गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

महाशिवरात्रि - गृहस्थ महिमा

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आज महाशिवरात्रि है – फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी या तेरस। हर महीने यह तेरस शिवरात्रि कहलाता है किंतु कामऋतु वसंत में कामदहनी शिव के विवाह वाला तेरस महती अर्थ धारण कर लेता है। शिव का विवाह गृहस्थ जीवन की प्रतिष्ठा है। गिरि वन प्रांतर में अनेक प्रकार के जीव जंतुओं से उलझते सुलझते, उन्हें पालतू बनाते यायावर मनुष्य का ‘गृह प्रवेश’ है। इस दिन समाज से दूर रहने वाला विनाशी औघड़ घुमंतू फक्कड़ी संन्यासी गृहस्थ बनता है। शक्ति से जुड़ शव शिव हो जाता है। उससे जुड़ गिरि वन प्रांतर की बाला मैदानों की गोरी गउरा हो जाती है।

संहार से जुड़े होने के कारण शिव की दिशा दक्षिण मानी जाती है। दक्षिण में यमपुरी है। वर्ष का वह आधा भाग जब सूर्य दक्षिणायन होते हैं, पितृयान यानि पितरों का समय माना जाता है। पितर देवतुल्य हैं। उनका तर्पण आगामी पीढ़ी करती है। मृत्यु की कठोर सचाई के बीच इस तरह की व्यवस्था, जीवन की प्रतिष्ठा है कि चाहे जो हो, जीवन जयी रहेगा। जीवन जयी हो इसलिये शिव का विवाह आवश्यक है। वह घर परिवारी हो, यम को निर्देशित करते हुये भी संतति को जन्म दे तो संतुलन हो, विरुद्धों का सामंजस्य हो। बिना सामंजस्य के कैसा जन, कैसा समाज, कैसी पूजा, कैसी व्यवस्था? थोड़ा गहरे उतरें तो यह ऋत की प्राचीन अवधारणा का लौकिक रूप है।

शिव का विवाह वसंत की काम ऋतु में होता है। जोगी महाभोगी हो उद्दाम वासना में लिप्त होने से पहले समाधिस्थ होता है, काम द्वारा जगाया जाता है। शिव क्रोध से ग्रस्त होता है। त्रिनेत्र द्वारा काम का दहन होता है तब शिवा और शिव युगनद्ध होते हैं। सृष्टि नर्तन का रूपक है यह जिसमें शिव का तांडव है तो शिवा का लास्य भी!

भले कैलास के खोह में रहते हों, शिवयुगल आदि दम्पति हैं। ब्रह्मा सरस्वती तो शापित हो कलंकी हो गये। विष्णु युगल भी आदर्श नहीं, लक्ष्मी चंचला हैं तो उनके स्वामी बला के सुतक्कड़। बच गये गौरी महेश। सारी सीमाओं के बावजूद वे घर घर के हैं। वे लोक दम्पति हैं। सुख, दुख, कलह, मिलाप, कथा, व्यथा, उपासना, वासना आदि आदि सब धारण किये गाँव गाँव घूमते रहते हैं। गृहस्थ के प्रिय देव महादेव हैं। घरनी की प्रिय देवी गउरा पार्वती हैं।

गृहस्थ सबका भार वहन करता है। गृहस्थ धर्म का निबाह निर्बल के वश का नहीं, इसके लिये महादेव सा पौरुष और गिरिजा सा धैर्य ममत्त्व चाहिये। मनु कहते हैं:

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जिस प्रकार वायु का आश्रय सभी जीवित प्राणी करते हैं, वैसे ही गृहस्थ का अन्य तीन आश्रम। इसलिये गृहस्थ सर्वोत्तम आश्रम है। ऋषि, पितर, देव, भूत और अतिथि इन सबका पोषण गृहस्थ को ही करना है। यह आश्रम दुर्बल इन्द्रियों वाले के लिये नहीं है। तो इस आश्रम का आदर्श महादेव का दाम्पत्य ही होगा न!

बोलिये भवम भवानी की जय!

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रविवार, 9 फ़रवरी 2014

सिगरा मंडी का एक तरकारी विक्रेता

बनारस में साजन सिनेमा चौराहे पर नवनिर्मित फव्वारे से थोड़ा आगे सिगरा तरकारी मंडी की ओर बढ़ने पर बायीं ओर तमाम पणियों, गाली गलौज करते चिल्लाते दलालों, लोगों, पशुओं और गन्दगी की भीड़ के बीच भूमि पर छोटी सी टोकरी में तरकारी रख कर बेचता यह व्यक्ति मुझे जँचता है।


साधारण वस्त्र, सँवारे केश और हल्की बढ़ी दाढ़ी लिये इस मानुष का उत्साह नख नख से फूटता है। करीने से सजी सब्जियों में कोई असुन्दर नहीं होतीं और उनकी सजावट में एक ज्यामितीय प्रारूप दिखता है। 

इनकी तरकारियों के भाव में सामने वाले को देख कर उतार चढ़ाव होता रहता है। ग्राहकों की कमाल की परख है इन्हें और उन पर पकड़ भी। किस को क्या दिखाना है, कैसे घेरना है और कैसे भाग कर माँग पूरी करनी है, सब का कौशल इनमें है। निराशा का प्रदर्शन करते हुये कभी कभी मैंने असम्भव माँगें भी की हैं। उस समय फुर्ती के साथ कहीं और से ले आकर भी इस व्यक्ति ने पूरी की है। 
  
इनके स्वभाव में एक खास तरह का आक्रामक माधुर्य है जिसके कारण कोई भी ग्राहक आ जाने पर खाली हाथ नहीं जाता। इनके यहाँ रुकने वाले भी खास ही होते हैं जिन्हें मैं मन ही मन ‘गुण ग्राहक’ कहता हूँ। गुण ग्राहक वह होता है जो भाव ताव में उन्नीस बीस की परवाह न करते हुये ‘सम्पूर्ण क्रय अनुभव’ पर केन्द्रित रहता हो। उसके लिये पण से ले कर थाली तक तरकारी के आने की पूरी प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण होती है ताकि स्वाद का सम्पूर्ण परिपाक हो। गुण ग्राहक रुपये व्यय कर आनन्द का अनुभव करता है और इस हेतु वह आनन्ददायी विक्रेता पा ही लेता है। आप के आसपास भी ऐसे आनन्ददायी विक्रेता हों तो अवश्य बताइये!

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

आर टी भाई का मफलर

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बचपन से ही मुझे मफलर बाँधना नहीं आता। स्टाइलिश कूल हॉट देसी बिलायती आदि विधियों वाले मफलर बन्धुओं को देख देख जलन होती रहती है। अब तो मफलर प्रगतिशीलता और क्रांति का प्रतीक भी बन गया है।
वसंत आगमन निकट है लेकिन कोहरा और ठंड दोनों जाने का नाम नहीं ले रहे। चूँकि मफलर बाँधे बिना प्रगतिफीलता का भाव नहीं आता और बिना मफलर अराजक क्रांति हो नहीं सकती और चूँकि मैं यह सब चाहता हूँ इसलिये हर पल मफलर बाँधे रहना चाहता हूँ और इसीलिये मेरी माँग है कि हर मौसम सदाबहार मफलर बनाया जाना चाहिये। मफलर बाँधने की विधि सबको आनी चाहिये। विद्यालयों के पाठ्यक्रम में इसे सम्मिलित किया जाना चाहिये।  साथ ही फैब्रिक भी ऋतु के अनुकूल होना चाहिये। लेकिन समस्या यह है कि जैसे ही इस क्रांतिकारी सुझाव को किसी को सुनाता हूँ, वह विचार करने के बजाय मुझ पर ही हँसने लगता है जैसे कह रहा हो कि तेरा भेजा खिसकेला है!
इसके लिये आर टी भाई से सम्पर्क करना पड़ेगा। सुना है कि धरना, प्रदर्शन और नौटंकी की कला में वे इतने पारंगत हैं कि आर टी के आगे आई लगा कर इंडियन स्टेट की ऐसी तैसी कर देते हैं।
 
इंटरनेट पर ढूँढ़ा तो बता चला कि यह आम के बजाय अमरूद आदमी के लिये बनी एलीट टाइप की चीज है और इसे बाँधने की तमाम आसुरी और पश्चिमी विधियाँ हैं। अमेरिकन लिखना चाह रहा था लेकिन आसुरी शब्द कूल और एंटीक लगा सो लिख दिया। विश्वास है कि इससे मेरी प्रगतिफीलता पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
आर टी भाई ने मफलर बाँधने की एक देसी तकनीक का आविष्कार किया है। यूँ तो यह विधि बैगन देहात में बहुत पहले से ग़रीब गुरबा अमीर उमराँ द्वारा प्रयुक्त होती रही है लेकिन जब तक आर टी भाई ने इसे नहीं नकलियाया था तब तक यह बहुत ही उपेक्षित टाइप थी जिससे चेहरे की बैकवर्डनेस झाँई की तरह झाँकती थी। उनके नकलियाते ही इसमें कूलनेस तो आई ही, इस भयानक सर्दी में यह हॉट आइटम हो गयी। जिसे देखो वही इसे बाँधे जब चाहे तब रात बिरात सड़क मुहल्ला गली राजपथ आइटम सांग करता नज़र आने लगा। सही पूछिये तो आर टी भाई इस मामले में युग पुरुष निकले!  
इस विधि में कान को कस कर बाँधते हुये गले में लपेट लिया जाता है। चूँकि एक ही हॉट स्थान पर दो भयानक कूलें एक साथ एक ही समय नहीं विराज सकतीं इसलिये टोपी को किनारे रख दिया जाता है। इस विधि में सहूलियत यह रहती है कि आप को दूसरों की बातों पर कान नहीं देना होता और अपने गले की खाँसी भी कंट्रोल में रहती है। उस समय आप अक बक कुछ भी कह दें कैसी भी हरकत कर दें, उसमें क्रांति ही क्रांति पाई जाती है।
hind_timesमैं आर टी भाई से सीखने जा रहा हूँ लेकिन मुझे बगल के भीखन काका का एक प्रश्न परेशाँ किये हुये है - कान बन्द कर और गला बाँध कर नौटंकी हो रही है बेटा! नौटंकी देखते देखते मरण सेज पर आ गये हम लेकिन नौटंकी की काट ऐसी नौटंकी होगी, सोच नहीं पाये थे। अपने आर टी भाई से पूछना दूसरों को मूर्ख बनाने और समझने की तकनीक का इतना ह्रास कब कैसे क्यों कर हुआ?
आप को इसका उत्तर पता हो तो बताइयेगा। साथ ही वसंत में मफलर कैसा हो, इसकी जुगत भी सोचियेगा। राम राम!
 

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चित्राभार: hindustantimeṣ.com, bbc.co.uk

शनिवार, 18 जनवरी 2014

द्वीप में मस्सा

राजधानी से जब चला था तो विशाल विमान था और सुन्दर व्योमपरिचारिकायें जिनकी काजल भरी कृत्रिम आँखों की झपझप से अधिक आकर्षक उनकी नकली मुस्कानें थीं। मुस्कानें जो दृष्टि को देहयष्टि पर फिरने से रोक सी देतीं। कनेक्टिंग उड़ान एकदम वाद की प्रतिवाद सिद्ध हुई जिससे कोई संवाद स्थापित नहीं हो सकता था – छोटा पुराना सा विमान, कोई परिचारिका नहीं, केबिन में भरता रोर और यह भय कि अब गिरा तो तब!
घहराता हल्का विमान हिचकोला सा खाता हवाई पट्टी पर उतरा तो मुझे इस विचित्र सी खीझ भरी हास्यास्पद आशंका से मुक्ति मिली कि पायलट यात्रियों की सेवा में भी नियुक्त था जो रह रह उड़ाना छोड़ झाँकने आ जाता था कि सब ठीक तो है!

होटल की ओर बढ़ती काली पीली टैक्सी से बाहर का संसार दिखता रहा और तभी ड्राइवर ने एक ओर संकेत कर कहा – वह रहा वह इलाका जिसे देखने आप आये हैं। वह मुझे एक पर्यटक समझ रहा था। मैंने उधर की ओर देखा और उसके बाद सामने नियराते होटल की ओर। अचानक ही लगा कि मैं एक द्वीप पर आ गया हूँ। ऐसे द्वीप पर जहाँ एक बड़ा कालखंड लुप्त है - दो हजार वर्षों के अंतर से बने दो निर्माणों के बीच कोई अवशेष नहीं। इनसे बाहर कलकल बहती जनसरि है जिसमें निश्चिंत लोग लुगाई बच्चे हैं, मवेशी हैं, विद्यालय हैं, सरकारी विभाग हैं, छोटे व्यापार हैं, ऑटो टैक्सी वालों की झौं झौं है जो दूसरे द्वीपों से आने वालों को उस द्वीप पर उतारते हैं और पुन: वापस जाने को छोड़ आते हैं। आने वाले हजारो वर्षों के अंतर से मुग्ध हो चले जाते हैं। वे आते तो भी इसीलिये हैं न!

जनवरी के शीत कोहरे भरे अलसाये दौर में मुझे कम्पनी ने यहाँ अपने हेल्थ ड्रिंक का बाज़ार पता करने का काम सौंपा था। असल में निर्णय लिया जा चुका था और मुझे केवल अनुकूल रपट देने की खानापूरी करनी थी – बोरियत भरा वाहियात सा काम। मैंने कहा भी था – मार्केटिंग टीम भेज दो, मैं वहाँ जा कर क्या उखा...
मेरी बॉस ने हल्के से खाँस कर ‘ड़’ कहने से रोका, साथ साथ चेता भी दिया कि एक लेडी के सामने झुँझलाहट ऐसे नहीं दर्शाते और एक कोमल वाक्य के साथ मेरा प्रस्थान भी पक्का कर दिया – कुछ करना ही नहीं है। पेड हॉलीडे मान कर जाओ, आजकल बहुत स्ट्रेस्ड दिखते हो, ब्रेक मिल जायेगा। मैंने कहा - अद्भुत है यह संसार ...। वह मुस्कुरायीं – और तुम्हारी हिन्दी भी... कल्चर्ड बोले तो सुसंस्कृत। मैं खिलखिलाहट के आगे परास्त हो गया।


सुइट का इंटीरियर किसी मिरर प्रेमी ने किया था। छोटे बड़े दर्पण अपरिचय को गाढ़ा करने वाले थे। ठंडी चमक जैसी कुछ होती हो तो वैसा लगता था, जैसे पूछ रही हो – अतिथि! कब वापस अपने द्वीप जाओगे? मुझे ऐसा वातावरण एकदम नहीं जमता। एक आह सी भर कर कर मैं टॉयलेट में घुसा और सामने स्वयं को खड़ा पाया। झुँझलाहट सवार होती कि पता चला कि दर्पण कुछ अवतल बनाया गया था जिसके कारण प्रतिबिम्ब वास्तविक आकार से बड़ा दिख रहा था। मेरा ध्यान अपने गले पर के पारदर्शी से मस्से पर चला गया और मन में प्रभा पसरती चली गयी - एक अंतरंग उदासी जिसकी गोद से बिना कहानी लिखे मुक्ति नहीं मिलती...

... प्रभा को दिवंगत हुये दो वर्ष से अधिक हो गये और तब से मैं उसकी उपस्थिति और अनुपस्थिति की सान्द्रताओं को ही जी रहा हूँ। प्रांजल दून में सातवीं में है और मैं? बस मैं और प्रभा। घर में निर्वात नहीं, वात की वे परते हैं जिनसे होती वह अदृश्य रंग भरती रहती। दुख इतना घना हो सकता है कि वह जड़ से मुक्त कर दे, इतना अवमुक्त कि कोई यूँ सामान्य सा दिखने लगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं! जाने ऐसी स्थिति को क्या कहते हैं? प्रांजल और मैं उसके बारे में कभी बात नहीं करते। उसके जाने के बाद आज तक हममें से किसी ने प्रभा का नाम एक दूसरे के सामने नहीं लिया।
दाहसंस्कार के पश्चात प्रांजल आया था। माँ ने उसे बताया और उसने मेरी ओर जी भर देखा; न रोया, न कुछ कहा। उसके हिस्से का मैं ही रोया और अगले दिन उसे बाल मनोचिकित्सक के पास ले जाना पड़ा। वह इतना सामान्य दिख रहा था कि अनहोनी की आशंका से सभी ग्रस्त हो गये थे।
कुछ महीनों के बाद वह सामान्य जैसा सामान्य लगने लगा – हँसना, खेलना सब ठीक। स्वयं कहा – पापा, स्कूल वापस जाना है। मेरे पास अपने इस प्रश्न का उत्तर नहीं है - बचपन से ही माँ बाप से विलग रहने वाले बच्चे अधिक शक्तिवान या निठुर हो जाते हैं क्या? जीवन का एक पाठ समाप्त हुआ और लोगों को मैं भी सामान्य जैसा सामान्य लगने लगा...

“यह जो मस्सा है न, तुम्हारे सारे भेद खोल देता है। तुम्हें तो दिखता नहीं लेकिन मैं जान जाती हूँ कि साहब का मूड कैसा है। मस्सा रंग बदलता है सुक्कू!”

दर्पण के निकट हो मैंने दिये सी आकृति वाले उस लम्बोतरे मस्से पर हाथ फेरा – रू! आज कोहरा है, पराया देस है, ठंड है और तुमसे हजारो वर्षों सी दूरी लग रही है। क्या करूँ?
शांत अन्धेरा जाने कितने दर्पणों से परावर्तित हो कमरे को भरने लगा। मैंने आँखें मूँद ली। अब कौन रोकने वाला है कि संझा को नहीं सोते, लक्ष्मी लौट जाती है? देह अभी भी देह की इच्छा रखती है किंतु बिना प्रभा के कैसी पूर्ति?
...साँझ गहराती गयी और मैं रागी होता गया। सुना है कि संसार में हर व्यक्ति का कम से कम एक प्रतिरूप अवश्य होता है। तुम कहीं और हो प्रभा? यदि हो तो किस हाल में? मैं व्यभिचारी हो रहा हूँ क्या? मैं यदि मर गया होता तो क्या तुम भी ऐसा ...?

मैंने रिसेप्शन का नम्बर लगाया – मुझे मैनेजर से बात करनी है। लड़की ने पूछा – सर, क्या आप मुझे बता सकते हैं? उत्तर में मैंने बस यह कहा – मैं उनसे स्वयं भी मिलने आ सकता हूँ, लेकिन बात उन्हीं से करनी है। आप समय ले लीजिये। दस मिनट के बाद मुझे नीचे बुला लिया गया। मैंने उन्हें लॉन के एकांत कोने की ओर आने का संकेत किया और बिना प्रतीक्षा किये बढ़ लिया। उन्हें मेरे पीछे आना पड़ा।
“इस ऐतिहासिक स्थान पर देश विदेश से अलग अलग रुचियों के पर्यटक आते हैं, ढंग के होटल गिने चुने, ऐसे में क्या आप लोग आगंतुकों की ऐसी वैसी जरूरतों की भी पूर्ति करते हैं क्या?”
मेरे सीधे प्रश्न से वे अचम्भित से दिखे – आप स्पष्ट करेंगे प्लीज?
“स्पष्टता में नग्नता हो तो अस्पष्टता ही संवाद होती है।“
वे समझदारी से मुस्कुराये – ड्रग्स स्ट्रिक्टली नो नो ... बाकी जनरली नहीं करते लेकिन रेयरली तो ...करना ही पड़ता है। बहुत महँगा पड़ेगा। चार्ज के अलावा आप को एक और कमरे का रेंट देना होगा। कल शाम को हो पायेगा और आप को हमारे फॉर्मेट में अपना सही बायोडाटा अभी देना होगा। उसे हम पार्टी के पास मेल करेंगे। स्वीकृति की स्थिति में वह अपना परिचय फोटो के साथ भेजेगी। यदि आप को स्वीकार होगा तो आगे बात करेंगे।
मैं अवाक रह गया। उन्हों ने धीमे से पूछा – ऐक्सेप्टेबल? मैंने हाँ कर दी और वे चल दिये।

सुइट में पहुँचा तो पेंसिल के साथ फॉर्मेट मुलाकाती कमरे के टेबल पर था। पहला निर्देश था – कृपया पेन का प्रयोग न करें।
पहला बिन्दु था – पत्नी का नाम
दूसरा – बच्चों के नाम
तीसरा – व्यवसाय/ फर्म/ कम्पनी/ नियोक्ता
स्वयं का नाम चौथे स्थान पर था। मैंने फॉर्मेट को पलटा – कहीं भी आयु नहीं पूछी गयी थी। (जारी)                                                        

शनिवार, 11 जनवरी 2014

ट्यूब में दो एक जन पल

हम दो एक बराबर तीन थे। भागते जीवन की एक साँस भर ठहर में अनचाहे यूँ ही मिल जाने वालों के लिये 'हम' कहना अब अधिकई होगी लेकिन रेल यात्रा के उस सीमित समय में हम हम ही थे। उन्हों ने मुझे कैसे देखा, नहीं पता लेकिन मैं तीनों के बारे में बता सकता हूँ, दो के लिये तो प्राणवायु भरा रंगहीन कैनवस और अँखिया गहरानी थीं और स्वयं को तो पाँच छ: लाख बार उस चौंध में निहारा ही है जिसके पीछे आत्ममुग्धता की कलई लगी होती है।

भारी भीड़ के रेले में उस लघु वृत्त की परिधि पर तीन सिरों के व्यवस्थित होते ही मैंने जिस पहली बात का अनुभव किया वह यह थी कि उसके अधोमुखी शंकु केन्द्र पर तीखी गन्धों वाली साँसें इकट्ठी हो रही थीं क्यों कि हम समान ऊँचाई के थे। उस केन्द्र पर मुझे बहुत दया आई कि तीन तीन मानवों को झेलता वह बिन्दु वासना भावहीन ऊष्मा से तप्त हो जाने किस असंतुलन से ग्रसित हो रहा होगा।

एक ऐसा था जिसे ऐसे जाना जा सकता है कि अश्वेत अभिनेता वाशिंगटन उस आर्य ललछौंहे रंग को ओढ़ सामने खड़ा हो जिसके साथ आक्रांता होने का विशेषण बाइ डिफाल्ट जुड़ा हुआ है। प्रकृति के इस अलबेले खेल पर मैं मुस्कुराया, जाने उसकी माँ अश्वेत थी या पिता या वह बस उत्परिवर्तन की उपज था! अपरिचित की मुस्कान पर मुस्कुराने का जो सहज आदिम संस्कार है, उसने जोर मारा तो वह भी मुस्कुराया और मैंने जाना कि उसके उभरे भरे पुरे होठ अद्भुत सुन्दर थे। संस्कृत उपमा ध्यान में आई बिम्बाफल! मैंने अपनी मुस्कान इस स्वार्थ हेतु चौड़ी की कि वह भी चौड़ा हो और मुझे दाड़िम दंत उपमा के दर्शन हो जायें लेकिन वह शमित हो पुन: अपरिचित हो चुका था। मुझे तेज भागती ट्यूब पर झल्लाहट हुई जो अपरिचय को सान्द्र करने पर बाध्य करती थी।
और तब मैंने अनुभव किया कि उसकी साँसों से रह रह आती गन्ध पायरिया रोग को अगोपित कर रही थी। सभ्यता वश मैं निर्विकार बना रहा किंतु उसने मुझे प्राणवायु के रंगहीन कैनवस में निहारना आरम्भ कर दिया। मुझे लगा कि वह इस बात की प्रतीक्षा कर रहा था कि कब मेरा निर्विकार भाव टूटे, कलई के पीछे से घिरना झाँके और तब वह चेहरे पर वह तिरस्कार भाव लाये जो असहिष्णु जन के लिये माया सँजो कर रखती है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, असह्य को निरपेक्ष निर्जीव रूप हो सहने की मुझमें अद्भुत क्षमता है। मैंने उससे दृष्टि हटा दूसरे की ओर फेर दी और वह उस अंतरंगताहीन घेरे के केन्द्र पर स्थिर हो गया।

जो दूसरा था वह गेंहुआ था, इसलिये बहुत ही परिचित लगा वैसे ही जैसे प्रतिदिन थाली में गर्म रोटी लगती है हालाँकि उसमें न तो भूख को और उच्छृंखल बनाती वह गन्ध थी और न वह भाप, ममत्त्व का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वह ताजे नहाये दाढ़ी बनाये क्रीम लगाये उस संतुष्ट कर्मचारी सा दीप्त हो रहा था जिससे मातहत और ऊपर वाले दोनों प्रसन्न रहते हैं। मुझे उससे ईर्ष्या हो आई, बहुत ही गहरी ईर्ष्या क्यों कि कलई केपीछे छिपी अपनी इस सचाई से मैं भिज्ञ था - मुझसे सब घृणा करते हैं। मुझे वह गेंहुअन साँप सा लगा - कुछ भय, कुछ रहस्य, कुछ सम्मोहन किंतु ढेर सा विष!
उसके केश उड़ रहे थे। चेहरा ऐसा था जैसे सपाट भूदृश्य पर दूर सूर्योदय हो रहा हो। मुझे लगा कि सम्मोहित सा मैं शब्दहीन बुदबुदाया - हेलो! तत्काल ही मैंने सोचा कि यदि ऐसी बुदबुदाहट उस गन्धाते बिम्बाफल से आती तो गेंहुआ अवश्य उत्तर देता। साँप सुन्दरता के प्रेमी जो होते हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हमदोनों एक दूसरे को यूँ घूरते रहे जैसे दुर्गापूजा पंडाल की द्वितीयक प्रतिमायें आमने सामने हों।

सबअर्बन क्षेत्र के स्टेशन के निकट होने की उद्घोषणा से हम तीनों की तन्द्रायें टूटीं और मुझे आश्चर्य नहीं हुआ कि तीनों वहीं उतरने वाले थे। वृत्त टूटा, उसके केन्द्र को अनचाही साँसों से मुक्ति मिली। ट्यूब के वातानुकूलित वातावरण में उत्पन्न हो गये छोटे से उत्पाती क्षेत्र में ऊष्मागतिकी के नियम अपनी गणित लगाने लगे। रेला आगे बढ़ा। कल्पित बिम्बाफल पैरों के नीचे आ गिरा। गेंहू की रोटी और उसके विष आने वालों के लिये छोड़ दिये गये और मैं अपनी कलई ठीक करते संसार में पुन: उतर गया।