मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

गिफ्ट वाली पायल

सनीप और बिनती का घर झुग्गी बस्ती का सबसे खुशहाल घर है। हाई स्कूल पास सनीप ठेला खींचता है, ठीक ठाक कमाई हो जाती है। आठ तक पढ़ी बिनती कोठियों में झाड़ू पोंछा का काम करती है। गाँव में अधिया बटाई पर थोड़ी जमीन है जिसके बारे में लोग कहते हैं कि जिस दिन बाइपास सड़क निकली, करोड़ भर की सम्पति होगी! दोनों साथ साथ गिनते हैं – हजार, दस हजार, लाख, दस लाख, करोड़! बिनती को सुरुहरी होने लगती है तो सनीप सँभालता है – अभी किसी काम की नहीं। दोनों को एक टीस सी है सो उनके दोनों बेटे पब्लिक स्कूल में पढ़ने जाते हैं कि आगे चल कर ठीक ठाक पढ़े लिखे कहा सकें, बड़े आदमी बन सकें।

आज मुन्हार हो गया लेकिन सनीप घर नहीं आया। बिनती थोड़ी बेचैन हो उठी – ऐसा तो कभी नहीं हुआ! उसने बरसाती का परदा उठाया और बाहर आ गई। झुग्गियाँ रोशन हो गई थीं। लग्गी उठा कर बिनती ने खुद कँटिया बझा दिया। भीतर साफल जल उठे, रोशनी हो गई।

बिनती ने दोनों बेटों को पढ़ने पर लगा दिया और खुद गोद की बेटी को दूध पिलाने लगी। उसके मन में आशंका ने सिर उठाया – कहीं पी पा कर ...? पापी मन को झटक कर वह मुस्कुराई – हो ही नहीं सकता। सनीप ने ठेला चलाना शुरू किया तो रात को उसकी देह पिराती थी। किसी किसी दिन तो सो भी नहीं पाता था। मेहनत वालों को तुरंत नींद आ जाती है! ये कौन सी बीमारी? एक दिन बिनती ने लेटे हुये सनीप को खूब निहारा। उसका पति इस काम के लिये नहीं बना था लेकिन करम का लिख्खा, क्या करे? उस दिन बिनती ने खुद कहा – शाम को थोड़ी अंग्रेजी पिया करो। खबरदार जो देसी को हाथ लगाया! पहले तो बोतल लेकिन अब टिन वाली पीता है सनीप। खाली टिन जैसा कुछ वापस लाता है – कबाड़ी कुछ न कुछ दे ही देता है। आज तक कभी नशे में धुत्त हो कर सनीप घर नहीं आया। एकाध महीने से तो खाली टिन भी नहीं लाता! रात में हमबिस्तर होते बिनती को लगता है कि अब वह पीता नहीं। ऐसा क्यों? वह समझ नहीं पाती।

बेटी दूध पीते पीते सो गई। बिनती ने उसे लिटाया ही था कि बाहर ठेले की आवाज़ सुनाई दी। भाग कर बाहर निकली तो सनीप ही था। नज़दीक आया तो बड़े लाड़ से मुस्कुराने लगा। बिनती का माथा ठनका – हो जी! कहाँ रह गये थे इतनी देर? मोबाइल पास रखते नहीं, जी घबराने लगता है।
सनीप पूछ पड़ा – बच्चे सो गये क्या?
बिनती ने बताया कि बेटे अभी जगे हैं। सनीप ने उसका हाथ पकड़ खींचा – चल टहल आते हैं।

और आदतों की तरह टहलने की आदत भी देखा देखी ही लगी, रोज तो नहीं लेकिन कभी कभार पूरा परिवार टहलने जाता है – अलग तरीके के कपड़े पहन - बगल की कोठी वाली दीदी की मेहरबानी, बिनती कभी गलत आदत न पकड़ना। देखा देखी बिनती का परिवार बड़े लोगों जैसे व्यवहार पकड़ने लगा है। बिनती सोचती रहती है – सनीप अच्छा है, इधर उधर ताक झाँक नहीं करता। कोठियों के बड़े लोग तो ...

बिनती हँसने लगी – हो जी? यह कोई टैम है? ऐसी क्या खास बात है जो आज देर से आये और अभी टहलने की बात कर रहे हो?
सनीप ने जवाब नहीं दिया और उसे खींच ले चला। स्टेडियम के बाहर बेंचों पर बड़े बुजुर्ग बैठे थे। कुछ बच्चे भी खेल रहे थे। किनारे की थोड़ी अन्धेरी बेंच पर दोनों बैठ गये। सनीप ने बिनती को पास खींच लिया। उसने जेब से एक पन्नी निकाला और बिनती के हाथ में पकड़ा दिया – देखो तो क्या है?
चीज गढ़ू थी। बिनती चकरघिन्नी हो गई - क्या हो सकती है? कहीं कोई गलत सलत हाथ तो नहीं मार आया!
पता नहीं कि वह इस सोच से सिहरी या सनीप के अचानक चुम्बन से जिसकी साँसों में आज अंग्रेजी की हल्की बास थी।
इतने दिनों बाद इसने आज पिया है! - बिनती के मन से सारी शंकायें उड़न छू हो गईं, वह खुश हो गई।

“हो जी, बड़ा लाड़ लड़ा रहे हो, बात क्या है?”
“खोल तो सही!”
बिनती ने खोला तो धीमी रोशनी में चमकती हुई पायल नज़र आई। इतनी भारी पायल! वह अचरज से भर उठी। आज तक सनीप उसके लिये कुछ नहीं लाया था, आज ऐसा क्या हो गया?
सनीप ने उसे बाहों में जकड़ लिया – आज के लिये कई दिनों से पैसे जोड़ रहा था। पता है आज हमारी शादी की बरसगाँठ है?पायल हजरतगंज से लिया है। गली में ठेला छिपा कर दुकान पर गया था। गार्ड ने बड़ी मुश्किल से दुकान में घुसने दिया।  
निहाल बिनती ने सिर उसके सीने में छिपा लिया – हो जी, बड़े लोगों की एक और आदत सीख लिये! मुझे पता है महिनवार से तुम पी नहीं रहे थे।
सनीप ने उसके केशों में अंगुलियाँ फँसा दीं,“हाँ, वही पैसे जोड़ कर तो ले आया।“ उसने आवाज़ भारी कर कहा – गिफ्ट!
बिजली चली गई तो दोनों की खिलखिलाहटें देहों के कसाव में घुटने लगीं।  
दो तीन मिनट के बाद बिजली वापस आने पर उन्हें बच्चों की सुध आई और वे अपनी झुग्गी की ओर उड़ चले। बड़े बुजुर्गों ने बेंचों को खाली करना शुरू कर दिया था। सड़क की धूल और जोड़ी भर पायलें आज सहेली थीं। (अगला भाग यहाँ)                             

22 टिप्‍पणियां:

  1. एक और प्रॉजेक्ट? बढ़िया है भैया जी.... हमारी तो चाँदी ही चाँदी है चाहें उससे पायल बने या कमरधनी...

    सादर

    ललित

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    1. प्रोजेक्ट नहीं भैया! बस एक या अधिक से अधिक दो कड़ियाँ और।

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    1. माने ना ये मन बावरा, तुझ बिन माने ना
      ढूँढ़े रात दिन क्या बावरा!

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  3. अभी तक तो पवित्र कथा है ...किसी को इम्प्रेस करने के लिए क्या ?

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    1. अब तो लकड़ियाँ सहेजने की अवस्था आ गई भैया! इस पवित्र दौर में क्यों गुनाह करें? कहानी से इम्प्रेसन तो वैसे भी नहीं पड़ता?
      जो है बस उसे बाँट देना है कि देख लो संसार, एक नमूने हम भी थे और हैं। :)

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  4. आपकी कहाने जब लगे कि खतम हो गयी है या हो रही है, तब्बे शुरू होती है!! इसलिए पुरा सुनने के बादे हम कहेंगे जो कहना है..
    एक अऊर खराबी है आपकी कहानी की.. जब खतम होती है तो कसम से कुच्छो कहने के काबिल नहीं छोडती!!
    पुनश्च:
    इस "गढू" शब्द का अर्थ स्पष्ट करें.. दूसरी बार मुझसे टकराया है!! आपही की कहानी में मिला है यह देशज शब्द.. हमारे अंचल में भी नहीं सुना कभी!!

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    1. :) आप बहुत गहराई तक जाकर पढ़ते हैं।
      यह शब्द बहुत गहन है। नानी बोलती थी - गर्हू (नागरी लिपि में ध्वनि को लिखना कठिन लग रहा है) और एक अम्मा कहती हैं - गढ़ू।
      इसके कई अर्थ हैं - गहन, भारी, गम्भीर, सान्द्र आदि कई अर्थों में प्रयुक्त होता है। इस पर 'शब्द चर्चा' में अच्छी बहस हो चुकी है।

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  5. अनजाने ही अपने से बड़े लोगों की आदतें अपने आप सोख लेते हैं हम सब. शादी की बरसगाँठ मनाने का तरीका पसंद आया.
    घुघूतीबासूती

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    1. 'आदत सोख लेना' - अच्छा लगा यह प्रयोग।संक्षिप्त रूप में बहुत कुछ कह देता है।

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  6. छोटी छोटी प्रेम भरी छुन छुन से प्रेम का संगीत बनता है।

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  7. आपकी कहानी "वेश्या" ने नि:शब्द कर दिया था पिछली बार…… इस बार हमने सोचा कि कुछ तो कह ही लें पता नहीं जब आप इसे भी खत्म करें तो हम कुछ कहने की हालत में हों या नहीं !

    अगली कड़ी के लिये आतुर है मन !

    नमन !

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  8. कितना सुन्दर !! :)

    प्रेम और उसकी अभिव्यक्ति "बड़े लोगों" की जागीर थोड़े ही है :)

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  9. अभी शुरू किया है पढना, सप्ताह-दस दिन से आसरा ही लगाये था समय का। साफल! गज़ब्बे शिल्प निखर आया है।

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  10. @ (अगला भाग यहाँ)

    यहाँ गलती से इसी पोस्ट का लिंक दे दिया गया है, कृपा ठीक कीजिए ताकि मेरे जैसे 'आलसी' पाठक को दिक्कत न हो.

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