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रविवार, 15 जून 2014

साक्षी भ्रमण ध्यान - 1

10413419_10204078153622312_9166858868039137010_nकठभठ्ठा नोनछा माटी की लीक। ध्यान सी स्थिति - भ्रमण ध्यान। आरम्भ है किंतु अनुभूति ऐसी जैसे कि ध्यान में थिर हुये चौथाई घड़ी बीत चुकी हो। कानों में धीमी अनवरत सीटी बज रही है, स्वरमय शांति है - टी टी टूँ, टुँइ, टुइँ टिर टिर टिर च्यूँ चू, टिउ टिउ टिउ ट ट ट टी टी टूँ, टी टी टूँ। खगछ्न्द के विन्यास,  सुर ताल मन में निर्वात भरते - कोरा, पुरानी धोती सा मन धुलते धुलते धूसर रंग स्वच्छ, लुप्त श्वेतकांति।

यह लीक कहीं नहीं जाती, पग चलते हैं पगले दंडियों के, पगडंडियाँ बनती हैं! खेतों के किनारे श्रमकण खिचड़ी श्मश्रुओं में उलझते हैं, नमी जड़ों तक पहुँचती है, पत्तियों के तीखे कोर बाहों की मछलियों पर गोदने जड़ते हैं, अन्न उपजता है, क्षुधा शांत होती है, ध्यान पकता है। लीक पौढ़ा होती है।

भाठ तापस गेरुआ नहीं ओढ़ता, उसके मटमैलेIMG_20140608_075801841 यादृच्छ चेकित वस्त्र के कोर से हरियाली फूटती है। मुग्ध धरा का हास उनमें जड़ता है, गुड़हल फूलते हैं। पूजा की थाली में मृत पुहुप नहीं, तोड़े गये बलिपुष्प सजते हैं और अक्षत आराधनाओं के घूँघट धूप धूम चर्चित होते हैं। कपूर प्रतिदिन उड़ते हैं, समिधायें पूछती हैं - धरे! जीवन क्या है? वह अनमना उत्तर देती है - अस्थिर संतुलन - फूलने सा, उड़ने सा, जलने सा, बरसने सा और आँकुर अँखुआने सा। 

IMG_20140608_080308670खिले अर्क ने स्वागत किया है। पत्तियों की हरिताभा में शिराओं की दुग्धधार मचल रही है। अभिषेक को न शिव हैं और न हिरण्यपुरुष। भस्मवसना शिवा ने सैरीय नीललोहित वासंत से रंग चुरा निज क्षार दूध मिला दिया तो तुम उपजे? देवी को तो अरुण अड़हुल अर्पित कर चुका, किस आस तुम खिले हो एकाकी??

खिली तो अनामपुष्पा भी है। लहकती किशोरी समीरा का हल्का सा स्पIMG_20140608_081217436र्श होगा और सृष्टि के नियम आदिबाबा की पोटली से रवरोर करते निकल भागेंगे। उड़ उड़ यहाँ वहाँ भैंस की पीठ, कौवे की पाँख, दादा की काँख, पगड़ी, चोटी, आँचल, बोरा, टट्टर की छाँव – सब पर सब ओर सवार अचीन्हे अनदेखे फैल जायेंगे नरम गदबदे फाहों के बीच सिमटे नान्हें से बीज। एक ओस आँसू भर किसी मेड़ पर गिरेगा और अंकुरित होगी नान्ही सी घास - धरती एक तिरिन और लजा जायेगी।

IMG_20140608_080834815रोग लदी हवा हवा हुई। लुप्तप्राय शिंशपा अब लहराने लगे हैं। इनकी सूखी मृत देह ने मन काठ होने का मुहावरा दिया। अभी तो इन्हें लहराते देख मन बाग बाग हुआ जाता है। नीरवता में, ध्यान में उच्छृंखलता आती है, जाती है। द्र्ष्टा हूँ मैं - कहो कि तुम्हारी छाँव इस गोपन में कितनी अभिसारसन्धियों पर अधराक्षर हुये? स्वीकारते अनजाने कौन सी नई फुनगी मसली गयी और कौन सी डार मरोड़ मुड़ महक उठी?

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मौन प्रश्न - लटजीरे सी लटों में मोती पिरोये अकेली! पी कहाँ? कंटक इक्ष्वाकुओं की नगरी में तुम्हें अकेली छोड़ कहाँ गया??
सर सर उत्तर - मेरा सखा तो नभ में है। जानते हो, रोहिन गई, मृगडाह लगने वाला है। उसके आने में अभी देर है। जब आयेगा तब इक्ष्वाकुओं की कँटीलियाँ रसभरी होने लगेंगी, मदमाती मेरे सारे मोती छीन लेंगी। तुम साखी हो हमारे, बताना कि उसकी प्रतीक्षा में मैं कैसी सजी थी और मेरे साथ इन्हों ने क्या किया। कहीं वह मुझे छोड़ उन पर न लुभ जाय!

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किसे कह रही है वह बैरन कँटीली? वह तो यहाँ है। भोली आशाओं जैसे कंटक लिये, पूरी हों तो चाहतें और चुभती हैं, न पूरी हों तो बेधती हैं। सुन्दरता हो तो ऐसी। समय संग परिवर्तन ओढ़ती, निर्वसन होती, सिमटती और ... लहूलुहान करती। छूना मत!!

(जारी)

रविवार, 27 नवंबर 2011

कास, कुश, खस, दर्भ, दूब, बाँस के फूल और कुछ मनबढ़ई

kaasa
शरद ऋतु में कास, Saccharum spontaneum
कास हर शरद फूलते हैं। प्रकृति मैदानों के उन सरेहों को यह उपहार हर वर्ष देती है जहाँ हिमपात नहीं होते। उन्हें बहलाती है – क्या हुआ जो हिमपात नहीं? इनका सौन्दर्य अलग है। मन्दानिल पर कभी हिम लहरा सकता है क्या? लेकिन इन्हें देखो तो सही! कितना सुन्दर नृत्य है!!
मेरे मन पर नहर किनारे पिताजी के साथ खेतवाही निकलने पर दूर दूर तक पसरे लहराते कास कुंजों की छवि अमिट है। पैसेंजर ट्रेन से गुजरते उन पर अठखेलियाँ करती धूप और लहराती शुभ्र धुपछैंया – खिड़कियों से इससे बढ़ कर प्यार नहीं किया जा सकता। आप भी सोचेंगे आज क्या ले कर मैं बैठ गया?
यदि आप निपट अकेले खेतों के मेड़, बाग, दिन में अँधियारे बगीचों, नहर किनारे नहीं भटके हैं, हर सौ एक पग पर किसी अनजान वनस्पति को देख बच्चे सरीखे कौतुहल के साथ बैठ उसे कुछ क्षण निहारे नहीं हैं और भोले आश्चर्य से ग्रसित नहीं हुये हैं तो आप को मुझे समझने में कठिनाई होगी। बचपन गया, कैशोर्य गया; नून रोटी के चक्कर में अब वैसा नहीं हो पाता लेकिन जब भी अवसर मिलता है, मैं नहीं चूकता। इंटरनेट और ब्लॉग का संसार भी अवसर दे देता है।
इस बार चक्र प्रारम्भ हुआ अवधिया जी की इस पोस्ट से जिसमें कास का उल्लेख था। कास या काँस को देवी दुर्गा का स्वागत पुष्प माना जाता है - शारदीय नवरात्र के आसपास मातृपूजा हेतु प्रकृति का उपहार। अवधिया जी का फैन होने के लिये स्वयं को सराहा और मैं तो मैं! पुराना भ्रम सिर उठा बैठा - कहीं कास मूँज तो नहीं? यह प्रश्न अचानक उठा और पवित्री की स्मृति हो आई। वही पवित्री जो कुश की बनती है और पूजा पाठ के अवसर पर हाथ में अँगूठी की तरह पहनी जाती है। कुश और मूँज में अन्तर को लेकर मैं उलझा करता था। नवरात्र में पूजा करते पुरोहित जी अन्तर समझाने के असफल प्रयत्न करते और बात दर्भ पर आ कर और उलझ जाती। वैदिक युग से ही दूर्बा, कुश और दर्भ (आधुनिक विज्ञान के विश्लेषण से देखें तो सब के सब घास) बहुत पवित्र माने गये हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कुश(र), दर्भ, सैर्या और मूँज का वर्णन मिलता है जहाँ साँप(?) और उस जैसे अन्य जीव अदृश्य विचरण करते हैं: 
शरास: कुशरासो दर्भास: सैर्या उत।
मौञ्जा अदृष्टा बैरिणा: सर्वे साकं न्यलिप्सत॥191.3॥ 
doob
'दूर्बा' या 'दूब'
Cynodon dactylon 
(syn. Panicum dactylon, Capriola dactylon) 
कुश , Desmostachya bipinnata  
दूर्बा या दूब को तो आप सब पहचान सकते हैं लेकिन कुश और दर्भ? हमारे बच्चे तो सम्भवत: दूब भी न पहचान पायें! ऋग्वेद के भाष्यकार सायण के समय से ही कुश और दर्भ को लेकर भ्रांति व्याप्त रही है। लोक में और सामान्य व्यवहार में कुश या कुस या कुसा और दर्भ या दाभ या डाभ या डाभी प्राय: समानार्थी रूप में आज भी प्रयुक्त हो रहे हैं लेकिन वास्तव में ये भिन्न हैं। कुश का वैज्ञानिक नाम Desmostachya bipinnata है। पुराने समय में कुश को 'खर दर्भ' कहा जाता था जब कि दर्भ को 'मृदु दर्भ'। दोनों नामों में दर्भ प्रयुक्त होने से भ्रम हुआ और लोक ने सरलीकरण कर दोनों को एक कर दिया।


दर्भ का वैज्ञानिक नाम Imperata cylindrica  है। इसे लोक में डाभ या डाभी नाम से भी जाना जाता है लेकिन जैसा कि पहले बताया, कई बार लोग कुश को भी डाभ या डाभी बोलते हैं। अन्य देशों में इसे जापानी घास और Red Baron नामों से भी जाना जाता है। इसकी पत्तियाँ ऋतुचक्र और अवस्था अनुसार लाल या बैंगनी सदृश भी हो जाती हैं। अथर्ववेद में दर्भ की प्रशंसा में कई मंत्र हैं। 
दर्भ या डाभ, Imperata cylindrica

mooj
मूँज, Saccharum munja 
... इन वनस्पतियों को लेकर मन में घूमता चक्र कुछ धीमा पड़ा था कि आज अपने प्रिय कवि अविनाश चन्द्र की इस कविता पर दृष्टि पड़ी। हिमांशु, देवेन्द्र पांडेय, रजनीकांत, किशोर चौधरी, संजय व्यास और अविनाश ऐसे कविजन हैं जिनकी हर कविता से कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है। अविनाश ने ‘वानीर’ शब्द का प्रयोग किया जिसका अर्थ होता है – मूँज। अद्भुत बिम्बों के लिये बधाई देने के पश्चात अचानक यह पंक्तियाँ मन मथने लगीं (मन्मथ से अर्थ न जोड़ें Smile )
कौन खींचता है नियम से,
मारूति के नव परिपथ?
वानीर झुरमुटों के बीचोंबीच,
यत्र-तत्र काटते पगडंडियों को।
मैं सोचने लगा यहाँ वानीर के स्थान पर कास का प्रयोग किया जाय तो कैसा बिम्ब हो?
कौन नियम नित्य का यह?
नाचते हैं कास झुरमुट
मन्दानिल के मद्धम ताल

भूलती पगडंडियाँ मार्ग।
अविनाश के यहाँ मारुति के परिपथ को खींचने वाला प्रधान है – कदाचित उद्योगप्रधान बिम्ब और मेरी मनबढ़ई में नियम लेकिन कास झुरमुट के नृत्य पर पगडंडियों का मार्ग भूलना भारी पड़ जाता है – कदाचित अलसाता सा बिम्ब। ‘जाने दूर नक्षत्रों से कौन?’ और ‘कौन तुम संसृति जलनिधि तीर’ वाली उत्सुकता दोनों में है। खैर! यह मेरी मनबढ़ई ही है, उनके जैसा अर्थगहन बिम्ब गढ़ना अपने वश का नहीं है...मूँज और कास एक ही हैं क्या?
वामन शिवराम आप्टे के शब्दकोष में मूँज के लिये ‘दर्भाह्वय:’ शब्द बताया गया है। अब ‘आह्वय:’ का अर्थ कोई संस्कृत विदुषी/विद्वान बतायें तो पता चले। आप्टे शब्दकोष तो उसका अर्थ A name, appellation बताता है। तो क्या मूँज भी पवित्र दर्भ से सम्बन्धित है? उपनयन संस्कार के समय मूँज की मेखला पहनाई जाती है। सामान्य अवधारणा के विपरीत मूँज और कास अलग वनस्पतियाँ हैं। मूँज का वैज्ञानिक नाम Saccharum munja है। डा. पंकज अवधिया ने कास (Saccharum spontaneum) से इसकी भिन्नता को http://botanical.com पर अपने आलेख में स्पष्ट किया है। तय है कि प्राचीन काल से ही मूँज, कुश और दर्भ वनस्पतियाँ आनुष्ठानिक और औषधीय कार्यों में प्रयुक्त होती रही हैं लेकिन कास नहीं। 
kush
खस या खसखस या उशीर या वीरण या काळावाळा
Vetiveria zizanioides  
खस या खुश (Vetiveria zizanioides) की भीगी चट्टी गर्मियों में शीतल बयार के लिये जानी जाती रही है। वही जिसकी जड़ के अर्क से मीठा खस का शर्बत बनता है और जिसे परम्परा से उशीर, हरिप्रिय और सुगन्धिमूल के नाम से भी जाना जाता रहा है। बिहार में इसकी कृषि की जाती है। 
बिहार सिद्धार्थ गौतम के ज्ञानप्राप्ति की भूमि है और कहते हैं कि उन्हें कुश की चटाई पर बैठ कर ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसलिये सनातन के साथ साथ बौद्ध परम्परा भी कुश को पवित्र मानती है लेकिन जिन्हें कुश की चटाई कह कर बौद्ध और अन्य देशों को निर्यात किया जाता है, वह वास्तव में खस या खुश की बनी होती हैं। बिहार में यह प्रचुरता से मिलता है। अब यह शोध का विषय है कि गौतम की चटाई कुश की बनी थी या खस खुश की? 
लोक में जिस तरह से दर्भ और कुश को लेकर भ्रांति व्याप्त है, कहीं बौद्ध परम्परा में कुश या खस को लेकर तो नहीं है? हो सकता है कि गौतम खश यानि उशीर की चटाई पर ही बैठे हों, वैदिक कुश की चटाई पर नहीं। मुझे संहिताओं में उशीर नहीं मिला। क्या वैदिक युग में यह वनस्पति ज्ञात नहीं थी? 


...शांत सन्ध्या में फोन आया तो गरिमा बिटिया लाइन पर थी – बड़े पापा! आप जानते हैं बाँस फूलते हैं तो बहुत बुरा होता है? मेरी टीचर ने बताया है और घर पर पूछने को भी कहा है। अब टीचर के मन में जो था, वही जानें लेकिन मैं एक और चक्कर खा गया। बाँस भी कथित घास जाति का ही है। अपने जीवनकाल में एक ही बार फूलता है और फिर मर जाता है। बाँस में ‘सामूहिक पुष्पन’ होता है – भूगोल-ऋतु-निरपेक्ष, जिसकी आवृत्ति दशकों से सदियों तक में होती है। जापान और संसार के कुछ भागों में 130 साल बाद बाँस फूलते पाये गये हैं तो मिजोरम और उत्तरपूर्व के अन्य राज्यों में लगभग 48 वर्षों की आवृत्ति देखी गई है। 1862, 1911, 1959 और 2008 में बाँस फूले और हर बार विनाश या उपद्रव घटित हुये। होता यह है कि बाँस फूलने के बाद उनमें बीज पड़ते हैं जिसके पश्चात बाँस मर जाते हैं। उनकी सामूहिक मृत्यु के कारण जिन क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था बाँस पर आधारित है, वहाँ नई बाढ़ तैयार होने तक इस संसाधन का अभाव हो जाता है। बीजों की अधिकता से खाने की उपलब्धता कई गुना बढ़ जाने के कारण चूहे बहुत बढ़ जाते हैं। चूहे बाकी फसलों को चौपट कर देते हैं और दुर्भिक्ष की स्थिति आ जाती है।
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(1)

(2)
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(3)

(1) बाँस के फूल, चित्र : Mogens Engelund
 
(2) बाँस के फूल, चित्र : Joi Ito

(3) बाँस के फूल, मिज़ोरम, चित्र : Shahanaz Kimi
1959 में मिजोरम में यही हुआ। धीरे धीरे अकाल सी स्थिति हो गई और केन्द्र सरकार की बेरुखी ने पहले से जारी अलगाववादी आन्दोलन को बहुत शक्तिशाली और जनप्रिय बना दिया। परिणाम हुआ – लगभग 20 वर्षों तक जारी संघर्ष जिसका समापन राजीव गान्धी लालडेंगा समझौते के साथ हुआ। मिजोरम में विद्रोहियों की सरकार बनी और वे मुख्य धारा में आये...
...अब समाप्त करता हूँ, बात बाँस के फूलने तक जो आ गई! अविनाश के रहते विनाश की बात कौन करे लेकिन विराम होना ही चाहिये Smile बहुत हो गई घास खोदाई! 
आप यह समझ लें कि मिलते जुलते नामों से बहुत भ्रम हो सकता है। उनके गुण एकदम अलग हो सकते हैं। 'कास, कुश और खस' या 'दूब, दर्भ(डाभ)' नामों के मामले में साम्यता रखते हैं लेकिन हैं एक दूसरे से एकदम अलग -  पृथक, स्वतंत्र अस्तित्त्वधारी।  
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आभार: 
विकिपीडिया, डा. पंकज अवधिया, एस. मेहदीहसन, एस. जयलक्ष्मी, अर्जुन पात्रा, वी. के. लाल, ए. के. घोष, तमाम अन्य वेबसाइट और अपने अभिषेक ओझा जिनकी टिप्पणी ने लोक प्रेक्षण से उद्भूत कुश और खस के एक ही होने की अपनी धारणा पर मुझे पुनर्विचार और शोध को प्रेरित किया। 
अभिषेक जी से अनुरोध है कि वह भी अपनी इस धारणा कि मूँज और कास एक ही है, में सुधार कर लें। :) 
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यह आलेख अपने प्रकाशन के पश्चात 01/12/2011 को प्रात: 9 बजे तक संशोधित, परिवर्द्धित और पुनर्प्रकाशित किया गया।

शनिवार, 5 जून 2010

वह वनस्पति ढूँढ़ कर लाओ वत्स ...

"... मुझे गुरुदक्षिणा का आदेश दें। करबद्ध प्रार्थना है कि दीक्षांत समारोह में स्नातक दीक्षा के लिए मेरा नाम प्रस्तावित करें।"
नालन्दा विश्वविद्यालय की एक कोठरी में गुरु के चरणों में झुका शिष्य निवेदन कर रहा था। गुरु के प्रशांत मुखमंडल पर स्मित आभा पसर गई। कृपापूर्ण स्वर में उन्हों ने आदेश  दिया,  
" नालन्दा के वन प्रांतर से वह वनस्पति ढूँढ़ कर लाओ वत्स, जिसमें औषधीय गुण न हों।"
शिष्य को आश्चर्य हुआ - यह कैसी दक्षिणा !
"जाओ वत्स। प्रात:बेला शुभ है। कार्यारम्भ में शीघ्रता करो।"
"जो आज्ञा गुरुदेव !"
...
शिष्य ढूँढ़ता रहा। ऋतुएँ बीतती गईं। सूर्यदेव जाने कितनी बार नभ के चक्कर लगा गए। वह वनस्पति नहीं मिली ।  अश्रु भरे नेत्र लिए थका हारा वापस गुरु के चरणों पर आ गिरा।
"मैं असफल हुआ देव ! क्षमा करें । मुझे ऐसी कोई वनस्पति नहीं मिली जिसमें औषधीय गुण न हों। कोई और  गुरुदक्षिणा बताइए।"
आचार्य ने शिष्य को उठा कर गले लगा लिया।
"नालन्दा के वन प्रांतर ही नहीं, पूरे ज्ञात संसार में कोई ऐसी वनस्पति नहीं है जिसमें औषधीय गुण न हों। तुम कसौटी पर खरे उतरे हो। तुम्हारी स्नातक दीक्षा के लिए मैं कुलपति से विशेष सत्र आयोजन का अनुरोध करूँगा। "
...
आज पर्यावरण दिवस  पर  इस कथा का स्मरण हो आया। हममें से जाने कितने वनस्पति जगत के विविध रूपों को देखने के लिए पर्यटन करते हैं या डिस्कवरी चैनल पर अमेज़न के जंगलों पर प्रोग्राम देखते हैं। क्या आप ने अपने आस पास के वनस्पति संसार पर कभी परखन दृष्टि दौड़ाई है ? आप सोचते होंगे ऐसा क्या विशेष है ?
विशेष है। अपने घर के सामने के पार्क से कुछ अज्ञात पौधों के चित्र पोस्ट कर रहा हूँ। विविधता को सराहिए।
ये बस 'घास पात' नहीं हैं। इनके नाम बताइए। गुण बताइए। मुझे मालूम नही हैं।
मेरा मानना है कि रत्नगर्भा धरती अपने भीतर बहुत कुछ छिपाए रखती है। उचित अवसर और पर्यावरण मिलते ही रत्नप्रसूता बन जाती है। ये वनस्पतियाँ प्रमाण हैं। 
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ये वनस्पतियाँ यूँ ही उग आई हैं। सारे फोटो मैंने मोबाइल से लिए हैं।
 

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

मदार :वनस्पति,पौधा,लता,वृक्ष -3


पौधा है : मदार , वैज्ञानिक (Botanical) नाम: Calotropis gigantea,
अन्य नाम - अर्क(संस्कृत), आक, अकौआ
मदार आदमी की ऊँचाई से भी अधिक बढ़ने वाला झाड़ी प्रकार का पौधा है। इसकी पत्तियाँ स्निग्ध, मांसल सी और कोमल होती हैं। तोड़ने पर दूध सा स्राव निकलता है जिसे लोग विषैला बताते हैं।

मुख्यत: यह दो प्रकार का होता है। एक प्रकार में पुष्प एकदम श्वेत होते हैं। पत्तियाँ कुछ छोटी तो पौधा बृक्ष सा आकार लेता हुआ। दूसरे प्रकार में पत्तियाँ अपेक्षाकृत बड़ी, पौधा छोटा और पुष्प बैगनी रंगत लिए होते हैं।

इसके संस्कृत नाम 'अर्क' का एक अर्थ सूर्य भी होता है। प्रात: बेला में सूर्य की किरणों से नहाए इसके श्वेत पुष्पों को देखने से इस संज्ञा की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। अद्भुत कांति !

यह पौधा तमाम औषधीय गुण रखता है और नानियों, दादियों का प्रिय रहा है। इसके फल जब पक कर बीज प्रसारण के लिए चिटकते हैं तो उनसे रूई निकलती है। इस रूई से बने तकिये को लगा कर सोने से 'अधकपारी' शिरोपीड़ा में लाभ होता है। इस प्रयोग को सफल होते मैंने स्वयं देखा है।

बचपन में हम लोग इसके दूध को प्रतिदिन्द्वी की आँखों मे डाल उन्हें फोड़ देने की धमकियाँ दिया करते थे। नाना नानी ने हमेशा इस पौधे के निकट जाने से मना किया - सम्भवत: इसके दूध से आतंकित रहने के कारण। वाकई इतना त्वरित प्रभाव होता है, इसकी परीक्षा नहीं कर सके। आँखों से चांस कौन ले?

महादेव की पूजा में इसके पुष्पों का प्रयोग होता है। किसी और देवी देवता की पूजा में इसे प्रयुक्त होता मैंने नहीं देखा। भाँग और धतूरा की तरह ही औघड़दानी शिव ने इस सर्वहारा पौधे पर भी अपनी कृपा रखी है। शिव से सम्बद्ध और पौधों की तरह ही टोटका वग़ैरह में भी इसका प्रयोग होता है।

सम्भवत: आप ने ध्यान न दिया हो - गाँवों में कोला कोलवाई, बँसवारी और सरेह में पाया जाने वाला यह पौधा अब कम दिखने लगा है। यहाँ गोमती नगर में एल डी ए इस पर कुछ अधिक ही मेहरबान है जिसके कारण इसके पौधे बाकायदे रोपित किए गए हैं। मैंने बड़े अनूठे चित्र मोबाइल से खींचे थे लेकिन दुर्भाग्य से कुछ चित्र गायब हो गए। इसी कारण उपर के दो चित्रों के लिए वीकीपीडिया की शरण लेनी पड़ी। वीकीपीडिया को आभार।

नए घर में आया तो आसपास इसके दूसरे प्रकार की बहुतायत दिखी। अपनी पूरी देहाती गरिमा के साथ यह पौधा यहाँ बहुतायत में उपलब्ध है। यहाँ पादप और जंतु जगत की अन्योन्याश्रयिता का एक उदाहरण मैंने पाया है। एक बहुत ही रंग बिरंगी टिड्डे की जाति आहार के लिए पूरी तरह से इसकी कोमल पत्तियों पर निर्भर है। ये टिड्डे इन पत्तियों पर ही रहते हैं, उन्हें खाते हैं, वहीं सम्भोग करते हैं . .। किसी और पौधे पर मैंने उन्हें नहीं पाया। नीचे कुछ चित्र दे रहा हूँ।
क्या आप इस टिड्डे की जाति बता सकते हैं?

मंगलवार, 23 जून 2009

कनैल: वनस्पति, पौधा, लता, वृक्ष - 2

पौधा है : कनैल , वैज्ञानिक (Botanical) नाम: Thevetia neriifolia, अन्य नाम - अश्वमारक, कर्वीर (संस्कृत), करबी (बंगला)

कनैल एक बहुत ही सुन्दर और 'देसी प्रकार' का 'सर्वहारा' पौधा है। पत्तियाँ, फूल और बीज - सबकी छटा निराली है। इसके फूलों का रंग प्रमुखत: पीला होता है किन्तु इसके ललछौहें, श्वेत, रंगहीन फूल भी देखे गए हैं। पौधा बढ़ कर वृक्षाकार भी हो जाता है, वैसे हमारे विद्वान इसे झाड़ी श्रेणी में रखते हैं।
जन जन उपयोगी यह 'थेथर' श्रेणी का पौधा कहीं भी उग आता है। घूरा, कोला, बाँस के झुरमुट, काली माई वाले बरगद के नीचे, घर के आँगन, बाग बगइचा, गँवारू मन्दिर, नागर रोड डिवाइडर, अगाड़, पिछवाड़ कहीं भी लगा दो, बपुरा टनाटन्न हरा भरा रहता फूलों की वर्षा करता रहता है। निस्पृह इतना कि जोगी भी प्रेरणा लें!
हम अधम मानवों ने अपनी जाति या वर्ग व्यवस्था चारो तरफ थोप रखी है। पौधा जगत भी अपवाद नहीं है। सर्वसुलभ और सर्व-उपयोगी होने से इसे सर्वहारा की भाँति ही उपेक्षित रखा गया है। मेरी बात पर आपत्ति करने के पहले थोड़ा बताइए कि आप ने अपने प्रेमी या प्रेमिका को कभी कनैल का फूल भेंट किया है? नहीं। क्यों? क्या यह सुन्दर नहीं होता कि इसमें सुगन्धि नहीं होती?
उपेक्षा की स्थिति यह है कि :
- कभी इसे 'बुके' में स्थान नहीं मिलता।
- किसी लेखक ने इसके बारे में नहीं लिखा।
- दुष्ट कवियों ने जूही, मोगरा, गुलाब, कमल, चम्पा, चमेली, रजनीगन्धा आदि को लेकर तो बहुत उपमाएँ गढ़ीं परन्तु कनैल की कहीं चर्चा तक नहीं हुई।
- एक और सर्वहारा गेंदा फूल पर भी फिल्मी गाना रच दिया गया, पर बेचारा कनैल, आह!
- पौधारोपण करने जब महाजन आते हैं तो अशोक, अमलतास, गुलमोहर आदि ही लाए जाते हैं, कनैल नहीं।
- नारियों की वैयक्तिक प्रकार के पूजा पाठ में एकमात्र उपयोगी फूल होने पर भी वे इसे कभी जूड़े में स्थान नहीं देतीं।
बच्चे इसके सूखे बीजों से गोट्टी खेलते लक्ष्य साधने का अभ्यास करते हैं। है कोई माई का लाल पौधा जिसके बीजों में इतना बल हो? आखिर यह क्यों उपेक्षित है? गँवई होने के कारण न?
गाँवों में अभी एक पीढ़ी पहले तक इसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। पीले फूल किसी भी सात्त्विक प्रकार की पूजा के लिए सर्वोत्तम माने जाते थे। गुरुवार व्रत में तो इसके फूलों का आदर देखने योग्य होता था।
नई नवेली दुल्हनें नैहर सन्देशा देते समय बटोही को बाबा के घर की पहचान बताती थीं,"कुववाँ जगतिया कनइल बन फूले, दुवरे निबिया के गाछ हो.” ( मेरे पिता के घर के आगे कुआँ है, उससे लग कर कनैल का झुरमुट फूलता है और द्वार पर नीम का पेंड़ है)। इतना आदर कि कुएँ जैसे सार्वजनिक स्थान पर एक दो नहीं, कनैल के पूरे झुरमुट को स्थान दिया जाता था और इतना स्नेह कि बेटी को बाबा के घर का अभिज्ञान देते समय यह थेथर पौधा ही स्मृति में आता था, नीम से भी पहले!
परन्तु जिस प्रकार से मुए खम्भे अशोक ने आकर नीम के सम्मान का सत्तानाश कर दिया, वैसे ही दुष्ट पूँजीवादी समाज प्रिय गुलाब ने गाँवों में पदार्पण कर कनैल को उसके आसन से नीचे कर दिया।
कनैल इतना अत्याचार होते हुए भी फूल, पत्ती या डाल तोड़ने पर निस्पृह भाव से दूध स्रवित करता है मानो आशीर्वाद दे रहा हो फलो फूलो, हम तो ऐसे ही हैं। मुझे बड़ी करुणा होती है किन्तु कर भी क्या सकता हूँ, सिवाय इस एक लेख के?

मंगलवार, 9 जून 2009

बरियार : वनस्पति, पौधा, लता, वृक्ष - 1

आप लोगों ने सम्भवत: देखा होगा, मेरा परिचय चित्र परिवर्तित होता रहता है। आज एक वनस्पति तो कल दूसरा पौधा। वास्तव में एक पुराने वचन  को निभाने का प्रयास करता हूँ। प्रतिदिन तो नहीं हो पाता किन्‍तु आवृत्ति अधिक ही है। सदा की तरह इस बार भी मुझे कुछ नया करने के लिए सिद्धार्थ जी और बालसुब्रमण्यम जी ने प्रेरित किया है। 

सिद्धार्थ जी जब लखनऊ आए थे तो उन्हों ने मुझे वचन के विपरीत अनियमित होने के लिए टोका था। मैं कई दिनों तक चित्र जो नहीं परिवर्तित करता। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी सूक्ष्म जाँच पड़ताल चल रही है! कल क्या हुआ कि ऐसे ही चैटिंग करते हुए बालसुब्रमण्यम जी ने टोका आप चित्र तो परिवर्तित करते हैं किन्‍तु इतने छोटे चित्र को देख कर देसी/वैज्ञानिक नाम आदि नाम कौन जानेगा? एक बार पुन: मैं सूक्ष्म दृष्टि द्वारा चेताया गया। उनका मंत्र मान मैं यह शृंखला प्रारम्भ कर रहा हूँ - अपने दिवंगत नाना की स्मृति में जिन्हें लोग उनके जीवन काल में ही देवता कहते थे और जो वनस्पतियों के गतिशील शब्दकोश थे। 

मुझे कुछ नहीं आता जाता । बस एक भावुक प्रयास है। आप लोगों को प्रस्तुत वनस्पतियों के बारे में कुछ अधिक पता हो तो कृपया बतायें तथा मेरी त्रुटियों को सुधारने में किञ्चित भी संकोच न करें। हाँ, आलसी स्वभाव के कारण प्रतिदिन नया नहीं प्रस्तुत कर पाऊँगा। इस बार का कुछ भाग आप को टूटी फूटी पर मेरी टिप्पणी के रूप में भी मिल जाएगा।
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पौधा है : बरियार, अधिक सूचना हेतु :http://ayurvedicmedicinalplants.com/plants/1176.html 
वैज्ञानिक  (Botanical) नाम: Sida retusa (Linn.) Borssum, सामान्य नाम - जंगली मेंहदी
हम पूरबियों का एक त्योहार है - जिउतिया । शुद्ध नाम है जीवित्पुत्रिका  (जो जीवित पुत्रों की माँ हो ?)। आश्विन (क्वार माह)  कृष्ण पक्ष अष्टमी को यह तप-पर्व पड़ता है। वे सारी नारियाँ जिनके पुत्र जीवित होते हैं, वे उनके दीर्घायु और कल्याण हेतु निर्जला व्रत रखती हैं। विद्रोही स्वभाव की माताएँ, जिनकी केवल लड़कियाँ ही होती हैं, भी अपनी दुलारियों के लिए यह व्रत रखती हैं। पूरे 24 घण्टों तक निर्जल निराहार व्रत, उमस ताप में !  

इस तप-पर्व के दिन बरियार लाखों माताओं का सन्देशवाहक बनता है। पौधा ढूँढ़ कर उसके चहुँओर सफाई कर उसे विशिष्ट दूत की तरह सजा दिया जाता है। माताएँ अक्षत रोली से 'अँकवार' देती हैं (भेंटती हैं) । बरियार का अर्थ होता है - बलवान। राम के पास जाता दूत बलवान तो होना ही चाहिए। बजरंग बली जो वहाँ हैं !

सीधे प्रभु राम को सन्देश जाते हैं , "ए अरियार ए बरियार जा के राजा रामचन्द्र से कहि दीह (बेटा, बेटी का नाम) के माई जिउतिया भूखल बाली"। कितनी ममताओं का आश्रय बनता है एक झँखेड़ा पौधा - भले साल में एक ही दिन ! मुझे इसे जंगली कहते लज्जा आती है। नागर न सही ग्रामीण तो है ही। 

मुझे इतना ही पता है। माताओं, बरियार दूत और राम के बीच कुछ और गोपन होता हो तो नहीं मालूम ।  आप को पता हो तो बताइए। 

गुरुवार, 13 नवंबर 2008

अनाम वनस्पति के नाम . . नाना


काम करतॆ करते अचानक समय में भटक सा जाता हूं। कई साल दूर . . . .
शमी के फ़ूलों पर अटकी ओस की बूंदें . इल्लियां सरकती हैं पत्तियों पर और पगडंडी के चारो तरफ फैले जंगली फूलों के गंध से बौराया मैं पूछ बैठता हूं. . पिताजी इसका नाम क्या है? (आप पूछेंगे कि पगडंडी के दो ही किनारे हुए चार कहां से आए? संभवत: आप ने भाठ के खेतों में खेतवाही नहीं की है!)

पता नहीं बेटा ऐसे ही कोई पौधा है. भला इनके भी कोई नाम होते हैं. नहीं पिताजी नाम तो होगा आप को नहीं पता. नाना होते तो बताते . . . .

ये फूल आज भी होते हैं और अपनी कार से उन रास्तॊं से गुज़रते हुए आज आंखें नम हो जाती हैं . . . कितना कुछ खो दिया हमने . . . ये पौधे हम देहातियों के मित्र हुआ करते थे . . आज इतने अज़नबी हो गये हैं कि हम इऩ्हें बस घास कहते हैं। वनस्पति विज्ञानी कोई नाम तो ग्रीक/लैटिन/रोमन में बता ही देगा लेकिन वह लगाव कहां से लाएगा? . . . नाना!

जब भी खेतवाही करने निकलता हूं . . . इन फूलों की सरसराहट लगता है कि भरी दुपहरी में नाना किस्से सुना रहे हैं . . . सारंगा सदाब्रिज, लोरिक ,शीत बसंत . . . सब मुझे आगोश में ले लेते हैं . . . दिवंगत नाना कितने उपेक्षित हैं. . उनके कोई पुत्र नहीं हुए . हम असली मामाओं से वंचित उऩ्हें याद तक नहीं करते . .
मेरे बच्चों को कौन सुनाए? . . उऩ्हें समझ भी आएंगी वो सीधी साधी बातॆं ? हैरी पोटर तुमने बहुत नुकसान किया हमारा . . . बौराये फूलों की गंध अभी भी मेरे नथुनॊं को पसन्द आती है. . नाना और उनके किस्से याद आने पर अभी भी कानों को सिहरा जाते हैं. .

मां से कह कर दुआरे एक शमी का पौधा लगवा दिया है. . मां रोज उसके नीचे दिया बाती करती है. . . नाना का घर खंड्हर हो रहा है तो क्या हुआ . . .दुआरे वह फूल रहा है . . .
बौराये फूलों की गंध नथुनों में भर रही है . . एसी कमरे में बैठा छलछलाए मन से सोचता हूं रिटायर होने तक शमी कुर्सी लगा कर छांव में बैठने लायक हो जाएगा. . .