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| सरदार का जैकेट/कोट। पहन कर देखिए! |
स्वतंत्रता उपरांत खंड खंड राज्यों को एक कर 'भारत' संघ की स्थापना में इस महामानव का योगदान प्रणम्य है। अरुन्धतियों और गिलानियों के पाखंडी शृगाल प्रलापों के बीच सरदार की स्मृति मुझे सम्बल देती है कि इस आत्मघाती प्रवृत्ति के विरुद्ध स्वर गूँजते रहने चाहिए।
खेलों और कथित राष्ट्रीय सम्मान की आड़ में 70000 करोड़ रुपयों के भारत के अब तक के सबसे बड़े घोटाले और उसे पचा कर डकारती व्यवस्था को देख जो घृणा उपजती है, उसकी आँच में 'सतर्कता अवधि' को 'मनाना' महज एक आयोजन या वार्षिक कर्मकाण्ड नहीं होकर रह जाना चाहिए। अपने भीतर कुछ ठोस परिवर्तन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध छोटे छोटे ही सही, कुछ पग चलने की शपथ हम सब को लेनी चाहिए, केवल 'सरकारी जन' को नहीं। हमारा जनतंत्र तभी और असरकारी होने की दिशा में अग्रसर होगा। प्रारम्भ आज से ही ...यह लौह दिवस हमारे भीतर लौहसंकल्प का जनक हो!
