गुरुवार, 5 जनवरी 2012

मैं तुम्हें लिखता हूँ।

जब तुम्हें लिखता हूँ, स्वेद नहीं, झरते हैं अंगुलियों से अश्रु। सीलता है कागज और सब कुछ रह जाता है कोरा (वैसे ही कि पुन: लिखना हो जैसे)। जब तुम्हें लिखता हूँ।
  
नहीं, कुछ भी स्याह नहीं, अक्षर प्रकाश तंतु होते हैं (स्याही को रोशनाई यूँ कहते हैं)। श्वेत पर श्वेत। बस मुझे दिखते हैं। भीतर भीगता हूँ, त्वचा पर रोम रोम उछ्लती है ऊष्मा यूँ कि मैं सीझता हूँ। फिर भी कच्चा रहता हूँ (सहना फिर फिर अगन अदहन)। जब तुम्हें लिखता हूँ।

डबडबाई आँखों तले दृश्य जी उठते हैं। बनते हैं लैंडस्केप तमाम। तुम्हारे धुँधलके से मैं चित्रकार। फेरता हूँ कोरेपन पर हाथ। प्रार्थनायें सँवरती हैं। उकेर जाती हैं अक्षत आशीर्वादों के चन्द्रहार। शीतलता उफनती है। उड़ते हैं गह्वर कपूर। मैं सिहरता हूँ। जब तुम्हें लिखता हूँ।

हाँ, काँपते हैं छ्न्द। अक्षर शब्दों से निकल छूट जाते हैं गोधूलि के बच्चों से। गदबेर धूल उड़ती है, सन जाते हैं केश। देखता हूँ तुम्हें उतरते। गेह नेह भरता है। रात रात चमकता हूँ। जब तुम्हें लिखता हूँ।

जानता हूँ कि उच्छवासों में आह बहुत। पहुँचती है आँच द्युलोक पार। तुम धरा धरोहर कैसे बच सकोगी? खिलखिलाती हैं अभिशप्त लहरियाँ। पवन करता है अट्टहास। उड़ जाते हैं अक्षर, शब्द, वाक्य, अनुच्छेद, कवितायें। बस मैं बचता हूँ। स्वयं से ईर्ष्या करता हूँ। जब तुम्हें लिखता हूँ।

न आना, न मिलना। दूर रहना। हर बात अधूरी रहे कि जैसे तब थी और रहती है हर पन्ने के चुकने तक। थी और है नियति यह कि हमारी बातें हम तक न पहुँचें। फिर भी कसकता हूँ। अधूरा रहता हूँ। जब तुम्हें लिखता हूँ।

तुम्हें चाहा कि स्वयं को? जीवित हूँ। खंड खंड मरता हूँ।  साँस साँस जीवन भरता हूँ। मैं तुम्हें लिखता हूँ।

तुम्हारा गीत फिर फिर तुमसे ही कहता हूँ  ... जा रे हंसा कागा देश!
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रविवार, 1 जनवरी 2012

... लेकिन वैसा होता कहाँ है?”

“तुम किस्से गढ़ते हो, मेरी कहानी भी कहो न! उसे तो गढ़ना भी नहीं पड़ेगा।“

“गढ़ना आसान होता है और सच असम्भव।“
“सच तो सीधा सा होता है, बस कह दिया।“

“यहीं समस्या है। कहने वाले सीधे नहीं होते। वे तो कहते हैं कि सच जैसा कुछ होता ही नहीं। जानते हो समस्या क्या है? ....सीधे सादे लोग कहानियाँ नहीं कहते। कहने वाले हमेशा कुटिल और छलिया किस्म के लोग होते हैं। अंतस के स्याह को चाँदी के वर्क में लपेटते हैं और किसी सादी सी बात पर चिपका देते हैं। उसके पहले सादेपन को सोनापन दे चुके होते हैं।“
“अच्छा!”

“हाँ, देखो न! आसमान लाल होता है। चिड़ियाँ चहकती हैं। सूरज उगता है। उजाला होता है। - अब ये कितनी सादी सी बात है, रोजमर्रा की। इस पर किसी सीधे सादे इन्सान ने कुछ कहा क्या? नहीं, लेकिन एक पंक्ति की इस बात पर पूरे संसार में एक लाख गीत कवितायें और साढ़े छप्पन हजार कहानियाँ और इतने ही मन्तर, संतर, टोटके वगैरह हैं। कुटिल प्राणियों ने जाने क्या क्या जाने कितने जतन से लिख मारा!”
“तुम इतने निश्चित कैसे हो? मेरा मतलब संख्याओं से हैं।“

“चूँकि मैं किस्से गढ़ता हूँ इसलिये निश्चित हूँ। तुम्हें भरोसा न हो तो गिन लो – ठीक उतनी ही गीत कवितायें वगैरह मिलेंगी।“
“तो मेरी कहानी नहीं कहोगे?”

“ऐसा मैंने कब कहा? मैं तो बस तुम्हारी गढ़न वाली बात पर तुम्हें समझा रहा था।“
“तो मेरी कहानी बिना गढ़न के लिखना।“

“देखो! तुम्हें अपनी कहानी स्वयं नहीं पता। ऐसे समझो कि सुबह जब कलेवा कर काम पर निकलते हो तो क्या बात उतनी ही भर होती है? ... नहीं होती। अब जो तुमसे देखना बच गया है, वह मुझे कैसे दिखेगा? ... तो मैं गढ़ूँगा। बिना गढ़े कहानी नहीं कही जा सकती।“
“यह तो आसमान, चिड़ियाँ, सूरज और उजाले पर भी लागू होता है? फिर तुमने उन्हें सादी सी बात क्यों कहा?”

“इसलिये कि तुम्हें समझाना था कि हम कैसे कहते हैं।“
“यह तो छल है।“

“एकदम। मैं यही तो कह रहा हूँ कि कहने वाले हमेशा कुटिल और छलिया किस्म के लोग होते हैं।“
“मुझे अपनी कहानी नहीं कहवानी।“

“यह तुम्हारी सीमा है कि तुम स्वयं नहीं कह पाओगे। उसके आगे तुम्हारा जोर नहीं। मैं तुम्हारी कहानी कहूँगा। तुम्हें मेरा कृतज्ञ होना चाहिये कि मैं तुम्हारी बात मान रहा हूँ।“

“मुझे तुमसे बोलना ही नहीं था।“

“वही तो! संसार में सब चुप हो जायँ तो कहानी कैसे कही जा सके? ... लेकिन वैसा होता कहाँ है? ...बोलना चुप रहने से अच्छा लगता है और कहना सुनने से। बस इसी में तो हम गढ़ने वालों की चाँदी है।”    

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

केश और बाल

केश कटाने हैं। वह बाल नहीं कहता, पुरबिया भाभी खी खी कर हँसती है और फिर मजाक उड़ाती है – बाबू, आप के सिर पर बाल! खी, खी, खी....
कॉलोनी के इलाके में दस रुपये से लेकर सत्तर रुपये में केश कटते हैं। वह सत्तर वाले एयर कंडीशंड सैलून में जाता है, जिसका नाम है dews बोर्ड पर पानी की बूँदों के चित्र देख उसके भीतर का बजबजाता आभिजात्य नाली के किनारे के कुर्सी बरसाती सैलून से अपने को अलग समझता है जहाँ मज़दूरों के केश कटते हैं, नहीं बाल बनते हैं।     
Dews में एक बार आरामकुर्सी पर बैठ जाओ तो उठने का मन नहीं करता। अगल बगल धीमी रोशनी फेंकते एल ई डी होते हैं, सब सफेद चकाचक। लड़के फूल से महकते हैं और हमेशा इलायची चबाये रहते हैं। उनके हाथ रमणियों जैसे होते हैं जो केशों में कैंची कुशल सर्जन की तरह चलाते हैं। आध घंटे लग जाना आम बात है।

लेकिन आज dews में भीड़ थी, वह ग़लत समय पहुँच गया था। उसे इंतज़ार करना बुरा लगता है। इंतज़ार वह भी ऐसे टुच्चे काम के लिये! नहीं।
जाने लोगों के पास कितना पैसा हो गया है, यहाँ भी भीड़ हो जाती है!
बाहर टहलते टहलते वह कुढ़ता रहा, बेचैन होता रहा – इन्हें मेंहदी आज ही लगवानी थी और उसे आज ही फेस मास्क चढ़वाना था!
सामान्य सी बातें भी चिढ़ाती रहीं क्यों कि उनके कारण देर हो रही थी - कमबख्त लड़के भी मीठी मीठी बातें कर जेब काटते हैं, तीन चार सौ का बिल आम है। 
जाने कब वह नाली के किनारे हजामों की उस कुर्सी कतार के पास पहुँच गया जहाँ मज़दूर बाल बनवाते हैं। वह कुर्सी पर बैठ गया जो काठ की थी और जिसकी एक बाँह दुर्घटनाग्रस्त थी।
“डिटॉल है तुम्हारे पास?”
हजाम ने जवाब दिया – हाँ साहेब! अब मजूरा लोग भी यह सब माँगते हैं, यह देखिये।
भीतर डिटॉल का दुधिया घोल था लेकिन शीशी बहुत गन्दी थी। चोर नजरों से उसने हजाम के हाथ को देखा तो शिवमंगल की याद हो आई। गाँव के खानदानी नाऊ – केश काटते तो कई दफे लगता कि बाबा सिर सहला रहे हैं! इस हजाम के भी हाथ वैसे ही थे – खुरदरे, बेवाई भरे जिनसे कर्मों की राख झाँक रही थी।
प्रकट में उसने कहा – कैंची, उस्तरा सब डिटॉल से धो दो। मैं दूना दाम दूँगा। ब्लेड तो नया है न?
हजाम ने वैसा ही किया। तौलिया साफ थी लेकिन कुचैली थी जिस पर वह मैल थी जो रीठ जाने के कारण जबरजोर धुलने पर भी नहीं जाती – पुरायठ कभी छूटता है भला?
उसने अपनी जेबें टटोलीं – रुमाल घर छूट गया था।
कैंची चलने लगी और बाहर सड़क के शोर और अगल बगल की चखचख के बावजूद वह भीतर खामोश होता चला गया। शिवमंगल कितना बतियाते थे! सारे गाँव इलाके की खबर दे देते और हमलोगों से शहर की खबरें ले भी लेते। यह बूढ़ा इतना चुप क्यों है? जब कि इसके हाथ एकदम शिवमंगल जैसे हैं। कैंची जैसे खोपड़ी को दुलरा रही है।
इशारे से रोक कर उसने हजाम को देखा। कोई फर्क नहीं।
“क्या हुआ साहेब?”
“कुछ नहीं। यहीं के हो?”
“नहीं, गाँव से।“
उसने आगे नहीं पूछा क्यों कि आगे की कहानियाँ उसे पता होती थीं। कैंची चलती रही। खत बनाने को उस्तरे का नम्बर आया और कनपटी के पास कट गया।
हजाम हाथ से डिटॉल लगाने लगा। उसके चेहरे पर खामोश घबराहट थी। खून रुक नहीं रहा था।
“साहेब, कुछ गहरा हो गया लगता है। बुढ़ाई...” । बूढ़ा छलछला गया था – आप के पास रुमाल होगा?
“नहीं, लाना भूल गया।“
उसने बूढ़े हजाम का राख भरा हाथ अपने हाथ में लिया और पुरायठ तौलिये को घाव पर जमा दिया। उसे लगा कि दोनों और खामोश हो गये थे।
“आप कुछ बोले नहीं। बाल बनाते तो आप लोग खूब बातें करते हैं?”
उसकी बात का जवाब टूटा बक्शा खोलते हाथों की कँपकपाहट ने दिया। बूढ़े ने बीस के नोट से लौटाने को दस रुपये निकाले थे।
उसने देखा – नोट बहुत मैला था – soiled .

“अरे बाबा! आप रखिये उसे।“
बक्शा वापस खुला और बन्द हुआ। कुर्सी पर एक मज़दूर बैठ गया था – जल्दी से खत बना द!
“जल्दी में ई कार न होला। हमरे लगे टैम लगी...”
हजाम बाबा सहज हो चले थे।
वह घर को लौट चला।
“बाबू! बहुत जल्दी केश कटवा आये?”
“नहीं, बाल बनवा कर आ रहा हूँ।“
उसके चेहरे के भाव देख भाभी खी खी नहीं कर पाई।       

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

शनिवार को एक लड़की से

इंजीनियरिंग कॉलेजों की हर रात उन्मुक्त होती है और बोझिल भी - यौवन के उल्लास पर अपेक्षाओं का बोझ। शनिवार की रात वास्तव में रात सी होती है – शर्वरी, हिंस्र वनचर भरी। बस जीना होता है और कुछ नहीं। छात्र हिंसा के स्तर तक उन्मुक्त होते हैं – यदि स्वाभाविकता को हिंसा कहा जा सके और छात्रावासों को जंगल, तो। जैसा कि तुम जानती हो, मुझे रात उतनी नहीं सुहाती जितनी भोर, साँझ और दिन, हाँ दिन भी। मैं प्रारम्भ में वहाँ हास्य का पात्र था लेकिन शनै: शनै: सबने मुझे स्वीकार लिया। सोते की धार जैसे कुछ धैर्यधन पत्थरों को स्वीकारती है, वैसे ही।

वह दिन शनिवार का था, जब आधे दिन के बाद मचलती आत्मायें अपनी करने को मुक्त होतीं – कॉलेज सोमवार की दुखती प्रात तक के लिये बन्द हो जाता। दुपहर के भोजन के बाद जब सब सो गये तो आदतन मैं पुस्तकालय चला गया। कुरेदने के लिये शनिवार की दुपहर से भला अवसर नहीं होता। सबसे ऊपरी मंजिल पर मध्ययुगीन कलाकृतियों की भारी भरकम पुस्तक ले मैं रंगों में साँवलापन ढूँढ़ने लगा। तुम्हारी स्मृति के गौरांग जब बेचैन कर देते तो मैं यह करता। ढलते दिन से साँझ उतरने के पहले तक वहीं निहारता रहा और बाहर आ गया।
गार्ड ने तलाशी ली तो मैंने कहा – सब कुछ मेरी आँखों में है, जेब क्यों टटोल रहे हो?
वह मुस्कुराया और बोला – क्यों कि आँखों की भूख जेबों से फटे पन्नों की शक्ल में निकलती है।
मेरे यह पूछने पर कि पिछ्ले रविवार वाली फिल्म देखी क्या, उसने हामी भरी और मैंने कहा – तभी शायर हो रहे हो।
युकेलिप्टसों की पट्टी के छोर पर पहुँच कर मैंने साँस रोकी और तेज पग पगडंडी पार करने लगा। पार होते होते दम घुट चुका था। पानी की टंकी के नीचे आकर मैंने जोर से वायु को भीतर लिया और सिगरेट के लिये पॉकेट टटोलने लगा। यह शनिवारीय कर्मकांड था। चौराहे से एक ओर दूर हाइवे दिख रहा था जहाँ गेट की रखवाली बजरंगबली के जिम्मे थी तो दूसरी ओर दूर तक आम के वृक्षों की पंक्तियाँ जो एयरफोर्स स्टेशन के जंगल में ग़ुम हो रही थीं। जगुआर और मिराज हैंगरों में विश्राम कर रहे थे और अद्भुत शांति थी। यह एकांत मुझे प्रिय था। इतना प्रिय कि सदा सामने कमरे में रहने वाला मेरा यार सदाशिव भी मुझे इस समय अकेला छोड़ देता। सड़क का झुँझला देने वाला सीधापन मुझे मीठी पीर से भर देता।
यह सड़क हाइवे से जुड़ती है और हाइवे तुम तक पहुँचने का जरिया है। मैं कितना हाई जा सकता हूँ? बजरंगबली से अमिया मोड़ तक आते आते साँझ आने का आभास देने लगी थी। सुभाष और रमन भवन गुलजार हो चले थे लेकिन जनप्रवाह गेट की ओर था। मैं जंगल किनारे अब भी एकांत में था।
गोरे दिन की जंगली आँखों में सँवराये आँसू भर रहे थे – समय रोज रुलाता है! यही वह समय था जब मैं कलवर्ट पर बैठ सामने सूने फार्म के केन्द्र में खड़े उन दो ट्रैक्टरों को रात घिरने तक सिगरेट फूँकते घूरता रहता। लगता कि अब कि तब फट फट फट फट बोल उठेंगे और वृक्षों और जंगल से घिरी आश्चर्यजनक रूप से बंजर धरती पर शस्य लहलहा उठेगी। पर वैसा कभी नहीं होता। सिगरेट चुक जाती और सँवराये आँसू नीचे धरा पर गिर चारो ओर फैल जाते। रात हो जाती टप्प से!  
इवनिंग या नाइट नहीं जिनमें कोई विभेद नहीं, साँझ और रात – स्पष्ट विभाजन। वापस चलो अब यहाँ न बैठो! मैं उदास तुम्हारी परछाईं को तलाशता वापस हो लेता – किसी शनिवार तो तुम आओगी...
लेकिन उस दिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उस दिन ठीक मेरे स्थान पर कोई बैठा हुआ था। इस समय यहाँ कोई और? मुझे आश्चर्य हुआ और फिर क्रोध भी। मेरी जगह कैसे हथिया सकता है? और कोई जगह नहीं मिली उसे? उसे मेरे दृश्य में क्या रुचि हो सकती है? निकट पहुँचने पर पता चला कि वह एक लड़की थी। जंगल को घूरे जा रही थी, जैसे खरहे निकलने वाले हों और उन्हें पकड़ना हो। मैं ठिठक गया।
लड़की? यहाँ? इस समय? मैं खाँसता सा बोल उठा – एक्सक्यूज मी। उसने नहीं सुना। मैंने दुहराया तो उसने मुड़ कर मुझे देखा – गेहुँआ रंग, बड़ी बड़ी आँखें और आती रात के घनेपन का अनुमान दिलाते केश। वह सुन्दर थी। मैं खुल गया।
“...आप को अजीब सा लगेगा लेकिन क्या आप यह जगह खाली कर देंगी?”
उसके चेहरे पर नागवारी के भाव उमड़े और चले गये।
“तुम?” हेकड़ी के अन्दाज में परिचय पूछता सम्बोधन था।
“जी, मैं स्टूडेंट हूँ। रमन भवन में रहता हूँ।“
वह नरम हुई और सुलगती सिगरेट की ओर इशारा कर कहा – फेंक दीजिये। मैं टीचर्स कॉलोनी में मेहमान हूँ। यूनिवर्सिटी में पढ़ती हूँ।
मैं अब भी असहज था जिसे उसने भाँप लिया। अलग अलग भावों ने अपरिचय के संकोच को जैसे दबोच लिया था – तो आप को यह जगह पसन्द है?
मेरा बचा खुचा संकोच छू मन्तर हो गया।
मैं यहाँ हर शनिवार को इस समय रात होने तक बैठता हूँ।“
“क्यों भला?” उसके होठों पर सहज मुस्कान थी।
“सुनेंगी तो हँसेंगी ... वास्तव में मैं यहाँ उदास होने के लिये आता हूँ... नहीं, आज का दिन ही ऐसा होता है। अगला दिन छुट्टी का जो होता है। मुझे यह समय बहुत खास लगता है।“
वह खिलखिला उठी – तो ऐसे खास समय आप वीकली उदास होने यहाँ आते हैं! लगता है किसी चक्कर में हैं।
मुझे हम दोनों के खुलेपन पर घनघोर आश्चर्य हो रहा था। भीतर कहीं उससे अधिक मैं स्वयं पर भौंचक था।
वह कलवर्ट से उतर गई – लीजिये, आप की जगह, अब खाली है।...किसी से आप के हॉस्टल में मिलना था तो आते आते यहाँ ठिठक गई। इसे समझ सकती हूँ लेकिन उदास होने के लिये नहीं। मैं सोच रही थी कि उससे मिलने ब्वायज हॉस्टल में इस समय जाना ठीक होगा क्या?
“तो आप अब हॉस्टल जा रही हैं?”
“नहीं। अब नहीं.. वापस कॉलोनी।“ उसने हाथ से इशारा भी किया।
मैं उलझ गया – ऐसा क्यों?
“आप मिल गये, समझिये वह मिल गया।“
रहस्य भरी मुस्कान लिये वह चली गयी। मैं दूर तक उसे उस पथ पर जाते देखता रहा जो बजरंगबली-अमिया रेखा के लम्बवत था और जिस पर दोनों ओर अशोक के वृक्ष लगे थे और जिसके किनारे पानी की टंकी नहीं पम्पिंग स्टेशन था।
फार्म के किनारे ट्यूबवेल अब भी सूखे थे। धरती अब भी बंजर थी। मैं कुछ अधिक ही उदास पगों से लौट चला। दृश्य निहारने का कोई अर्थ नहीं था। सिगरेट कब की बुझ चकी थी। मन में यह पंक्तियाँ उमड़ रही थीं:

साँझ आम सड़क सिगरेट

अचानक तुम ?

धुआँ गुबार दफन भीतर

लरजते आँसू रोक

तुम्हारी देह गंध

हवा में जोहता रहा

तुम दूर

बिना मुड़ कर देखे

(कहा नहीं जा रहा)

यूँ चली गई !

बस देखता रहा

कारे केश -

आग बुझी राख गिरी

कड़वाहट उतराई

याद आया वह दिन

जब पी थी

पहली सिगरेट ।


हूँ दीवाना

अकेले में अंगुलियों के पोर जोड़

होठों पर रखता हूँ

वह तुम्हारे अधरों का स्पर्श

कहाँ?

कितनी दफे वर्कशॉप जाते

अपनी खाकी को भिगो

सूँघा है

कि गंध मिल जाय तुम्हारी

कहाँवह ऊष्मा कहाँ !

दिन की जीवन लहरियां

अब काठ हैं तुम जो नहीं हो

जिन्दगी अब गन्धहीन है

मेरे कमरे के बाहर

रातरानी सूख चली है

माली कहता है

अब की गरमी

क्या लू चली है

यूँ ही भटकता हूँ

साँझ आम सड़क सिगरेट ।

सिगरेट सिगरेट

छल्ले धुआँ धुआँ

कुछ महीनों बाद किसी ने मुझसे जीवन का पहला और अब तक का आखिरी ऑटोग्राफ लिया। वही थी। सिल्वर जुबली सांस्कृतिक कार्यक्रम में यूनिवर्सिटी के दल में वह भी थी।
तुम जानती हो कि वह मेरी कौन है।
और यह भी कि तुम मेरी कौन हो।
यह कहानी तुम्हें सुनाते सुकून मिला है। जानती हो? अभी साँझ नहीं, शनिवार की सुबह चमकती धूप है। इस सप्ताहांत मैं हिंस्र हूँ, उन्मुक्त हूँ...अपनी कहो।             

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

राजू के नाम एक पत्र


अन्धपुर
दिनांक - 13/12/11

मेरे राजू!
किसी दिन तुम्हें नाम लेकर न बुला पाऊँ तो न हैरान होना और न बुरा मानना। हार्ड डिस्क का वह भाग चुकने लगा है जहाँ नाम, अंक, शब्द आदि अंकित रहते हैं। विचित्र है यह डिस्क! इसे न तो डीफ्रैगमेंट कर सकता हूँ और न फॉर्मेट। क्या करूँ
क्या करूँ जो ढेरों अनावश्यक स्मृतियाँ वैसी ही चमकती हों जैसे कल की बात हो और तुम्हारा नाम ही भूल जाऊँ? इस इंटीग्रेटेड बोर्ड पर प्रॉसेसररैम, ग्राफिक्स कार्ड, नेटवर्क पोर्ट, यू एस बी पोर्ट सब ऐसे सीमाहीन रूप से घुले मिले हैं कि रिपेयर या बदले नहीं जा सकते और यह इतना नाजुक है कि छूने से भी डर लगता है। 
बहुत बार स्वयं को संज्ञा और शब्दों से घिरा पाता हूँ। किसी घनी धुन्ध के पार से वे झाँकते से दिखते हैं, आभास भर होता है लेकिन रूपाकार स्पष्ट नहीं होते। उनकी आँखें तक नहीं चमकतींजैसे चुप टोह लगाये बैठे हों कि अब जीभ पर चढ़ जायेंगे कि तब, लेकिन .... बस वही लेकिन राजू, वही। 
 मैं दो टुकड़ा हो गया हूँ - एक हँसता, खाता, पीता, सामान्य जीता है और दूसरा भयानक रूप से भीत भटकता भरा जा रहा है। जाने वह क्या है जो भरता जा रहा है - गहन एकांत सा कुछ। उससे डर लगता है। जबरन पहला टुकड़ा और हँसने, और मजाक करने, और खाने लगता है लेकिन जीना 'और' नहीं हो पाता। दूसरे के भीतर कोई आतंकवादी प्रविष्ट हो गया है। उसकी छाया मैं कहीं और नहीं पड़ने देना चाहता।
यह तुम जानते हो राजू! कि बाहर से मैं कभी चाहे कितना भी हिंसक या दुष्ट लगूँ, असल में वैसा नहीं होता। 
 इसलिये राजू! अगर तुम्हें फोन न करूँ, सामने पड़ने पर चुप रहूँ, बोलते बोलते अचानक शांत हो जाऊँ या कोई वाक्य अधूरा छोड़ दूँ तो बुरा न मानना। यह एकदम बुरा मानने वाली बात नहीं है। यह मेरा प्यार है, तुमसे ही नहीं उन सबसे जिनके साथ और जिनमें मैं जीता हूँ। मैं किसी को कष्ट नहीं पहुचाना चाहता, मुंडेर पर रहते कबूतरों को भी नहीं।
आज जब कि तुम्हारा नाम याद है, यह पता है कि मैं अन्धपुर में हूँ और आज की तारीख अजीब संयोग वाली 131211 है, तुम्हें पाँच रुपये के लिफाफे में रख कर यह पत्र भेज रहा हूँ, यह सिद्ध करने को (तुमसे अधिक स्वयं को) कि तुम्हारा पता अभी मुझे पता है, कल मेरे लापता होने से पहले तुम लापता हो जाओगे (यह मेरी गुम्मी की अनिवार्य शर्त होगी) !

सुखी रहना और जीवन को कभी गम्भीरता से न लेना। यह इस लायक नहीं। देखो न! मुझे पता ही नहीं कि मैं पहला हूँ या दूसरा

सस्नेह तुम्हारा

मानव चक्रवर्ती (मुझे अभी मेरा कुलनाम याद है)