदमों से) चले। पगड़ी अभी तक सिर पर ही थी।
(भ)
खलिहान से अहिरटोली के तरफ के रास्ते के दोनों तरफ समतल परती (बंझा या छोड़ दी गई खाली पड़ी धरती) थी। नाहर ने घुड़दौड़ की व्यवस्था यहीं की थी। गोलाई में भींड़ इकठ्ठी हो चुकी थी। रास्ते के एक तरफ नीची मचाननुमा जगह पर नाहर का सिंहासन लगा था, दूर सीधाई में रास्ते के बीचो बीच रोली पुता भाला डण्डे की ओर से जमीन में गड़ा था, फलक पर बिंधा था –छोटा सा कोंहड़ा (कद्दू)।
योग्य और प्रशिक्षित घुड़सवारों ने प्रदर्शन प्रारम्भ किए । पहले सूर्य देव के उदय को प्रतीकात्मक रूप से सात घुड़सवारों ने एक ऊँचे कद के घोड़े को केन्द्र में रखते हुए दर्शाया – सूर्यवंशी नाहर फूल उठे। फिर घोड़ों पर गोले के अन्दर ही थोड़ी देर चौगान। गोले में घूमते हुए विपरीत दिशा से आते दो घुड़सवारों ने जब बिना टकराए अपने घोड़े बदल दिए तो भींड़ आनन्द से पागल हो उठी।
बाउ उत्सुकता में खिसकते खिसकते न जाने कब मचान के एकदम पास पहुँच गए थे। अंतिम प्रदर्शन था- रास्ते पर धँसे भाले की तरफ घोड़ा दौड़ाते जाना और बिना उसे गिराए और बिना रुके कोंहड़ा (कद्दू) लेकर वापस आ जाना। भींड़ तो जैसे मतवाली हो गई थी।
लोहा गरम जान नाहर सिंह ने आवाज दी,’बाउ, कुछ इहो कुल जानेल कि खाली बैले भँइस डहरावेल (यह सब भी आता है कि केवल बैल भैंस ही घुमाते रहते हो)। बाउ ने उपहास समझ सुना अनसुना कर दिया। लेकिन नाहर तो जैसे उतारू ही थे। दुबारा कोंचा ,” सुनलSS नाहिं का। दलिद्दर खेतिहर बहिरो होलें का (सुने नहीं क्या? दरिद्र खेतिहर बहरे भी होते हैं क्या)? और.... वही अट्टाहस, बाउ ने नजरें उठाईं तो ... गजकरना, नाहीं नरसिंघवा, गजकरना, नरसिंघ हा! हा!! हा!!!
कुएँ के भीतर से जैसे आवाज आई हो ,’नरसिंघ..’ चेतना ने सँभाल लिया , ..’वा’ नहीं बोलना, सम्माननीय है।
. . .बरसों पुराना गुरु गोनई नट्ट का आदेश,’बउआ, कब्बो देखावा खातिर बिद्या जनि उघरिह। पाप होला (कभी दिखावे के लिए विद्या का प्रदर्शन नहीं करना, पाप होता है)। . . मामा के यहाँ तो रात थी ! बचपन या बचपना ? ब्रह्मराक्षस! लेकिन आज? भरी दुपहरी, हजारों की भीड़!
. .गुरु का आदेश? पाप तो उसी दिन हो गया था गुरूजी जिस दिन बैल की पीठ पर बिठा दिए थे। बैल की पीठ पर तो केवल भोले शंकर ही बैठ सकते हैं। खेतिहर का बेटा तो सोच भी नहीं सकता। गाड़ा में नाधने पर बात और हो जाती है। ये क्या किया?
‘चुप्प! जोगी अउर नटुए ई कुल नाहीं मानेलें (चुप रहो, जोगी और नट्ट यह सब नहीं मानते)’।. .
हा! हा!! हा!!! ‘का हो गइल (क्या हो गया)? डेरा गइल (डर गए)?...नरसिंघवा, गजकरना . .
आत्मनिरीक्षण से उपर आ बाउ ने दृष्टि उठाई। कठिन परीक्षा। गाँव वाले क्या सोचेंगे? भींड़ जैसे सन्न। दहकती हुई आँखें, पाताल की गहराई से गोहार निकली ,”दोहाई गुरू, दोहाई भोले। मैनवाSSS’।
गिरता पड़ता मैनवा भींड़ से बाहर आया। “जो, गोलवा के खोल ले आउ (गोलवा बैल को खोल कर ले आओ)।“ नाहर की ओर मुँह कर बाउ बोले,’बाबू, खेतिहर का जानें घोड़ा, हम त बैले दउराइब (खेतिहर घोड़ा क्या जानें, मैं तो बैल ही दौड़ाऊँगा)’।नाहर को लगा गलती हो चुकी थी। रात को इस बनमानुख का किस्सा सुना था। पोखरे पर नाचते प्रेत! . . . . लोचना अभी तक बोल नहीं पा रहा था- गर्मी? कैसा इलाका था ये? – बारात का पूरा खर्च जैसे आपस में चुपचाप बाँट लिया हो !
भींड़ की स्तब्ध आँखों के आगे ही बाउ उछल कर गोलवा पर सवार हो गए। पापी! नराधम!! मिसिर बुदबुदाए थे। मुन्नर बोला ‘नाहीं बाबा, पाप त मनई के लागेला। परेतन के नाहीं। चुप्पे तमाशा देखीं (नहीं बाबा, पाप तो मनुष्य को लगता है, प्रेतों को नहीं। चुपचाप तमाशा देखिए)।‘
गोलवा को दौड़ाते हुए बाउ भाले के पास पहुँचे, बाएँ हाथ से पगहा सँभालते दाहिने हाथ से पूरा भाला उखाड़ लिया। मुड़ कर दौड़ते गोलवा की पीठ पर खड़े हो गए। भीड़ ने देखा - वापस आता दौड़ता बैल, उस पर खड़ा वनमानुष, हवा में लहराता गमछा और हाथ में भाला। अमानुषी किलकारी गूँजी, दूरी का अनुमान ले दौड़ते बैल की पीठ पर थोड़ा पीछे झुक अधखड़े हो बाउ ने भाला मचान की तरफ उछाल दिया।. . . सन्नाटा पसर गया।
नाहर भय से पीले पड़ गए। शान ने जैसे कदम जकड़ लिए थे नहीं तो मचान से कूद ही जाते। आँखें बन्द हो गईं। . .
खचाक! आँखें खुलीं तो देखा कि भाला मचान पर उनके आगे धँसा हुआ है। बाउ की पगड़ी उनके कदमों में। . . . झुका बैठा बनमानुख माफी माँग रहा था ,’बाबू, अब अउर नाहीं, बस्स(अब और नहीं, बस)
नाहर ने मरजाद की तैयारी के बहाने घुड़दौड़ बन्द करा दी। तमाशा देखने की उनकी लालसा पूरी हो चुकी थी – सचमुच क्या?
(म)
जिस तरह द्वारपूजा में कन्या पक्ष की परीक्षा सी होती है, वैसे ही मरजाद के दिन जनवासे में वर पक्ष की। नाहर सिंह ने इस अवसर के लिए अंग्रेजी शामियाना तनवाया था । ऊँचा तोरण और शिखरों के आभास, लगे जैसे महल हो। वैसे ही द्वार, हर द्वार पर पहरेदार। भीतर जमीन पर गद्दों के उपर झक सफेद चादर। सहारा लेकर बैठने के लिए गाव तकिए। चाँदनी तनी हुई। झूमर । केले के पौधों का एक पूरा वृत्त। पूर्व की ओर मुँह कर ऊँचे मंच पर लगा भव्य सिंहासन जिस पर दुल्हा रणवीर बैठ जनवासे का मौन सभापतित्त्व कर रहा था। सिंहासन के उपर यंत्र चालित बड़ा दुपखिया पंखा, जिसे एक सेवक डोरी खींच छोड़ चला रहा था। कितने ही सेवक बड़े पंखे ले घूमते हुए लफा कर दोनों हाथों से झलने के लिए तैयार।
बजनिए और वेश्या दल एक किनारे। सभा में जब बौद्धिक बहस समाप्त हो जाती तो ये लोग अपनी कला का प्रदर्शन करते – विशुद्ध शास्त्रीय विधि से। कोई अश्लीलता या सस्तापन नहीं।
वर पक्ष। संभ्रांतता और गरिमामय दम्भ। कुलगुरु महेशानन्द, शैव। पकी हुई लहराती दाढ़ी, प्रशस्त ललाट। माथे पर त्रिपुण्ड और आँखों में गहराई।
पुरोहित अष्टभुजा शुकुल। दाढ़ी मूँछ सफाचट। माथे पर वैष्णवी टीका। गले में तुलसी माला। श्वेत चन्दन चर्चित शरीर का उपरी भाग नग्न था। नाहर के साथ वही नौ बुजुर्ग। चेहरों पर अहंकार नाचता हुआ और आँखों में व्यंग्य भरा तिरस्कार। बाकी सभा सुभीते से बैठी हुई।
कन्या पक्ष। पँड़ोही के साथ मिठाई मिसिर। वही वेश भूषा। बगल में हरिहर। साथ में बाकी पट्टीदार। चेहरों पर धूप की लाली और विशिष्ट झुर्रियाँ जो खेतों में काम करने वालों का श्रृंगार होती हैं। बाउ, इस बार साफ धोती पहने हुए। सुद्धन उनके बगल में बैठे – अगर खड़े हो जाँय तो लगे कि जैसे खेत में ढीला चोगा पहने पुतला लगा हो। मनसुख, मुन्नर वगैरह पीछे की पंक्ति में। हजाम साज साजने में लगा हुआ था।
दोनों पक्षों के मध्य में मंगल कलश।
वर पक्ष की तरफ का भाग पूरा भरा था तो कन्या पक्ष का एक तिहाई भी नहीं।
धूपदान जल उठे। गुलाब जल का छिड़काव प्रारम्भ हुआ और पंखे झलने वाले हाथ सक्रिय हो उठे। कटे हुए सूखे फल और शरबत लिए सेवक घूमने लगे।
महेशानन्द और अष्टभुजा बाबा ने स्वस्तिवाचन से कार्यवाही प्रारम्भ की, “स्वस्ति नो इन्द्रो, स्वस्ति नो पूषा...”। गम्भीर वेदध्वनि से शामियाना गूँज उठा।
उसके बाद वर की ओर मुखातिव हो सुन्दरी नर्तकी ने आलाप लिया। मधुर स्वर, मधुर काव्य का चयन और भरपूर यौवनमयी तन्वंगी तरुणी। सभा मधुमय हो उठी:
’श्रृत कमलाकुच मंडल, धृत कुण्डल ए
कलित ललित वनमाल जय जय देव हरे
.....
दिनमणि मण्डल मण्डन भवखण्डन ए
मुनि जन मानस हंस, जय जय देव हरे ‘
अवतार स्तुति का आश्रय ले नर्तकी ने दुल्हे में जैसे कन्हैया का रोपण कर दिया हो। वर को आशीर्वाद देकर नर्तकी ने झुक कर नमस्कार मुद्रा के साथ प्रस्तुति समाप्त किया। न्यौछावर की झड़ी लग गई।
अब बारी मंगल पाठ और बौद्धिक बहस की थी। परम्परा के अनुसार पहले कन्या पक्ष वर की मंगल कामना से प्रारम्भ करता था। बाउ ने हरिहर को कोंचा। लेकिन पुरोहित होने के कारण मिसिर खड़े हुए। रात भर का श्रम। वृद्ध शरीर। स्वर में थकान और स्खलन। बाउ बैठे बैठे ऐंठने लगे। हरिहर पर क्रोध आ रहा था।
“गवीश पुत्र: नगजार्तिहारी, कुमार तात: शशि खंड मौलि:।
लंकेश सम्पूजित पादपद्म:, पायादनादि परमेश्वरो वा॥“
हाथी के मुख के समान सूड़ वाले गणेश जिनके पुत्र हैं। वह कार्तिकेय के पिता जिनके ललाट पर चन्द्रखण्ड विराजमान हैं। रावण के द्वारा जिनके कमलवत चरण पूजित हैं, वे परमेश्वर शंकर सबका कल्याण करें।
किसी भी तरह से मिसिर की निहायत ही पारम्परिक और थकान लिए यह प्रस्तुति अब तक बन चुके माहौल के अनुकूल नहीं थी। वर पक्ष में न जाने कितने चेहरों पर व्यंग्य और तिरस्कार नाचने लगे थे।
महेशानन्द ने पलट वार किया -रावण कृत शंकर स्तुति ! खड़े हुए और पखावज वादक को संकेत किया। आर्यागीति छन्द, धमाल ताल पर शिव ताण्डव स्तोत्र नाद सौन्दर्य का सृजन करता गूँज उठा:
”जटाटवी गलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेवलम्ब्य लम्बिताम् भुजंगतुंगमालिकाम्
डम डम डम्म... ..
.......................
........ सुमुखिं प्रददाति शम्भु:”
महेशानन्द अंतिम तक खींच ले गए। सभा सम्मोहित सी हो गई। बाउ जैसे भी जिन्हें संस्कृत की कोई समझ नहीं थी, सुध बुध खो बैठे। 
मनुष्य की लड़ने की प्रवृत्ति! यहाँ एक दूसरे की मंगल कामना करनी थी लेकिन लड़ाई इस बात की कि कौन बेहतर और सामने वाले से अच्छे से कहता है?कौन दमदार प्रभाव छोड़ता है- इसीलिए घात प्रतिघात। हाय रे मंगल भावना !
बाउ ने सुद्धन की ओर निहारा। आँखों ही आँखों में सम्प्रेषण। भइया अब तुम्हारा ही सहारा। ऐसे माहौल में विरुद्ध वीणा वादन! सुद्धन का काम अति कठिन था। खड़े हुए। बोलना प्रारम्भ किए। एक एक शब्द जैसे गहन अध्ययन की पूँजी सँजोए था . . . जारी