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गुरुवार, 21 जुलाई 2016

डेट

शनिवार का दिन समुद्र के किनारे डूब रहा था और मैं प्रतीक्षा में था। उसे अनजान भेंट ही कहूँगा, ब्लाइण्ड डेट में किसी ऐसे परिचित का होना अनिवार्य होता है जो दोनों को मिला दे। हमारे साथ ऐसा नहीं था, इंटरनेट को  मनुष्य तो नहीं कह सकते न!
साँझ की थकान में नीचे आ गये सूरज के साथ पश्चिम के मकान भी पियरा गये थे। मुझे थमी सी बयार साँवरी लग रही थी जिसके रुख पर हल्दी का लेप लगा था। मैं अपने में मुस्कुराया – परिवेश भी मनुष्य की नकल करता है। यहाँ की साँवली महिलायें मुख में हल्दी लगा घूमती जो हैं! पूरब में बदली सी थी या धुन्ध, पता नहीं लग रहा था लेकिन इतना अवश्य था कि किनारे घूमते सैकड़ो लोगों में कोई साँझ में यूँ डूबा न होगा जैसा मैं था। सब अपने आप में मगन थे। हहरते सागर में कोई कितने संवाद घोल सकता है! मैं चकित भी था।
मनुष्य अकेलेपन से कतराता है। जो भी उसका विस्तार है वह भीतर के निर्वात को भरने के लिये ही है जिसे उसने जाने कितने भागों में बाँट अलग अलग नाम दे रखे हैं। मैं भी उससे बचना चाहता था। यह भी कह सकता हूँ कि एक पचपन साल के किरानी के लिये वह अनिवार्य है, तब जब कि न कोई मित्र हो, न पत्नी हो और न बच्चे। उस दिन जाने क्या सूझी तो एक डेटिंग साइट पर चला गया, यह सोच कि कोई मिल ही जाय। मुझे किसी स्त्री मित्र की चाहना नहीं थी लेकिन ऐसी साइट पर किसी पुरुष का पुरुष मित्र ढूँढ़ना तो उसे समलैंगिक अधिक सिद्ध करता जो कि मैं हूँ नहीं। इस हास्यास्पद कारण से ही मैं स्त्री मित्र ढूँढ़ने निकला।
पुलिस द्वारा अपराधी की जाँच पड़ताल सरीखे प्रश्न झेल कर प्रविष्ट हुआ तो उबकायी आने लगी। कुण्ठाओं के लिजलिजे चित्र सर्वत्र बिखरे थे। साइट डिजाइन करने वाला पक्का कुलोचन होगा, यह तय था। यूँ ही पन्ने पलटते एक चित्रहीन प्रोफाइल पर ठहर गया। आयु 35 वर्ष, ऊँचाई 4'4'', रुचि 55-60 की वय-परास के पुरुष। विचित्र सी प्रोफाइल उलझाने वाली थी – ड्रॉप डाउन में वय चुनने में त्रुटि हुई होगी जिसे उसने बहुत दिनों से देखा ही नहीं होगा लेकिन प्रोफाइल तो सक्रिय थी। उत्सुकता में मैंने अपनी पसन्द जाहिर कर दी... 4'4"! हूँ।
... चैट से होते होते बातें जाने कब मोबाइल पर आ गईं और हम खुलते चले गये लेकिन हमने एक दूसरे का न पता जाँचा और न चित्रों की अदला बदली की। इस नम सीझते नगर में उमस बढ़ती जाय तो जीना मरना हो जाता है। ऐसे ही एक दिन का जब मैं रोना रो रहा था तो वह खिलखिला उठी – पता है? मैं सप्ताह में बस तीन दिन ही नहाती हूँ। मैंने उसे फूहड़ गन्धिनी कहते हुये बताया कि मैं दिन में दो बार।
तो मिल कर जान ही लें कि कौन अधिक गन्धाता है और किसकी खाल धुलते धुलते इतनी पतली हो गयी है कि बयार भी चुभने लगी है? – प्रस्ताव उधर से ही आया और शनिवार का दिन तय हुआ।
उसने पूछा – तुम्हें पहचानूँगी कैसे?
मैंने तुरंत बताया – काली टी शर्ट। इस नगर में कोई और नहीं पहनता होगा।
“क्यों भला?”
“मैंने आज तक नहीं देखा। काले पर जमे पसीने की धारियाँ भद्दी जो लगेंगी, सूरज सोख कर देह स्वयं अपने को घायल कर लेगी सो अलग!
खनक तेज हुई – अच्छा, तो कहाँ मिलेंगे?
“वहीं जहाँ मरुधर को उसकी लल्ली ने विदाई दी थी।”
वह प्रगल्भ हो चली – आना पक्का, साँझ को जब दिन डूबने लगे लेकिन आर्यश्रेष्ठ! इन दोनों का परिचय भी करायेंगे?
मैंने हँसते हुये उत्तर दिया  - अरे, एम जी आर और अम्मा, और कौन? 
दूसरी ओर अचानक ही शांति छा गयी। मोबाइल एकदम से कट गया। मैंने दुबारा मिलाया लेकिन आउट ऑफ कवरेज बताने लगा।
आने वाले दो दिन कोई बात न कोई चीत। मैं पुनरावलोकन करने लगा – मेरी हँसी में हल्कापन या असहज करने वाले संकेत तो नहीं थे? क्या कारण हो सकता है, वह ऐसी प्रूड तो नहीं है। मैंने कुछ अवांछित तो कहा नहीं!
पता नहीं, लेकिन मैं जाऊँगा अवश्य...
...बालू के ऊपर दूर तक दुकानें टिमटिम हो चलीं थीं। नीचे रेती की पियराई सलवटों पर झँवराई चढ़ने लगी थी लेकिन उसका कहीं पता नहीं था। मैं ऐसे सोच रहा था जैसे उसे पहचानता होऊँ। विरक्त हो मैंने पूरब की और दृष्टि फेरी, आश्चर्य हुआ कि बादल इतने लाल थे जैसे उनके पीछे दूसरा सूरज छिपा हो। छलना, मैं बुदबुदाया। ऊब इतनी गहन हो सकती है कि ध्यान की उच्चतम स्थिति जैसी हो जाय। उस किनारे तक पहुँच चुका था  फिर भी मैं बैठा रहा, मरुधर से जया मिलेगी ही। 

पश्चिम को निहारते आँखें थक गयीं - उस कद की कोई न दिखी कि पीछे से किसी ने कन्धे पर थपकी दी - सॉरी देव, विलम्ब हो गया। वही थी, कुछ लोगों का स्वर मोबाइल से इतर कितना मधुर लगता है न! 
मैंने आँखें घुमाईं और ठगा सा रह गया - अवस्था उतनी ही थी लेकिन देह तो सामान्य ऊँचाई की थी। अंग्रेजी औपचारिक वेशभूषा में वह आकर्षक लग रही थी, पाँव में साधारण चप्पल ही थे, हाई हील नहीं। मुझे मुँह बाये देख वह खिलखिला उठी - अरे, जया को आसन ग्रहण करने के लिये नहीं कहेंगे आर्यश्रेष्ठ! 
वह सुन सके ऐसे मैं बुदबुदाया - उपविश द्रविड़े! और हम दोनों खिलखिला उठे। 
उसने कहा - यू डॉण्ट लुक दैट ओल्ड।
मैंने पलट कर कहा - तुम भी उतनी नाटी नहीं हो नॉटी! 
मैंने एक नारियल पानी उसे थमाया और दूसरा स्वयं ले लिया - सही सही बताओ, क्या करती हो? 
उसने उत्तर दिया - एक प्राइवेट फर्म में फाइनेंस देखती हूँ। गुड्डी और मेरे लिये पर्याप्त है। 
“गुड्डी? 
हाँ, मेरी बहन है। बंगलोर में एम सी ए कर रही है।
मैं चुप हो गया। मौन कुछ खिंचा तो उसने ढीला किया - चुप क्यों हो गये?
मैंने प्रतिप्रश्न किया - अम्मा और एम जी आर कहने पर तुम एकदम से क्यों चुप हो गयी थी?
उसने ठंढे स्वर में उत्तर दिया - उस बात को आगे बढ़ाना ठीक नहीं होगा। पहली भेंट का स्वाद न बिगाड़ो, नारियल पानी पियो।
मैंने मनुहार सी की - बताओ न? 
उसने बात घुमा दी - जानते हो, एक तमिळ कवि हुये हैं जिन्हों ने नारियल की तुलना पयोधर से की है। तुम्हारे हाथ में जो है उसे देखो तो! 
वह कौतुक के साथ मुस्कुराने लगी। मैं लजा सा गया। 
“ए, , ए ... द ओल्ड मैन इज ब्लशिंग!”
उन खिलखिलाहटों से समुद्र की गरज भरती गयी ठीक वैसे जैसे साँझ को बाबा की धीर गम्भीर समझावन के बीच यकायक माँ किसी बच्चे को दुलराने लगती थी। साँवरी के दाँत चमक उठे और मैंने कहा - बस, बस ... मेघ बरसने लगेंगे। बाढ़ से मुक्त हुये अभी अधिक दिन नहीं हुये।
वह सहसा चुप हो गयी और मैंने मन में उपमा गढ़ी - जैसे बादलों के बीच प्लेन का इंजन यकायक बन्द हो जाय और वह नीचे धँसने लगे - सूँ sssss...

प्रकृतिस्थ हो उसने कहा - कुछ अपने बारे में कहो जेंटिल ओल्ड मैन।
मैंने प्रतिवाद किया - ओल्ड कहना आवश्यक था? 
उसने मुस्कुरा कर उत्तर दिया - हाँ, नहीं होते तो मैं तुमसे बातें कर रही होती?
 बताओ, कहाँ से कहूँ?
अपने ब्याह से। 
हैं? 
हैं नहीं हाँ। चलो, बढ़ो।
कुछ खास नहीं। कॉलेज में था तभी हो गया था।
हैं, हैं, हैं ... लभ्भ मैरिज? द ग्रेट ओल्ड मैन - उसने अपने वक्ष आगे कर होठों पर हाथों से मूँछों की भंगिमा बनाई।
न्न रे, मैं मनहूसियत की सीमा तक मासूम था। सभी यौवनाओं का छोटा भाई। सोच कर ही हँसना आता है। 
इसमें हँसने की क्या बात हुई?
हाँ, रोने की बात है। 
रोने की भी नहीं है। आगे, आगे क्या, कैसे हुआ? 
कुछ नहीं। हमलोग बचपन में ही ब्याह दिये गये थे। सयाना हुआ तो उसे ले आया, गवना कहते हैं हमारे यहाँ। 
उत्सुकता में उसकी आँखें और काली हुईं थीं या नहीं लेकिन मुझे तो लगीं। वह उठ खड़ी हुई - वाह भइ वाह ... सुनो सुनो, सुनो इक प्रेमकहानी। लब्भ लेटरी। खूब चिट्ठीबाजी होती होगी?
नहीं रे, उस आयु में यह सब कहाँ हो पाता? जब तक समझ आती, तब तक घर का बूढ़ा अपनी पगड़ी बेटे के सिर पर रख हुक्का गुड़गुड़ाने चल दिया होता।
ऐसा क्या? ...तुम्हारे बाबा कब...?

उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया और मैं बमक उठा - मरे तुम्हारा बाप। मेरा अभी भी जीवित है और तुम जैसियों को आज भी अपनी मूँछों में बाँध कर नचा सकता है!
“सॉरी बाबा, सॉरी। उनको मेरी आयु के भी दसेक बरस लग जायें। बताओगे भी कि क्या करते हो?”  
“तुम्हारी ही तरह नौकर हूँ। ऊब कर यहाँ भाग आया।
“मैं ऊब के लिये नहीं, खूब के लिये आयी हूँ।
मैंने पूछा – खूब?
यस, टू अचीव स्टेट ऑफ फुलफिलमेंट। तुम भी यहाँ इसीलिये हो। हम सभी अपने खालीपन को भरने को व्याकुल कोटर भर हैं – उसका गम्भीर उत्तर था जो मुझे आतंकित कर गया।
जैसे किसी खंडहर के वृहद रखरखाव कार्यक्रम के दौरान हुई पुताई ने पुराना भले छिपा दिया हो लेकिन वह जहाँ तहाँ से झाँक रहा हो।  उसकी हिन्दी वैसा ही प्रभाव दे रही थी। मैं आतंकित सा हो रहा था – कोई छलना तो नहीं?
पूछ बैठा – तुम्हारी हिन्दी ...? उसकी आँखों की हँसी ने आगे पूछने नहीं दिया।

प्रस्तावना तो लम्बी दे सकती हूँ लेकिन समय नहीं है, कहते हुये वह पास खिसक आयी। मैंने भी पार्श्व में खिसक उसके कन्धे पर अपना सिर रख दिया, झुरझुरी का अनुभव मुझे हुआ लेकिन देह कौन सी, अलग नहीं कर पाया। हम दोनों क्षितिज देखने लगे, अचकचापन छिपाने को इससे अच्छा क्या हो सकता था?  
तनिक विराम के पश्चात उसने जारी रखा – हमलोग मूलत: गोवा से थे। पापा की पोस्टिंग बनारस में थी। सागर किनारे से गंगातीरे का यह संयोग ऐसा था कि मुझे आज भी लगता है दुबारा नहीं हुआ होगा। मेरा बचपन गंगा के रामनगर तट की बालुका में खेलते बीता, नाव तो नाव, कई बार तैर कर भी उस पार पहुँच जाती। पापा अजातशत्रु थे लेकिन एक दिन पता नहीं क्यों, किसने, पुलिस आज तक पता नहीं लगा पाई, उन्हें काशी स्टेशन पर गोली मार दी। टिकट मैं ही ले आई थी, कैंट स्टेशन पर मैंने ही विदा किया था...

...मौन कितना लम्बा खिंच सकता है? कितना भी लेकिन मृत्यु इतना नहीं। आँसू मृत्यु के तनाव को बहा देते हैं और हम व्यर्थ ही समय को श्रेय देते हैं।...मुझे ‘उसकी हिन्दी’ समझ में आ गई थी।

उसने एक बार मुझे भरपूर निहारा जैसे कुछ पढ़ सी रही हो और पुन: उस क्षितिज की ओर हो गई जो अब था ही नहीं – सबके पास संघर्ष की कोई न कोई कहानी होती ही है। तुम्हें सुना कर बोर नहीं करूँगी। ‘जया और मरुधर’ पर मेरी प्रतिक्रिया तुम्हें सता रही होगी, सुनाती हूँ कि ऐसा क्यों है?
इस बार उसने मेरा सिर खींच कर अपने कन्धे पर टिका लिया – रखे रहो, भरोसा होता है... पुरुष समाज में स्त्री अवचेतन में तीन पुरुषों की कामना रखती है, पिता, भाई और संगी। पुरुष कितनों की रखते हैं, मुझे नहीं पता। क्यों रखती है, बताना मेरे वश का नहीं। तीनों अलग अलग हों, कोई आवश्यक नहीं। कभी कभी वह निरे रक्त सम्बन्ध और बॉयोलॉजी से बहुत आगे बढ़ जाती है। किसी एक में तीनों मिल जायँ तो उससे अच्छी बात कोई हो ही नहीं सकती।
न, न, सिर न हटाना, उसी के सहारे तो कह रही हूँ। इस समय तुम तुम नहीं, मेरा आरोपण हो।
जया के पिता उसके बचपन में ही चल बसे थे, यह कहें कि वह इतनी छोटी थी कि उसे स्मृति ही नहीं तो अतिशयोक्ति न होगी। मरुधर में उसकी खोज पूरी हुई। संसार किसे अवैध सम्बन्ध कहता है, वह संसारातीत होता है, सम नहीं विषम किंतु सम को समोये। संसार रखैल और कुलटा कहता है तो वह उसके मानक होते हैं लेकिन उनका क्या जो उन मानकों से अपने को परे रखते हैं? एकाध बजर ढींठ हो जाते हैं, परवाह नहीं करते। जया और मरुधर भी, उन्हीं में से एक ...

... घिरती साँझ और पीली हो चुकी थी। दूर कहीं गेरुवा काला हो रहा था और मैं अपनी पूरी देंह को भिगोते स्वेद का अनुभव कर रहा था। सिर उठा कर देखा और पुन: रख दिया। तट पर दीप्त होते एकाध लट्टुओं की पृष्ठभूमि में किलोल करते घूमते लोग आँखों में स्थिर हो गये। सिर ही नहीं सब कुछ स्थिर था। कैसी चलती फिरती स्थिरता थी! जाने कब उसके कन्धे भीगे होंगे। मुझे नहीं पता कि मेरे आँसू थे या दो देहों के स्वेद, इतना याद है कि उसने अपने कन्धे और मेरे सिर के बीच अपनी हथेली लगा दी थी। उसके कहे  नारियल पयोधर और हाथ की सोच मैं सिहर उठा, मेरा सिर!...

मैं लेट गया और वह मुझे थपकी सी देने लगी – आगे और सुनोगे?
“हूँ”, मैंने बच्चे सी हुँकारी भरी।
“संगी ढूँढ़ ली हूँ, भाई और पिता की खोज ने मुझे डेटिंग पर विवश किया। कन्यादान के लिये ये दोनों चाहिये न। तुम किसलिये यहाँ हो, जानती हूँ। सोचो कि महानगर में एक आधुनिक कुमारी बाप और बीर कैसे ढूँढ़ पाती? नियति के तार में कोई कोई अपने आप से नहीं जुड़े होते, जोड़ने पड़ते हैं। सोचो कि वैसा विचित्र प्रोफाइल नहीं देती तो तुम कैसे मिलते? ... हो सकता है कि तुम अभी तक उबर न पाये हो लेकिन मेरा मन कहता है कि तुम्हारा मन समझ गया होगा। तुम यहाँ नर मादा सम्बन्ध के लिये तो नहीं आये थे न?”
मैं ने हुँकारी भर दी।
“तुम साइट पर परिपाटी से परे एक नितांत अपने वाले की खोज में रैण्डम आजमाने गये थे और मैं मिल गई। लकी हो या नहीं?”
मैंने पुन: हुँकारी भर दी।
“मैं भी लकी हूँ। ... अपने को कहाँ फिट पाते हो? बताओ?”

साँझ अब साँझ नहीं रह गयी थी। लट्टुओं ने गतर गतर उदास उजाला छिड़क दिया था और मैं गढ़ुवाये आकाश में आकार ढूँढ़ रहा था। लेटे ही लेटे मैंने उसे अपनी ओर खींचा और वह मुझ पर उतर आई। उसका सिर हाथ में ले और निकट किया तो निकटता में परफ्यूम की धीमी गन्ध घुल गई। उसकी साँसें दुधमुँहे बच्चे सी महक रही थीं। होठों से हट मैं मस्तक चूमने चला, लगा कि कुछ अवांछित मन में है इसलिये हिचक है। जाने कहाँ से किसी मेक्सिकन फिल्म का दृश्य ध्यान में आ गया जिसमें एक युवा पुत्र ने अपने पिता की मित्र से लजाते हुये कहा था – डैड अभी भी मुझे होठों पर चूमते हैं!
मैंने खींच कर सीने से लगा उसके होठ चूम लिये। दुधमुँही को जैसे जीवन मिल गया था।

...वापस आते हुये उसने अपनी बाँह मेरी बाँह में फँसा दी, फेल्ट कैप को मेरे सिर से उतार अपने पर रख लिया और यूँ सट कर सहारा लेते चलने लगी जैसे प्रेमी प्रेमिका चलते हैं। उसने चुहुल की – योर फ्रेम फिट्स बेटर दैन योर फ्यूचर सन इन लॉ। इस अन्धेरे में जो देखेंगे कहेंगे क्या जोड़ी है!   
“बापू, कल ठीक ठाक हुलिया बना पाँच बजे शाम को कन्नगी की प्रतिमा के पास आ जाना, भावी जामाता से मिलना होगा। आना अवश्य नहीं तो देवी कन्नगी का शाप तुम्हारे पुहार की ऐसी तैसी कर देगा।
चेन्नई कडक्करइ का लोकल रेल स्टेशन पास आ गया था। उसने कहा, यहीं ठहरो टिकट ले कर आती हूँ।
मैंने रोका -  रहने दो, मेरे पास मासिक टिकट है।
“तुम्हें विदा भी तो करना है बापू! टिकट तो लूँगी ही। अगले स्टेशन पर फिर से मर मरा मत जाना। बीर को भी तो ढूँढ़ना है।... हे, हे, हे। मजाक कर रही थी, अब टाइम नहीं ढूँढ़ ढाँढ़ की। तुम्हीं सब हो। फेमिली बनाने में और लेट नहीं करनी!


उसने फेल्ट कैप वापस मेरे सिर पर रख दिया और मैं टिकट की प्रतीक्षा में वहीं कर्ब पर बैठ गया। नीचे समय की दबी हुई रेत थी – काशी की मीठी बालू, चेन्नई की नमकीन।  
__________________
- गिरिजेश राव      

रविवार, 20 सितंबर 2015

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 29

पिछले भाग से आगे...

रमैनी काकी माने माया छाया एक देह। कुछ पहर पहले ही जिस नगिनिया भउजी के लिये मन में माया हिलोर ले रही थी वह जुग्गुल की एक बात से अपनी पुरानी छाया में आ गई थी। रक्कत देख सन्तोख नहीं पूरा था, काकी तमाशा देखने को गोहरा रही थी!

घेरा तोड़ते खदेरन आगे पहुँचे तो जो वीभत्स दिखा वह कहीं नहीं, कभी नहीं दिखा था, कमख्खा में भी नहीं। एक नवजात मानुष देह क्षत विक्षत पड़ी थी, पास ही मझोले कद का एक कुत्ता किसी धारदार हथियार से कटा पड़ा था और जुग्गुल भ्रष्ट भैरव बना एक हाथ में टाँगी और दूसरे में नवजात की टाँग लिये उछ्ल रहा था। लाल कपड़े पर भी रक्त के छींटे स्पष्ट थे, धरती पर खून ही खून। रमैनी काकी को पंडिताइन के लाल गोड़ निसान याद आ गये, खुद को सँभालने को लबदी का सहारा ले धीरे धीरे वहीं बैठ गयी। दोनो गोड़ पानी जैसे हो गये थे!

जुग्गुल चिघ्घाड़ उठा – महापातक भइल बा गाँव में, महापातक! मुसमात देवर संगे सुहागिन भइल, केहू जानल? नाहीं। नागिन पेटे जीव परल, केहू जानल? नाहीं। भवानी पैदा भइल, केहू जानल? नाहीं। खेला देख जा पंचे, खेला! भवनिया के मुआ के एहिजा, भरल गाँव के बिच्चे गाड़ देले रहलि हे नगिनिया! बसगित में मुर्दा गड़ले रहलि हे नगिनिया खोनि के पिल्ला नोचत रहलें हँ सो, आपन पलिवार त खाही घरलसि, गाँव के सत्यानास करे चललि बा नागिन। रउरा पाछ्न के लइके फइके कुँवारे रहि जइहें, के बियही ए गाँवे जब ई खिस्सा चहुँ ओर फइली? कुलटा हे नगिनिया, कुलटा!...

(गाँव में बहुत बड़ा पाप हुआ है, महापातक! विधवा देवर संग सुहागिन हुई, किसी ने जाना? नहीं। नागिन गर्भवती हुई, किसी ने जाना? नहीं। बेटी पैदा हुई, किसी ने जाना? नहीं। तमाशा देखो पंचों! तमाशा। बेटी को मार कर यहीं, भरे पूरे गाँव के बीच नागिन ने गाड़ दिया था! बस्ती में नागिन ने मुर्दा दफन किया था, कुत्ते खोद के नोच चोथ रहे थे! अपना परिवार तो खा ही गयी, नागिन अब गाँव का सत्यानाश करने चली है। जब यह किस्सा आस पास फैलेगा तो उसके बाद कौन अपनी संतान इस गाँव में ब्याहेगा? आप सब के बच्चे कुँवारे रह जायेंगे। नागिन कुलटा है, कुलटा!...)

... कुलटा हे नगिनिया कुलटा! – सोहित के कान बस यही स्वर पड़े। बुढ़िया आँधी भरे मन ने स्वर पहचाना – जुग्गुल काका? एक ही सहारा था, वह भी...गद्दार...हमार भउजी कुलटा?

नयनों के आगे भीड़ दिखी, लाल लाल जुग्गुल दिखा, लाल आँखें, भउजी की काली आँखें, करिखही राति, बबुना... ढेबरी की लौ सम भक भक करिखही आँख... मस्तिष्क में भरे अरबों तंतुओं का आपसी संतुलन टूटा और काला पर्दा तन गया। सोहित के गले से माँ से बिछड़े पड़वे सी गुहार निकली – हमार भउजी कुलटा नाहीं, कब्बो नाहीं रे जुगुला! नरखा फाड़ते, केश नोचते सोहित जुग्गुल पर टूट पड़ा। लँगड़ा कहाँ सँभाल पाता, जमींदोज हुआ और उसके गले सोहित के हाथ कस गये...  

...सोहित के चेहरे की बदलती रंगत किसी ने सबसे पहले पहचानी तो इसरभर ने। उसे जुग्गुल की और झपटते देख इसरभर को चमैनिया अस्थान से जुड़ी सारी पुरानी घटनायें एक साथ याद आ गईं, वह पीछे मुड़ा और भाग चला – जल्दी से कुछु करे के परी,  लेकिन का? इसरभर सिर इसर सवार थे – मन में जाने कितने समीकरण बनने बिगड़ने लगे!  मलकिन के माटी कइसे पार घाट लागी? भइया त पगला गइलें! (मलकिन की मृत देह का संस्कार कैसे होगा? भैया तो पागल हो गये!)  कुलटा मलकिन, नगिनिया मलकिन ... सरापल गाँव में अब के अनरथ करी, खदेरन पंडित? ना, कब्बो ना!...(इस शापित गाँव में अब अनर्थ कौन करेगा? खदेरन पंडित? नहीं, कभी नहीं!)

...”सोहिता रे!” खदेरन पंडित ने स्वर पहचान लिया – बेदमुनि के महतारी? पीछे मुड़े और पियराती मतवा के उठे हाथ ने जैसे समझा दिया कि क्या करना है! झपट कर सोहित पर पिल गये जिसके नीचे गों गों करते जुग्गुल की आँखें बाहर निकल सी रही थीं। खदेरन को देख और लोग भी जुड़ गये। बहुत मुश्किल से सोहित का हाथ छूटा। जुग्गुल आश्चर्यजनक गति से पुन: खड़ा हो गया और सोहित? चुप्प! आँखें दूर तकती, जैसे किसी की तलाश में हों। अधखुले मुँह से लार बह रही थी, सुन्दर चेहरा विकृत हो गया था। खदेरन की आँखें भर आईं – इतने कम समय में कितनी यातना! सोहित लड़खड़ाता चल पड़ा। दूर सधी आँखें, पागल प्रलाप – भइया हो! ले चलs, भउजी के, हमके, गाँव के। घवराई भीड़ ने राह दे दी।

मन्नू बाबू के बाप के प्रचंड स्वर ने भीड़ को यथार्थ पर ला पटका – बरस बरस के नवमी के दीने, कुलदेबी पूजा के दीने अइसन गरहित कांड! थू। दुन्नू के गाँवे से बहरियावे के परी। (वर्ष में एक ही बार आने वाले इस नवमी के दिन, कुलदेवी की पूजा के दिन ऐसा घृणित कांड! थू। दोनों को गाँव से बाहर करना पड़ेगा।) विजयी स्वर में उन्हों ने प्रश्न किया - बोलs खदेरन पंडित! तोहार सास्त्र अब का कहता? कवनो दूसर उपाइ बा? आ कि चमइनियन जइसन फेंसे कुछु ...? (बोलो खदेरन पंडित!  तुम्हारा शास्त्र क्या कहता है? कोई दूसरा उपाय है? या वैसा कुछ करना है जैसा चमाइनों के साथ ...?)   

अधूरे छोड़ दिये गये व्यंग्य वाक्य में अहंकार कम, राक्षसी प्रवृत्ति का कोलाहल अधिक था। निर्बल मतवा को सहारा देते खड़े खदेरन भूत लोक में पहुँच गये। फेंकरनी गा रही थी – राम के कड़हूँ खरउँवा, कन्हैया जी के झूलन हो ... अमा की रात में सुभगा – मैं धरती हूँ बावले जिसकी वासना कभी समाप्त नहीं होती। युगों युगों से मैं तुम्हें भोगती आई हूँ, यहाँ जीवन मुझसे है। हाँ, हाँ, मुझे प्रेम करो, कहो सबसे कि मैंने धरती का सुख भोगा, कहो क्यों कि तुम्हारा कहना मुझे प्रबल करता है। हा, हा, हा...

करुणा की कीच सने मन को ठाँव मिली, उत्तर के पहले चेतना आई – धरती, भोग। यह सब षड़यंत्र है, जमीन हड़पने का। पंडितों की जमीन हड़पे, अब पट्टीदारों की जमीन हड़पने को ये नीच लगे हैं। खदेरन! तुम्हें यह सब समाप्त करना है। जाने कितनी बलियाँ इस गाँव में और होंगी। तुम्हारी करनी यह जगह शापित है, कुछ करो, कुछ करो!

“गाँव से बाहर कोई नहीं जायेगा बाबू! कोई नहीं। इस गाँव का शाप जायेगा!” खदेरन थम गये। चढ़े सूरज को घूरते तांत्रिक खदेरन का वही पुराना कौवे जैसा कर्कश स्वर भीड़ ने बहुत दिनों के बाद सुना:  

“त्वं जानासि जगत् सर्वं न त्वां जानाति कश्चन

त्वं काली तारिणी दुर्गा षोडशी भुवनेश्वरी

धूमावती त्वं बगला भैरवी छिन्नमस्तका

त्वमन्नपूर्णा वाग्देवी त्वं देवी कमलालया

सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं सर्वदेवमयी तनु:”     

 

तेज स्वर की सहम दस दिशाओं को मथती चली गयी, एक विकार से दूसरे विकार में प्रवेश करते जन जड़ हो गये थे!

“तव रूपं महाकालो जगत्संहारकारक:

महासंहारसमये काल: सर्वं ग्रसिष्यति

कलनात् सर्वभूतानां महाकाल: प्रकीर्तित:

महाकालस्य कलनात् त्वमाद्या कालिका परा ...

साकाराsपि निराकारा मायया बहुरूपिणी

त्वं सर्वादिरनादिस्त्वं कर्त्री हर्त्री च पालिका

... जो भवानी भूमि पर क्षत विक्षत पड़ी है, उसकी साक्षी मान मैं इस स्थान पर अब तक हुये सारे पापों को अपने सिर लेता हूँ। साथ ही यह शाप देता हूँ कि आज के बाद अगर किसी ने यहाँ कुछ भी टोना टोटका किया तो उसका और उसके परिवार का सर्वनाश हो जायेगा।“

धीमे स्वर में सबको सुनाते हुये खदेरन ने कहा – यह सब जमीन हड़पने की गर्हित कुचाल है। आप लोग खुद विचारें और समझें। विधि की विधना जो होनी थी, हो गयी, आगे आप सब के हाथ लेकिन अगर किसी ने यहाँ कोई टोना टोटका किया तो माँ काली की सौंह... ।

मतली आते हुये भी खदेरन ने नवजात की देह के टुकड़ों को उठाया, गमछे में लपेट भीड़ को चीरते चँवर की ओर चल पड़े। मतवा उनके अनुसरण में थीं।

 

जुग्गुल को चेत हुआ, उसने भीड़ को ललकारा – ई पखंड कवनो नया थोड़े ह, सोहिता त भटकते बा, नगिनिया के पकड़ि के बहरे कर के परी!

प्रतिक्रिया नहीं होते देख उसने पट्टीदारों को पुकारा – खून खनदान के फिकिर बा कि नाहीं? एक छोटा सा समूह सोहित के घर की ओर चल पड़ा। लोग घर में घुसे, जुग्गुल सबसे आगे भउजी की कोठरी में।

कोठरी एकदम व्यवस्थित साफ सुथरी थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो! न तो नागिन का अता पता था और न ही इसरभर का!

 

बचे दिन गाँव सरेह में दोनों की खोज चलती रही लेकिन वे नहीं मिले तो नहीं मिले! साँझ को दिया बारी पूजन के बेरा दक्खिन कोने किसी घर एक फुसफुसाहट उभरी – ऊ भवनिया देवरा के नाहीं, भरवा के रहलि हे। एहि से सोहिता पगला गइल हे अउर नगिनिया सँगे भरवा नपत्ता बा! धुँअरहा के धुँये और चूल्हे की आग के साथ यह बात घर घर में बँटती चली गयी। (वह भवानी देवर से नहीं, इसरभर के साथ हुये संबंध से थी। इसी से सोहित पागल हो गया और नागिन संग इसरभर लापता है!)  

 

शुद्धिस्नान और कर्मकांड के पश्चात कार्त्तिक शुक्ल पक्ष नवमी की उस सन्ध्या यह बात खदेरन पंडित के कान पड़ी और वह कराह उठे। शांति अब बस भ्रम थी। भीतर दाह उठने लगा। वहीं निखहरे चौकी पर लेट गये। मतवा ने हाथ लगाया तो जाना अब खदेरन की बारी थी। फीकी मुस्कान के साथ खदेरन बड़बड़ाये, सतमासी भवानी थी, नवमी के दिन सात महीनों की सँभाल व्यर्थ हुई। वे गलदश्रु हो उठे – आह, कहीं से भी सतमासी नहीं लगती थी... सुभगा!

... बेदमुनि की माँ, यह इकट्ठे पापों की ताप है, जल्दी नहीं जायेगी। धीरज रखना। जब भी यह काया ठीक हुयी, शिकायत ले थाने तो जाऊँगा ही।       

 

छिप कर सुने गये खदेरन के निश्चय के साथ लोगों की थू थू को जुग्गुल अपनी कोठरी में दुहरा रहा था।  उसके हाथ पीले बस्ते के वही कोरे कागज थे जिन पर अंगूठों की छाप थी। चेंचरा बन्द कर ढेबरी जला वह कुटिल मुस्कान लिये लिखता जा रहा था - हम कि सोहित सिंह वल्द ...

 

(अगले भाग में जारी)

रविवार, 31 मार्च 2013

जतिगो सम्हति - अंतिम भाग

(पिछले भाग से आगे)

(4)

उस साल की होली के बाद जब जुवा नाग दुबारा गाँव वापस आया तो अकेला नहीं था, उसके साथ उसकी विवाहिता सोमा भी थी। घर पहुँच कर उसने दुआरे ही माँ बाप से कहा – मुझे जो ठीक लगा, किया और आप लोगों को भी बिना किये ही उसका मौका दे देता हूँ। आज से इस घर से मैं खुद बाहर होता हूँ। आप लोग कई गँवई मुसीबतों से बच जायेंगे।

जिन लोगों ने देखा सुना उनकी मानें तो पंडित पंडिताइन दोनों ऐसे चुप रहे जैसे उनमें पहले से ही सहमति बन गई थी। आशुतोष पांडेय और सोमा नाग ने अपनी पलानी चमटोली में बनाई। खरहरा पंडित ने नागिनबासा नाम दिया और गाँव में वे नाग नागिन नाम से प्रसिद्ध हुये। दोनों ग़ायब होते तो महीनों पता नहीं चलता। उनकी संदिग्ध हरकतों से खरहरा पंडित में दुविधा ने प्रवेश किया – सबजन कि बहुजन? आ कि कमनिस्ट?  

अहिरटोली के जुवा वर्ग ने एक बार चँचरा काट कर तसदीक भी कर लिया कि उनके यहाँ सिवा कुछ किताबों और अलमुनिया भँड़सा के कुछ नहीं था। बाकी गाँव के हिसाब से असतोसवा जैसा पतित इतिहास में पैदा नहीं हुआ। इतिहास माने पुरनियों को याद रह गईं गाँव जवार की बिसभोरी बातें!

उस साल एक और ऐतिहासिक घटना हुई – सम्हति न रखी गयी और न जली। सभी जातियों की घरनियों ने अपने अपने सँवागों को जी भर कर कोसा और देह से छूटी बुकुवा झिल्ली को दूसरे गाँव की सम्हति में फेंक आने के लिये अपनी अपनी औलादों को दौड़ा दिया। बीते सालों की आस कि अंत समय अपने गाँव भी जल ही जायेगी, उस साल न फली।

सुबह का उजाला हो ही रहा था कि चमटोली की ओर से धुँआ उठा। हल्ला होने पर जब वहाँ लोग इकट्ठे हुये तो देखा कि नागिनबासा धू धू कर जल रहा था। असतोसवा जाने कौन सी भाषा में चिल्ला रहा था जिससे सिर्फ यह अनुमान लगाया जा सकता था कि होली के दिन गाँव में पुलिस आयेगी और अपनी बेंत को सबके गुह से तृप्त करेगी।

“किसने किया यह?”

यह प्रश्न सबकी जुबान पर तो नहीं लेकिन मन में अवश्य था। निरगुन ने फुसफुसा कर छ्ट्ठू से कहा – खुदे फूँक दिये होंगे सब। नागिन को देखो, कैसे घूर रही है!

“खुदे काहें?”

“असतोसवा सम्हति के बिरोध में तो था ही, क्या पता अब होली को भी बन्द करवाना चाहता हो?”

छ्ट्ठू से रहा नहीं गया, सुनाई पड़ने वाली आवाज़ में बोल पड़ा – तुम्हारे जैसा चूतिया भी इतिहास में कभिये कभार पैदा होता है! 

कानाफूसी को नोट करते हुये सीरी ने निर्लिप्त भाव से खरहरा को देखा, दो मित्रों की आँखों ने बातें की और बीच के मौन मुस्कान ने पुष्टि की कि नागिन पेट से थी!

छ्ट्ठू को महातम कोइरी के क़त्ल के बाद आई पुलिस की याद हो आई। जाने क्यों भीतर तक थरथराहट भर गई।

(5)

थानेदार बल्लभ पाल को लेकर गाँव में पहले से ही कंफ्यूजन था - गड़रिया है या बबुआन? चूँकि इस मामले में किसी को भी मुलजिम नहीं कहा जा सकता था और कोई भी मुलजिम हो सकता था और ले दे के एक झोंपड़ा ही फूँका गया था जिसके रहवासी ‘भारत के मूल निवासी वर्ग’ से नहीं आते थे इसलिये पुराने इतिहास को देखते हुये बल्लभ पाल की जात जानने का यह बहुत ही उपयुक्त अवसर था क्यों कि कोई खतरा था ही नहीं! गाँव प्रसन्न था।

महातम हत्याकांड में अपने सीनियर के साथ अब के थानेदार पाल भी आये थे। इतने हरामी गाँव से होली के दिन घटना की सूचना मिलने पर एक दिन भी चुप नहीं रहा जा सकता था – क्या पता उस कांड की कोई कड़ी ही हाथ लग जाय! पाल को अच्छी तरह से वह दिन याद है...

 

...सीरी के दुआरे पिटे तुड़े बाभन बबुआन इकट्ठा थे। सब चुप थे। थानेदार यादव जी की बातों का जवाब या तो सीरी देता या हरख पाँड़े।

“क्या हुआ था?”

“अइसहीं ...मारपीट”

“उसी जमीन के लिये न जिसके कारण मर्डर हुआ है?”

“साहब, टैम तो वही था लेकिन जमीन का कोई मामला नहीं था।“

“भोंसड़ी के क्या सब ऐसे ही तुड़े तुड़ाये खड़े हैं?”

“देखिये साहब, गाली गुप्ता न दीजिये। जैसा कि कहा है – यह केवल संयोग है कि मारपीट उसी दिन हुई लेकिन मामले दो थे। इधर जो मारपीट हुई वह इसलिये हुई कि किसी के घर में कोई घुसा था। इज्जत आबरू का मामला है, सबने सलट लिया है, इससे अधिक हमलोग कुछ न बता पायेंगे।“

“अभी चार को थाने ले जा कर रगड़ना शुरू करेंगे तो सब बकने लगेंगे। बताते हो या?”

इस प्रश्न के उत्तर में सीरी बाबू ने अपना मोबाइल हाथ में ले लिया – आप जैसा उचित समझें, करें। सम्पर्क और भी हैं और आप की उगलवाई बकचोदी को कोरा बकवास साबित करने के सूत्र भी। हासिल कुछ नहीं होगा, पुलिस प्रशासन की बदनामी जरूर होगी। रही बात पिटाई की तो जैसे उतनी सही वैसे और भी सह लेंगे। कोइटोले से कोई किसी बाभन बबुआन का नाम ले ले तो फिर से आ जाइयेगा। हमलोग यहीं हैं।

 

धमकाने के बाद यादव जी कोइटोले गये जहाँ पुलिस के जवान पहले से ही फील्ड वर्क में लगे थे। एक स्वर में सबने अहिरटोली के जुवाओं का नाम लिया लेकिन यहाँ भी लेकिन लग गई!

कोई एक या दो नाम न बता कर टोली के सब पर इलजाम लगाया गया। मामला ऐसा समझ में आया कि भीड़ में दो पक्षों के बीच लाठियाँ चलीं और उन्हीं में से कोई एक लाठी प्राणघातक साबित हुई। मजे की बात यह कि जिस छ्ट्ठू यादव के ऊपर कब्जे का इलजाम था, वह उस दिन गाँव में था ही नहीं! इसकी तसदीक हर टोली ने की।

थानेदार यादव जी ने ग़ैर इरादतन हत्या का केस बना कर अहिरों को बचाने का  मन बना लिया – थोक में गिरफ्तारी और तुड़ाई। बाद की बाद में। हर टोली पट्टी से कुल मिला कर बाइस जन पकड़े गये जिनमें अधिकतर पहले से ही घायल थे। दुआर पर सीरी और खरहरा के दुस्साहस दिखाने और चालाकी बघारने का दंड बाभन और बबुआन टोली के जुवा बर्ग ने खास बेंतों के रूप में भोगा। तुड़इया तो खैर सबकी हुई। महीनों बाद जमानतें एक एक कर हुईं और मुकदमा शुरू हुआ, सबने राहत की साँस ली – केस का तो अब रामे मालिक।  महातम की मुसमात में कितना दम? और यादव जी तो अपनी जात बिगाड़ने से रहे!...

 

... “साहब! नमस्ते... कहाँ आज होली के दिन?”

खरहरा पंडित के अभिवादन से पाल वर्तमान में गिर पड़ा। उसने बुरा सा मुँह बनाते हुये पूछा – गाँव के बाहर रहते हो क्या बे? साले, हमें शौक चढ़ा है तुम लोगों का दर्शन करने का?

गाली की कोमलता और तड़क में कमी से पंडित ने अनुमान लगाया – गड़रिया ही है। प्रकट में बोल पड़ा – अरे साहब! ऐसी छोटी सी बात पर आप भी अंग्रेजी के चक्कर में आ गये!

“अंग्रेजी?”
“हाँ, नगवा आप के यहाँ जा कर अंग्रेजिये बोला होगा तभी तो आ पहुँचे!”

“नगवा! कौन नगवा?”

“हे, हे, हे ...अरे साहब! नहीं जानते? इस गाँव में असतोसवा को नाग कहा जाता है। दिल्ली से एक ठो नागिन बझा के लाया, महतारी बाप को लात मार कर घर से बाहर हो गया। बाभन की औलाद जाने किस जाति की घरैतिन कर के चमटोली में रहता है। सब तर त्यौहार को ढोंग पोंग कहता है और सभी सबरनों को यूरिया नस्ल। ... गाँव में तो कल सम्हति भी नहीं जली! किसी का घर कोई क्यों फूँकेगा, वह भी बिहाने बिहाने? नागिन पेट से है साहब! रात में रखी दीया ढेबरी गिर सिर गई होगी। फुसऊ घर में कितनी जान?”

“ठीके कहता है। तुम लोग हो ही ऐसे हरामी! ... उसने सम्हति नहीं जलने दिया? उसकी बीवी पेट से है?”

‘मेन पाइंट से बहक गया! सरवा पक्का गड़रिया है’ - पंडित मन ही मन अपने अनुमान की पुष्टि से प्रसन्न हुआ। प्रकट में बोल पड़ा – अरे! वह क्या खा के रोकेगा भला? आप तो जानते ही हैं पुराना कांड! तभी से सब उचाट हो गया। सीरी भाई जैसे तैसे कर के जलवा देते थे लेकिन इस साल तो वह भी फेल हो गये। मेरी बात पर भरोसा न हो तो असतोसवा और उसकी औरत से खुदे प्राइवेट कर लीजिये।

थानेदार पाल को जल्दी थी। उसने नाग नागिन जोड़े से पूछ्ताछ की, अपने तरीके से गर्भ की सूचना की पुष्टि कर उसने उन्हें समझाया कि हो सकता है किसी ने कुछ न किया हो, किसी और कारण आग लग गई हो। सतर्क रहने की हिदायत दे चलने से पहले उसने उन्हें ‘हैप्पी होली’ भी बोला।

छिप कर सुनते सीरी बाबू ने हैप्पी सुना और पक्का समझ गये कि यह पाल तो वो वाला है!

छ्ट्ठू ने पंडित की वह सराहना शुरू की कि कोई सुनता तो उनके अपोजिट पार्टी में होने का विश्वास ही नहीं करता।

(6)

खटिया का ओनचन छोड़ खरहरा पंडित और सीरी बाबू अपने अपने मनधुन में टहलते अब तक थोड़ी दूर निकल आये थे। दिन डूब रहा था। देर का मौन पंडित ने तोड़ा – तो क्या होगा इस साल? सम्हति रखी जायेगी कि नहीं?

सीरी बाबू ने देखा कि वे दोनों उस तिराहे पर खड़े थे जहाँ से अलग अलग टोलों को रास्ते फूटते थे। उन्हों ने बगल की बँसवारी से कइनबाँसा तड़का लिया। कमर से छूरी निकाल उसका टूटा सिरा पैना किया और हुमच के कोने में अपने खेट में गाड़ दिया – गड़ गई सम्हति!

पंडित चौंके,“यह क्या? ... अपने खेत में? हर साल के बिमारी”

“तो तुम्हारे में गाड़ दें? कहीं न कहीं जमीन पर ही गड़ेगी न? पुरनियों को मरने पर अपने खेत में फूँक दिया जाता है और बाद में जगह जोता जाती है। इसमें कैसा भेद?”

बगल में रखे पतहर के दो बोझे दोनों ने उठा कर वहाँ जमा दिये।

लौटते हुये पंडित ने पूछा – लेकिन इससे होगा क्या? लोग तो शामिल होने से रहे!

“क्यों नहीं शामिल होंगे? सब परपंच के बाद भी गाँव के लोग सुख दुख में शामिल होते ही हैं। सम्हति भले न जले, होली में भेंट मुलाकात मनावन होती ही है। सम्हति को टेंशन का एक बहाना बना लिया है लोगों ने। असो जतिगो सम्हति होगी – हर जाति की अपनी अपनी।“

पंडित इस प्रस्ताव पर भौंचक्के थे।

अगले दिन सीरी बाबू के दुआर पर मीटिंग हुई – सब जाति जुटी। कोई निष्कर्ष न निकलता देख सीरी बाबू ने समाधान दिया – हम खुद ही हर टोले की अलग सम्हति का बाँस सुभीता से गड़वा देंगे। बाकी उस टोली पर निर्भर करता है कि उसे बढ़ाये और फूँके या रहने दे। अपने अपने जाति की सबको ऐंठन है। इस जमाने में सब सबरन हैं और सब सूद। कोई नहीं जलेगी तो मेरे खेत वाली तो जलेगी ही। देखी जायेगी कि लोग शामिल होते हैं या नहीं!

सम्हति जैसा छुद्र मामला भी इतना जटिल हो सकता है! केदार कोइरी को समझे में नहीं आ रहा था।

दिन बीतते गये। गड़े बाँस सूखते गये लेकिन सम्हति बढ़ाने को किसी ने एक तृण भी नहीं रखा। दहन की साँझ भी आ पहुँची तो चिंतित खरहरा पंडित सीरी के दुआर पहुँचे। सीरी ने उन्हें आश्वासन दिया – मौका मोकाम देख लिया है। रात में काम हो जायेगा। घर घर साइत का सन्देसा पहुँचवा दो।

दहन के पहले ही सब लोग खा पी कर पटा गये लेकिन पूरे गाँव के पेट में जैसे उत्सुकता की आग लगी हुई थी। बाकी सब जगहों को छोड़ लोग बस उस तिराहे की ओर ध्यान लगाये हुये थे – क्या होगा?

समय होने पर सीरी बाबू ने अपने तीनों बेटों को उठाया। खरहरा पंडित को मिला कर कुल पाँच जन तेलियापट्टी की ओर चुपचाप चल दिये – सम्हति में चोरी का पतहर न पड़े तो कैसी सम्हति? पाँचो ने खामोशी से एक एक बोझा उठा लिया। कुछ पल ही चले होंगे कि पीछे से चोर, चोर और गालियों की आवाजों के साथ अनेक कदमों के दौड़ने की आहटें जुवा हो गईं। पाँचो ठिठके और सीरी कुछ समझ पाते कि उनके बेटों में से दो तो अपने अपने बोझ पटक भाग पड़े। बचे तीनों ने अपने बोझ वहीं पटके और खड़े हो गये।

लानटेन, टार्च की रोशनी में तीनों ने देखा – घेरने वालों के हाथों में लाठियाँ चमक रही थीं।

सीरी बाबू बोल पड़े – सबको पता है कि मैंने सबके लिये सम्हति गड़वाई थी। मैं चाहता तो पतहर भी रखवा कर अपनी सम्हति तो जला ही देता लेकिन चोरी और गाली की रस्म का क्या होता? अब दोनों पूरी हो गईं। हमलोग खड़े हैं, मारना हो तो मारो या चाहे जो करो, भागेंगे नहीं। बस सम्हति जलनी चाहिये।

निरगुन तेली आगे थे लेकिन चुप रहे। जुलमिया निकल कर सामने आया – घर छाने के लिये जुटा कर रखा था लेकिन अब तो यह पतहर मसान की चीज जैसा हो गया। जो करना हो करिये। हम से तो मार पीट नहीं हो पायेगी।

पंडित को हिम्मत बँधी तो बुद्धि ने वाणी पाई – ले जायेगा कौन पाँच बोझा, आदमी बस तीन?

जुलमिया ने अवसर का लाभ उठाया – छिनरो के छौंड़े चोरी करें, मारि डरे भागि परें... सर र र र र....

समवेत स्वर के सर र र र का उत्साह था और अन्धेरा भी – जिस बात पर आँखों में खून उतरना था, उस पर सीरी के होठों पर आ उमगी मुस्कुराहट को किसी ने नहीं देखा। तेलियापट्टी के पाँच जवानों ने बोझे उठा लिये।    

लुकारों के प्रकाश में जब सभी तिराहे पहुँचे तो चारो ओर लोग जमा थे। हर आदमी ने अपनी जात से अलग जात वाले को नोटिस में लिया और मनों में सामूहिक स्वीकार हुआ कि पूरा गाँव जमा था। बहोरन बाबू आग लगाने चले कि एक स्त्री स्वर से सब चौंक गये – थामो! होली हम जलायेंगे।

नागिन यानि सोमा? ऐसा कैसे? असतोसवा के मेहरारू? असतोसवा कहाँ है? ....होली जलाने जनानी? यह कैसे हो सकता है? जाने कौन जाति?

सीरी बाबू को लगा कि मौका दुरुस्त है, सबको सम्बोधित हो बोल पड़े – सम्हति में जात पात, छूत छात, मरद मेहरारू सब माफ! लगा लेने दिया जाय।

हाथ में लुकारा ले सोमा ने गोद के बच्चे को खरहरा पंडित को थमाया – आशुतोष दिल्ली गया है, रहता तब भी आज उसे घसीट ले आती लेकिन हमारे यहाँ गाली गलौज नहीं होता है। इस साल आप लोग भी न कीजिये, बस इस साल।

सम्हति की आग धधक उठी। पहली लपट को देखने से बचने को मुँह दूसरी ओर किये लोगों ने जब मुँह वापस फेरा तो जलती होली के प्रकाश में खड़ी बुलन्द आवाज में बोलती सोमा कुछ और ही लगी – पिछले साल अपनी झोपड़ी में आग मैंने खुद लगाई थी। हमारे यहाँ मानते हैं कि जिस गाँव में होली नहीं जलती उसका सत्यानाश हो जाता है। अपने गाँव का ऐसा कैसे होने देती?
रुक कर उसने पंडित की गोद में रोते अपने बच्चे की ओर इशारा किया - उस समय तो यह भी पेट में था!
 

भीड़ पर जैसे बिजली गिरी थी, सन्नाट हो गई!

कुछ न समझ पाने पर भकुवाये पंडित ने गोद के बच्चे को हल्के से उछाल कर जयकारा लगाया – बोलो होलिका मइया की .... लोगों ने सन्नाटा तोड़ा – जय!

... जाने कितने प्रश्न पीछे छोड़ती रहस्यमयी नागिन अन्धेरे में लुप्त होती चली गयी। लौटती भीड़ के उत्साह के कारण उस साल पहली और आखिरी बार गाँव में तीन होलिकायें और जलीं।

सीरी बाबू की खोंपी पुन: स्वाहा हुई लेकिन अबकी वह उलझे हुये थे और उदास भी – असतोसवा जानेगा तो सोमवा के साथ जाने किस तरह पेश आयेगा?                                         

निरगुन को ऐतिहासिक चूतिया कहने की साल भर पहले की गयी ग़लती की माफी छ्ट्ठू यादव ने यूँ माँगी – झूठ थोड़े है बनिये के दिमाग वाली कहावत!

निरगुन को ऐसी कोई कहावत पता नहीं थी लेकिन प्रकट में गुर्राये – जात मत बिगाड़ो, तैलंग बंस का दिमाग कहो।

छ्ट्ठू चुप्प!

(समाप्त)