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रविवार, 11 अक्टूबर 2015

सनातन मांस

रामायण, वैदिक छान्दस, ब्राह्मण और उपनिषदों की भाषा पाणिनि के व्याकरण से कई स्तरों पर मुक्त है। 1500 ई.पू. में सृजन या प्राक् आर्यभाषा जैसे ऐतिहासिक हास्य प्रकरण छोड़ देने पर और ध्यान से पढ़ने पर किसी भी खुली बुद्धि वाले को यह लग जाता है वेदों की भाषा बहुत पुरानी है, इतनी कि उसके कई शब्द, धातु, प्रयोगादि वर्तमान में रूढ़ प्रयोगों से पूर्णत: भिन्न हैं - सन्दर्भ में भी और अर्थ में भी।

कल देर रात एक मित्र से वार्ता हुई और उसके पश्चात मैं काण्व शाखा के शतपथ ब्राह्मण को पढ़ता रहा। चेतना का जो स्तर वहाँ है, उसे हम क्यों नहीं देख पाते या क्यों उपेक्षित कर निरर्थक ही बहस करते रहते हैं? आँखें भर आईं। वास्तविकता यह है कि जिसे केवल ब्राह्मणों का प्रपंच मान प्रचारित किया जा रहा है, वह पूरी मानव सभ्यता की गौरवपूर्ण थाती है। स्वतंत्रता के पश्चात अब जब कि सब कुछ सब को उपलब्ध है, अध्ययन से हम आम जन क्यों कतराते हैं? पहले भी करता रहा हूँ, आज भी शेयर करता हूँ। इसमें मेरा कुछ भी नहीं, संस्कृत के विद्वानों का बताया हुआ है।

'मांस' नपुसंक लिंगी शब्द है। प्रथमा से पंचमी विभक्ति तक इसका अर्थ किसी भी फल या कन्द का गूदा होता है। वाल्मीकि के रामायण को पढ़िये तो विचित्र प्रयोग सामने आते हैं - गजकन्द, अश्वकन्द आदि। उनके गूदे के लिये मांस शब्द का प्रयोग किया गया है। अब यदि कोई मार्क्सवादी उनका अर्थ यह लगाता हो कि राम के समय में हाथी और घोड़े का मांस खाया जाता था तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। वास्तविकता यह है कि भिषगाचार्य और वैद्य मृत पशुओं के शरीर का भी अध्ययन करते थे। पहचान सुनिश्चित करने के लिये कन्द विशेष के गूदे के रंग, बनावट आदि की समता के आधार पर जंतुओं के नाम पर आधारित नाम का प्रयोग करते थे। वे लोग आज के नागर जन की तरह परिवेश से कटे हुये नहीं थे। उनके लिये वन प्रांतर पड़ोस की सचाई थे और उद्योग क्षेत्र भी। सही शब्द 'माम्स' है जो कि मांस हो गया वैसे ही जैसे सम्स्कृत संस्कृत हो गयी। तो ये जो माम् स है वह किसी भी आहार के लिये प्रयुक्त था। आहार वह जो प्राण की निरंतरता सुनिश्चित करे। प्राणी वह जो प्राण(वायु) के रूप में श्वास ले। साँसों के नियमन के लिये प्राणायाम अर्थात प्राण का आयाम विस्तार।

लौकिक या वैदिक संस्कृत हमें मनुष्य की निरंतर ऊर्ध्व होती चेतना से परिचय कराते हैं। आहार के रूप में वनस्पतियों की श्रेष्ठता सिद्ध होने के पहले एक बहुत ही लम्बी और जटिल कालयात्रा रही है जो कि समझ की भी यात्रा रही है। शतपथ ब्राह्मण का ही एक भाग बृहदारण्यक उपनिषद है। उसमें एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रश्नोतरी प्रेक्षण है: 
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 जैसे वृक्ष, वैसे मनुष्य। यह सत्य है। उसके रोम. इसकी पत्तियाँ; उसकी त्वचा इसकी छाल; उसकी त्वचा से रुधिर बहता है तो इसकी छाल से रस। इसलिये एक घायल मनुष्य से निकलता रुधिर वृक्ष की चोटिल छाल से टपकते रस के समान है। उसका मांस इसका भीतरी भाग है। उसकी पेशियाँ इसकी भीतरी मज्जा हैं। उसकी अस्थियाँ, इसकी लकड़ी हैं। उसकी अस्थिमज्जा भी इसके समान ही है।

तो हमारे पुरनिये (मूलनिवासी, आर्य, द्रविड़, बाबू साहब, दलित जी, यादो जी आदि सबके) संसार को इस दृष्टि से देखते थे। पिछड़े थे बेचारे, हम लोग बहुत विकसित हो गये हैं, हमारी चेतना का चरम बीफ पार्टी है। है कि नहीं?

भरद्वाज ने भृगु से पूछा - वृक्षों में जीवन है या नहीं? भृगु ने उत्तर दिया - जीवम् पश्यामि वृक्षाणाम्, अचैतन्यम् न विद्यते! वृक्षों में (मैं) जीव देखता हूँ, उन्हें अचैतन्य मत जानो। (महाभारत शांति पर्व)। यह आप्तवाक्य है, प्रमाण है। सनातन परम्परा के दो पुरनियों ने बताया है।

वापस आते हैं माम् स पर जिसका एक रूप मांस भी है। एक शब्द और भी है - माष। ऊड़द को माष कहा जाता था। माष और दधि का मिश्रण कहलाता था मांस अर्थात बलि अन्न। बलि का अर्थ आजकल काली माई के आगे बकरा भैंसा, गड़ासा और रक्तपात से लगाते हैं। है कि नहीं?

बलि का सम्बन्ध आहार से है लेकिन वह मामूली आहार नहीं है। यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे के अनुसार अपने प्राण पोषण के लिये दी गयी बलि समूचे परिवेश के लिये भी पोषक होनी चाहिये। बलिवैश्वादि का अर्थ यही है। बिना बलि दिये आहार नहीं लेना अर्थात बिना समर्पित किये खाना नहीं! तुमहिं निवेदित भोजन करहीं का भक्तिभाव भी वही है।
तो आप की जो रसोई है न – रसभरी रसायन वाली अर्थात जो जीवन के लिये आवश्यक रसों की शरीर में पूर्ति करती है; वह शूना है। शूना अर्थात बलिस्थान :) सिलबट्टा शूना है, चूल्हा शूना है, पात्र शूना है ... जहाँ ‘अग्निदेव’ को भीतर की ‘जठराग्नि’ को तृप्त करने हेतु बलि दी जाती है। समझे कि बलिवैश्वादि का वैश्वानर अर्थात दहकते अग्नि से क्या सम्बन्ध है?

हाँ तो माष और दधि = मांस अर्थात बलि ‘अन्न’, पशुमांस नहीं। यज्ञ पूर्णाहुति के समय ‘दिक् पाल’ बलि दी जाती है। कैसे? दस दिशाओं में ऊड़द, मसूर, दधि आदि के मिश्रण को पीपल के पत्ते पर रख कर दीप जला बलि दी जाती है। हमारे दिक्पाल भी मांस खाते हैं। है कि नहीं बहुबंस बाबू?
शतपथ की यजन् भाषा देखिये:
 गोधूम+यव (गेहूँ और जौ) का मिश्रण = लोम
इनका गूँथा गीला आटा = त्वचा
 भुना या तला आटा = मांस
हरा जौ = तोक्म
 तोक्म अर्थात त्वचा से यव वैसे ही घिरा है जैसे मांस त्वचा से।
 यथा तोक्म शब्देन यवा विरूदा उच्चते, तोक्यानि मांसम्!
बृहदारण्यक में ही एक कर्मकांड का वर्णन है जिसमें इच्छित संतान की प्राप्ति के लिये विभिन्न उपाय बताये गये हैं। जिसे आधार बना कर यह कहा जाता है कि उसमें बछड़े और बैल का मांस खाने को बताया गया है। आज के समय में उपलब्ध मूल पाठ लगा दिया है ताकि सुविधा रहे।
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‘ओदन’ कहते हैं भात को (बनाने की विधियाँ और सान्यता अलग अलग हो सकती हैं)। कर्मकांड के अनुसार गोरा और एक वेदज्ञाता पुत्र चाहिये तो दम्पति क्षीरौदन का सेवन करें अर्थात दूध में बने ओदन का। कपिल पिंगल वर्ण का दो वेदों का ज्ञाता पुत्र चाहिये तो दही भात का सेवन करें। श्याम वर्ण लाल आँखों वाला तीन वेदों का ज्ञाता पुत्र चाहिये तो पानी में बने ओदन का सेवन करें। यदि पंडिता पुत्री चाहिये (हाँ, फेमिनिस्टों! पुत्री प्राप्ति के लिये भी कर्मकांड है) तो तिल के साथ बने भात का सेवन करें। एक बात ध्यान रखें कि यहाँ तक कहीं भी मांस खाने को नहीं कहा गया है। 

अब आइये आगे। समिति योग्य सर्ववेदज्ञाता पुत्र चाहिये तो ... तो, तो... महाविद्वान मरकस बाबा के अनुयायी अनुसार बछड़े और बैल के मांस वाला ओदन खाने को बताया गया है। कारण बताये गये हैं तीन शब्द – मांस (माँस है, मांस नहीं। तो चन्द्रबिन्दु से क्या अंतर पड़ता है, अवैज्ञानिक लिपि का दोष), औक्षेण और वार्षभेण (उक्षा का एक अर्थ बैल है और वृषभ माने भी बैल) अर्थात विद्वान जी की मानें तो चन्द्रबिन्दु से कोई अंतर नहीं पड़ता और दो बार बैल का पर्यायवाची लिखा गया जिसमें से किसी एक का अर्थ बछड़ा हो जाता है। नहीं? J भैया जी! सर्ववेद का अर्थ चार वेदों से है। चौथा है अथर्वण, वही जिसे वैद्यकी से जुड़ा बताया जाता है। वैद्यकी का एक ग्रंथ है जिसे सुश्रुत का रचा बताते हैं। 
मासं पर ध्यान गया? मांंस नहीं, मासं है, दोनों द्वारा मास अर्थात महीना भर ब्रह्मचर्य पालन के पश्चात ही संतान प्राप्ति हेतु युगनद्ध होने को कहा है!  
उसमें महराज लिखे हैं कि सुपुत्र की प्राप्ति के लिये पुरुष को दूध, भात, मक्खन और स्त्री को तेल एवं माष से बने भोजन का सेवन करना चाहिये। चमका कुछ? माँस (मांस नहीं) माष है। उक्षा माने बैल नहीं होता? होता है भैया लेकिन उसका एक अर्थ सोम भी होता है। वही सोम जिसे आप लोग मिथकीय विलुप्त औषधि बताते हैं। आकाश से भी वृषाकपि सोम बरसाते हैं और धरा उक्ष हो जाती है माने कि भीग जाती है! बैल जी और भीगने का सम्बन्ध दास कैपिटल में नहीं मिलेगा! 
वह जो अश्वकन्द गजकन्द वाले मांस की बात की थी न मैंने? कहाँ थी? रामायण में न? रामायण किस कुल का वर्णन करता है? इक्ष्वाकु कुल का न? पूरबिया सूर्यवंशी इक्ष्वाकु कुल वेदों की किस शाखा का पोषक था? अथर्वण शाखा का न? वह रामायण में जो सारे भारत की प्रमुख औषधियों सॉरी, वनस्पतियों का वर्णन है वह अकारण ही नहीं है। समझ में आ गया न? 
लेकिन वह वार्षभेण? वृषभ वाला? हाँ भई, ऋषभकन्द भी औषधीय गुण वाला था जिसका मांस सॉरी गूदा बैल के माफिक गन्धाता था, होता भी वैसे ही था, एक ठो ऋषभक भी होता है। देवी को जो मधु समर्पित करने को लिखा है न वह माधवी सुरा नहीं, मधु ही है जिसमें ईक्ष अर्थात गन्ने का रस भी मिला हो। देवी ऐसे ही नहीं हाथ में मधुतृण अर्थात गन्ना थामे होती हैं। यह ईक्षुदंड बाद में यक्षदंड हो गया। उसका फसली अर्थात ऋतु से भी सम्बन्ध है।
अब आखिर में आप के लिये एक ठो नारीमेध छोड़े जाता हूँ। 
ततोवरो वध्यादक्षिण स्कन्धोपरि हस्तं नीत्वाममब्रते स्तिस्व पठित मंत्रेण तस्थाहृदयमालभते। 
विवाह वेदी पर दूल्हा स्त्री के दायें कन्धे को पकड़ देह काट उसका हृदय निकाल लेता है (और अपने कुल में मंत्र पढ़ते हुये बाँट देता है)! 

हो गया न नारीमेध? स्त्री की बलि?? अब आप का एक लेख तो बनता ही है, ‘हिन्दुओं’ में जारी नारी शोषण पर जो कि उस कारिका से आता है जिसमें स्त्री के प्रति इतनी हिंसा का भाव है! नहीं?? शुरू हो जाइये।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

नववर्ष

आज नववर्ष का पहला दिन है - विक्रमी संवत 2070 के प्रथम मास चैत्र के शुक्ल पक्ष की पहली तिथि यानि प्रतिपदा। आदि काल से ही सूर्य की आभासी गति और ऋतुओं के सम्बन्ध को मनुष्य जानता समझता चला आया है। भारत के मनीषि प्राकृतिक व्यवस्था को बहुत उदात्त रूप में देखते थे और उसे एक अर्थगहन नाम दिया – ऋत। रीति-रिवाज की 'रीति' भी इसी ऋत से आ रही है।
ऋत व्यवस्था में किसी निश्चित कालावधि को उसमें निश्चित बारम्बारता में होने वाले परिवर्तनों, जलवायु और दैहिक प्रभाव लक्षणादि के आधार पर 'ऋतु' नाम दिया गया। शस्य यानि कृषि का सम्बन्ध भी ऋतु चक्र से है। भारत में छ: ऋतुयें पायी गयीं - वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर और हेमंत। इनमें वसंत पहली ऋतु थी।
इस ऋतु में वनस्पतियाँ पुराने वसन यानि पत्तियों रूपी वस्त्र का अंत कर नये धारण करती हैं। समूचे जीव जगत में नये रस का संचार होता है इसलिये इस समय को नवरसा भी कहा गया। घास पात तक फूलों से लद जाते हैं इसलिये वसंत कुसुमाकर भी कहलाता है। वैदिक युग में वसंत से प्रारम्भ हुआ एक वर्ष संवत्सर कहलाता था। अथर्ववेद के तीसरे मंडल की संवत्सर प्रार्थना में नववर्ष प्रारम्भ का बहुत ही  अलंकारिक वर्णन है जिस पर विस्तार से चर्चा फिर कभी।
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उत्तरी गोलार्द्ध की पुरानी सभ्यताओं ने जाना कि वर्ष में जिन दो दिनों में दिन और रात बराबर होते हैं उनमें से एक वसंत ऋतु में पड़ता है। काल के पहेरू पुरोहितों ने नवरस के इस दौर को उत्सवों और अनुष्ठानों का रूप दे दिया। चूँकि इस विषुव दिन का सटीक प्रेक्षण आसान था और फसलों के कटने पर अन्न भी घर में आता था जिससे ढेरों आर्थिक व्यापार भी जुड़े थे, इसलिये जनता ने भी इसे स्वीकार किया और इस दिन से नया वर्ष और उसके आसपास के कालखंड में उससे जुड़े उत्सव प्रारम्भ होने लगे।
वैश्विक प्रसार वाले आज के ईसाई ग्रेगरी सौर कैलेंडर में यह दिन 20 मार्च को पड़ता है।
भारत गणतंत्र के आधिकारिक राष्ट्रीय शक संवत का पहला दिन चैत्र 1 भी वसंत विषुव के अगले दिन से प्रारम्भ होना निश्चित किया गया जब कि पुराने समय में कभी सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता था।

ग्राफिक्स आभार: http://www.carnaval.com/precession/
ग्राफिक्स आभार: http://www.carnaval.com/precession/
20/21 मार्च को वसंत विषुव मान कर राष्ट्रीय शक संवत को 22 मार्च के दिन से प्रारम्भ होना तय किया गया हालाँकि पृथ्वी के घूर्णन अक्ष की लगभग 26000 वर्ष लम्बी आवृत्ति वाली एक गति के कारण इस दिन अब सूर्य मीन राशि में होता है। आगे के कुछ सौ वर्षों में यह खिसकन कुम्भ राशि पर  पहुँच जायेगी।
 
ग्राफिक्स आभार: http://www.carnaval.com/precession/
सन् 1582 में हुये ईसाई कैलेंडर संशोधन में  गिनती के 11 दिन कम कर दिये गये। उसके पहले जो नववर्ष 1 अप्रैल को मनाया जाता था, उसे 1 जनवरी से प्रारम्भ किया जाने लगा। कैलेंडर संशोधन के बाद भी जिन लोगों ने 1 जनवरी के बजाय 1 अप्रैल को ही नववर्ष मनाना जारी रखा उन्हें तिरस्कार स्वरूप 'मूर्ख' संज्ञा दी गई और April Fool की परम्परा प्रचलित हुई जिसने बाद में वसंत विषुव पर्व से जुड़े मोद मनाने की पगान विधियों से जुड़ कर एक दिन के उत्सवी नयेपन को जन्म दिया।
ईसाई कैलेंडर पूर्णत: सौर गति पर आधारित है जब कि भारत  का पारम्परिक पंचांग आदि काल से ही सूर्य और चन्द्र दोनों गतियों से निर्धारित होता रहा। दिन में चलते दिखते सूर्य के पथ को रात के आकाश  में 27  तारासमूहों (नक्षत्रों) में बाँट दिया गया। सौर पंचांग वालों ने इसे 12 भागों यानि राशियों में बाँट रखा था। दोनों की संगति बैठाने में 12 महीनों के नाम 27 नक्षत्रों में से उन 12 के आधार पर रखे गये जिन पर कि पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा होता था जैसे चित्रा (spica) पर हो तो चैत्र, विशाखा पर हो तो वैशाख आदि। मास निर्धारण की दो पद्धतियाँ प्रचलन में आईं - अमांत और पूर्णिमांत। अमांत यानि अमावस्या के दिन महीने का अंत, पूर्णिमांत यानि पूर्णिमा के दिन। इनके अनुसार वसंत ऋतु (Spring) का विस्तार आधा फागुन+चैत्र+आधा वैशाख या चैत्र+वैशाख तक होता है। पारम्परिक पंचांग के महीने चन्द्र आधारित होने के कारण इसमें लम्बी कालावधि में वसंत विषुव की राशियों पर खिसकने से जुड़ी नाम निर्धारण वाली समस्या नहीं है। इसमें हर तीसरे वर्ष अधिकमास के संयोजन द्वारा वर्ष के अंतर को भी समायोजित कर लिया जाता है साथ ही यह भी सुनिश्चित रहता है कि किसी भी महीने की पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा उसके नाम से सम्बन्धित नक्षत्र राशि में ही होगा।  
ईसाई कैलेंडर, भारतीय पंचांग, महीने, ऋतुयें और प्रमुख पर्वों का यह इस्कॉन संस्था द्वारा दिया गया ग्राफिक्स संकलन उपयोगी है:  
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वसंत को दिया गया महत्त्व उल्लेखनीय है कि संवत्सर या वर्ष के प्रारम्भ और अंत इसी ऋतु में रखे गये हैं। फाल्गुन का होलिका दहन भोजपुरी क्षेत्र में 'सम्हति फूँकना' कहलाता है। सम्हति संवत का ही बिगड़ा रूप है। यह दहन प्रतीकात्मक रूप से जाते हुये संवत का है जिसमें मन और देह के सारे मैल जला दिये जाते हैं। अगला दिन रंगपर्व नये रंग से अस्तित्त्व रँगने का प्रकृति से जुड़ा विधान है। चन्द्रमा के एक पक्ष यानि चौदह दिनों के अंतराल के पश्चात शुक्ल पक्ष के प्रारम्भ में होने वाला नवरात्र आयोजन आगामी वर्ष के लिये स्वयं को तैयार करने का तप आयोजन है। रबी की फसल का अन्न घर में आ जाता है तो राम जी की कृपा से आये नये अन्न के स्वागत में रामरसोई सजती है रामनवमी के दिन जब कि नये आटे से बने व्यंजन पहली बार खाये जाते हैं। वैदिक युग के नये सत्र आयोजन भी ऐसे ही पुरोहित, कृषक और व्यापारी वर्ग द्वारा संयुक्त रूप से किये जाते थे। दुर्गा पूजा की परम्परा की साम्यता ढूँढ़े तो हम पाते हैं कि स्त्री शक्ति की कल्पना अथर्वण संहिता की संवत्सर प्रार्थना में भी है।
 
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पश्चिम भारत में यह दिन वृहद आयोजन का होता है और इसे गुड़ी/ढी पड़वा कहते हैं। 'पड़वा' संस्कृत के प्रतिपदा का ही प्राकृत 'पड्डवा/वो' से हो कर आया रूप है। प्रकृति के विभिन्न स्वादों को मिश्री, नीम पत्ती, आम्र मंजरी के रूप में इकठ्ठा कर जरी के रंगीन कपड़े में बाँस के सिरे पर बाँध दिया जाता है। उसके ऊपर फूलमाला और चाँदी, ताँबा या पीतल का लोटा उलट कर रख दिये जाते हैं। सौभाग्य आगमन के सूचक इस प्रतीक 'गुढी' को ऊँचाई या खिड़की पर प्रदर्शित किया जाता है। कोंकण क्षेत्र में यह प्रतिपदा यानि पड़वा 'संसर पाडवो' नाम से मनायी जाती है। 'संसर' संवत्सर का अपभ्रंश है।  
 सिन्धी लोग चैत्र माह में शुक्ल पक्ष के पहले चन्द्र दिन को 'चेटि चाँद' नाम से मनाते हैं। कश्मीरी पंडित नवरस का यह उत्सव 'नवरेह' नाम से मनाते हैं।
  दक्षिण में यह पर्व 'उगाडि' या 'युगाडि' नाम से मनाया जाता है जो कि संस्कृत 'युगादि' यानि युग के प्रारम्भ का द्योतक है।
उल्लेखनीय है कि 'युग' शब्द का प्रयोग संवत्सर के लिये भी होता है। यहाँ युग का संकेत वर्ष में छ: छ: महीने के  उन दो अर्धांशों से है जिनमें सूर्य क्रमश: उत्तरायण और दक्षिणायन होते हैं। वैदिक युग में पाँच वर्ष का काल युग कहलाता था।  
कालांतर में ज्योतिष गणना में वृहस्पति और शनि गतियों के संयोग ने संवत्सरों को नाम देने का चलन प्रारम्भ किया। बारह राशियों के चक्र को पूरा करने में वृहस्पति को 12 वर्ष लगते हैं जब कि धीमे यानि शनै: चलने वाले शनैश्चर शनि को 30 वर्ष। इनका लघुत्तम समापवर्त्य (LCM – Lowest Common Multiple) है - 60। हर साठवें वर्ष वृहस्पति और शनि वर्ष की प्रारम्भ राशि मेष पर एक साथ होते हैं, इसलिये 60 संवत्सर नामों का चक्र चलता है। वाराहमिहिर के पहले तक यह चक्र 'विजया' नाम से प्रारम्भ होता था, उनके बाद 'प्रभाव' नाम से प्रारम्भ होने लगा। वर्ष  2070 वि. का नाम है 'पराभव'। 

इस वर्ष समस्त अशुभ का पराभव हो। नववर्ष आप के लिये मंगलमय हो। 
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ॐ
एक पुराना लेख यह भी : नवरसा 
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