[अपनी बात: पिछली कड़ी में अमरेन्द्र जी ने अपनी टिप्पणी और बाद के व्यक्तिगत संवाद के दौरान अनुवाद में सरलता की आवश्यकता बताई। अंग्रेजी और हिन्दी के व्याकरण और अभिव्यक्ति विधि परम्पराओं में बहुत असमानताएँ हैं जिनके कारण सरलता का निर्वाह मुझे बहुत कठिन लगता है ।प्रशिक्षित अनुवादकों के लिए सम्भवत: यह कठिन न होता हो।
एक ओर तो भाषिक सम्प्रेषणीयता की बात है तो दूसरी ओर यह डर कि जाने कौन सा तकनीकी शब्द आनुवादिक सरलीकरण की प्रक्रिया में वधित हो जाए ! ... इतने वर्षों के बाद मार्क्सवादी धार पर पुन: चलते हुए लुहलुहान हो रहा हूँ जिसके बारे में फिर कभी बात करूँगा। सम्प्रति यही निवेदन है कि यत्र तत्र मैंने अपनी समझ के अनुसार भावानुवाद का प्रयास किया है। कहीं कहीं अपनी ओर से स्पष्टीकरण भी जोड़े हैं जो चिह्नित है। शुद्धता के आग्रही जन डा. केली रॉस के मूल अंग्रेजी लेख को देख सकते हैं। अनुवाद के छोटे छोटे अंश ही दूँगा ताकि ब्लॉग प्लेटफॉर्म की सीमा में भी पाठकों को पढ़ने, गुनने और समझने में आसानी हो।]
मार्क्स के सिद्धांत के अनुसार हमारे कुछ निर्णयों के कारण नहीं बल्कि आर्थिक परिस्थितियों में अंतर्निहित कारकों के कारण संसार बदलेगा। उनका सिद्धांत मानव स्वभाव (1) या मानव मनोविज्ञान (1) का सिद्धांत न होकर यह बताता था कि माल और सेवा उत्पादन की आर्थिक विधियाँ एक समाज की अन्य सभी राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक संरचनाओं को तय करती हैं ( हालाँकि कुछ मार्क्सवादी इसे पूर्ण रूप से सही मानने में संकोच करते हैं)। इस प्रकार मार्क्स के नकार के बावजूद ‘क्षुद्र अंग्रेजी बुर्जुआ’ की आवश्यकताएँ ‘अवास्तविक (false) आवश्यकताएँ (1)’ न होकर उत्पादन के पूँजीवादी विधि से सम्बन्धित ‘वास्तविक आवश्यकताएँ’ हैं – वे आवश्यकताएँ जो ऐतिहासिक सूझ के अनुसार समय के साथ साथ उत्पादन विधियों के बदलने पर ही बदलेंगी। इतिहास के ‘विज्ञान’ के रूप में मार्क्सवाद की सफलता या असफलता इस बात से तय होती है कि यह उत्पादन के विकास और उसके विभिन्न प्रभावों की भविष्यवाणी किस सीमा तक कर सकता है।
मार्क्स के अनुसार जिस तरह से सामंतवाद को पूँजीवाद ने एक नई, बेहतर और दक्ष उत्पादन विधि के रूप में प्रतिस्थापित किया, उसी तरह से पूँजीवाद को विस्थापित करती एक दूसरी व्यवस्था भी जन्म लेगी। अंतत: मजदूरी के निरंतर कम होते जाने से निर्धन होते जाते मज़दूर और प्रतिस्पर्धा की जगह वृहद एकाधिकारी प्रवृत्तियों के आने से पूँजीपतियों की घटती संख्या के कारण पूँजीपतियों को सामान बेचने के लिए कोई नहीं बचेगा और उनके पास लाभांश द्वारा जमा की गई पूँजी निरर्थक हो जाएगी। यह स्थिति क्रेडिट और बैंकिंग की उत्तरोत्तर कठिन परिस्थितियाँ तब तक उत्पन्न करती जाएगी जब तक कि सर्वहारा सड़ चुके पूरे तंत्र को आसानी से ध्वस्त कर एक वर्गविहीन समाज की स्थापना नहीं कर लेंगे।
"उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण और श्रमिकों का सामाजीकरण अंतत: उस बिन्दु तक पहुँचेगा जहाँ वे अपने पूँजीवादी खोल को बर्दाश्त नहीं कर पाएँगे। तब यह खोल खण्ड खण्ड हो बिखर जाएगा।"
[द कैपिटल, भाग एक, पृ.837, चार्ल्स एच. केर एण्ड कं., शिकागो, 1906, एडवर्ड अवेलिंग द्वारा अनुवादित और थॉमस सोवेल द्वारा ऑन क्लासिकल इकोनॉमिक्स , येल,2006, पृ.170 पर उद्धृत]
मार्क्सवादी अर्थशास्त्र की भ्रांति का सार हमें इसमें मिल जाता है। मार्क्स का यह विश्वास है कि इतिहास की द्वन्द्वात्मकता के विकास के साथ साथ उत्पादन की नई विधियों का विकास होगा। इससे उत्पादकता बढ़ेगी और अधिक पूँजी का सृजन होगा जिससे अंतत: मज़दूर को अलगाव और शोषण से मुक्ति मिलेगी। लेकिन, मार्क्सवादी मूल्य सिद्धांत में इस बढ़ी हुई उत्पादकता को सुनिश्चित करने वाला कोई कारक (variable) नहीं है। यदि श्रमिक ( या ‘सामाजिक रूप से आवश्यक’ श्रम) मूल्य का सृजन करता है तो अधिक श्रम अधिक मूल्य सृजित करेगा लेकिन यह वैविध्य लिए हुए न होकर केवल मात्रात्मक होगा। पिरामिड बनाने के लिए किया जाने वाला अधिक श्रम केवल अधिक पिरामिडों की ही रचना करेगा (कुछ और नहीं**)। अत: यह सिद्ध हो जाता है कि (गुणात्मक मूल्य संवर्धन के लिए**) श्रम के अलावा कोई और कारक भी है। यह कारक ‘पूँजी’ है। श्रमाधिक्य वाला उत्पादन तंत्र पूँजी आधिक्य वाले तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। पूँजी के आधिक्य से केवल मात्रात्मक ही नहीं बल्कि गुणात्मक उत्पादन की अधिकता भी सुनिश्चित होती है। लेकिन मार्क्स पूँजी के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं रखते इसीलिए (अपने वाद से अलगाव जताने के लिए**) ‘पूँजीवाद’ नाम का प्रयोग करते हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि मार्क्सवाद उत्पादन में बढ़ोत्तरी को व्याख्यायित नहीं कर सकता (क्यों कि इसमें उसके लिए किसी अतिरिक्त कारक की व्यवस्था ही नहीं है**)। (जारी)
..............................................................................................................

** अनुवादक द्वारा जोड़े गए अंश इस रंग के फॉण्ट में हैं और दो ताराओं द्वारा चिह्नित हैं।
(1) ये पद आचारनीति ( Ethics) की पुस्तक मॉरल रिजनिंग, विक्टर ग्रैसियन, पृ. 59 पर परिभाषित और व्याख्यायित हैं।
____________________________________________________
मार्क्स के सिद्धांत के अनुसार हमारे कुछ निर्णयों के कारण नहीं बल्कि आर्थिक परिस्थितियों में अंतर्निहित कारकों के कारण संसार बदलेगा। उनका सिद्धांत मानव स्वभाव (1) या मानव मनोविज्ञान (1) का सिद्धांत न होकर यह बताता था कि माल और सेवा उत्पादन की आर्थिक विधियाँ एक समाज की अन्य सभी राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक संरचनाओं को तय करती हैं ( हालाँकि कुछ मार्क्सवादी इसे पूर्ण रूप से सही मानने में संकोच करते हैं)। इस प्रकार मार्क्स के नकार के बावजूद ‘क्षुद्र अंग्रेजी बुर्जुआ’ की आवश्यकताएँ ‘अवास्तविक (false) आवश्यकताएँ (1)’ न होकर उत्पादन के पूँजीवादी विधि से सम्बन्धित ‘वास्तविक आवश्यकताएँ’ हैं – वे आवश्यकताएँ जो ऐतिहासिक सूझ के अनुसार समय के साथ साथ उत्पादन विधियों के बदलने पर ही बदलेंगी। इतिहास के ‘विज्ञान’ के रूप में मार्क्सवाद की सफलता या असफलता इस बात से तय होती है कि यह उत्पादन के विकास और उसके विभिन्न प्रभावों की भविष्यवाणी किस सीमा तक कर सकता है।
मार्क्स के अनुसार जिस तरह से सामंतवाद को पूँजीवाद ने एक नई, बेहतर और दक्ष उत्पादन विधि के रूप में प्रतिस्थापित किया, उसी तरह से पूँजीवाद को विस्थापित करती एक दूसरी व्यवस्था भी जन्म लेगी। अंतत: मजदूरी के निरंतर कम होते जाने से निर्धन होते जाते मज़दूर और प्रतिस्पर्धा की जगह वृहद एकाधिकारी प्रवृत्तियों के आने से पूँजीपतियों की घटती संख्या के कारण पूँजीपतियों को सामान बेचने के लिए कोई नहीं बचेगा और उनके पास लाभांश द्वारा जमा की गई पूँजी निरर्थक हो जाएगी। यह स्थिति क्रेडिट और बैंकिंग की उत्तरोत्तर कठिन परिस्थितियाँ तब तक उत्पन्न करती जाएगी जब तक कि सर्वहारा सड़ चुके पूरे तंत्र को आसानी से ध्वस्त कर एक वर्गविहीन समाज की स्थापना नहीं कर लेंगे।
"उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण और श्रमिकों का सामाजीकरण अंतत: उस बिन्दु तक पहुँचेगा जहाँ वे अपने पूँजीवादी खोल को बर्दाश्त नहीं कर पाएँगे। तब यह खोल खण्ड खण्ड हो बिखर जाएगा।"
[द कैपिटल, भाग एक, पृ.837, चार्ल्स एच. केर एण्ड कं., शिकागो, 1906, एडवर्ड अवेलिंग द्वारा अनुवादित और थॉमस सोवेल द्वारा ऑन क्लासिकल इकोनॉमिक्स , येल,2006, पृ.170 पर उद्धृत]
मार्क्सवादी अर्थशास्त्र की भ्रांति का सार हमें इसमें मिल जाता है। मार्क्स का यह विश्वास है कि इतिहास की द्वन्द्वात्मकता के विकास के साथ साथ उत्पादन की नई विधियों का विकास होगा। इससे उत्पादकता बढ़ेगी और अधिक पूँजी का सृजन होगा जिससे अंतत: मज़दूर को अलगाव और शोषण से मुक्ति मिलेगी। लेकिन, मार्क्सवादी मूल्य सिद्धांत में इस बढ़ी हुई उत्पादकता को सुनिश्चित करने वाला कोई कारक (variable) नहीं है। यदि श्रमिक ( या ‘सामाजिक रूप से आवश्यक’ श्रम) मूल्य का सृजन करता है तो अधिक श्रम अधिक मूल्य सृजित करेगा लेकिन यह वैविध्य लिए हुए न होकर केवल मात्रात्मक होगा। पिरामिड बनाने के लिए किया जाने वाला अधिक श्रम केवल अधिक पिरामिडों की ही रचना करेगा (कुछ और नहीं**)। अत: यह सिद्ध हो जाता है कि (गुणात्मक मूल्य संवर्धन के लिए**) श्रम के अलावा कोई और कारक भी है। यह कारक ‘पूँजी’ है। श्रमाधिक्य वाला उत्पादन तंत्र पूँजी आधिक्य वाले तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। पूँजी के आधिक्य से केवल मात्रात्मक ही नहीं बल्कि गुणात्मक उत्पादन की अधिकता भी सुनिश्चित होती है। लेकिन मार्क्स पूँजी के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं रखते इसीलिए (अपने वाद से अलगाव जताने के लिए**) ‘पूँजीवाद’ नाम का प्रयोग करते हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि मार्क्सवाद उत्पादन में बढ़ोत्तरी को व्याख्यायित नहीं कर सकता (क्यों कि इसमें उसके लिए किसी अतिरिक्त कारक की व्यवस्था ही नहीं है**)। (जारी)
..............................................................................................................

** अनुवादक द्वारा जोड़े गए अंश इस रंग के फॉण्ट में हैं और दो ताराओं द्वारा चिह्नित हैं।
(1) ये पद आचारनीति ( Ethics) की पुस्तक मॉरल रिजनिंग, विक्टर ग्रैसियन, पृ. 59 पर परिभाषित और व्याख्यायित हैं।