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रविवार, 11 नवंबर 2018

किशोर नाक्षत्रिकी - 1

पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, साथ में अपने अक्ष पर घूमती भी है (परिभ्रमण) जैसे कि कोई लट्टू नाचते हुये किसी बिंदु का चक्कर भी लगा रहा हो।
उसके घूमने का अक्ष परिक्रमा के तल से प्राय: 23.5 अंश झुका हुआ है। सर्कस में झुकी हुई मोटरसाइकिल के साथ चालक का एक गोले में घूमना समझें, केवल यह मान कर कि चालक ऐसी सीट पर सवार है जो अपने अक्ष पर भी घूम रही है।


धरती का परिभ्रमण अक्ष उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं को निश्चित करता है तथा उसके लम्बवत जिन दो बिंदुओं के निकटवर्ती क्षेत्र में सूर्य क्रमश: उगता एवं अस्त होता दिखता है, वे क्रमश: पूरब एवं पश्चिम होते हैं। जब इण्टरनेट, जी पी एस आदि नहीं थे तथा हम प्रकृति से इतने कटे नहीं थे, तब लोग दिशाओं को बिना किसी यंत्र के ही बता सकते थे क्यों कि उनकी आंतरिक समझ सूर्य गतियों से अधिक जुड़ी थी, दिन में भी अंधेरा कर कृत्रिम प्रकाश से चलने वाले कार्यालय भी नहीं होते थे।

अक्ष के झुकाव के कारण सूर्य प्रतिदिन ठीक पूरब में उगता या पश्चिम में अस्त होता नहीं दिखाई देता, इस दो दिशाओं के सापेक्ष उस काल अवधि में दोलन करता दिखता है जिसे हम वर्ष कहते हैं। वर्ष क्या है?

अक्ष पर पृथ्वी के इस झुकाव के कारण ऋतुयें होती हैं। ऋतु अर्थात एक निश्चित आवृत्ति से धरती के वातावरण में गरमी, ठण्ड, सूर्य के दिखने के घण्टों में घटबढ़। यदि झुकाव नहीं होता तो घटबढ़ नहीं होती, सूर्य सदैव एक बिंदु पर उगता दिखता, एक ही बिंदु पर अस्त होता अर्थात धरती के विविध क्षेत्र उसके गोले अपनी अपनी विशेष स्थिति के अनुसार सदा सदा एक ही मात्रा में ऊष्मा प्राप्त करते।

मनुष्य हेतु सबसे स्पष्ट निश्चित आवृत्ति से होने वाली प्राकृतिक घटना वर्षा है। मनुष्य ने देखा कि एक निश्चित आवृत्ति से कुछ महीने या दिन ऐसे आते हैं जब वह वर्षा अधिक होती है, निरंतर होती है जो कि कृषि अर्थात पेट पालन के लिये अन्न आदि उत्पन्न करने के उद्योग हेतु बहुत लाभकारी होती है। उस निश्चित आवृत्ति को वर्ष नाम दे दिया गया।

वास्तव में वर्ष पृर्थ्वी द्वारा सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लिया गया वह समय है जिसे एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक की समय इकाई 'दिन' या 'दिनमान' में मापा जाता है। जो कि मनुष्य के अपने विभाजन से 36 मुहूर्त या 24 घण्टे होता है।

मनुष्य ने पाया कि वर्ष 365 से 366 दिन तक का होता है जिसे गणना में सुविधा के लिये उसने 360 का निकट मान कर विविध इकाइयाँ बनाईं।

उसने ऋतुओं अर्थात एक निश्चित कालखण्ड में देह पर, कृषि पर, पेड़ पौधों पर, जलवायु पर होने वाले समेकित प्रभावों को नाम दिये। मोटा मोटी जाड़ा, गरमी, वर्षा।

भारत में रहने वाले मनुष्य ने इन तीन का पौधों एवं त्वचा पर प्रभावों को देखते हुये दो दो में विभाजन और किया - वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शीत तथा छ: ऋतुयें हो गईं।

उसने पाया कि वसंत के समय जब कि चहुँओर पुष्प खिले होते हैं, त्वचा एवं मन पर नया नया सा प्रभाव होता है, एक दिन सूर्य ठीक पूरब में उगता है तथा ठीक पश्चिम में अस्त होता है। प्राय: आधा वर्ष बीत जाने पर ऐसा पुन: होता है। ये दो दिन विषुव कहे गये।

ऐसे ही एक समय ऐसा भी होता है जब सूर्य के उदय का बिंदु उत्तर की दिशा में झुकते झुकते एक समय के पश्चात पुन: लौटने लगता है, यही बात एक अन्य समय के साथ दक्षिणी झुकाव में भी होती है मानों सूर्य एक डोरी से बँधा लोलक हो जो दोलन कर रहा हो!

इस चार बिंदुओं ने उसकी नींव डाली जिसे हम आज कैलेण्डर कहते हैं। वसंत ऋतु वहाँ भी होती है जहाँ आज सम्पूर्ण विश्व में मान्य ग्रेगरी का कैलेण्डर विकसित हुआ। यह कैलेण्डर ऋतु सापेक्ष है तथा वसंत विषुव प्रत्येक वर्ष एक निश्चित दिनांक (~ 21 मार्च) को ही पड़ता है।

पृथ्वी की अन्य ऐसी भी गतियाँ हैं जिसकी आवृत्ति वर्ष से हजार लाख गुना है अर्थात बहुत धीमी है। उनके प्रभाव पर आगे बात करेंगे किन्‍तु अभी वर्ष पर ही केंद्रित रहते हैं।

वर्ष के साथ समस्या यह है कि वह न तो ठीक 365 दिन का होता है, न ही 366 दिन का। वह इन दो के बीच, लगभग 365 दिन एवं 5 घण्टों एवं उससे भी अल्प समयावधियों को मिला कर होता है जो एक पूर्ण घण्टे से कम होती हैं।

कैलेण्डर में तो केवल दिन होते हैं, घण्टे नहीं। अनेक वर्ष बीतने पर यह अतिरिक्त अवधि बढ़ते हुये गड़बड़ करने लगती है यथा चार वर्ष पश्चात लगभग एक पूरे दिन का अंतर तथा घण्टे से लघु अवधियों के कारण आगे के सैकड़ो हजारो वर्षों में जुड़ने वाले अंतर। इस कारण ही समायोजन किया जाता है - लौद या लीप वर्ष, प्रत्येक 4 वर्ष पर एक दिन जोड़ कर 366 दिन का वर्ष मानना। अन्य समायोजन भी घण्टे से लघु अवधियों हेतु होते हैं जिन्हें हम आगे देखेंगे।

ध्यान देने योग्य यह बात है कि ग्रेगरी के कैलेण्डर में समायोजन इस प्रकार सदैव चलता रहेगा। ऋतु आधारित इस वर्ष गणना में किसी ऋतु का आरम्भ प्राय: निश्चित दिनांक पर ही होगा (लौद समायोजन के कारण कुछ एक दिनों का ही अंतर हो सकता है)। यह स्थिति हजारो वर्षों तक ऐसे ही रहेगी क्यों कि समायोजन कर के एक निश्चित दिनांक को वसंत विषुव हेतु सुरक्षित रखा जाता रहेगा।

यह हुआ पूर्णत: ऋतु या पृथ्वी से दर्श सूर्य गति आधारित कैलेण्डर किंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती। आकाश में रात में चंद्रमा भी दिखता है, उसका क्या? क्या ऐसे वर्ष भी हो सकते हैं जो सूर्य के अतिरिक्त चंद्र गति पर भी आधारित हों या केवल चंद्र गति पर ही आधारित हों?

उत्तर हाँ है। इस हाँ में मानव की विराट मेधा एवं प्रेक्षण क्षमता के प्रमाण हैं जिन्हें हम अगले अंक में देखेंगे।

शनिवार, 14 जुलाई 2018

हथिया के पेटे जाड़ - नक्षत्र, सूर्य, चंद्र, पृथ्वी प्रेक्षण - लोकगिरा, वर्ष, ऋतु, माह

सूर्य पृथ्वी का निकटमत तारा है जहाँ से प्रकाश को तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकण्ड की गति से पहुँचने में मात्र आठ मिनट लगते हैं अर्थात किसी भी समय हमारी आँखों से देखा जाने वाला सूर्य आठ मिनट पुराना होता है अर्थात यदि सूर्य पर कुछ घटित हो तो हमें आठ मिनट पश्चात दिखेगा। 
प्रॉक्जिमा सैंटौरी तारा हम से दूसरा निकटतम तारा है जो कि लगभग सवा चार प्रकाशवर्ष की दूरी पर है अर्थात वहाँ से चले प्रकाश को हम तक पहुुँचने में सवा चार वर्ष लगेंगे अर्थात उसे जब भी हम देखेंगे, सवा चार वर्ष पुराना ही देखेंगे। 
अब उन तारों, निहारिकाओं, मंदाकिनी इत्यादि की सोचें जो हमसे लाखों प्रकाश वर्ष दूर हैं, उनका वर्तमान तो हम जान ही नहीं सकते ! दिक्काल की सीमायें यही हैं।
...  
विराट ब्रह्माण्ड में यदि हम अपने क्षुद्र सौरमण्डल को देखें तो पृथ्वी अपने अक्ष पर जितने समय में एक चक्र पूरा करती है, उससे लगभग 365 गुना समय में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है। सूर्य भी अपने समस्त ग्रहों के साथ तीव्र गति से भागता जा रहा है किंतु हमें तो स्थिर प्रकाश पिण्ड ही लगता है जिसकी परिक्रमा हम कर रहे हैं। कारण है, तुलनात्मक रूप से हमारा अति लघु रूप। हमें दिन रात जो कि पृथ्वी के अक्षीय घूर्णन के कारण होते हैं, प्रति दिन पता चलते हैं, दिन की इकाई बनी ही उससे है किंतु उससे क्रमश: बढ़ने में समस्यायें होने लगती हैं। 
By LucasVB [Public domain], from Wikimedia Commons
ऋतुयें इस कारण होती हैं कि पृथ्वी का घूर्णन अक्ष लट्‍टू की भाँति झुका हुआ है जिसका शीर्ष एक वृत्त में घूमता  रहता है, आकाश के जिस क्षेत्र की सीध में किसी समय उसकी शिरोरेखा पड़ती है, उसे ध्रुव कहते हैं, धुरी की भाँति अटल जो कि वस्तुत: लगभग 21 से 26 हजार वर्षों के आवर्तकाल से परिवर्तित होता रहता है। उसकी दिशा ही उत्तर दिशा है - ऊपर, उदीचि, उत्तर। चूँकि यह एक धीमी गति है, इसका प्रेक्षण सभ्यताओं के विद्वान ज्योतिषी ही कर पाये, जनसामान्य के लिये तो ध्रुव धुरी बने स्थिर ही रहे।
इस गति के कारण ही सूर्य देव पूरब पश्चिम में क्रमश: उदित अस्त दिखते हुये भी उत्तर दक्षिण दिशाओं में झुकते, सीधे होते, पुन: झुकते एक आवर्ती गति करते प्रतीत होते हैं। झुकाव के अल्प एवं अधिक होने से विकिरण, ऊष्मा आदि की प्राप्ति में हुये एवं उनसे जुड़े अन्य परिवर्तनों के कारण विविध नाटकीय परिवर्तन धरा पर दिखते हैं, कभी फूल ही फूल, कभी सब पत्ते लुप्त, कभी वर्षा ही वर्षा तो कभी तपती धूप। ये परिवर्तन सहसा नहीं हो जाते, उनका पता हमें अपेक्षतया मंद गति से शनै: शनै: पड़ता है।
ये परिवर्तन एक लय में होते हैं - संस्कृत का ऋत, अंग्रेजी का rhythm. ऋतु अनुकूल आहार विहार से स्वास्थ्य ठीक रहता है, rhythm में विविध ध्वनियाँ सङ्गीत हो जाती हैं, जीवन सङ्गीत यही तो है ! आवर्ती लय।     
इन दो घूर्णन गतियों के साथ साथ पृथ्वी द्वारा सूर्य की वार्षिक परिक्रमा है ही। चूँकि ये सारी गतियाँ लयबद्ध हैं, इनमें कोई यादृच्छ या अनिश्चित या सहसा परिवर्तन नहीं हो सकते; सूर्य सापेक्ष सबसे बड़े परास वाली गति 365 दिनों के वर्ष विभाजन के सापेक्ष हम शेष दो को व्यवस्थित कर सकते हैं। यही तो है अभियांत्रिकी एवं प्रबंधन की एक प्रिय कार्यविधि - सकल से सूक्ष्म की दिशा में, from WHOLE to PART
चंद्रमा को आप प्राकृतिक कैलेण्डर मान सकते हैं जो कि भीति पर टँगा होने के स्थान पर आकाश में टँगा कलाओं के माध्यम से तिथियाँ बताता रहता है। आज सामान्य जन भले चंद्र को देख तिथि न बता पायें, एक पीढ़ी पूर्व तक लोग देख कर बता देते थे - अन्हार या अँजोर, चौथी या पञ्चमी ! 
उसकी सोलह कलाओं में से आरम्भ एवं अंत को हटा दें तो चौदह चौदह दिन की दो अवधियाँ हुईं अट्ठाइस एवं वे दो मिला कर एक अवधि हुई तीस दिन की। मा, चंद्रमा से मास, moon से month. 365 को जब इन तीस दिनों में बाँटा गया तो बारह इकाइयाँ हो गयीं, बारह नामों वाले महीने। बचे खुचे दिनों का समायोजन विविध रीतियों से कर लिया गया। एक दूसरा गणित, अधिक सटीक 'पक्ष' वाला हुआ - जब चंद्र घट रहा हो तो अन्हार, बढ़ रहा हो तो अँजोर - क्रमश: कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष। माह में दो पक्ष हो गये मानोंं मास रूपी उड़ते पक्षी के दो पंंख हों ! 
दो महीने मिला कर हो गयी एक ऋतु जब कि परिवेश का समेकित सकल प्रभाव निश्चित प्रकार से पारिभाषित किया जा सकता है। बारह अद्धे छ: ऋतुयें हुईंं। 
...  
इनके अतिरिक्त जो भी गतियाँ हैं, उनके लिये हमें विशेष यंत्र, प्रेक्षण, विद्या इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। उन्हें हम इनके बिना नहीं जान सकते, अतिशय मेधावी जन अनुमान मात्र लगा सकते हैं। 
रात में आकाश देखें तो हमें भिन्न भिन्न तारामण्डल दिखाई देते हैं जो विविध आकृतियों में सहस्राब्दियों से यथावत मानव को दिखते रहे हैं। इस कारण ही अनेक कल्पनाओं एवं कहानियों का सृजन हो पाया किंतु उन ताराओं में भी सापेक्ष गतियाँ हैं जो कि अतिशय दूरी के कारण हमें कोरी आँखों से पता नहीं चल पातीं। लाखों वर्षों के पश्चात उनके आकार वही नहीं रहने जो आज दिखते हैं, सप्तर्षि पूँछ वाली पतंग की भाँति उड़ते नहीं दिखेंगे, आकार परिवर्तित हो जायेगा।  
कल्पना करें कि पृथ्वी की परिधि पर एक वृत्तीय पथ बना हुआ है जिस पर हम किसी वाहन में सवार अबाध गति से चल रहे हैं। पहला परिक्रमण पूरा होते ही हमें खिड़की से वही संरचनायें दिखने लगेगीं जो आरम्भ में दिखी थीं। बाह्य परिवेश हमारा स्थिर संदर्भ बिंदु हो जायेगा जिसके सापेक्ष हम गतिमान होंगे, कहेंगे यहाँ पहुँच गये, अब आगे वह वृक्ष आयेगा, सरोवर पीछे छूट गया आदि आदि। 
इसी प्रकार पृथ्वी की गति अंतरिक्ष में है। वे विविध तारामण्डल स्थायी स्थिर संरचनाओं की भाँति संदर्भ बिंदु हैं, स्थिर stationary station, स्‍थिर स्थानक हैं जिनके सापेक्ष गाड़ी की गति का लेखा जोखा रखा जाता है। अंतर इतना ही है यह गाड़ी विलम्ब नहीं करती, न कभी समय से पहले चल पाती है। लगभग स्थिर मान का वर्ष उसकी इस समयबद्धता के कारण ही है। गति में विविध सूक्ष्म अंतर हैं किंतु उनकी उपेक्षा की जा सकती है या उन्हें जटिल बृहद गणित में समोया जा सकता है। बृहस्पति का साठ वर्षीय चक्र, सप्तर्षि का 2700 वर्षीय आदि ऐसी ही व्यवस्थायें हैं। 
हमारी गति के कारण वर्ष भर सूर्य जिस पथ पर चलता दिखाई देता है, उस पर सम दूरी पर विविध तारों एवं तारामण्डलों के 27 स्थानक मान लिये गये जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। 27 ही क्यों? 
यहाँ पुन: चंद्रमा रूपी प्राकृतिक कालेन्‍द्र calendar काम आया। सूर्य के साथ समस्या यह है कि जब वह दिखता तो कोई अन्य तारे या नक्षत्र नहीं दिखते। चंद्रमा के साथ यह समस्या नहीं है। वह नक्षत्रों के साथ साथ रात में दिखता है, सबसे प्रभावी दिखता है। इसी कारण से उसे नक्षत्र रूपी स्त्रियों का स्वामी मान लिया गया। देखा यह गया कि वह किसी नक्षत्र की सीध में 27 से 28 दिनों के बीच की अवधि में बारम्बार आ जाता है, चंद्र के रूप में मानव को सूर्य गति के प्रेक्षण हेतु एक स्वतंत्र मापनी मिल गयी !  
ऋतु कोई हो, सूर्य पृथ्वी कुछ भी कर रहे हों, चंद्रमा अपनी यह 27 दिवसीय यात्रा निरपेक्ष भाव से करता रहता है। चूँकि पृथ्वी की परिक्रमा के साथ साथ वह सूर्य की भी परिक्रमा कर रहा है, वह निरपेक्ष होते हुये भी इनके सापेक्ष सत्यापन की युक्ति हो सकता है। 
वह आभासी पथ जिस पर सूर्य अपने समस्त ग्रहादि एवं उनके उपग्रहों के साथ गतिमान प्रतीत होता है, उसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। क्रांतिवृत्त को 27 स्थानकों या नक्षत्रों में बाँट दिया गया - सूर्य जी जब इस स्थानक आये थे तो चंद्र जी अपनी फला कला में फला स्थानक पर थे ! घड़ी की व्यवस्था हो गयी। 
आकाश में चलते चलते सूर्य जब किसी नक्षत्र पर पहुँचता है अर्थात जिसकी सीध में दिखता है, उसे उस समय का सूर्य नक्षत्र कहते हैं या इस भाँति कहते हैं कि अभी सूर्य उस नक्षत्र पर है। ऐसा ही चंद्र के साथ है। इस कारण ही किसी दिन सूर्य नक्षत्र एवं चंद्र नक्षत्र, दो होते हैं। दोनों का एक साथ एक ही नक्षत्र पर होना बहुत सुलभ घटना नहीं है।  
365.25 दिनों की पृथ्वी की वार्षिक गति को 27 नक्षत्रों से भाग दें तो सूर्य एक नक्षत्र पर साढ़े तेरह दिनों से किञ्चित अधिक समय तक रहेगा। 
(कभी यह भी था कि मानव निर्मित ये विभाजन समान नहीं थे किंतु हमें तो अब  का देखना है।)
ग्रेगरी का अंग्रेजी कैलेण्डर शुद्ध सौर है अर्थात उसमें चंद्रमा की कलाओं, मास, दिन, तिथि आदि के संयोजन नहीं होते, न उस उद्देश्य से गणितीय संशोधन किये जाते हैं; इस कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित इस कैलेण्डर के दिनाङ्कों को सौर गति अर्थात उसके विविध नक्षत्रों में प्रवेश से जोड़ा जा सकता है। उदाहरणतया :                 
अगस्त मास में 18 को सूर्य मघा नक्षत्र में प्रवेश कर 30 तक रहते हैं,  31 को पूर्व फाल्गुनी में, 14 सितम्बर को उत्तर फाल्गुनी में एवं 28 सितम्बर को सूर्य रूपी गाड़ी हस्त स्थानक अर्थात नक्षत्र पर पहुँचती है। 
(दिन सूर्योदय से गिनते हैं अत: रात्रि में या सूर्योदय के पश्चात हुये परिवर्तनों के लिये +/- 1 दिन की परास रहेगी।
स्पष्ट है कि इसी प्रकार ऋतु आरम्भ एवं अंत के दिनाङ्क भी बताये जा सकते हैं जो वर्षो वर्ष एक ही रहेंगे। तमिळ कैलेण्डर भी पूर्णत: सौर है, भारतीय मानक शक संवत भी। इनमें भी ऋतुओं की आरम्भ तिथियाँ निश्चित एवं स्थिर होंगी। 
24 अगस्त को शरद ऋतु का आरम्भ हो जाता है, 26.50 उत्तरी अक्षांश के निकटवर्ती क्षेत्रों में इसी दिन के निकट अगस्त्य का उदय होता है अर्थात सूर्य की ओट में अपनी कांति खो चुके अगस्त्य उससे मुक्त हो पुन: भोर में दिखना आरम्भ करते हैं। (यहाँ समस्या यह है कि इस प्रकार के उदय अस्त अक्षांश आधारित होते हैं। क्यों ? कभी समझायेंगे।
अक्षांश आधारित स्थानीय प्रेक्षण भारत में बहुत हुये एवं कृषि आधारित समाज में उन्हें ऋतुओं से जोड़ कर एक मौखिक परम्परा के ढीले ढाले लोक-कैलेण्डर के रूप में बारहो महीनों, छहो ऋतुओं के लिये सँजो लिया गया। पीढ़ियों तक इस कला में निष्णात 'घाघ भड्ढरी' प्रकार के जन किसानों का मार्गदर्शन तो करते ही रहे, उन्हें शिक्षित कर एक स्वतंत्र सशक्त वैज्ञानिक परम्परा को भी सुरक्षित सम्वर्धित करते रहे। 
ऐसे प्रेक्षणों के साथ समस्या यह है कि ये सार्वदेशिक नहीं लागू किये जा सकते। कोल्लम का प्रेक्षण काशी में काम नहीं आयेगा। हाँ, यदि दोनों स्थानों के औपचारिक ज्योतिर्विद एक साथ बैठें तो अपने अपने क्षेत्रों के लोकज्ञान के संयोग से जाने कितने रहस्य उद्घाटित कर सकते हैं।  
उत्तर भारत में अगस्त्य दर्शन को वर्षा ऋतु का अन्त माना जाता है। वर्षा इससे आगे भी होती है किन्‍तु अवसान वाली। लगभग महीने भर पश्चात जब 28 सितम्बर को सूर्य हस्त नक्षत्र में होते हैं तब अंतिम वर्षा के झँकोरों के साथ ही जाड़े की भूमिका हो जाती है। 
लोक में कहते हैं - हथिया के पेटे जाड़हस्त नक्षत्र हाथ के आकार में समाता चार तारकों का समूह है जो कि लोकगिरा में हस्त से हाथ, हाथ से हाथी हो गया है (हाथी या हस्ति को यह नाम इस कारण दिया गया है कि चौपाया होने पर भी उसकी सूँड़ ऐसे काम करती है जैसे मनुष्य का हाथ।)  
देखें तो बारह महीनों में छ: ऋतुओं हेतु प्रति ऋतु दो माह ही पड़ते हैं किंतु संधि काल का ध्यान लोक में रखा गया है। शरद है किंतु उसमें हो रही वर्षा को अगस्त्य तारे से जोड़ कर सँजो लिया गया। 
शरद है किन्‍तु उसमें हो रही अंतिम वर्षा के साथ हेमन्त (हिम का अंत अर्थात हिमपात अब ठहर जायेगा, पिघलेगा तो दाँत कड़कड़ाने वाले शिशिर का आगम होगा) अर्थात जाड़े की पूर्वऋतु से जोड़ कर स्मृतिबद्ध कर लिया गया। 
वस्तुत: शरद-हेमन्त-शिशिर की तिकड़ी ऐसी रही कि उनमें ऋतुओं का संक्रमण उतना स्पष्ट न होने के कारण पाँच ऋतुओं की भी संकल्पना करनी पड़ी। 
इसके अनेक उदाहरण वैदिक वाङ्मय में उपलब्ध हैं।
शतपथ ब्राह्मण में वर्षा एवं शरद को मिला कर पाँच ऋतुओं की बात की गयी है: 
लोको॑वसन्त॑ऋतुर्य॑दूर्ध्व॑मस्मा॑ल्लोका॑दर्वाची॑नमन्त॑रिक्षात्त॑द्द्विती॑यम॑हस्त॑द्वस्याग्रीष्म॑ऋतु॑रन्त॑रिक्षमेवा॒स्य मध्यमम॑हरन्त॑रिक्षमस्य वर्षाशर॑दावृतू य॑दूर्ध्व॑म्न्त॑रिक्षादर्वाची॑नं दिवस्त॑च्चतुर्थम॑हस्त॑द्वस्य हेमन्त॑ऋतुर्द्यउ॑रेवा॒स्य पञ्चमम॑हर्द्यउ॑रस्य शि॑शिर ऋतुरि॑त्यधिदेवतम्।
ऐसा क्यों? इसमें उस समय की स्मृति है जब वर्ष का आरम्भ वर्षा से था। शरद मिला देने पर शरद विषुव (23 सितम्बर) जो कि वसंत विषुव (21 मार्च) से छ: महीने के अंतर पर पड़ता है, वर्षा के साथ आ जाता है, नाक्षत्रिक एवं ऋत्विक प्रेक्षणों के सम्मिलन से सुविधा हो जाती है (विषुव अर्थात जब उत्तर दक्षिण में दोलन करता सूर्य माध्य स्थिति में दिखे, ठीक पूरब में उगे, ठीक पश्चिम में अस्त हो)
ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत एवं शिशिर को मिला दिया गया है: 
हेमन्‍तशिशिरयो: समासेन तावान्‍संवत्सर: संवत्सर: प्रजापति: प्रजापत्यायतनाभिरेवाभी राध्नोति य एवं वेद। 
आजकल के आधे कार्त्तिक से आधे फाल्गुन तक के इस कालखण्‍ड में माघ महीना पड़ता है जो कभी संवत्सर का आरम्भ मास था, वही शीत अयनांत वाली उत्तरायण अवधि जिसे अब लोग संक्रांति के रूप में मनाते हैं।
... 
आगे लिखते रहेंगे। हमारी मान्यताओं में जाने कितनी सहस्राब्दियों के अवशेष छिपे हुये हैं। सावधान विश्लेषण करें तो ! 

बुधवार, 23 नवंबर 2016

नाक्षत्रिक नटराज

पूर्णिमान्त आधारित नामकरण में महीने का अंत पूर्णिमा से होता है, उत्तर के अधिकांश भाग में यह प्रचलित है। गई पूर्णिमा को जब कि चंद्र कृत्तिका नक्षत्र पर पहुंचे, कार्तिक मास समाप्त हो गया और मार्गशीर्ष (अगहन) प्रारम्भ हो गया जो कि अगली पूर्णिमा तक रहेगा। उस दिन चन्द्र मृगशिरा (Orion) नक्षत्र पर होंगे। इसी से महीना मार्गशीर्ष कहलाता है।

 इसके एक और नाम अगहन का सम्बन्ध उस समय से है जब महाविषुव (Spring equinox) के दिन सूर्य मृगशिरा नक्षत्र पर होते और नया साल प्रारम्भ होता अर्थात मृगशिरा साल का अगुवा था।

दक्षिण में अमान्त का चलन है अर्थात अमावस्या के दिन महीना समाप्त होता है और शुक्ल पक्ष एक से प्रारम्भ। पूर्णिमा महीने के बीच में पड़ती है। अत: यहां कार्तिक अभी भी चल रहा है जो अगली अमावस्या को समाप्त हो जाएगा। 

किसी समय परंपरा में मृगशिरा नक्षत्र प्रजापति का रूप था जिसका मस्तक लुब्धक नक्षत्र (Sirius) रूपी रुद्र ने काट दिया था। उस नाक्षत्रिक रूपक का संबंध महाविषुव की खिसकन से था।

दक्षिण भारत में मृगशिरा, आर्द्रा और रोहिणी नक्षत्रों के साथ और नीचे का क्षेत्र ले 'विराट नटराज' का रूपक मिलता है। रोहिणी (aldebaran) और अग्नि हुतभुज (Alpha स्टार) एवं [Hyades] का क्षेत्र वैदिक यज्ञीय अग्नि से संबन्धित था। उसका नटराज का प्रज्वलित खप्पर हो जाना! कल आकाश को घूरते मेरे रोंगटे खड़े हो गये। 

तो आज रात आप नटराज का दर्शन करेंगे न? दक्षिण पूर्वी आकाश साढ़े दस के पश्चात?

सोमवार, 20 जून 2016

नक्षत्र परिचय - 2 (ग्रीष्म अयनांत के आस पास)

पहले भाग में हम बता चुके हैं कि लगभग फरवरी से लेकर जुलाई तक का समय नक्षत्र पर्यवेक्षण के लिये उपयुक्त होता है क्यों कि आकाश में बादल नहीं होते, ऋतु भी उपयुक्त होती है, धुन्ध और शीत अनुपस्थित होते हैं। वास्तव में जुलाई का महीना फरवरी की तरह लगभग ही उपयुक्त होता है, कारण यह कि जून के अन्तिम सप्ताह से ही वर्षा ऋतु साँकल बजाने लगती है।

अब तक हम इन नक्षत्रों को कुछ प्रमुख तारकसमूहों के साथ पहचान चुके हैं:     
स्वाति
चित्रा
हस्त
उत्तराफाल्गुनी
मघा
पूर्वाफाल्गुनी
अभिजित
 अब आगे बढ़ते हैं। 
जून ग्रीष्म अयनांत का महीना है। 20/21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य अपने उत्तरी झुकाव के चरम पर होते हैं और सबसे बड़ा दिन होता है। इस वर्ष संयोग अच्छा है। 20 जून को पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र पर होंगे अर्थात जेठ महीने(पूर्णिमांत) का अंत हो जायेगा। 21 जून को ग्रीष्म अयनांत के दिन आषाढ़ का महीना प्रारम्भ होगा। जेठ के महीने में सूर्य की तपन अधिकतम होती है। गाँव गिराम में कहते हैं मिरगा दहकता! मिरगा क्यों? क्यों कि इस समय सूर्य मृगशिरा नक्षत्र में होते हैं।
21 जून को ही सूर्य मृगशिरा से आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे और ईंख की खेती करने वाले किसान ‘अदरा की गुड़ाई’ की तैयारी प्रारम्भ कर देंगे। इस नक्षत्र का नाम संकेतक है कि वातावरण में वर्षा की प्रस्तावना में आर्द्रता अर्थात नमी बढ़ जाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि रामायण काल में कुछ क्षेत्रों में नया वर्ष वृष्टि प्रारम्भ से लगता था और इसीलिये संवत्सर ‘वर्ष’ कहलाता था। वे बताते हैं कि महाविषुव के स्थान पर नववर्ष का प्रारम्भ वर्षा के संकेतक ग्रीष्म अयनांत के दिन अर्थात 21 जून से माना जाता था।
21 जून के दिन उठिये, चार बजे भोर में।  पूरब और उत्तरपूर्व दिशाओं के बीच खड़े हो जाइये। उत्तरपूर्व में सबसे अधिक चमकते दिखेंगे ब्रह्महृदय (Capella), ब्रह्मबेला नाम ध्यान में आया?

मध्य दिशा में मन्द लपलप करता सा मन्द तारकपुंज दिखेगा। यही है देहाती ‘झुलनिया’ या ‘कचपचिया’ या वैदिक कृत्तिका नक्षत्र (pleiades) । जहाँ इसकी टिमटिम और द्युति के कारण सामान्य जन ने नाक में पहना जाने वाला गहना समझा वहीं वैदिक ऋषियों ने अग्नि की लपलप जिह्वा से साम्य पाया – अग्निर्न: पातु कृत्तिका।
 इसके कोरी आँख से दिखने वाले छ: तारों के काटने वाले पुराने शस्त्र कटार से आकृति साम्य के कारण कृत्तिका कहा गया। यही षडानन कार्तिकेय को दूध पिलाने वाली  मातायें हैं जिनकी महिमा अपरम्पार है। 
एक ब्राह्मण ग्रंथ में संवत्सर प्रारम्भ के समय इनके प्राची में अटल रहने के उल्लेख ने ही भारतीय परम्परा के इसाई कालनिर्धारण की धज्जियाँ उड़ा दीं। तैत्तिरीय संहिता का नक्षत्रमंडल इन्हीं ने प्रारम्भ होता है, आज कल की तरह अश्विनी से नहीं। इनके बारे में विस्तार से यहाँ भी बताया गया है।
इनके बाद सबसे आसान पहचान है अश्विनी या अश्वायुज के दो तारों (Sharatan) की जो कि लगभग पूरब में 30 से 40 अंश के बीच दिखेंगे। कुछ लोग नीचे वाले तारे की अपेक्षा ऊपर के मन्द समांतर तारे को युग्म का भाग बताते हैं। वैदिक जन इनकी प्रशंसा में बहुत छन्द रचे हैं। ये भूलों को मार्ग दिखाने वाले हैं और देवताओं के वैद्य भी – यौ देवानां भिषजौ हव्यवाहौ, विश्वस्य दूतवमृतस्य गोपौ।
अश्विनियों से ऊपर प्राची में ही मीन राशि के दो तारे दिखते हैं जिनका स्थान नक्षत्र मण्डल की अंतिम रेवती का है। कृत्तिका और अश्विनियों के बीच दिखती हैं भरणी (Torcularis)। यदि आप साढ़े चार बजे तक रुक गये और भूदृश्य स्पष्ट हो तो क्षितिज के पास दिख जायेंगे बुध ग्रह और रोहिणी(Aldebaran) नक्षत्र - साथ साथ। महाभारत काल में महाविषुव मृगशिरा नक्षत्र से खिसक कर रोहिणी नक्षत्र पर आ चुका था। रोहिणी के बारे में कुछ और इस लिंक पर।

रात पौने दस बजे के आसपास दक्षिण से दक्षिण-पूर्वी आकाश में चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, अनुराधा के साथ मूल नक्षत्र। साथ में वृक और वृत्र तारामण्डल। पूरब में गरुड़ (Aquila, Altair)।
 पहले दक्षिण में देखिये, वृक और वृत्र तारासमूह अपने आकार और तारों की बहुलता से स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं।
 नीचे क्षितिज के पास दो बहुत तेज चमकते ताराओं से ऊपर जाइये, चित्रा (Spica) मिलेंगी। पूरब की ओर बढ़िये। दक्षिण-पूर्व से थोड़ा पहले ही वृश्चिक या रामायण में वर्णित ‘ऐरावत की सूँड़’(Scorpio) स्पष्ट दिखती है। इसी में अनुराधा और ज्येष्ठा हैं। बिच्छू का डंक ही मूल नक्षत्र है। चित्रा और मूल को मिलाने वाली रेखा पर तुला राशि में हैं विशाखा (Brachium)। 
ठीक पूरब दिशा में हैं गरुड़ जी जिन्हें एक तेज चमकते तारे के परिवेश में देखा जा सकता है। पूर्ण चन्द्र के प्रकाश के कारण थोड़ी कठिनाई हो सकती है। मई उत्तरार्द्ध से जून पूर्वार्द्ध तक रात साढ़े ग्यारह बजे से नौ बजे के बीच कृष्ण पक्ष में इन्हें आसानी से देखा जा सकता है।

( क्रमश: ) 

रविवार, 21 दिसंबर 2014

उत्तरायण के दिन अब मकर संक्रांति नहीं होती!

कल के सूर्योदय के साथ उदया तिथि में 22 दिसम्बर को सूर्य उत्तरायण होंगे अर्थात दक्षिण की ओर के अपने अधिकतम झुकाव से उत्तर की ओर पहला पग लेंगे। उस समय सूर्य मूल नक्षत्र पर होंगे अर्थात आकाश में जिस अयन क्षेत्र में सूर्योदय होगा, वह मूल नक्षत्र (वृश्चिक राशि के डंक का अंतिम बिन्दु) वाला होगा। 

उत्तर दिशा को शून्य मान कर यदि दक्षिणावर्त चलें तो पूरब दिशा 90 अंश पर आती है। अपने अधिकतम दक्षिणी झुकाव में सूर्योदय लगभग 116 अंश पर होता है और वहाँ से पुन: धीरे धीरे घटाव प्रारम्भ होता है - 115, 114, 113 ...। महाविषुव अर्थात 21 मार्च के आसपास मधुमास में सूर्योदय पुन: 90 अंश अर्थात ठीक पूरब दिशा में होगा।

हिन्दुओं में उत्तरायण को मकरसंक्रांति अर्थात सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण तिथि 14/15 जनवरी से जोड़ कर माना जाता है। कभी ऐसा था किंतु आज ऐसा नहीं है। 

अब 14 जनवरी को सूर्य उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर होते हैं। उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर उत्तरायण सूर्योदय लगभग छठी सदी में होता था जब कि आर्यभट आदि ने अंतिम बार पंचांग का मानकीकरण किया। तब मकर संक्रांति और उत्तरायण सम्पाती थे। लगभग 25920 वर्षों की आवृत्ति के साथ धरती के घूर्णन अक्ष के शीर्ष बिन्दु की वृत्तीय गति के कारण यह खिसकन होती है।


 अयनवृत्त पर सूर्य का वार्षिक संचरण अथर्ववेद (19.7) अनुसार 28 नक्षत्रों में विभाजित है (संभवत: महाभारत काल में व्यासपीठ के संशोधनों में अभिजित को हटा कर यह विभाजन 27 नक्षत्रों में कर दिया गया)। 
वैदिक युग में यह विभाजन सदा समान नहीं था। समान विभाजन कालांतर में गणितीय सुविधा हेतु किया गया जिसके कारण पश्चिम के 12 राशि तंत्र को अपनाना और उसके भीतर नक्षत्र आधारित काल गणना को समायोजित करना सरल रहा। 
 आधुनिक विद्वानों ने वैदिक समय की मान्यता के अनुसार 25920 वर्ष के समय अंतराल को महाविषुव के दिन सूर्य के किसी नक्षत्र पर होने से इन अवधियों में बाँटा है:

मृगशिरा - 363, आर्द्रा 1761, पुनर्वसु 1116, पुष्य 354, अश्लेषा 1164, मघा 828, पूर्व फाल्गुनी 741, उत्तर फाल्गुनी 1572, हस्त 748, चित्रा 30, स्वाति 1500, विशाखा 1257, अनुराधा 519, ज्येष्ठा 1068, मूल 720, पूर्वाषाढ़ 561, उत्तराषाढ़ 213, अभिजित 1185, श्रावण 1047, धनिष्ठा 1818, शतभिषा 858, पूर्व भाद्रपद 1128, उत्तर भाद्रपद 771, रेवती 1017, अश्वायुज 1026, भरणी 849, कृत्तिका 705, रोहिणी 1002।


इस समय महाविषुव पूर्वभाद्रपद नक्षत्र पर है जिसके 455 वर्ष बीत चुके हैं। महाविषुव की खिसकन के कारण पर्वों को मनाने में अब 23 दिनों का अंतर आ चुका है, पर्व पंचांग में संशोधन होने चाहिये।