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शनिवार, 22 मई 2010

इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 2

पहले भाग से जारी 
[अपनी बात: पिछली कड़ी में अमरेन्द्र जी   ने अपनी टिप्पणी और बाद के व्यक्तिगत संवाद के दौरान अनुवाद में सरलता की आवश्यकता बताई। अंग्रेजी और हिन्दी के व्याकरण और अभिव्यक्ति विधि परम्पराओं में बहुत असमानताएँ हैं जिनके कारण सरलता का निर्वाह मुझे बहुत कठिन लगता है ।प्रशिक्षित अनुवादकों के लिए सम्भवत: यह कठिन न होता हो। 
 एक ओर तो भाषिक सम्प्रेषणीयता की बात है तो दूसरी ओर यह डर कि जाने कौन सा तकनीकी शब्द आनुवादिक सरलीकरण की प्रक्रिया में वधित हो जाए ! ... इतने वर्षों के बाद मार्क्सवादी धार पर पुन: चलते हुए  लुहलुहान हो रहा हूँ जिसके बारे में फिर कभी बात करूँगा। सम्प्रति यही निवेदन है कि यत्र तत्र मैंने अपनी समझ के अनुसार भावानुवाद का प्रयास किया है। कहीं कहीं अपनी ओर से स्पष्टीकरण भी जोड़े हैं जो चिह्नित है। शुद्धता के आग्रही जन डा. केली रॉस के मूल अंग्रेजी लेख    को  देख सकते हैं। अनुवाद के छोटे छोटे अंश ही दूँगा ताकि ब्लॉग प्लेटफॉर्म की सीमा में भी पाठकों को पढ़ने, गुनने और समझने में आसानी हो।]
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मार्क्स के सिद्धांत के अनुसार हमारे कुछ निर्णयों के कारण नहीं बल्कि आर्थिक परिस्थितियों में अंतर्निहित कारकों के कारण संसार बदलेगा। उनका सिद्धांत मानव स्वभाव (1) या मानव मनोविज्ञान (1) का सिद्धांत न होकर यह बताता था कि माल और सेवा उत्पादन की आर्थिक विधियाँ एक समाज की अन्य सभी राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक संरचनाओं को तय करती हैं ( हालाँकि कुछ मार्क्सवादी इसे पूर्ण रूप से सही मानने में संकोच करते हैं)। इस प्रकार मार्क्स के नकार के बावजूद ‘क्षुद्र अंग्रेजी बुर्जुआ’ की आवश्यकताएँ ‘अवास्तविक (false) आवश्यकताएँ (1)’ न होकर उत्पादन के पूँजीवादी विधि से सम्बन्धित ‘वास्तविक आवश्यकताएँ’ हैं – वे आवश्यकताएँ जो ऐतिहासिक सूझ के अनुसार समय के साथ साथ उत्पादन विधियों के बदलने पर ही बदलेंगी। इतिहास के ‘विज्ञान’ के रूप में मार्क्सवाद की सफलता या असफलता इस बात से तय होती है कि यह उत्पादन के विकास और उसके विभिन्न प्रभावों की भविष्यवाणी किस सीमा तक कर सकता है।
मार्क्स के अनुसार जिस तरह से सामंतवाद को पूँजीवाद ने एक नई, बेहतर और दक्ष उत्पादन विधि के रूप में प्रतिस्थापित किया, उसी तरह से पूँजीवाद को विस्थापित करती एक दूसरी व्यवस्था भी जन्म लेगी। अंतत: मजदूरी के निरंतर कम होते जाने से निर्धन होते जाते मज़दूर और प्रतिस्पर्धा की जगह वृहद एकाधिकारी प्रवृत्तियों के आने से पूँजीपतियों की घटती संख्या के कारण पूँजीपतियों को सामान बेचने के लिए कोई नहीं बचेगा और उनके पास लाभांश द्वारा जमा की गई पूँजी निरर्थक हो जाएगी। यह स्थिति क्रेडिट और बैंकिंग की उत्तरोत्तर कठिन परिस्थितियाँ तब तक उत्पन्न करती जाएगी जब तक कि सर्वहारा सड़ चुके पूरे तंत्र को आसानी से ध्वस्त कर एक वर्गविहीन समाज की स्थापना नहीं कर लेंगे।
"उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण और श्रमिकों का सामाजीकरण अंतत: उस बिन्दु तक पहुँचेगा जहाँ वे अपने पूँजीवादी खोल को बर्दाश्त नहीं कर पाएँगे। तब यह खोल खण्ड खण्ड हो बिखर जाएगा।"
[द कैपिटल, भाग एक, पृ.837, चार्ल्स एच. केर एण्ड कं., शिकागो, 1906, एडवर्ड अवेलिंग द्वारा अनुवादित और थॉमस सोवेल द्वारा ऑन क्लासिकल इकोनॉमिक्स , येल,2006, पृ.170 पर उद्धृत]
मार्क्सवादी अर्थशास्त्र की भ्रांति का सार हमें इसमें मिल जाता है। मार्क्स का यह विश्वास है कि इतिहास की द्वन्द्वात्मकता के विकास के साथ साथ उत्पादन की नई विधियों का विकास होगा। इससे उत्पादकता बढ़ेगी और अधिक पूँजी का सृजन होगा जिससे अंतत: मज़दूर को अलगाव और शोषण से मुक्ति मिलेगी। लेकिन, मार्क्सवादी मूल्य सिद्धांत में इस बढ़ी हुई उत्पादकता को सुनिश्चित करने वाला कोई कारक (variable) नहीं है। यदि श्रमिक ( या ‘सामाजिक रूप से आवश्यक’ श्रम) मूल्य का सृजन करता है तो अधिक श्रम अधिक मूल्य सृजित करेगा लेकिन यह वैविध्य लिए हुए न होकर केवल मात्रात्मक होगा। पिरामिड बनाने के लिए किया जाने वाला अधिक श्रम केवल अधिक पिरामिडों की ही रचना करेगा (कुछ और नहीं**)। अत: यह सिद्ध हो जाता है कि (गुणात्मक मूल्य संवर्धन के लिए**) श्रम के अलावा कोई और कारक भी है। यह कारक ‘पूँजी’ है। श्रमाधिक्य वाला उत्पादन तंत्र पूँजी आधिक्य वाले तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। पूँजी के आधिक्य से केवल मात्रात्मक ही नहीं बल्कि गुणात्मक उत्पादन की अधिकता भी सुनिश्चित होती है। लेकिन मार्क्स पूँजी के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं रखते इसीलिए (अपने वाद से अलगाव जताने के लिए**) ‘पूँजीवाद’ नाम का प्रयोग करते हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि मार्क्सवाद उत्पादन में बढ़ोत्तरी को व्याख्यायित नहीं कर सकता (क्यों कि इसमें उसके लिए किसी अतिरिक्त कारक की व्यवस्था ही नहीं है**)। (जारी)
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** अनुवादक द्वारा जोड़े गए अंश इस रंग के फॉण्ट में हैं और दो ताराओं द्वारा चिह्नित हैं। 

(1) ये पद आचारनीति ( Ethics) की पुस्तक मॉरल रिजनिंग, विक्टर ग्रैसियन, पृ. 59 पर परिभाषित और व्याख्यायित हैं।


















रविवार, 9 मई 2010

इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 1

- हम जिन अपराधों की पोल खोलेंगे उनका फैसला कम्युनिस्ट सत्ताओं के मानकों से नहीं बल्कि मानवता के अलिखित प्राकृतिक नियमों से होना चाहिए। स्टीफेन कोर्टवोइस 
[द ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म, क्राइम्स, टेरर, रिप्रेशन , निकोलस, जीन-जुइस पन्ने, अन्द्र्ज़ेज चकोवस्की आदि, अनुवादित जोनाथन मरफी और मार्क क्रेमर, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1999, पृ.3 ] 
- एक अपराधी को छोड़ना ठीक नहीं भले सौ निर्दोषों की हत्या करनी पड़े। डोलोरेस इबर्रुरी ("ला पैसनरिआ"), स्पेनी कम्युनिस्ट [वही, पृ.343]  
- हमने पर्याप्त लोगों को नहीं मारा ... क्रांतियाँ तभी सफल होती हैं जब नदियाँ खून से लाल हो जाती हैं और जब आप का उद्देश्य मानव जाति की सम्पूर्ण उत्तमता का हो तो खून बहाना अनिवार्य हो जाता है। अरेस वेलूचिओटेस, ग्रीक कम्युनिस्ट, [वही, पृ.329]
- कम्युनिज्म आर्थिक उत्पाद की उत्कृष्ट्ता सुनिश्चित करने में उन्नीसवीं सदी की असफलता के विरुद्ध प्रतिक्रिया नहीं है। यह इसकी तुलनात्मक सफलता के विरुद्ध प्रतिक्रिया है। यह आर्थिक कल्याण के खोखलेपन के विरुद्ध प्रतिवाद है, हम सबके भीतर के तपस्वी के लिए एक अपील है ... आदर्शवादी युवा कम्युनिस्ट अवधारणा को आजमाते हैं क्यों कि यह एकमात्र आध्यात्मिक आकर्षण है जो उन्हें समकालीन लगता है। जॉन मेनार्ड कीनेस, 1934
- किसी भी बुद्धिजीवी के लिए यह कोई बचाव का रास्ता नहीं है कि उसे [कम्युनिज्म के द्वारा] ठग दिया गया। एक बुद्धिजीवी के रूप में उसे ऐसा कत्तई घटित नहीं होने देना चाहिए था।  ग्रेनविल हिक्स  
- यह अजीब है कि राजनैतिक रूप से सही (अवसरवादी) समतावाद बहुतेरे विद्वज्जनों के बौद्धिक दम्भ और उच्छिष्टवर्गवाद को आकर्षित करता है; साहित्यिक मार्क्सवाद के प्रति उनका झुकाव इसके आर्थिक सिद्धांत पर आधारित न हो कर इसके व्यापार (पण) और मध्य वर्ग के विरोध के कारण है। इसीलिए इस बुर्जुवाविरोधी भावना के चरित्र की संगति समतावाद के बजाय निचले तबके के प्रति इनके कुलीन तिरस्कार से अधिक बैठती है। जॉन एम. एल्लिस, लिटेरेचर लॉस्ट [येल यूनिवर्सिटी प्रेस, 1997], पृ.214
- कॉस्मिक अंतर्दृष्टि(विजन) वालों का मध्यवर्ग - बुर्जुवा - के प्रति करीब सर्वव्यापी तिरस्कार भाव इससे समझा जा सकता है कि ये विजन व्यक्तिगत संतुष्टि और व्यक्तिगत वैधता प्रदान करते हैं। निचले और धनाढ्य़ कुलीन दोनों वर्गों की तुलना में  परम्परा से ही मध्य वर्ग नियमों और परम्पराओं को मानने वाले और आत्मानुशासित लोगों का रहा है। जहाँ निचला तबका मध्य वर्ग जैसा आत्मानुशासित न होने की कीमत ग़रीबी और कैदखाने के रूप में अदा करता है वहीं धनाढ्य और शक्तिशाली लोग बहुधा नियम और क़ानून को बिना कुफल भुगते धता बता सकते हैं। सामाजिक अनुशासन और बन्धनों को स्वाभाविक के बजाय मनमाना मानने वाले कॉस्मिक अंतर्दृष्टिप्राप्त लोग उनसे मुक्ति चाहते हैं। वे निचले तबके की उच्छृंखलता और कुलीनों की खुद को नियमों से उपर मानने की प्रवृत्ति का रोमानीकरण करते हैं। थॉमस सोवेल्ल, द क्वेस्ट फॉर कॉस्मिक जस्टिस [द फ्री प्रेस, 1999], पृ. 139-140.
- बहुतेरे जिनकी निष्ठा सोवियत संघ के साथ थी अपने देश और लोकतांत्रिक संस्कृति के प्रति गद्दार की तरह देखे जाते हैं। लेकिन उनका सबसे बड़ा दोष और भी बुनियादी था। खुद को स्वतंत्र मस्तिष्कधारी की तरह देखते, एक समझदार की तरह अपने विकल्प चुनते उन्हों ने अपने मानदंडों की ही अवहेलना की। कम्युनिस्ट शासन की वास्तविकताओं पर तीसरे दशक में पहले से ही उपलब्ध बहुआयामी सबूतों की उन्हों ने जाँच पड़ताल नहीं की। यह कहा जा सकता है कि वे मानव मस्तिष्क के और स्वयं चिंतन के भी गद्दार थे। रॉबर्ट कॉंक़्वेस्ट, रिफ्लेक्संस ऑन अ रैवेज्ड सेंचुरी [डब्ल्यू ड्ब्ल्यू नॉर्टन एण्ड कम्पनी, 2000], पृ.118 
- एक बौद्धिक रचना के रूप में द कैपिटल (मार्क्स) उत्कृष्ट कृति थी। लेकिन कुछ और बौद्धिक उत्कृष्ट कृतियों की तरह ही यह एक विस्तृत और परिष्कृत शिल्प था जिसकी नींव एक आदिम मिथ्या अवधारणा थी। 
... विचारों के क्षेत्र में मार्क्स की अंतर्दृष्टि, उनके इतिहास के सिद्धांत के साथ, न केवल विभिन्न कालों में बहुआयामी क्षेत्रों में अपनी धाक जमाए रखी है, बल्कि पूँजीवाद की फलती फूलती समृद्धि और समाजवाद के आर्थिक पतन दोनों के दरम्याँ बची रही है। प्रमाण और तर्क के क्षयकारी प्रभावों से अभेद्य यह बुद्धिजीवियों की जमात के बीच स्वयंसिद्ध सी हो गई है। 
लेकिन अर्थशास्त्र के क्षेत्र में मार्क्स का क्या योगदान था? योगदान केवल प्रस्ताव पर नहीं बल्कि स्वीकार पर भी आधारित होता है, और आज के अर्थशास्त्र में कोई प्रमुख आधार वाक्य, मत, सिद्धांत या विश्लेषण यंत्र मार्क्स की रचनाओं से नहीं आया है। यह नकारने की कोई जरूरत नहीं है कि कई अर्थों में मार्क्स उन्नीसवीं सदी के एक प्रमुख इतिहास पुरुष थे, जिनकी लम्बी छाया इक्कीसवीं सदी की दुनिया पर अभी भी पड़ रही है; फिर भी शायद यह कहना कठोर हो, अर्थशास्त्र प्रोफेसनल के लिहाज से, जैसा कि प्रो. पॉल सैमुएल्सन ने कहा है, मार्क्स एक "अदने उत्तर-रिकार्डियन" थे। थॉमस सोवेल्ल, ऑन क्लासिकल इकोनॉमिक्स [येल, 2006] पृ.184-186 


"तुम जो आ रहे हो, हर आशा का त्याग कर दो"      
दांते एल्लीघीरी, द डिवाइन कॉमेडी, इंफर्नो, 3:9  
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कार्ल मार्क्स (1818-1883) के पास नैतिकता का सिद्धांत नहीं था; उनके पास इतिहास का सिद्धांत था। इस प्रकार, मार्क्सवाद सही या ग़लत का सिद्धांत न होकर इतिहास में क्या घटेगा इसका सिद्धांत था। मार्क्स उन लोगों के प्रति निन्दा भाव रखते थे जो बात, वस्तु या तथ्य को नैतिक अवधारणाओं से परखते थे। लेनिन, स्टेलिन, माओ, कास्त्रो, हो और डेनियल ओरटेगा की अपने कृत्यों के प्रति अवधारणा के बावजूद भी जब कट्टर अनुयायी यह कहते हैं कि मार्क्सवाद वास्तव में कभी 'आजमाया' नहीं गया, वे यह नहीं समझते कि मार्क्सवाद व्यवहार या कर्म के कार्यक्रम का कोई नियम नहीं बल्कि निश्चयात्मक क्रियातंत्र का सिद्धांत था, यह क्रियातंत्र भविष्य का 'उत्पादक' होने वाला था, ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण सहज स्वाभाविक तरीके से उठ खड़े होने वाली क्रियाओं का सिद्धांत -- हालाँकि हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि लोग , जिनमें हम भी सम्मिलित हैं,  किस तरह के कर्म करेंगे -- जैसा कि,  मार्क्स ने कहा था कि उनके काम का उद्देश्य संसार को केवल समझना नहीं, बदलना था। (जारी)
पूर्वानुमति के बाद  डा. केली रॉस के अंग्रेजी लेख   के अंश का ब्लॉग लेखक द्वारा अनुवाद