अभी अभी दो गिलास बेल का रस गटके हैं।
चम्मच से ककोर ककोर गूदा खाये हैं (देखिये कितना साफ कर दिये हैं खपड़ोई को!)।
बहुत दिनों बाद आज श्रीमती जी को हृदय से धन्यवाद दिये हैं(संडे को पार्टी पक्की - बेल के नाम!)...
बहुत दिनों बाद ईश्वर को याद कर धन्यवाद दिये हैं कि यूरोप जा बसने का प्लान ठंड से डरा कर कैंसिल करा दिया ... वहाँ बेल कहाँ मिलते? गर्मी में भारत कहाँ आ पाते? ;) ...
तृप्त हो गया आज तो!
तृप्त होकर आदमी आँय बाँय भी बकता है। NRI साथी बुरा न मानें प्लीज!
