भठ्ठर मन, सर्व व्यर्थता बोध - कुछ लिखा नहीं जा रहा। पुरानी डायरी की शरण गया तो पंजाब आतंकवाद के चरम के समय की यह कविता दिख गई। यह वह दौर था जब मेरा ईश्वर से मोहभंग हो रहा था। मनुष्य की सारी समस्याओं की जड़ विभिन्न पंथ और मजहब हैं - यह विश्वास पुख्ता हो चला था। ऐसे में मार्क्सवाद का अध्ययन प्रारम्भ हुआ । मार्क्सवाद और बौद्ध दर्शन के अध्ययन से वैचारिक स्पष्टता आई। इसका परिणाम यह हुआ कि मार्क्सवाद भी एक 'अलग तासीर का अफीम' लगने लगा - विषस्य विषमौषधम् जैसा। औषधि की एक सीमा होती है ...उससे भी मुक्त हुआ।
आज पंजाब में आतंकवाद नहीं है लेकिन देश के कई भागों में जन दु:ख के प्रति उपेक्षा, निर्मम दमन और शोषण ने हिंसा को एक विकल्प की तरह कायम रखा है। हिंसा - जिससे कोई समाधान नहीं आता लेकिन मनुष्य अपने मन को बहलाता है यह सोच कर कि शायद खून के छींटों से आँखों पर पड़ा पर्दा धुल कर बह जाय । कितनी सम्मोहक और कितनी निरर्थक है यह सोच ! लेकिन सार्थक क्या है ? क्या मानव सभ्यता इस तरह के दुश्चक्रों के आवागमन के लिए अभिशप्त है? हिंसा, शांति, हिंसा, शांति ... तो क्या अंतत: सोचना भी निरर्थक ही है - मानव समाज सुख के स्वप्न क्या निरर्थक ही हैं ? मुझे अब भी लगता है - नहीं ।
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प्रचुर निरंतर शामें
यहाँ आती हैं
चली जाती हैं
उजाला तो लगता है
अँधियारों के भ्रम जैसा
सूर्योदय तो श्रम जैसा
सूर्योदय तो श्रम जैसा
लड़ कर आने वाला।
इन शामों में
उदासी के कागज पर
चिंता की लेखनी में
पंजाबी खून की स्याही भर
लिख देता हूँ
तुम्हारा नाम
तुम तानाशाह हो
ईश्वर नहीं।
जिसके 'स्वर'
इतने कमजोर हों
गुरुओं की वाणी में
ऋषियों की ऋचाओं में
वह 'ईश्वर' नहीं है।
