बुधवार, 28 सितंबर 2011

बी

नवरात्रें शुरू हो गयी है। मतलब कि मैं पचहत्तर पार कर गया। सन् बासठ में चीनी हमले के बाद से डायरी लिखना शुरू किया तो सिलसिला आज तक नहीं टूटा। परिवार, गाँव, कस्बा, सगे सम्बन्धियों, देश, विदेश की प्रमुख घटनाओं के साथ अपनी व्यक्तिगत बातें भी डायरी में दर्ज हैं लेकिन अब लगता है कि कुछ छूट गया, बिखर गया। आज जन्मदिन पर उसे सहेजना चाहता हूँ। इतने लम्बे जीवन के बाद अनुभव ठोस होकर मूर्त से हो जाते हैं जैसे दिमाग में कोई बिनायन ट्यूमर हो। नहीं, उसे निकालना अपने वश का नहीं, कुछ और लिखना चाहता हूँ।

अब अकेला हूँ। बड़की माई की उस सतरोहिनिया का अकेला बचा लाल जिसमें सात नहीं बारह औलादें थीं। सारे सगे और चचेरे भाई, बहन परलोकवासी हो गये। आखिरी का अभी पिछले सप्ताह ही ब्रह्मभोज था। वह मुझसे छोटा था। पत्नी का क्या कहूँ, अब मुझसे अलग थोड़े है? बच्चों की अपनी दुनिया है, मेरी अपनी। वे विदेश में हैं।

माता पिता बचपन में ही चल बसे। आठ वर्ष का था जब बाबू माई के शोक में मरे। मुझे बताया गया कि दोनों किसी ईसर के यहाँ गये। निपढ़ बाबू चाहते थे कि मैं पढ़ लिख कर कलट्टरी करूँ – एकदम अंग्रेज बहादुर की तरह। उन्हें बस इतना पता था कि गाय के दूध से मगज तेज होता है, इसलिये जब तक जीवित रहे मुझे गाय का दूध पिलाते रहे। मैं गोरा हूँ। पियरकी गोराई। भूरे से बाल और बिल्लौरी आँखें। सब कहते हैं कि माई की सूरत मैंने ही पाई। माई जो किसी शुभ के मौके पर औरतों की जुटान में सबसे अलग दिखती। लमहर, गोरहर, सुन्नर – बिलैती मेम जैसी। कोई अचरज नहीं कि चार औलादों में कलट्टरी के लिये बाबू ने मुझे ही चुना। अगर जीवित रहते तो शायद बन भी जाता लेकिन न बन पाने का मुझे कोई दुख नहीं है। बस एक टीस सी है कि बाबू की इच्छा पूरी नहीं कर पाया।

बन पाता भी कैसे? मुझमें संघर्ष की उतनी शक्ति नहीं थी। बाबू के जाने के बरस भीतर ही लाला पागल हुये और सारे बही बस्ता को आग लगा दिये। बची खुची कसर पहलवान ने कत्ल कर के पूरी कर दी जिसमें सारा खानदान मुलजिम बन गया। उन सबने बच्चों तक को नहीं छोड़ा! मैं उस समय नीचे दर्जे में पढ़ता था और मेरा नाम इसलिये नहीं डाला गया कि मेरी हाजिरी कत्ल के समय स्कूल में मिलती। केस कमजोर हो जाता। देश आज़ाद हुये अधिक बरस नहीं बीते थे।  मुकदमा बहुत लम्बा चला और घर उसी में बरबाद हो गया। जिस पच्छिम घर से आग और दही के जोरन सारे गाँव में जाते, उसी घर के दुआरे मवेशी एक एक कर कुपोषण से मरे। भुक्खल चमार दो तीन दिन में आता और मरणासन्न गोरुओं के इकठ्ठा गोबर कुदाल से उठा कर घूरे में फेंक आता। एक खेतिहर घर के लिये इससे बड़ी दुर्दशा क्या हो सकती थी?
बड़के बबुआ की आत्मा सुखी रहे। मरने के एक दिन पहले ही पूरब घर वाले जमींदार घराने को जुटा कर कह दिये थे कि कल इसी समय मेरी आत्मा माटी छोड़ देगी। मुकदमे का सारा खरचा बिना ब्याज, बिना किसी अवधि के हमारे बच्चे भरेंगे और तुम लोग खेत का एक भी धुर हड़पे तो तुम्हारे खानदान का सत्यानाश हो जायेगा। अगले दिन उसी समय बबुआ चल बसे। उनके जाने से खेत बच गये। अच्छा हुआ कि चले गये, जीवित रहते तो न बचा पाते, न जाते हुये देख पाते और न सह पाते।

सबेरे बड़की माई थरिया में कभी भूजा, कभी मकई के दाने और कभी बासी भात के बारह छोटे छोटे ढेर लगा देती। हम सभी बारी बारी आ कर अपना अपना हिस्सा पा लेते और घर की संतानों के प्रति उस दिन की जिम्मेदारी खत्म हो जाती। ईमानदारी इतनी कि कोई दूसरे के हिस्से पर हाथ नहीं मारता था और न्याय बुद्धि इतनी थी कि हर ढेर में भूजा के दाने बराबर रहने चाहिये थे वरना बड़की माई की खैर नहीं। इस ‘नाश्ते’ के बाद लड़कियाँ घरेलू काम में लग जातीं और लड़के सरेह में – गन्ने चूसते, कन्न, सुथनी, आलू, भून कर खा जाते और कमर से नीचे सरकती फटी चुटी बजगानियों में बाँध कर बहनों के लिये ले भी आते। महातम भैवा कहता – सब नाश के रास्ते पर हैं।

बाबू की याद लिये मैं अकेला पाठशाला को निकलता। पेट में भूख ककोरती रहती, आँखों से लोर और नाक से पोंटा बहते रहते। चार कोस पैदल आना और जाना। बड़की माई पर क्रोध भी आता कि मुझे थोड़ा अधिक क्यों नहीं दे देती? धीरे धीरे भूख की आदत हो गई। रास्ते भर गन्ना चूसते जाता। मुँह फैल गया। दोनों किनारे हमेशा घाव रहने लगे। पेट निकल गया। बड़ा माथा और उभर गया। पट्टीदारों ने नाम दिया – पितमरुआ लेकिन मैं पढ़ता रहा और पास भी होता रहा।

पहली बार मिडिल में फेल हुआ। पढ़ाई जारी रह पा रही थी तो सिर्फ इसलिये कि मैं पास होता जा रहा था। उस दिन मेरी आँखों के आगे अन्धेरा था। परिवार वाले जानते तो पढ़ाई छुड़ा मुझे भी पूरे समय खेतों में लगा देते, उन खेतों में जिनमें अँजोरिया लगते ही कोदो की फसल मर जाती थी। छुट्टी के दिन मैं खेतों में काम करता लेकिन हमेशा लगता कि कुछ है जिसके कारण हमारी खेती बाँझ हो चुकी थी और उसे दुबारा उपजाऊ बनाने के लिये पढ़ लिख कर मेरा आगे निकलना जरूरी था। उस समय से ही अपने खेतों और सगों के लिये अजीब सा प्रेम और घृणा का समन्वय मैं खुद के भीतर पाता रहा हूँ। बहुत से अवसर आये लेकिन मैं बाहर की दुनिया में पंख पसार नहीं सका जिसका मुझे कोई दुख नहीं। मैं आज भी वैसा ही हूँ, बाबू के उलट - अमहत्त्वाकांक्षी।

फेल होने के बाद हेड मास्टर के ऑफिस के बाहर घुटने में सिर दिये मैं रो रहा था। किसी भी तरह के रहम के लिये डिप्टी साहब के ऑफिस जाना होता। लेकिन जाता कैसे और कौन ले जाता? मैंने अपनी पीठ पर किसी का हाथ महसूस किया। घुटनों से सिर उठाया तो असलम का धुँधला चेहरा दिखा। उसने मेरे आँसू पोंछे और बिना कुछ बोले हम दोनों कस्बे में उसके घर की ओर चल पड़े। अपने घर जाने का न तो कोई मतलब था और न जरूरत थी। उसके घर ही करीमन बी से मुलाकात हुई जो उसकी अम्मी थीं। करीमन बी देखने में माई की तरह ही थीं लेकिन नाटी थीं। उन्हें देखते ही मैं फूट फूट कर रो पड़ा। एक रिश्ते की शुरुआत हुई जिसमें मैं उनका लाडला पाँचवा बना और वह मेरे लिये सिर्फ बी। अम्मी पुकारने से उन्हों ने खुद मना कर दिया था – ठाकुर की औलाद हो, मुझे सिर्फ बी कहो।  असलम के अब्बू मेरे लिये आदर के पात्र थे तो सिर्फ इसलिये कि वे बी के खाबिन्द थे वर्ना वैसा कट्टर मैंने आज तक नहीं देखा लेकिन वह बी से डरते थे और खूब डरते थे।

अगले दिन बी असलम और मुझे लेकर डिप्टी साहब के ऑफिस जाने को तैयार हुईं। मुझे हर हाल में पास होना था और उन्हें मुझे पास कराना ही था। (अगला भाग)                   

17 टिप्‍पणियां:

  1. पाठक मुझसे कई मोर्चे एक साथ खोलने और बातों को लम्बे समय तक अधूरा रखने की शिकायतें करते रहते हैं। मुझे भी लग रहा है कि मैं दिन ब दिन बिगड़ता जा रहा हूँ।
    इस सुबह बाऊ की उस कथा के दो पेज लिखे जा सकते थे जो कि अब समाप्त होने को है लेकिन यह कहानी खुद को लिखा गई। इतना समय नहीं बचा कि पूरी करूँ। वादा करता हूँ कि नवरात्र में ही पूरी कर दूँगा।

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  2. एक सांस में पढ़ डालने वाली कहानी। अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार है।

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  3. तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन हों पचास हज़ार. हरेक के जंक दिन पर मै तो यही गाता हूँ. आपके लिए भी. अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा.

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  4. अरे लगता है जनम दिन आपका नहीं था, वह तो कहानी का ही हिस्सा था. भूल चूक लेनी देनी. गाना रिवर्स कर रहा हूँ. शुभकामनाएं तो कभी भी दी जा सकती हैं. सो ये ले लो.

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  5. अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार है।

    jai baba banaras..............

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  6. कहते हैं आदतें बहुत जल्दी बिगड़ती चली ज़ाती है, आपके साथ ऐसा है आचार्य...

    मन्नू उर्मी प्रसंग..
    बाऊ कथा...
    और हाँ,
    एक पुराणिक कथा भी शुरू की थी शायद सीता पर..

    सब क्रमश;
    क्रमश:

    डरता हूँ, यही क्रमश: आपके ब्लॉग की नियति न बन जाए :)

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  7. कथा का नया अध्याय, रोचक व संवेदनशील प्रारम्भ।

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  8. ये नयिकी आत्मकथा किसकी है -बड़ी फलक समेटे है ....आसन्न की अनुभूति है थोडा ..

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  9. @ दीपक बाबा जी ,
    क्यों ना इस ब्लॉग का नाम ही क्रमशः रख लिया जाये :)

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  10. दीपक जी और अली सा,
    ब्लॉग नाम में क्रमश: लगा दिया :)

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  11. क्या गिरिजेश भाई, अली सा ने थोड़ी चिकोटी काटी और आपने तुरंत क्रमशः लगा दिया! जल्दी क्रमशः हटाने के लिए जुट जाइये। सभी अधूरे पूर्ण हों यही शुभकामना है।
    ई कहानी भी महाभारत करेगी आपकी खोपड़ी से, ऐसा लग रहा है।

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  12. देवेन्द्र जी, शीर्षक में रहने से अपन के ऊपर प्रेशर रहेगा कि आलसीराम! जल्दी से सब अधूरी पूरी कीजिये। :) लगता हूँ।

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  13. कहीं से भटकती हुई अाज यहां अाई अौर लगा कि अब कुछ देर इसी ठांव बिताउं

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  14. कहीं से भटकती हुई यहां पर अाई अौर लगता है कुछ देर इसी ठांव पर सुस्ताते हुए किसी बर के पेड के नीचे बैठे हुए सब होते हुए देखने का सुख उठाउं

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  15. बढ़िया लिखा है। बिलकुल ठेठ apni hi bhasha hai

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