मुझे कोई ब्लॉग मिला है जिसके बारे में मैं यह कह सकता हूँ कि यदि मेरे ग्रेजुएशन के दिनों में ब्लॉगरी हो रही होती तो मैं ऐसा ही कुछ लिखता ।
वही उग्रता। वही निर्भीक पैनापन और लड़ने भिड़ने (?) को उद्यत वही जज्बा । हर बात को डिसेक्ट कर तार तार कर देने की आदत जो कभी कभी अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार लेने जैसी थी।
अधिक नहीं कहूँगा। न जाने इस युवा ने 27 जनवरी 2009 के बाद लिखना क्यों बन्द कर दिया?
लिंक है : मैनें आहुति बनकर देखा..