आज बाउ गाथा लिखने बैठा तो जाने क्यों भोजपुरी क्षेत्र की यह देहाती कथा याद आ गई। मैंने तो यही समझा कि अवचेतन की चुहुल है - मन में बहती दो एकदम भिन्न शैली की कथाओं 'प्रेमपत्र' और 'बाउ' को लेकर। सोचा आज देहाती बोध कथा को ही साझा कर दूँ। फोटो भी ऐसे ही लगा दिया है - दुपहरी फुरसत के कुछ क्षण। ऐसी कथायें ऐसे मौकों पर ही तो जन्म लेती हैं!
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ढेले और पत्ते में बहुत मैत्री थी। खेत से गुजरती मन्द हवायें ढेले से धूल की बातें करतीं तो पत्ते से खड़खड़ की। दोनों की बातों में कुछ खास नहीं होता था लेकिन दोनों बिना बातें किये रह नहीं पाते थे।
एक दिन हवा तेज हो गई। पत्ते ने खड़खड़ की - मैं उड़ जाऊँगा!
ढेले ने उसे अपने नीचे दबा लिया और पत्ता गुम होने से बच गया। मैत्री बनी रही।
एक दिन तेज वर्षा होने लगी। ढेले की धूल गलने लगी। ढेले की मौन घबराहट देख पत्ते ने उसे ढक लिया। ढेला गलने से बच गया। मैत्री बनी रही।
एक दिन आँधी पानी दोनों साथ साथ आये। न ढेला पत्ते को बचा पाया और न पत्ता ढेले को। ढेला गल गया और पत्ता दह बिला गया।
ऐसी मित्रता न हो वही ठीक। अगर हो जाय तो उससे अधिक आस न रखना।
कथा समाप्त।
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इस कहानी का पोडकास्ट श्री अनुराग शर्मा के स्वर में नीचे दिये लिंक पर उपलब्ध है: हिन्दयुग्म पर 'ढेला पत्ता'
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इस कहानी का पोडकास्ट श्री अनुराग शर्मा के स्वर में नीचे दिये लिंक पर उपलब्ध है: हिन्दयुग्म पर 'ढेला पत्ता'