मुझे नहीं पता कि नारीवादी क्या कहेंगे? वैचारिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के झण्डाबरदारों को कैसा लगेगा? बस हक़ीकत बयाँ कर रहा हूँ:
घटना 1:
समय : रात 11 बजे
स्थान : पार्क
सिर पर जेबकतरों की स्टाइल में रुमाल बाँधे पुरुष, टिपिकल टपोरी । जींस टी शर्ट पहने उससे आधी उमर की लड़की। बेंच पर प्रेम लीला करते पाए गए। दूसरी लड़की और एक और लड़का भागने में सफल।
"इस समय यहाँ क्या कर रहे हो?"
"इसे मोबाइल देने आया था"
"नाम?"
"...(मुस्लिम नाम)"
"कहाँ से आए हो?"
".... (करीब 5 किमी. दूर)
लड़की से "तुम्हारा नाम क्या है?
"...(हिन्दू नाम)
"कहाँ से आई हो?"
"... (पास की ही एक कॉलोनी)"
भीड़ बढ़ चुकी है।
"साले! इतनी दूर से इसे मोबाइल देने के लिए यही समय और यही ज़गह मिली थी? जो कर रहे थे वह तो सबने देखा।
शरम नहीं आती ? "
"भाईजान! ऐसी कोई बात नहीं।"
"साले ! पूरे आधे घंटे झेलने के बाद परेशान सामने के घर वाले ने फोन किया तो लोग इकट्ठे हुए हैं और तुम कह रहे हो, ऐसी कोई बात नहीं? कान पकड़ कर उठो बैठो। फिर मत आना यहाँ!"
अकड़ दिखाता है। भीड़ में से एक शख्स निकल कर चार पाँच तमाचे जड़ देता है। तत्काल उठक बैठक शुरू। पुलिस बुलाने की बात होती है, कोई कहता है कि लड़की की ज़िन्दगी नरक हो जाएगी। साथ में जोड़ता है - इसके घर वालों को कोई ऑबजेक्सन नहीं , आप लोग आसमान सिर पर उठाए हैं।
कोई लड़की को 'रंडी' कहता है।
"ज़बान सँभाल कर बात करो!"
"अरे खुद को तो सँभाल नहीं पा रही, हमें सँभलने को कह रही है!"
घटना 2:
समय: शाम के पाँच
स्थान: पार्क के बाहर का कोना
स्कूटी पर लड़की आगे, लड़का पीछे। उम्र इतनी कि दसवीं या ग्यारहवीं में होंगे। लड़का बेतहाशा वह किए जा रहा है जिसे मॉलेस्टेशन के आगे का स्टेज कहा जा सकता है। लड़की खिलखिलाए जा रही है। दोनो मस्त हैं।
मैं अकेला। पास जा कर स्कूटी का नम्बर देखता हूँ।
"यह तुम्हारी पढ़ने लिखने की उम्र है, शर्म नहीं आती? भाग यहाँ से!"
स्कूटी स्टार्ट । फुर्र....
घटना 3:
समय: रात के आठ
स्थान: पार्क और खाली प्लॉटों के बीच का सड़क का अन्धेरा हिस्सा । खिलखिलाहट , सिसकारी। ..
ठक! ठक!!
कार पर पुलिस विभाग का चिह्न लगा है। कार का शीशा थोड़ा और नीचे होता है। लड़की स्कूल ड्रेस में - शायद ग्यारहवीं बारहवीं में होगी । जल्दी जल्दी कपड़े ठीक कर रही है। एक बार फिर लड़का उससे बहुत अधिक उमर का ।
लड़का "जी ?"
"क्या कर रहे हो?"
"हमलोग अलबम देख रहे हैं।"
"रोशनी में देखो, अन्धेरे में कौन सा अलबम देख रहे हो? भैया! यहाँ मत आया करो। खामख्वाह फँस जाओगे।"
"जी अंकल !"
तीन चार दिन बाद, बाज़ार से लौटते - फिर वही गाड़ी, समय शाम के छ:। लड़का वही, लड़की बदल गई है। पास जा कर घूरते ही गाड़ी स्टार्ट, फुर्र।
घटना 4:
भरी दुपहरी। स्कूल कम्पाउंड से लगे दो बच्चे 'दोस्ताना' में संलग्न है। डाँटने पर जल्दी जल्दी निकर ठीक करते स्कूल भवन की तरफ भागते हैं।
घटना 5:
समय : सुबह छ: के आसपास
टहलते हुए श्रीमती जी तीन दिनों से देख रही हैं। लड़की साइकिल से स्कूल ड्रेस में - शायद दसवीं में भी नहीं होगी। अधेड़ मर्द उसका इंतजार करता है, दोनों कभी इस कोने कभी उस कोने एकांत देख 'फोरप्ले' करते हैं। लोग देखते हुए भी नहीं देखते। कुछ देर के बाद लड़की साइकिल पर अकेले रवाना हो जाती है।
...आज उन्हों ने बताया है। कल कॉलोनी की 'ऐक्टिव ब्रिगेड' हिसाब किताब करेगी।
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हॉर्मोन जनित सेक्स रिलेटेड इस तरह की घटनाएँ हमेशा होती रही होंगी लेकिन इतने खुले में और इतनी? मैं अब ही देख रहा हूँ। तकरीबन हर बार लड़की कम उमर है जब कि लड़के/पुरुष आयु में बहुत बड़े।
...नहीं! मैं किसी घेट्टो में नहीं रहता। अच्छी कॉलोनी है, थोड़ी कम बसी है, बस। यह सब बस मेरे अलावा दो तीन और लोगों को दिखता है, बाकियों को नहीं।
तब तक जब तक कि यौन शिक्षा लागू होती है, जब तक समाज उलट कर 'पुरुषवादी' से 'व्यक्तिवादी' नहीं होता; अपने बच्चों को संस्कारों की सीख दीजिए। बच्चों के उपर नज़र रखिए। उन्हें अपनी और दूसरों की निजता का सम्मान करना सिखाइए।
एक्सपोजर बहुत बढ़ गया है। हमारी ज़िम्मेदारियाँ भी बढ़ गई हैं। जो देखने के अभ्यस्त हैं, जो देखना चाहते हैं ; उससे इतर भी देखने की कोशिश कीजिए। कहीं उल्टा पुल्टा होता दिखता है तो टोकिए, समझाइए। हाँ, अकेले नहीं - अपने जैसे दो तीन को जुटा कर। यह 'मॉरल पुलिसिंग' नहीं, हमारे आप के बच्चों के भविष्य का मामला है। लड़कियों के मामले में और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। माना कि यह एक हारी हुई लड़ाई है लेकिन कभी कभी ऐसे भी लड़ना ठीक होता है, अनजाने ही आप शायद भविष्य की किसी कल्पना चावला, किरण बेदी, इन्दिरा नुई .. को बचा लें। .. अभी मेरा साहस वहाँ तक नहीं पहुँचा कि मसीहा बनूँ, बच्चों के माँ बाप या पुलिस तक पहुँचने की ज़हमत उठाऊँ लेकिन मुझे लगता है कि कहीं न कहीं इस प्रयास में सार्थकता तो है... वक़्त भी कैसा हो चला है, जो बातें सीना तान कर की जाती थीं, उन्हें अब स्पष्टीकरण के साथ कहना पड़ रहा है। दकियानूसी पुरनियों की तुलना में शायद हम बहुत डरे हुए लोग हैं।