(1) हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे, लगे रहो अन्ना हजारे!
अपना काम बनता तो, भाड़ में जाये जनता
जनता तो यही उचारे,का करें अन्ना हज़ारे,
(2) पार्ट टाइम वेश्यावृत्ति
पहलू एक :
महत्वाकाँक्षाओं की सीढ़ी पतन की दोछत्ती से शुरु होती है ।
दूसरा पक्ष :
डा. अरविन्द के विचारों से आँशिक रूप से सहमत,
समाज को इसमें दखल देना तो दूर कोई प्रश्न करने का भी अधिकार नहीं है
यदि वह स्वेच्छा से या पति की मज़बूर सहमति से
बिना किसी के बाध्य और प्रताड़ित किये
इस कृत्य को स्वीकार किया है और
शोषण की सँभावना भी नहीं दिखती ।
अब एक ज्वलँत प्रश्न :
अस्वस्थ, क्लाँत या अनिच्छित पत्नी का अपने पति की कामेच्छा के आगे समर्पण की विवशता !
ऎसे अनचाहे समझौते को बुद्धिजीवी चश्मा किस खाने में देखना चाहेगा ?
त्याग... या फिर,
एक मध्यमवर्गीय, अर्धशिक्षित, नॉन-वर्किंग स्त्री का अपने अस्तित्व के लिये अपने असँवेदनशील पति से समझौता क्यों नहीं ?
यह अपना और अपने साझा बच्चों के भरण पोषण एवँ जीवनरक्षा के लिये स्व-उत्सर्ग / बलिदान क्यों नहीं ?
अनुराग जी यह प्रश्न आपसे ही है !
(3) चर्चा मंच की चोन्हरई
आह आह और वाह वाह से हमहूँ उकताये बईठे हैं,
आपको पढ़ लेते हैं और उतान होकर मन में घुलाते हुये कचरते रहते हैं,
पर आज की रात अपनी टिप्पणी ठोंके बिना नहीं टलूँगा ।
हमारे मिथिला-वैशाली क्षेत्र में चोन्हराना का सोझा मतलब किसी स्थितिविशेष से बैठता है ।
एक -Looking London Talking Tokyo ( हम देखा कुछ रहे हैं अउर ई बुरबक देख कुछ रहा है, काहे चोन्हराता है बे ? )
दो -मूर्ख ( ई चोन्हरा से कुच्छौ कहिये, इसका दिमगिये में नहीं ठँसता है )
तीन -जानबूझ कर धुँधला देखना ( सोझे सामने त लउक रहा है, त जबरजस्ती काहे चोन्हरा रहे हैं, जी ? )
चार -नेत्रों का विस्फारित होना ( अईसि जुलुमी कटरिया रही के हम त देखते हि चोन्हरा गये )
पाँच -अचानक दृष्टिभ्रम हो जाना ( ऊ टरकवा अ ईसा न लाइट मार दिहिस कि हम साइकिल लिये दिये चोन्हरा के उसी में घुस गये )
छः -एक और भी है.. का नाम से :)
सात -एक याद नहीं आ रहा है :)
आठ -एक कुछ भूल रहा हूँ :)
नौ -ई वाला भोर में अम्मा के उठने पर पूछ कर बताऊँगा :)
मुला चर्चा के नाम पर अईसी गँडौल मची है, जईसे धरती पर गोड़ टेकते ही बछड़ा उमकने लगता है । हम आपके रँज़ का समर्थन करते हैं जी ।
(4) बाउ मण्डली और बारात एक हजार – प्रसंगांत
मुझसे यह प्रसँगकथा अनदेखी क्योंकर रह गयी,
यह देख ग्लानि हो रही है, आँचलिक साहित्य का अनमोल ख़ज़ाना है यहाँ !
भई वाह.. भई वाह !
(5) लंठ महाचर्चा: अलविदा शब्द, साहित्य और ब्लॉगरी तुम से भी...
विवादों ने ही नही, प्रशस्तिगान की आवश्यकता ने भी शब्दों के सामर्थ्य को मान्यता दी है ।
और.. माध्यम चाहे जो भी हो, शब्द कभी नहीं मरेंगे ! शिलालेख से भोजपत्र, और भोजपत्र से कागज़ तक आने में शब्दों को इसी सँक्रमण से गुज़रना पड़ा है, जैसे आज कागज़ से उठ कर वह कीबोर्ड पर कब्ज़ा करने में लगा है ।
इसकी कमेन्ट्री में शब्दों का खिलँदरापन, प्रस्तुति के अँदाज़-ए-बयाँ को बाँधने वाला बना रहा है ।
(6) प्रसन्न होऊँ ? अपने केश नोचूँ ? निर्लज्जता जारी रखूँ ?
नागरिक के जान की कीमत क्या होती है ?
एक मुआवज़ा... या और भी कुछ ?
इस मेनहोल में आदमी केवल घायल होकर रह जायेगा,
मुआवज़ा कम देना पड़ेगा, कि नहीं ?
क्या एक नागरिक इस कीमत पर अपँग व्यवस्था को अपनी सेवा भी न देगा ?
यदि वह स्वयँ ही अपँग हो गया तो सरकार को मुआवज़ा बढ़ाने का एक मौका और मिलेगा, कि नहीं ?
क्यों ऎसी समाजविरोधी पोस्ट लिखते हो, गिरिजेश बाबू ?
(7) एक ठो कुत्ता रहा ...
उत्तम-कथा : मनोरँजक निष्कर्ष
पर, कहीं आप यह सँदेश तो नहीं देना चाहते कि
1. उत्सर्जन के लिये उचित अवसर की समझ होनी चाहिये ।
2. घूमते कालचक्र के अँतर्गत गतिमान कतिपय श्वान-शिरोमणियों को स्वयँ ही अपनी औकात भूलना काल-कलवित होने का कारण बन सकता है ।
3. शीतलता ( सुविधा ) की छत्रछाया का लाभ लेने वालों के लिये उसकी जड़ों में मूतना एक आत्मघाती कदम है ।
कुछ अतिरिक्त निट्ठल्ले क्षणों में कुछ और सँभावित निष्कर्ष भी निकाले जायेंगे । कृपया प्रतीक्षा करें, अभी मुझे इसी स्टॉप पर उतर लेने दीजिये ।
(8) पुरानी दुपहरी के कुछ बिम्ब - टिकिर टिक्क टिक्क टिक्क
और नन्नन ?
नन्नन यदि आज हमारे बीच आ जायें.. तो बिलख पड़ें
" कलेवा खात हईं, घोंटाते नईखे
आऽ मड़ुआ के रोटी भेंटाते नईखे "
आज के नन्ननों ने एक नई तरह की समृद्धि (?) में मोटा अनाज देखा ही नहीं !
(9) बजरलंठ ब्लॉगर समारोग
.महोदय,
आपके इस आयोजन से परिचित हुआ,
आपको निग़ाह-पैनी के इनाम के लिये चुन लिया गया है ।
पुरस्कार प्राप्त करने के लिये कृपया निगाह फाउंडेशन से शीघ्र सम्पर्क करें ।
धन्यवाद !
(10) प्लीज शट अप!
कल से यहाँ पर चल रहे बहस को पढ़ रहा हूँ, मॉडरेशन के अँदेशे में टिप्पणी करने से बचता रहा ।
मैं सीधे सीधे यही कहूँगा कि क्यों करें शट-अप... बहुत शट-अप हो चुका, हम स्वयँ ही शट-अप होते रहे... अब क्यों करें शट-अप ?
अब बतकहियों के वताशे फोड़ने का समय नहीं है, हम बहुत बौद्धिक जुगाली कर चुके.. कुछ कुछ चेतना जगी है.. तो क्यों करें शट-अप ?
पहले ही अधिकतर सामाजिक मुद्दों पर हमलोग इतने सहिष्णु हो चुके हैं कि कोई कुरीति कोई अनाचार हमारे लिये एक खबर मात्र बन कर रह जाती है, इसके उलट धार्मिक मुद्दों पर हमारी असहिष्णुता अव्वल दरज़े की रही है । किसी ऎरे गैरे का भगवा, और अलाने फलाने की दाढ़ी हमें श्रद्धावनत करती आ रही है ।
अफ़सोस तो तब होता है जब बुद्धिजीवी समाज जागरूकता में पहल करने के बजाये ’ क्या कहा जाये, अब किया ही क्या जा सकता है ’ जैसे ज़ुमलों में घुसे रहना पसँद करता है । हमारी तार्किक दृष्टि जैसे कुँद हो गयी हो । उनमें मनन का स्पष्ट अभाव है, हाल के वर्षों में मीडिया ने हम सबको तमाशबीन बना दिया है । जैसे घरों में बैठे बैठे चैनलों को कोट करते रहने में ही समग्र बुद्धिमता समाहित हो ।
आज देश की ज़रूरत यह नहीं है कि कहीं से एक नेता अवतरित होकर अपने पीछे जनसमुदाय खड़ा करे, बल्कि ज़रूरत यह है कि जनसमुदाय स्वयँ खड़ा होकर अपने मध्य से एक नेतृत्व खड़ा करे ।
(11) इस मोड़ से जाते हैं...
महत्वाकाँक्षी राजनीतिक फ़ैसले लेने वाले यह क्यों नहीं सोचा करते कि,
इससे कितने परिवार, गाँव और शहर प्रभावित होंगे, और इन फ़ैसलों की धधक
कितनी पीढ़ीयों को परेशान करती रहेगी ?
सकल विश्व में विस्थापन का इतिहास देखें, उसके पीछे एक व्यक्ति ही उत्तरदायी होता है ।
(12) ब्लॉगर की अम्माँ गोंइठी दे।
एक सूक्ष्म टिप्पणी ही पर्याप्त है,
वह है.. " वाह ! "
अपनी विशद यात्राओं के दौरान मैंने मैक्लॉयड गँज,धर्मशाला में ठहर कर इनको और इनकी जीवनशैली देखी है ..... मनोहर, मानवीय मेघा की सँभावनाओं एवँ जिजीविषा से भरपूर.... दुबारा जाने की इच्छा है, उनका सम्पूर्ण रहन बड़ा रहस्यमय लगता है । आपकी आलेख ऋँखला मेरी ज़रूरत पूरी करती हुई सी लगती है । अनुराग शर्मा द्वारा दी जानकारियाँ भी मेरे लिये नयीं हैं । पृष्ठाँकित करने योग्य सँग्रहनीय आलेख प्रस्तुत करने के लिये बधाई स्वीकार करें ।
टिप्पणी बक्से में अपनी अनावश्यक हाज़िरी न लगाते हुये भी अगली कड़ियों की प्रतीक्षा रहेगी ।
(14) तिब्बत : चीखते अक्षर (3)
जानकारियों का गज़्ज़ब सँकलन गिरिजेश जी,यह आलेख ऋँखला भुलाये न भूलेगी..
इस बेला तिमिर के गहन शून्य में यह सँगीतमय हृदय-सूत्र सुनने में देह के सारे रोंये तक सजग हो उठते हैं ।
बहुत बहुत धन्यवाद ।
पुनःश्च; क्या यह अच्छा न रहता कि इस ऋँखला की अँतिम कड़ी में आप इन जानकारियों के मूल स्रोत का उल्लेख भी करते, ताकि इसमें और भी डूबने के इच्छुक जिज्ञासु प्रवृत्ति पुरुष उन तक पहुँच बना पाते । यह एक सुझाव मात्र है ।
(15) तिब्बत - चीखते अक्षर (4)
तिब्बती इतिहास के ये लोमहर्षक पृष्ठ बड़े घृणास्पद हैं । आपने धैयपूर्वक उन्हें सँयत और नियोजित तरीके से परोसा है । इनकी वास्त्विकतायें कहीं अधिक निर्मम है । आप इसे हिन्दी में प्रस्तुत करके भाषा के प्रति एक महती कार्य कर रहे हैं ।
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