मार्क्सवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मार्क्सवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

तिब्बत- चीखते अक्षर : अपनी बात

  
Picture 14
साम्यवादी चीन में तिब्बती बच्चे 
मार्क्सवाद चिंतन की एक द्वन्द्ववादी, भौतिकवादी पद्धति है जिसका उद्देश्य सामंतवाद-पूँजीवाद-समाजवाद से आगे साम्यवादी समाज की स्थापना है जहाँ ‘सब बराबर’ होते हैं। अपनी सुव्यवस्थित, निर्मम और बराबरी की रोमान्टिक अवधारणा के कारण मार्क्सवाद सदा से ही युवा वर्ग को आकर्षित करता रहा है और रहेगा। भाववादी चिंतन के विपरीत यह मनुष्य के विकास और कल्याण के लिये मनुष्य को ही पर्याप्त मानता है, ईश्वर को नकारता है और धर्म को अफीम की संज्ञा देता है जो सोचने की तार्किक क्षमता को कुन्द कर देता है। वर्गसंघर्ष और क्रांति मार्क्सवाद के उद्देश्यप्राप्ति हेतु अस्त्र हैं।
 मार्क्स के अलावा ऐसे चिंतन के और भी ‘वैरियेंट’ रहे हैं, जैसे – 'बन्दूक की बैरल से क्रांति उगलता' माओवाद, उत्तर कोरिया में किम-इल-सुंग की 'चुच्चे (juche)' चिन्तन पद्धति आदि। कुछ लोग पहली क्रांति (रूस, सोवियत संघ) के जनक के नाम से लेनिनवाद को भी कुछ अंतरों के कारण अलग मानते हैं। सर्वहारा(उत्पादन के स्रोतों से वंचित और श्रम को बेच कर जीने वाला वर्ग) की निरंकुशता का प्रतिपादन करने वाले इस चिन्तन ने इतिहास में दो बड़ी क्रांतियाँ कीं - रूस की क्रांति और चीन की क्रांति। राज्य के शोषण, दमन और निरंकुशता के विरुद्ध खड़ा यह स्वघोषित ‘लोकतांत्रिक’ आन्दोलन जब सत्ता में आया तो कई गुना दमनकारी हो गया। सोवियत संघ में स्टालिन ने हिटलर से भी अधिक लोगों को लम्बी यातनायें देकर मरवा दिया। चीन के साम्राज्यवादी कारनामें और दमन तो जग जाहिर हैं ही।

ईश्वर को पूर्णत: नकारने वाले और मानव मेधा की वकालत करने वाले मार्क्सवादियों के लिये मार्क्स या माओवादियों के लिये माओ स्वयं किसी ईश्वर से कम नहीं। अन्धानुसरण से वैचारिक असहिष्णुता आती है जिसकी चरम परिणति उसी जन के दमन में होती है जिसके कल्याण के लिये क्रांतियाँ की जाती हैं। वैचारिक अतिवाद कितना घातक हो सकता है, इसका ज्वलंत उदाहरण है – तिब्बत। माओ के लालों ने तिब्बत में यातना, दमन, विनाश और हत्याओं का जो नंगा नाच किया वह छिपा नहीं है। फिर भी अन्धसमर्थक और मस्तिष्क को  मार्क्स/माओ जैसे 'ईश्वरों' के यहाँ गिरवी रखे लोग चीन के तंत्र को ‘राज्य नियंत्रित पूँजीवाद’ और सोवियत तंत्र को ‘सुविधाभोगी समझौतावादियों का तंत्र’ बता कर जनता को उन क्षेत्रों में मूर्ख बनाते रहे हैं जहाँ तथाकथित ‘क्रांतियाँ’ नहीं हुई हैं लेकिन उसकी सम्भावनायें पूँजीवादी शोषण तंत्र के कारण परिपक्व हैं। इनके हर तंत्र जनविरोधी साबित हुये हैं फिर भी ये बराबरी के ‘स्वर्णयुग’ के सब्जबाग दिखाने में लगे हुये हैं। वे इस तथ्य को भुला चुके हैं कि प्रगति की मौलिक शर्त है - वैचारिक कार्मिक स्वतंत्रता। व्यक्ति, समाज और परिवेश के आपसी आदान प्रदान और द्वन्द्व की स्थिति में विचार स्थैतिक नहीं रह सकते। अगर रहेंगे तो अन्तत: निरंकुश क्रूर दमन को ही जन्म देंगे चाहे उनके कारक सामंतवादी हों, पूँजीवादी हों या साम्यवादी हों। पिसेगा मनुष्य ही।
 तिब्बत केन्द्रित प्रस्तुत अनुवाद अलग किस्म के इन मठाधीशों की करनी को उजागर करता है। एक पूरी सभ्यता को माओवादियों ने न केवल नष्ट भ्रष्ट कर दिया बल्कि अपार जनहानियाँ भी कीं। ‘स्वर्णिम युग’ के लिये भारत के जंगलों और गाँवों में क्रांति के नाम पर लूट और भयदोहन करने वाले मानवता के अपराधी सत्ता हाथ में आने पर कितने नीचे गिर सकते हैं, यह दस्तावेज उसकी झाँकी है।

मानव मस्तिष्क में सच जीवित रहे इसलिये उसे बार बार बताना पड़ता है। ‘बिनायकी’ हो हल्ले के जमाने में सतर्क ‘वाणी’ को बोलना ही चाहिये। इस लोकतंत्र में इसकी स्वतंत्रता तो है!
अगले अंक से अनुवाद प्रस्तुत करूँगा। (अगला भाग)

रविवार, 11 जुलाई 2010

इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 3

इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत – 1
इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 2
मार्क्सवाद में उत्पादकता को ही हीन दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति भी है। जैक लंडन, जो अब कम्युनिस्ट के बजाय एक लेखक के रूप में अधिक जाने जाते हैं, ने कहा था कि अपने दूसरे साथियों की तुलना में अधिक उत्पादक मज़दूर पहले से ही ‘हड़ताल भेदी’ होता है। यह विचार तो ऐसा ही है कि उत्पादकता में वृद्धि को मज़दूर के शोषण का हिस्सा मान लिया जाय।
दुर्भाग्य से बिना बढ़ी हुई उत्पादकता के श्रम का 90% भाग खेती बाड़ी में लगा रहेगा जब कि आज अमेरिका में आज 2% से भी कम श्रम खेती में लगा हुआ है और बाकी का 98% दूसरी वस्तुओं के उत्पादन में लगा है। यह ‘दूसरी वस्तुएँ’ही मार्क्सवादी आर्थिक तंत्र की समस्याएँ हैं। मार्क्स के ज़माने में ब्रिटिश उद्योग का बड़ा हिस्सा रेलवे के निर्माण में लगा था। ऐसा लगता है कि मार्क्स को यह भरोसा हो चला था कि एक बार रेलवे का काम पूरा हो जाने के बाद मज़दूरों और पूँजी दोनों के पास करने को कुछ नहीं रहेगा। लेकिन यही तो पूँजी के मायनों की कुंजी है। पूँजी ज्ञान है। पूँजी कल्पना की शक्ति है। पूँजी निवेश को मशीनरी निर्माण के रूप में सोचा जा सकता है लेकिन पहले मशीनरी के उपयोग और उद्देश्य के बारे में सोचा जाना चाहिए। नए उद्देश्यों के लिए नए उत्पादों के बारे में सोचना अनिवार्य है। लेकिन नए उत्पाद, नए उपयोग और नए उद्देश्यों की परिकल्पनाओं में मशीनरी बस एक हिस्सा भर हो सकती है। यह भी हो सकता है कि यह एक हिस्सा जितनी भी न हो। इसे सरलता से ऐसे समझा जा सकता है कि काम करने के अलग तरीके नए ज्ञान और नई पूँजी को निरूपित करते हैं। इस प्रकार, आधुनिक अर्थशास्त्र में ‘मानव पूँजी’ की अवधारणा स्थान बनाती है जिसका निहितार्थ यही है कि कुछ लोग काम को औरों से बेहतर तरीके से करना जानते हैं। ग़लत तरीके से परिकल्पित निवेशों में पूँजी का मूल्य ही उड़न छू हो जाता है। सिद्धांत यह है कि “जो डूब गया वह डूब गया”। ऐसे हर निष्फल निवेश, जिसमें कि पूँजी डूब चुकी है, के लिए एक समय ऐसा आता है जब इसे त्याग देना होता है।
इस प्रकार पूँजी के काल्पनिक स्वभाव वाला मार्क्सीय सिद्धांत मार्क्स की सोच की दरिद्रता को दर्शाता है। मार्क्स यह सोच समझ ही नहीं पाए कि लोग अपनी पूँजी का उपयोग कैसे कर पाएँगे। पूर्णत: नए उत्पाद और उद्योगों का प्रकटीकरण और उनका पूँजी निवेश के द्वारा सम्वर्धन एक ऐसी प्रक्रिया थी जो मार्क्सवादी अर्थशास्त्र की समझ के बाहर की बात थी। शायद उन्हों ने यह सोचा कि द्वन्द्वात्मक सिद्धांत द्वारा प्रदत्त सहज स्वाभाविक अवधारणा से प्रेरित हो एक दिन अशोषित मज़दूर साथ बैठेंगे और सेल फोन बनाना शुरू कर देंगे। चूँकि मार्क्स ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें यह कभी नहीं पता था कि पूँजी का करना क्या है, उन्हें इसकी उपादेयता का भी पता नहीं था। उनका सिद्धांत आधुनिक राजनीति शास्त्र की सतही आर्थिक समझ से जुड़ता है।
‘मानव पूँजी’ के साथ इसका व्यवहार और बुरा है। बहुधा नस्ली अल्पसंख्यक लोगों द्वारा शुरू किए गए छोटे व्यापार प्रक्रम जो कि बिजनेस स्कूलों के बजाय सहज घरेलू, पारम्परिक और अनौपचारिक रूप से सीखे गए गहन ज्ञान से चालित होते हैं; मार्क्सवादियों द्वारा सन्देह, निन्दा और घृणा की दृष्टि से देख जाते हैं। उनके अनुसार छोटे धन्धे चलाने वाले लोग यथा यहूदी, दक्षिण पूर्व एशिया के चीनी, अफ्रीका के भारतीय, हार्लेम के कोरियाई आदि लघु स्तर के पूँजीवादी शोषण कर्म में रत हैं। वे लोग ‘’क्षुद्र बुर्जुआ” हैं जो बढ़ते हुए एकाधिकारवादी पूँजी तंत्र द्वारा निगल लिए जाएँगे। मार्क्सवादी ज्ञानियों के लिए ऐसे ‘दक्षिणपंथी सोच’ वाले केवल निन्दा के पात्र हैं। यह विचार केवल नासमझी और अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है कि इस तरह के उद्यम न केवल अल्पसंख्यकों और व्यक्तियों की आर्थिक सफलता के स्रोत हैं बल्कि पूर्णरूपेण अर्थतंत्र में हुई उन उत्पादन क्रांतियों के भी स्रोत हैं जहाँ किसी के गैराज में फोर्ड मोटर या एपल कम्प्यूटर जैसे प्रक्रम जन्म लेते हैं ।
jobs-woz-garage
दोनों स्टीव उस गैराज में जहाँ से एपल कम्प्यूटर उद्यम की यात्रा प्रारम्भ हुई 
jobs-apple-2
स्टीव जॉब्स एपल-2 के साथ
apple-store-fifth-avenue
एपल कम्प्यूटर का प्रसिद्ध अत्याधुनिक स्टोर 
apple-imac
आज का एपल कम्प्यूटर उत्पाद - आइ मैक
एक क्षुद्र बुर्जुआ नवरचयिता लघु उद्यमी की यात्रा
ऐसा सोचने वालों में वे लोग भी सम्मिलित हैं -कुछ यहूदी भी उदाहरण हैं- जिनके अपने परिवारों में भी बहुत छोटे स्तर के बावज़ूद ऐसे नवप्रवर्तन, नवरचना और सफलता की परम्परा रही है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि मार्क्स का पूँजी पर कोई भरोसा नहीं था। उन्हों ने आविष्कार और नवप्रवर्तन के स्रोतों को नहीं समझा और उनके अनुसार एकाधिकारवादी पूँजी द्वारा लघु उद्योगों और उद्यमियों का उन्मूलन केवल अपेक्षित ही नहीं बल्कि प्रक्रिया का एक आवश्यक अंग भी है। (जारी)
डा. केली रॉस के मूल अंग्रेजी लेख  की अनुवाद माला का तीसरा पुष्प 

शनिवार, 22 मई 2010

इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 2

पहले भाग से जारी 
[अपनी बात: पिछली कड़ी में अमरेन्द्र जी   ने अपनी टिप्पणी और बाद के व्यक्तिगत संवाद के दौरान अनुवाद में सरलता की आवश्यकता बताई। अंग्रेजी और हिन्दी के व्याकरण और अभिव्यक्ति विधि परम्पराओं में बहुत असमानताएँ हैं जिनके कारण सरलता का निर्वाह मुझे बहुत कठिन लगता है ।प्रशिक्षित अनुवादकों के लिए सम्भवत: यह कठिन न होता हो। 
 एक ओर तो भाषिक सम्प्रेषणीयता की बात है तो दूसरी ओर यह डर कि जाने कौन सा तकनीकी शब्द आनुवादिक सरलीकरण की प्रक्रिया में वधित हो जाए ! ... इतने वर्षों के बाद मार्क्सवादी धार पर पुन: चलते हुए  लुहलुहान हो रहा हूँ जिसके बारे में फिर कभी बात करूँगा। सम्प्रति यही निवेदन है कि यत्र तत्र मैंने अपनी समझ के अनुसार भावानुवाद का प्रयास किया है। कहीं कहीं अपनी ओर से स्पष्टीकरण भी जोड़े हैं जो चिह्नित है। शुद्धता के आग्रही जन डा. केली रॉस के मूल अंग्रेजी लेख    को  देख सकते हैं। अनुवाद के छोटे छोटे अंश ही दूँगा ताकि ब्लॉग प्लेटफॉर्म की सीमा में भी पाठकों को पढ़ने, गुनने और समझने में आसानी हो।]
____________________________________________________

मार्क्स के सिद्धांत के अनुसार हमारे कुछ निर्णयों के कारण नहीं बल्कि आर्थिक परिस्थितियों में अंतर्निहित कारकों के कारण संसार बदलेगा। उनका सिद्धांत मानव स्वभाव (1) या मानव मनोविज्ञान (1) का सिद्धांत न होकर यह बताता था कि माल और सेवा उत्पादन की आर्थिक विधियाँ एक समाज की अन्य सभी राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक संरचनाओं को तय करती हैं ( हालाँकि कुछ मार्क्सवादी इसे पूर्ण रूप से सही मानने में संकोच करते हैं)। इस प्रकार मार्क्स के नकार के बावजूद ‘क्षुद्र अंग्रेजी बुर्जुआ’ की आवश्यकताएँ ‘अवास्तविक (false) आवश्यकताएँ (1)’ न होकर उत्पादन के पूँजीवादी विधि से सम्बन्धित ‘वास्तविक आवश्यकताएँ’ हैं – वे आवश्यकताएँ जो ऐतिहासिक सूझ के अनुसार समय के साथ साथ उत्पादन विधियों के बदलने पर ही बदलेंगी। इतिहास के ‘विज्ञान’ के रूप में मार्क्सवाद की सफलता या असफलता इस बात से तय होती है कि यह उत्पादन के विकास और उसके विभिन्न प्रभावों की भविष्यवाणी किस सीमा तक कर सकता है।
मार्क्स के अनुसार जिस तरह से सामंतवाद को पूँजीवाद ने एक नई, बेहतर और दक्ष उत्पादन विधि के रूप में प्रतिस्थापित किया, उसी तरह से पूँजीवाद को विस्थापित करती एक दूसरी व्यवस्था भी जन्म लेगी। अंतत: मजदूरी के निरंतर कम होते जाने से निर्धन होते जाते मज़दूर और प्रतिस्पर्धा की जगह वृहद एकाधिकारी प्रवृत्तियों के आने से पूँजीपतियों की घटती संख्या के कारण पूँजीपतियों को सामान बेचने के लिए कोई नहीं बचेगा और उनके पास लाभांश द्वारा जमा की गई पूँजी निरर्थक हो जाएगी। यह स्थिति क्रेडिट और बैंकिंग की उत्तरोत्तर कठिन परिस्थितियाँ तब तक उत्पन्न करती जाएगी जब तक कि सर्वहारा सड़ चुके पूरे तंत्र को आसानी से ध्वस्त कर एक वर्गविहीन समाज की स्थापना नहीं कर लेंगे।
"उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण और श्रमिकों का सामाजीकरण अंतत: उस बिन्दु तक पहुँचेगा जहाँ वे अपने पूँजीवादी खोल को बर्दाश्त नहीं कर पाएँगे। तब यह खोल खण्ड खण्ड हो बिखर जाएगा।"
[द कैपिटल, भाग एक, पृ.837, चार्ल्स एच. केर एण्ड कं., शिकागो, 1906, एडवर्ड अवेलिंग द्वारा अनुवादित और थॉमस सोवेल द्वारा ऑन क्लासिकल इकोनॉमिक्स , येल,2006, पृ.170 पर उद्धृत]
मार्क्सवादी अर्थशास्त्र की भ्रांति का सार हमें इसमें मिल जाता है। मार्क्स का यह विश्वास है कि इतिहास की द्वन्द्वात्मकता के विकास के साथ साथ उत्पादन की नई विधियों का विकास होगा। इससे उत्पादकता बढ़ेगी और अधिक पूँजी का सृजन होगा जिससे अंतत: मज़दूर को अलगाव और शोषण से मुक्ति मिलेगी। लेकिन, मार्क्सवादी मूल्य सिद्धांत में इस बढ़ी हुई उत्पादकता को सुनिश्चित करने वाला कोई कारक (variable) नहीं है। यदि श्रमिक ( या ‘सामाजिक रूप से आवश्यक’ श्रम) मूल्य का सृजन करता है तो अधिक श्रम अधिक मूल्य सृजित करेगा लेकिन यह वैविध्य लिए हुए न होकर केवल मात्रात्मक होगा। पिरामिड बनाने के लिए किया जाने वाला अधिक श्रम केवल अधिक पिरामिडों की ही रचना करेगा (कुछ और नहीं**)। अत: यह सिद्ध हो जाता है कि (गुणात्मक मूल्य संवर्धन के लिए**) श्रम के अलावा कोई और कारक भी है। यह कारक ‘पूँजी’ है। श्रमाधिक्य वाला उत्पादन तंत्र पूँजी आधिक्य वाले तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। पूँजी के आधिक्य से केवल मात्रात्मक ही नहीं बल्कि गुणात्मक उत्पादन की अधिकता भी सुनिश्चित होती है। लेकिन मार्क्स पूँजी के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं रखते इसीलिए (अपने वाद से अलगाव जताने के लिए**) ‘पूँजीवाद’ नाम का प्रयोग करते हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि मार्क्सवाद उत्पादन में बढ़ोत्तरी को व्याख्यायित नहीं कर सकता (क्यों कि इसमें उसके लिए किसी अतिरिक्त कारक की व्यवस्था ही नहीं है**)। (जारी)
..............................................................................................................





** अनुवादक द्वारा जोड़े गए अंश इस रंग के फॉण्ट में हैं और दो ताराओं द्वारा चिह्नित हैं। 

(1) ये पद आचारनीति ( Ethics) की पुस्तक मॉरल रिजनिंग, विक्टर ग्रैसियन, पृ. 59 पर परिभाषित और व्याख्यायित हैं।


















रविवार, 9 मई 2010

इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 1

- हम जिन अपराधों की पोल खोलेंगे उनका फैसला कम्युनिस्ट सत्ताओं के मानकों से नहीं बल्कि मानवता के अलिखित प्राकृतिक नियमों से होना चाहिए। स्टीफेन कोर्टवोइस 
[द ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म, क्राइम्स, टेरर, रिप्रेशन , निकोलस, जीन-जुइस पन्ने, अन्द्र्ज़ेज चकोवस्की आदि, अनुवादित जोनाथन मरफी और मार्क क्रेमर, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1999, पृ.3 ] 
- एक अपराधी को छोड़ना ठीक नहीं भले सौ निर्दोषों की हत्या करनी पड़े। डोलोरेस इबर्रुरी ("ला पैसनरिआ"), स्पेनी कम्युनिस्ट [वही, पृ.343]  
- हमने पर्याप्त लोगों को नहीं मारा ... क्रांतियाँ तभी सफल होती हैं जब नदियाँ खून से लाल हो जाती हैं और जब आप का उद्देश्य मानव जाति की सम्पूर्ण उत्तमता का हो तो खून बहाना अनिवार्य हो जाता है। अरेस वेलूचिओटेस, ग्रीक कम्युनिस्ट, [वही, पृ.329]
- कम्युनिज्म आर्थिक उत्पाद की उत्कृष्ट्ता सुनिश्चित करने में उन्नीसवीं सदी की असफलता के विरुद्ध प्रतिक्रिया नहीं है। यह इसकी तुलनात्मक सफलता के विरुद्ध प्रतिक्रिया है। यह आर्थिक कल्याण के खोखलेपन के विरुद्ध प्रतिवाद है, हम सबके भीतर के तपस्वी के लिए एक अपील है ... आदर्शवादी युवा कम्युनिस्ट अवधारणा को आजमाते हैं क्यों कि यह एकमात्र आध्यात्मिक आकर्षण है जो उन्हें समकालीन लगता है। जॉन मेनार्ड कीनेस, 1934
- किसी भी बुद्धिजीवी के लिए यह कोई बचाव का रास्ता नहीं है कि उसे [कम्युनिज्म के द्वारा] ठग दिया गया। एक बुद्धिजीवी के रूप में उसे ऐसा कत्तई घटित नहीं होने देना चाहिए था।  ग्रेनविल हिक्स  
- यह अजीब है कि राजनैतिक रूप से सही (अवसरवादी) समतावाद बहुतेरे विद्वज्जनों के बौद्धिक दम्भ और उच्छिष्टवर्गवाद को आकर्षित करता है; साहित्यिक मार्क्सवाद के प्रति उनका झुकाव इसके आर्थिक सिद्धांत पर आधारित न हो कर इसके व्यापार (पण) और मध्य वर्ग के विरोध के कारण है। इसीलिए इस बुर्जुवाविरोधी भावना के चरित्र की संगति समतावाद के बजाय निचले तबके के प्रति इनके कुलीन तिरस्कार से अधिक बैठती है। जॉन एम. एल्लिस, लिटेरेचर लॉस्ट [येल यूनिवर्सिटी प्रेस, 1997], पृ.214
- कॉस्मिक अंतर्दृष्टि(विजन) वालों का मध्यवर्ग - बुर्जुवा - के प्रति करीब सर्वव्यापी तिरस्कार भाव इससे समझा जा सकता है कि ये विजन व्यक्तिगत संतुष्टि और व्यक्तिगत वैधता प्रदान करते हैं। निचले और धनाढ्य़ कुलीन दोनों वर्गों की तुलना में  परम्परा से ही मध्य वर्ग नियमों और परम्पराओं को मानने वाले और आत्मानुशासित लोगों का रहा है। जहाँ निचला तबका मध्य वर्ग जैसा आत्मानुशासित न होने की कीमत ग़रीबी और कैदखाने के रूप में अदा करता है वहीं धनाढ्य और शक्तिशाली लोग बहुधा नियम और क़ानून को बिना कुफल भुगते धता बता सकते हैं। सामाजिक अनुशासन और बन्धनों को स्वाभाविक के बजाय मनमाना मानने वाले कॉस्मिक अंतर्दृष्टिप्राप्त लोग उनसे मुक्ति चाहते हैं। वे निचले तबके की उच्छृंखलता और कुलीनों की खुद को नियमों से उपर मानने की प्रवृत्ति का रोमानीकरण करते हैं। थॉमस सोवेल्ल, द क्वेस्ट फॉर कॉस्मिक जस्टिस [द फ्री प्रेस, 1999], पृ. 139-140.
- बहुतेरे जिनकी निष्ठा सोवियत संघ के साथ थी अपने देश और लोकतांत्रिक संस्कृति के प्रति गद्दार की तरह देखे जाते हैं। लेकिन उनका सबसे बड़ा दोष और भी बुनियादी था। खुद को स्वतंत्र मस्तिष्कधारी की तरह देखते, एक समझदार की तरह अपने विकल्प चुनते उन्हों ने अपने मानदंडों की ही अवहेलना की। कम्युनिस्ट शासन की वास्तविकताओं पर तीसरे दशक में पहले से ही उपलब्ध बहुआयामी सबूतों की उन्हों ने जाँच पड़ताल नहीं की। यह कहा जा सकता है कि वे मानव मस्तिष्क के और स्वयं चिंतन के भी गद्दार थे। रॉबर्ट कॉंक़्वेस्ट, रिफ्लेक्संस ऑन अ रैवेज्ड सेंचुरी [डब्ल्यू ड्ब्ल्यू नॉर्टन एण्ड कम्पनी, 2000], पृ.118 
- एक बौद्धिक रचना के रूप में द कैपिटल (मार्क्स) उत्कृष्ट कृति थी। लेकिन कुछ और बौद्धिक उत्कृष्ट कृतियों की तरह ही यह एक विस्तृत और परिष्कृत शिल्प था जिसकी नींव एक आदिम मिथ्या अवधारणा थी। 
... विचारों के क्षेत्र में मार्क्स की अंतर्दृष्टि, उनके इतिहास के सिद्धांत के साथ, न केवल विभिन्न कालों में बहुआयामी क्षेत्रों में अपनी धाक जमाए रखी है, बल्कि पूँजीवाद की फलती फूलती समृद्धि और समाजवाद के आर्थिक पतन दोनों के दरम्याँ बची रही है। प्रमाण और तर्क के क्षयकारी प्रभावों से अभेद्य यह बुद्धिजीवियों की जमात के बीच स्वयंसिद्ध सी हो गई है। 
लेकिन अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मार्क्स का क्या योगदान था? योगदान केवल प्रस्ताव पर नहीं बल्कि स्वीकार पर भी आधारित होता है, और आज के अर्थशास्त्र में कोई प्रमुख आधार वाक्य, मत, सिद्धांत या विश्लेषण यंत्र मार्क्स की रचनाओं से नहीं आया है। यह नकारने की कोई जरूरत नहीं है कि कई अर्थों में मार्क्स उन्नीसवीं सदी के एक प्रमुख इतिहास पुरुष थे, जिनकी लम्बी छाया इक्कीसवीं सदी की दुनिया पर अभी भी पड़ रही है; फिर भी शायद यह कहना कठोर हो, अर्थशास्त्र प्रोफेसनल के लिहाज से, जैसा कि प्रो. पॉल सैमुएल्सन ने कहा है, मार्क्स एक "अदने उत्तर-रिकार्डियन" थे। थॉमस सोवेल्ल, ऑन क्लासिकल इकोनॉमिक्स [येल, 2006] पृ.184-186 


"तुम जो आ रहे हो, हर आशा का त्याग कर दो"      
दांते एल्लीघीरी, द डिवाइन कॉमेडी, इंफर्नो, 3:9  
_____________________________________________________________________
कार्ल मार्क्स (1818-1883) के पास नैतिकता का सिद्धांत नहीं था; उनके पास इतिहास का सिद्धांत था। इस प्रकार, मार्क्सवाद सही या ग़लत का सिद्धांत न होकर इतिहास में क्या घटेगा इसका सिद्धांत था। मार्क्स उन लोगों के प्रति निन्दा भाव रखते थे जो बात, वस्तु या तथ्य को नैतिक अवधारणाओं से परखते थे। लेनिन, स्टेलिन, माओ, कास्त्रो, हो और डेनियल ओरटेगा की अपने कृत्यों के प्रति अवधारणा के बावजूद भी जब कट्टर अनुयायी यह कहते हैं कि मार्क्सवाद वास्तव में कभी 'आजमाया' नहीं गया, वे यह नहीं समझते कि मार्क्सवाद व्यवहार या कर्म के कार्यक्रम का कोई नियम नहीं बल्कि निश्चयात्मक क्रियातंत्र का सिद्धांत था, यह क्रियातंत्र भविष्य का 'उत्पादक' होने वाला था, ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण सहज स्वाभाविक तरीके से उठ खड़े होने वाली क्रियाओं का सिद्धांत -- हालाँकि हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि लोग , जिनमें हम भी सम्मिलित हैं,  किस तरह के कर्म करेंगे -- जैसा कि,  मार्क्स ने कहा था कि उनके काम का उद्देश्य संसार को केवल समझना नहीं, बदलना था। (जारी)
पूर्वानुमति के बाद  डा. केली रॉस के अंग्रेजी लेख   के अंश का ब्लॉग लेखक द्वारा अनुवाद   

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

पुरानी डायरी से - 13: 'ईश्वर' नहीं

__________________________________________________________
भठ्ठर मन, सर्व व्यर्थता बोध - कुछ लिखा नहीं जा रहा। पुरानी डायरी की शरण गया तो पंजाब आतंकवाद के चरम के समय की यह कविता दिख गई। यह वह दौर था जब मेरा ईश्वर से मोहभंग हो रहा था। मनुष्य की सारी समस्याओं की जड़ विभिन्न पंथ और मजहब हैं - यह विश्वास पुख्ता हो चला था। ऐसे में मार्क्सवाद का अध्ययन प्रारम्भ हुआ । मार्क्सवाद और बौद्ध दर्शन के अध्ययन से वैचारिक स्पष्टता आई। इसका परिणाम यह हुआ कि मार्क्सवाद भी एक 'अलग तासीर का अफीम' लगने लगा - विषस्य विषमौषधम् जैसा। औषधि की एक सीमा होती है ...उससे भी मुक्त हुआ।  
आज पंजाब में आतंकवाद नहीं है लेकिन देश के कई भागों में जन दु:ख के प्रति उपेक्षा, निर्मम दमन और शोषण ने हिंसा को एक विकल्प की तरह कायम रखा है। हिंसा - जिससे कोई समाधान नहीं आता लेकिन मनुष्य अपने मन को बहलाता है यह सोच कर कि शायद खून के छींटों से आँखों पर पड़ा पर्दा धुल कर बह जाय । कितनी सम्मोहक और कितनी निरर्थक है यह सोच ! लेकिन सार्थक क्या है ? क्या मानव सभ्यता इस तरह के दुश्चक्रों के आवागमन के लिए अभिशप्त है? हिंसा, शांति, हिंसा, शांति ... तो क्या अंतत: सोचना भी निरर्थक ही है - मानव समाज सुख के स्वप्न क्या निरर्थक ही हैं ? मुझे अब भी लगता है - नहीं ।   
____________________________________________________________
प्रचुर निरंतर शामें 
यहाँ आती हैं 
चली जाती हैं
उजाला तो लगता है 
अँधियारों के भ्रम जैसा
सूर्योदय तो श्रम जैसा
लड़ कर आने वाला।
इन शामों में
उदासी के कागज पर
चिंता की लेखनी में
पंजाबी खून की स्याही भर
लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
तुम तानाशाह हो
ईश्वर नहीं।
जिसके 'स्वर'
इतने कमजोर हों
गुरुओं की वाणी में
ऋषियों की ऋचाओं में
वह 'ईश्वर' नहीं है।