मंगलवार, 4 मई 2010

असहमति - जाने किससे

-एक वयस्क सुशिक्षित लड़की एक वैसे ही लड़के से बिना किसी सावधानी के शारीरिक सम्बन्ध बनाती है, गर्भवती होती है और तीन महीने (मतलब कि शिशु को जन्म देने को मानसिक रूप से तैयार) तक मृत्युपर्यंत गर्भ धारण रखती है। क्या उसका अपने माँ बाप के प्रति, जो कि पुराने विचारों के थे और वैसे ही समाज में रहते थे, कोई दायित्त्व नहीं था ?

-लड़का खुलेआम टेसुए बहाता, हीरो बना घूम रहा है। लड़की के पोस्टमार्टम के समय क्या यह आवश्यक नहीं था कि गर्भ का डी एन ए परीक्षण कराया जाता ताकि लड़के का पिता होना सिद्ध हो सकता और उसको क़ानून के शिकंजे में लिया जा सकता ?

- एक आतंकवादी जिसने खुलेआम सैकड़ों हजारों लोगों की उपस्थिति में राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ा, सैकड़ों की हत्या की, पूरी मशीनरी को बन्धक बनाए रखा; महीनों तक की क़ानूनी प्रक्रिया के बाद और 45 करोड़ उसके उपर खर्चने के बाद दोषी ठहराया जाता है और फिर भी फैसला सुरक्षित रखा जाता है। उसी देश में उक्त लड़की की हत्या के लिए उसके माँ बाप पर आरोप लगता है और सभी उन्हें दोषी मानने लगते हैं। क्या न्यायालय के फैसले के आने तक उन्हें उनके हाल पर छोड़ नहीं देना चाहिए ? अरे उनकी इकलौती लड़की मरी है, रहम करो। क्या कहा? घर बुला कर मार दिया ! निर्णय लेने के पहले प्रतीक्षा कर लीजिए न ।

- एक आरुषि नामक लड़की की हत्या हुई थी। क्या आप बताएँगे कि आज कल उस केस में क्या हो रहा है? क्या प्रगति है?

- कहीं ऐसा तो नहीं कि सारा बवाल बस इस लिए है कि मरने वाली पत्रकार थी और उसे मारने का पहला कदम लेने वाला ( उसे गर्भवती कर) उसका कथित प्रेमी भी पत्रकार है? कहीं प्रेमी अपने को बचाने के लिए जमात इकठ्ठी कर यह नौटंकी तो नहीं फैला रहा? कहीं ऐसा तो नहीं होगा न कि कल सुबूत मिले कि लड़के ने उसके साथ छिप कर शादी कर ली थी ?

- कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी घटनाएँ बच्चे की परवरिश का जिम्मा राज्य के सिर नहीं होने से हो रही हैं ? यह पुरातन समाज तेजी से बदलते माहौल के साथ कदम नहीं मिला पा रहा तो कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके लिए विवाह संस्था ही दोषी है ?

- आप में से कितने गिरिजेश अपने नाम से 'राव' हटाने को और अपने बच्चे को भी जाति सूचक उपनामों से मुक्त करने को तैयार हैं? ..मैं गिन रहा हूँ। संख्या बहुत कम है। .. तो भैया बहिनी! आप लोग उपनाम तक हटाने को तैयार नहीं; जाति व्यवस्था पर इतनी हाय तौबा क्यों?

- सार्वजनिक स्थानों पर दिन में खुलेआम सेक्स सम्बन्ध बनाते (जी हाँ, अब यह होने लगा है) कितने कुँवारे जोड़ों को आप ने टोका है ? मेरा मतलब यह है कि बच्चों पर क्या प्रभाव पडता होगा, यह सोचा है आप ने ? न न , सिनेमा वगैरह से इतर मामला है यह । कल अगर आप का बच्चा आप से पूछ बैठे तो क्या कहेंगे उसे ? वो जो कुत्ते करते हैं न वही कर रहे हैं - ऐसा कह पाएँगे आप ? ..सेक्स एजूकेसन। ... बच्चे सम्भोग करने के पहले उसकी ज़िम्मेदारी तो समझें...

बहुत से विचार गड्डमगड्ड हो रहे हैं। शायद मुझे आराम की जरूरत है। पाखंडी ऊर्जा क्षय अधिक करता है।

24 टिप्‍पणियां:

  1. she might have been raped do you remember a case that happend in lucknow where a minsiter was involved

    no change will come in our society till we start the process of total equality and state is made responsible for the welfare of the child

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  2. जब कसाब जैसे इंसान को जीने की मोहलत दी जा रही है तो क्या निरुपमा को जीने का हक नहीं था...क्या एक अजन्मे बच्चे को मार डालना हमारे धर्म के विरुद्ध नहीं.....विश्व का सबसे नामी धर्म ईसाईयत की नीव ही कुंवारी माँ पर टिकी है ..उसे कोई कुछ क्यों नहीं कहता है ??

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  3. मैं आपकी पोस्ट में से कमेंट के लिये सिर्फ़ जाति वाली बात चुन रहा हूं। किसी सवर्ण द्वारा अनु.जाति के व्यक्ति को जातिसूचक शब्द से बुलाने पर या बुलाने के इल्ज़ाम में कितनी प्रतारणा झेलनी पड़ सकती है, कम से कम नौकरीपेशा लोग ये जरूर समझते होंगे। मेरे स्टाफ़ का एक सदस्य जब दूसरे को "ओ बाह्मण के" या "ओ पंडत के" कहकर बुलाया करता था, तो क्या यह भी प्रतारणा है या नहीं? उसकी आदत सुधारने के लिये मुझे ही बुरा बनना पड़ा, जब ऐसी ही सिच्युएशन उसके साथ होने का अंदाजा करवाया कि यदि वह ब्राह्म्ण पुत्र तुम्हें इसी भाषा में पुकारे तो क्या कहेगा? खैर, मेरा मित्र समझदार था या मेरा लिहाज किया, वो रुक गया पर सब तो नहीं रुके हैं।
    गिरिजेश सर, सही मायने में हम इतने परिपक्व हुये ही नहीं हैं कि स्वतंत्र सोच रख सकें, न धर्म के बारे में, न जाति के बारे में और न ही जेंडर के बारे में। हम स्वतंत्रता के काबिल शायद अभी भी नहीं है। आपकी तरह मैं भी गड्डमगड्ड हो रहा हूं, लेकिन उलझाव आपका USP है और बना रहेगा। और ये क्या, आपने मॉडरेशन नहीं लगा रखा है? फ़िर पता कैसे चलेगा कि आप सहिष्णु हैं या नहीं। :)
    आलस्य टूटने का इंतज़ार रहेगा।
    आभारी(हमेशा की तरह)

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  4. गिरिजेश जी,

    यह दनदनाती पोस्ट दागने के लिए धन्यवाद।

    मेरे भी मन में यही सब चल रहा था कि कहीं निरूपमा के पत्रकार होने के नाते ही तो नहीं यह घोंघाबसन्त इतना हो हल्ला मचा रहे हैं। उसका प्रेमी शायद इस सबके पीछे कोई हिडन रोप खींच रहा हो....कौन जाने।

    ये जो इतना चिल्ला रहे हैं कि उसके परिवार वाले फलां मानसिकता के थे...आधुनिक जमाने के साथ नहीं चल पाए....लेकिन यदि उन्हीं के घर से एक लड़की या लड़का फरार हो जाए तब देखिए कैसे हहाते- छुछुआते कराहते दिखेंगे इनके चेहरे।

    तो भाई लोगों, समाज का तमाचा बडा करारा होता है और हर मां बार उस तमाचे को झेलने का साहस नहीं कर सकता जबकि आधुनिक होने का दंभ भरता एक अलग समाज खुद ही गड्डम गड्ड हो रहा है।

    यदि इतनी ही आधुनिकता दिखानी होती तो अखबारों में जाति आधारित शादियों का विज्ञापन क्यों लेते हो पत्रकार बंधुओ...पत्रकार बिहिनियो।

    मैं जातिवाद का समर्थन नहीं करता लेकिन पत्रकार बिरादरी के दोमुहेपन का विरोध करता हूँ जो कि एक तरफ तो आगे की सोचो कहता है और दूसरी ओर जाति आधारित विज्ञापन धडधडा कर छापता है ....

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  5. मैं मुक्तिबोध की यह कविता उद्ध्रत कर रहा हूँ ....

    " विचार आते हैं -

    लिखते समय नहीं
    बोझ ढोते वक़्त पीठ पर
    सिर पर उठाते समय भार
    परिश्रम करते समय ...."

    मुझे पता है राव साहब आपके विचारों का सिलसिला अभी थमा नहीं है .. आने दीजिये इसी से कोई सूरत निकलेगी ।

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  6. हीरो बन टेसुए गिरते उस पत्रकार के बच्चे को भी शक के बाहर नहीं रखा जा सकता .
    सबसे नालायक वही है और यदि प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष हत्यारा अवश्य ही ...जांच होने दीजिये !
    मैं आनर किलिंग की थियरी सिरे से खारिज करता हूँ !

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  7. Madhumita shukla ka rape nahin hua tha balki uska us badmaash Amarmani ke sath affair tha ye court me bhi proove ho chuka hai isi liye us gunde minister Amarmani tripathi ki nirdayee biwi madhumani tripathi ne uska murder kara diya tha.. Rachna yahan dekhiye-
    http://en.wikipedia.org/wiki/Amarmani_Tripathi#Madhumita_Shukla_murder

    isliye dono cases ko jabardasti ek jaisa na banayen.. haan ye similarity jaroor ho sakti hai ki dono cases me relation aapsi sahmati se the. Nirupama ek padhi-likhi patrakaar thi apne khud ke sath hue rape ko chhupa kar nahin ghoomti.
    Girijesh ji aapse sahmat hoon..

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  8. एक छोटी सी पोस्ट में इतने सारे सवाल है, किस किस की बात करें - जल्दबाजी में जवाब लिखना अन्याय होगा, फिर भी:
    * आपकी आशंका सच्ची हो सकती है. मामले की बारीकियों को जाने बिना कुछ भी कहना संभव नहीं है.
    * विवाह संस्था हो या कोई भी संस्था हो - दुर्घटनायें और अपराध दोनों कभी भी और कहीं भी हो सकते हैं.
    * कुलनाम हटाकर भी बड़े-बड़े racist ज़ुल्म/जुर्म करने वाले देखे हैं हमने.

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  9. रविन्द मिश्रा जी की बात से सहमत हूँ धन्यवाद्

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  10. @ आप लोग उपनाम तक हटाने को तैयार नहीं; जाति व्यवस्था पर इतनी हाय तौबा क्यों?...
    बात सोचने की है ...
    @ क्या न्यायालय के फैसले के आने तक उन्हें उनके हाल पर छोड़ नहीं देना चाहिए ?...
    तब तक टेलीविजन की टी आर पी का क्या करेंगे ...कैसे बढ़ेगी ...
    आरुषि कांड का क्या नतीजा निकाला ..अब दिलचस्पी नहीं रही लोगो में ...क्यूंकि उनके माता-पिता की भावनाओ का जिंतना दोहन किया जा सकता था ...हो चुका ...हमारी भूलने की आदत जाती नहीं ....

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  11. " ब्लोग बातें " का अगला अंक इसी विषय पर आधारित होगा , पोस्टें सहेज रहा हूं ताकि ब्लोग जगत से निकलती लपटें उस प्रियभांशु ( एक तो इस --ले का नाम ही मुझे भाले जैसा लग रहा है कहीं से भी प्रिय नहीं लग रहा है इसलिए गाली बक गया ) तक बाहर निकल निकल कर पहुंचें । आपने तो पूरी मैगजीन ही खाली कर दी है , और सब के सब निशाने पर लगे हैं

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  12. कल रात को ही एक लम्बी चौड़ी टिपण्णी इस पोस्ट के लिए लिखी थी, फिर कुछ सोच पोस्ट नहीं की ! छोडिये गिरजेश जी, हम ही क्यों टेंशन लें, भाड़ में गई दुनिया दारी ! बस अब तो इन दुनिया वालो को एक नया आशीर्वाद देना सीख लीजिये आप भी कि " भगवान् करे आपकी कुंवारी बेटी जल्दी आपको खुशखबरी दे ! " आखिर हम्मरे सर्वोच्च न्यायालय ने जो लिव इन रिलेशनशिप की आजादी जो दे दी !

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  13. अजय भाई यह समय हिचकने का नहीं भाई -गाली दीजिये उसे -मीडिया नरमी बारात रही है उसके प्रति जबकि वही है असली खलनायक इस घृणित कांड का ---वह कापुरुष, नालायक ,चोर ,पाजी ,निकम्मा -सभी कुछ है ...
    भाग गया अपनी जिम्मेदरियों ...से .....और ओह हमारी परम्परा और संस्कृति मृतक के प्रति कुछ भी अन्यथा कहने का इजाज्जत नहीं देती पर सबसे क्षमा याचना के साथ कहूँगा की निरूपमा का चयन ही गलत था --यह लफंगा जो एक शातिर शोहदा दिख रहा है चित्र में ...जरा भी जिम्मेदारी नहीं बरती इसने ....जब अमरमणि को जेल हो सकती है तो इसे क्यों छोड़ा जाय -कानून तो सबके लिए बराबर हैं न ? यह दो मासूम जिन्दगियों के मौत का गुनाहगार है !

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  14. ...................................................................
    ..........सोच रहा हूँ , यहाँ के लोगों की बातों पर
    ...................................................................

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  15. मैंने ये टिप्पणी चिट्ठाचर्चा पर की है यहाँ भी वही बात रख रही हूँ---
    "निरुपमा के मुद्दे पर अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी है. मीडिया कोई न्यायालय नहीं है कि उसके निष्कर्षों के आधार पर हम खुद कोई राय बनाने लग जायें, इसलिये इस पर मैंने अभी कुछ नहीं कहा है. पर, सोचने की बात है कि जब निरुपमा जैसी पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर और उच्चवर्गीय लड़की के साथ ऐसा हो सकता है, तो फिर सामान्य लड़कियों की बात ही क्या करें?
    पर जहाँ तक मैं समझती हूँ, यह संघर्ष माँ-बाप और बेटी या प्रेमी और प्रेमिका के बीच नहीं... उच्च जाति और निम्न जाति के बीच भी नहीं... ... औरत और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बीच है. इसके सभी पक्षों पर गौर करने के बाद ही कोई राय बनाई जा सकती है...और यह पक्ष सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है."

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  16. आपकी पोस्ट विचारणीय है....बहुत कुछ लिखा आपने..पर ज़रा बताइए की जो पढ़ी लिखी लड़कियां हैं जो अकेले रहती हैं...घर परिवार की स्थिति समझती हैं....क्या वो ऐसा कदम उठा सकती हैं????/ कहीं ना कहीं निरुपमा के विश्वास को धोखा दिया गया है....और ये शक सही लगने लगता है कि कहीं उसके कथित प्रेमी का ही तो हाथ नहीं इसमें....

    वैसे मैं तो यही कहूँगी कि लड़कियों को खुद ही जागरूक होना चाहिए...क्या सही है क्या गलत है ये उनको ही सोचना और समझना है....क्यों कि आखिर में भुगतना तो उनको ही पड़ता है....

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  17. " भगवान् करे आपकी कुंवारी बेटी जल्दी आपको खुशखबरी दे ! " आखिर हम्मरे सर्वोच्च न्यायालय ने जो लिव इन रिलेशनशिप की आजादी जो दे दी !

    kuwaare lafake kae pitaa banane par bhi maata pita ko badhaii dee jaani chaiyae yaa nahin godiyal ji

    sahii to kiyaa haen supreme court nae liv in relationship ko mantyaa dae akr kam sae kam agar kuwaara betaa pitaa banae to apnae sambandh to nibhayee

    kewal is liyae ki garb kewal stri hi dharna kar saktee haen usko dosh dena kyaa uchit haen

    isii ko gender bais kehtey haen

    kuchh to soch mae badlaav laaye

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  18. विद्वान लोग इतना कुछ कह चुके हैं, अब कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही।

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  19. आपके कई सवालों का जवाब मेरे पास नहीं है.. लग रहा है जैसे एक तमाशबीन मैं भी बन चुका हूँ इस समाज में..

    फिलहाल रचना जी से सहमत हुआ जा रहा हूँ..

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  20. विचार जब भी गड्मगड हों तभी समझिये सही दिशा है । निष्कर्ष मत निकालिये बस बने रहिये उसी स्थिति में रहिये ।

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