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रविवार, 3 नवंबर 2013

महो अर्ण: सरस्वती प्रचेतयति केतुना

आज दीपावली है। कार्त्तिक मास की अमावस्या। सूर्य स्वाति नक्षत्र पर। चन्द्र भी निशा बेला में उत्सव समाप्ति तक स्वाति नक्षत्र में। स्वाति यानि सु+अति यानि बहुत अच्छी। दो सप्ताह पश्चात पूर्णिमा के दिन चन्द्र कृत्तिका राशि पर होगा इसलिये इस महीने का नाम कार्त्तिक है।


यह समय धान की फसल का है। प्राचीन काल में वृहि या शालि या धान की शस्य पवित्र और क्षुधापूरक मानी गयी। इस नये अन्न के भात से ही देवतुल्य पितरों को श्रद्धांजलि दी जाती। कृषक के लिये यह धान्य से घर भरने का समय होता, व्यापारियों के लिये धन के आगमन का और राजन्य के लिये कराधान का। वर्षा ऋतु समाप्त हो चुकी होती और आवर्द्धित विशाल सरस्वती के पवित्र तट श्रौत सत्रों, सुदूर समुद्र के अभियान पर निकलने वाली व्यापारिक  नावों और खाली खेतों को पुन: तैयार करने को उद्यत कृषकों की गतिविधियों से गुंजायमान हो उठते। सरस्वती उनकी जीवन प्राण थी। यह समय हर वर्ग के लिये यज्ञ जैसा होता।

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ऐसे आह्लाद के समय कवियों की मेधा ऋत अनुशासित सुखी और समृद्ध समाज की कल्पना और संरचना के सूत्र रचने लगती। उसके आह्वान को, उसके आशीर्वाद को और उससे संवाद को देखिये वैश्वामित्र मधुच्छन्दा ऋषि क्या कहते हैं! (ऋग्वेद 1.3.10-12) 
saraswati पावनकारी, अन्नयुक्त और धनदात्री सरस्वती धन के साथ हमारे यज्ञ की कामना करें।
 
सत्य की प्रेरक, सुमतिशील जनों को चेताने वाली सरस्वती हमारे यज्ञ को ग्रहण कर चुकी है।

अगाध श्रेष्ठशब्दशाली सरस्वती बुद्धिमानों को चेतनाशील बनाती है। वही समस्त शुभ  कर्मज्ञान को प्रकाशित करती है। 

दीपावली पर्व में धन की पूजा और अमावस की रात श्रेष्ठ शब्दों वाली प्रकाशमयी विद्यादायिनी सरस्वती की उपासना के बीज वैदिक परम्परा में निहित हैं। धन धान्य का मद विद्या से अनुशासित रहे, यही उद्देश्य है।

आप सबको दीपपर्व की शुभकामनायें।  
2012-11-28-265

रविवार, 11 नवंबर 2012

दीपावली की खिचड़ी

बीता वर्ष अच्छा रहा। अपने लिये अपने अनुसार जीवन का एक सार्थक वर्ष बीता। विघ्न बाधायें रहीं, कुछ तो बहुत पीड़ादायक लेकिन मेरी यात्रा जारी रही। जो महत्त्वपूर्ण काम करने थे, पूरे नहीं हुये लेकिन प्रक्रिया चलती रही। यदि मृत्यु के समय कोई चाहना बाकी न रह जाय तो उसे ही मुक्ति मानना चाहिये। मैं उसी दिशा में चल रहा हूँ और यात्रा दिनों दिन निज को भरपूर करती, नये को विस्तार देती आसक्ति के उन आयामों में विचरती बीत रही है जो होश सँभालने के साथ ही आ जुड़े थे किंतु बीच के बहुत बड़े कालखंड में दुर्गम कोने अतरों में लुप्त हो गये थे।
अद्भुत बात यह रही कि मैं बाहर जितना ही मुखर हुआ भीतर उतना ही मौन साक्षी होता गया। मनुष्य और उसकी सृष्टि को शिशुवत समझता रहा।
पिता का 'ज्ञानवृद्ध पुत्र' अब वस्तुत: वृद्ध हो रहा है - देवत्त्व की ओर। कहते हैं 75 की अवस्था में मनुष्य देव हो जाता है। आशा है तब तक तो जियेगा ही 
आज जब कि धनतेरस की तैयारियाँ चल रही हैं, कृतज्ञ भाव से माता पिता, बन्धु, पत्नी, संतानों और अपने नियोक्ता के लिये सोचता लिख रहा हूँ। पार्श्व में कुमार गन्धर्व गा रहे हैं – नाथ हा माझा मो.. ही खला

इतने खल जनों से घिरा हूँ कि लगता है खल से ही ‘ख’ माने अंतरिक्ष और ‘खलु’ माने समस्त बने होंगे! लेकिन उन सब के होते हुये भी यदि आज इस तरह लिख पा रहा हूँ तो कोई नाथ भी होंगे ही। इस अनुमान को आप एक नास्तिक की आस्तिकता कह सकते हैं।
***** 
कल देर रात प्राची में बृहस्पति को निहारता रहा। देवगुरु बृहस्पति मुझ गुरुविहीन को चिढ़ाते से लगे। वे क्षण थे जब मैं किसी के साथ होते हुये भी नहीं होता। अक्सर ऐसा होता है क्यों कि जो साथ होते हैं उनसे कुछ कहना व्यर्थ ही होता है। ऐसे में एक साथ चेतना के दो स्तरों पर जीना होता है। 
आकाशीय प्रदूषण के कारण देवगुरु के अतिरिक्त चन्द तारे ही दिख रहे थे लेकिन मुझे पता था कि आज की रात देहाती नभ में इस समय सुरसरि के मनुसरि गंगा होने का दृश्य दिख रहा होगा। मृग राशिरूप रुद्र के मस्तक पर एक ओर से ब्रह्महृदय और बृहस्पति के मध्य होती हुई देवसरि आकाशगंगा  उतर रही होगी और दूसरी ओर से स्रोतस्विनी (Eridanus) गंगा बन भू की ओर बढ़ रही होगी।
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मूर्ख हैं हम जो इन गाथाओं को बस कपोल कल्पना मिथक कह नकारते रहे हैं। ये मिथ और धरा के इतिहास एवं वास्तविकताओं को नभ में सर्वदा के लिये अंकित कर देने के उपक्रम उन विलक्षण प्रतिभाओं का आभास कराते हैं जिनके उर्वर मस्तिष्क में एक अद्भुत  शक्ति जागृत थी – कल्पना। उनकी कल्पनायें ऋत से सम्वाद करती उन मूल्यों को गढ़ती और जीती रहीं जो आज भी प्रासंगिक हैं। आज की शब्दावली है नवोन्मेष यानि Innovation जो बिना कल्पना के असम्भव है। नहीं लगता क्या कि तमाम प्रगति के होते हुये भी कहीं हम भारतीय अपनी कल्पना शक्ति को खोते रहे हैं? प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल के ये शब्द भी पढ़ने को मिले:
‘...इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा संकट कल्पना का संकट है। इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी विफलता स्मृति और कल्पना की विफलता है। हम अपनी स्मृतियों से सीखना नहीं चाहते। हम अपने भविष्य की प्रदत्त कल्पनाओं से आगे जाकर कल्पनाएँ नहीं करना चाहते। ये सबसे बड़ा संकट है। और ये संकट ही हमारा स्थान है। हम ऐन इस संकट के बीचोंबीच खड़े हैं। मैं नहीं जानता कि ये कामना करने का पर्याप्त आधार हमारे पास है या नहीं लेकिन फिर भी यह कामना करना चाहता हूँ कि हम इस स्थान पर खड़े हो करके कल्पना के पुनर्वास का, विवेक के पुनर्वास का साहस कर सकें। तब संभवतः हम सचमुच अपने आप से कह सकेंगे कि हम दीप हुए, दीप भव होने की कामना हमने सचमुच पूरी करने की कम-से-कम कोशिश की।
*****
वरेण्य प्रकाशरूप सविता को चित्त में धारण करने का आह्वान करने वाले ऋषि विश्वामित्र बृहस्पति के लिये ऋक् संहिता में कहते हैं:
वृषभं चर्षणीनां विश्वरूपमदाभ्यम्। बृहस्पतिंवरेण्यम्॥
बृहस्पति विश्वरूप है। वह वरेण्य कहीं हमारी कल्पना शक्ति ही तो नहीं? विश्वामित्र जैसा कल्पनाशील और क्या कह सकता है?
ऋषि वामदेव तो सम्भवत: सूर्य में ही बृहस्पति का दर्शन कर लेते हैं:    
बृहस्पति: प्रथमं जायमानो महो ज्योतिष: परमो व्योमेन् 
सप्तास्यस् तुविजातो रवेण वि सप्तरश्मिर् अधमत् तमांशि। 
 वह प्रकाशपुंज के भीतर से सर्वोच्च नभ में प्रथम जन्मा है। सप्तरश्मियों के आलोक और अपने उद्घोष द्वारा हमें घेरे अन्धकार को दूर भगा देता है।  
टी वी पर, समाचारों में, हमारी चर्चाओं में और हमारे कर्मों में हर ओर खल तम का हाहाकार है। आज के दिन मेरी कामना है कि आगे आने वाले समय में हम ऐसे उद्घोष करें और उनके साक्षी भी हों जो तमस अन्ध हाहाकार को शमित कर दें। शब्दों और उद्घोष की दुर्दशा, उनके क्षुद्र व्यक्तिगत हित में उपयोग शमित हों।   
दीपावली राम की वापसी का पर्व है – ज्योतिपर्व। खल रूपी तम के पराभव का पर्व। कहते हैं कि हजारो वर्षों तक लोककंठ में रहने के पश्चात यह गाथा वाल्मीकि द्वारा पहली बार स्वरबद्ध हुई – क्रौंचवध के दृश्य की कारुणिकता और शोक से उपजा श्लोक छ्न्दगान। यह श्लोक दैवी उद्घोष है और वाल्मीकि से पहले इसी अर्थ में प्रयुक्त था। वशिष्ठ कहते हैं:
तम् उ ज्येष्ठं नमसा हविर्भि: सुशेवम् ब्रह्मणस् पतिं गृणीषे।
इन्द्रं श्लोको महि दैव्य: सिषु यो ब्रह्मणो देवकृतस्य राजा।
 (ऋक् 7-097-03)
विद्वान इस ऋचा में श्लोक का अर्थ वृहद दैवी लय और सर्वोच्च भाव से प्रेरित शब्दों से लगाते हैं जो कि आत्मा पर शासन करने वाले इन्द्र को व्यक्त करते हैं। वाल्मीकि की वीणा के लय पर बद्ध रामकथा इस अर्थ में एक प्रकाशकथा है।

हमारे दूसरे महाकाव्य महाभारत में जो भगवद्गीता है उसे तमसअन्ध-राष्ट्र को दिव्यदृष्टि प्राप्त संजय सुनाता है और अंत में अपना मत ‘मतिर्मम’ व्यक्त करते हुये जीवन के सार प्रस्तुत करता है: श्रीर्विजयोभूतिर्ध्रुवानीति:।
ये सार हम सबको प्राप्त हों:
श्री – अंत: और बाह्य सौन्दर्य
विजय – आंतरिक और बाहरी शत्रुओं पर विजय
भूति – दैवी और भौतिक सम्पदा
ध्रुव नीति – दृढ़ नीति

और
किसी सुलझे व्यास को यह कहने की नौबत न आये:
मैं बाँह उठा उठा कर कहता हूँ लेकिन कोई नहीं सुनता, मेरी कोई नहीं सुनता!
... हमें व्यर्थ के शोर से मुक्ति मिले, दिन प्रतिदिन बजते दगते पटाखों के बजाय हम अपने भीतर की लय पर नये ‘श्लोक’ रचें। ganga_descent_high
शुभमस्तु ॥

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

आओ गड्ढा सजाएँ


       भारतीय शहरों में गढ्ढे कई  प्रकार के होते हैं, नई कॉलोनियों में कूडा फेंकने वाली जगह (नगर निगम का कचरा डिब्बा तो बहुत बाद में आता है) के पास का उथला गढ्ढा जिसमें सूअर लोटते हैं; टेलीफोन/बिजली विभाग द्वारा खोदा गया सँकरा लेकिन लम्बोतरा गढ्ढा जो सड़क के बीचो बीच विराजमान होता है; नगर निगम द्वारा पानी सप्लाई और सीवर को ठीक करने और उस प्रक्रिया में दोनों को मिलाने के लिए किया गया गढ्ढा जिसे मैनहोल भी कहा जा सकता है।
                गढ्ढे का यह प्रकार जनता के स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी होता है। यह शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है साथ ही आवश्यक मिनरल, लवण वगैरह की पूर्ति करता है। आप ने देखा होगा कि झुग्गियों वाले जो इस प्रकार से एनरिच किए पानी को वैसे ही पीते हैं, बँगलों में रहने वालों की तुलना में कम बीमार होते हैं। असल में अक्वा गॉर्ड वगैरह के कारण पानी से सारे पोषक तत्त्व निकल जाते हैं.।
                इस तरह के गढ्ढे की एक और खासियत होती है। इसमें शराबी कभी नहीं गिरते। इसमें केवल शरीफ किस्म के कम या बिल्कुल दारू नहीं पीने वाले इंसान या जानवर ही गिरते हैं। दारू पीकर टल्ली हुआ इंसान हमेशा सड़क के किनारे सुरक्षित रूप से उथली नाली में ही गिरता है। यह रहस्य आज तक मुझे समझ में नहीं आया। बहुत विद्वान लोगों से पूछने पर भी जब इससे पर्दा नहीं उठा तो मैंने एक शराबी से ही इसका राज उस समय पूछा जब वह सुबह सुबह ठर्रे से कुल्ली कर रहा था। उसने सरल शैली में बताया कि जो इंसान दारू नहीं पीता वह जानवर ही होता है. उसकी बुद्धि और चेतना बहुत सीमित होते हैं इसीलिए जानवर और गैरदारूबाज इंसान दोनों इस तरह के गढ्ढे में गिरते हैं। मैं उसका कायल हो गया।
                हम शहरियों को गढ्ढों से बहुत प्रेम है। हम उनके साथ अकोमोडेट कर लेते हैं। अब देखिए सड़क पर एक तरफ खुला सीवर हो, दूसरी तरफ पानी सप्लाई का खुला मैन्होल हो और बीच में गौ माता पगुरा रही हों तो भी हमलोग कितनी कुशलता से गाड़ी निकाल ले जाते हैं - बिना गड्ढों और गौ को क्षति पहुँचाए ! कभी कभी चूकवश हम अपना नुकसान कर लेते है, हॉस्पिटल पहुँच जाते हैं| यह हमारे प्रेम की प्रचण्डता को ही दर्शाता है।   हमारा खयाल करते हुए सरकार ने महकमें बना रखे हैं जैसे नगर निगम, जल संस्थान, दूरसंचार, बिजली विभाग, जाने कितने ! इन महकमों में ऐसे कर्मचारी हैं जो गढ्ढों को उत्पन्न करने और उनका पोषण करने की क्रिया में एक्सपर्ट हैं। उनको देख कर मुझे सरकारी ट्रेनिंग की सार्थकता और इफेक्टिवनेस पर कई बार गर्व हुआ है।
हम को गढ्ढों पर गुमान भी रहता है। जिसके जितने पास गढ्ढा होता है, वह उतना ही सीना फुलाए रहता है – “अरे! हमारे घर के पास तो ऐसा सीवर खुला हुआ है कि हाथी समा जाय। बदबू की तो पूछो मत !” लोग जब आँखें फाड़े तारीफ के साथ देखते हैं तो कितनी खुशी मिलती है !
मैं भी एक ऐसे ही गढ्ढे का पड़ोसी हूँ। जब नया नया आया तो बहुत क़ोफ्त हुई, हरदम मुँह चिढ़ाता था। लेकिन यह सोच कर  कि आप अपना पड़ोसी नहीं बदल सकते, मैंने उससे प्रेम कर लिया है। बगल से गुजरते लोग जब उस खुले सीवर मैनहोल को हसरत से देखते हैं तो मैं अपनी किस्मत पर बाग बाग हो जाता हूँ।
बुरा हो इस दिवाली का जो श्रीमती जी को चिंता सताने लगी – लक्ष्मी जी घर में प्रवेश करने के पहले ही सीवर में समा जाएँगी। अब मेरा जीना हराम हो गया। मर्दानगी को चुनौती दी जाने लगी। सीने पर पत्थर रख कर मैंने नगर निगम को ई मेल लिखा। फॉलोअप पर जब श्रीमती जी को बताया तो वह आपे से बाहर हो गईं – अरे, सामने रोता आदमी तो इन्हें दिखता नहीं, आप ई मेल की बात करते हैं। अब दौड़ान शुरू हुई। नगर निगम ने बताया कि इसका महकमा जल संस्थान है। लोकल जल संस्थान गया तो बताया गया कि ऐप्लिकेसन की पावती मुख्य ऑफिस में मिलेगी, हाँ काम यहीं से होगा। रिक्शे से मैनहोल का कवर मंगा लीजिए। यह बताने पर कि ढक्कन तो है लेकिन फेंका हुआ है क्यों कि चैम्बर की जुड़ाई पूरी नहीं हुई है, सामने वाले के चेहरे पर नाग़वारी के आसार नजर आए। उन्हों ने कहा कि बात को ठीक से बताइए और पान खाने चल दिए।
               उसी दिन एक गाय उसमें गिर गई। गाय वाले को तो पता ही नहीं चला लेकिन प्रेमी जनता ने गाय को बाहर निकाल पुण्य़ लाभ लिया। मैं भन्नाया, पत्र लिखा जिसमें इस घटना का जिक्र करते हुए बच्चों के गिरने और जान जाने की भी शंका जताई। जल संस्थान ऑफिस फोन किया तो अधिशासी अभियंता महोदय का नम्बर मिला। उन्हों ने तसल्ली से सुना और त्वरित कार्यवाही का आश्वासन दिया।
अगले दिन सरकार द्वारा ट्रेंड एक सज्जन पधारे। बड़े खफा थे, आप ने गाय गिरने और बच्चों के गिरने की आशंका वाली बात क्यों लिखी? इतना किनारे तो है, ऐसा कैसे हो सकता है? मुझे अपने उपर ग्लानि हो आई। जो प्रेमी न हो और अकोमोडेटिव न हो उसे गिल्टी फील तो करना ही चाहिए। श्रीमती जी को लक्ष्मी मैया के सीवर गढ्ढे में गिरने की चिन्ता है, मुझे बच्चों की चिंता है और जल संस्थान को एक असामाजिक और नॉन अकोमोडेटिव शहरी की मानसिकता बदलने की चिंता है। सभी चितित हैं। आप ने सुना ही होगा – चिंता से चतुराई घटे सो काम कैसे हो? खुला सीवर गढ्ढा जस का तस है। अब देखना है कि लक्ष्मी जी से पहले जल संस्थान के कर्मचारी आते हैं या नहीं? मैंने तो रास्ता सोच लिया है। दिवाली के दिन खुले सीवर के चारो ओर दिया जलाएंगे। लक्ष्मी जी को चेतावनी भी मिल जाएगी और हमारा यह पड़ोसी गढ्ढा भी खुश हो जाएगा । किसी ने आज तक ऐसा प्रेम नहीं दिखाया होगा कि पड़ोसी गढ्ढे को दियों से सजाया हो ! कहिए आप का क्या खयाल है ?
                

दिवाली की पाती- अम्माँ के नाम


. . . अम्माँ, आज जब तुम दिया जलाओगी तो मुझे पता है कि आंसुओं को रोके रखोगी। दो बेटे, बहुएँ, नतिनियाँ और पोते लेकिन बरम बाबा के बगल का गँवारू मकान सूना रहेगा। अकेले पिताजी से इधर उधर की बातें कर अपना और उनका मन बहलाओगी। मुझे पता है अम्माँ कि त्यौहार के दिन रोना अच्छा नहीं होता - तुमसे ही सीखा है। इसीलिए आज तुम आँख नम नहीं करोगी।
 मुझे पता है अम्माँ कि कल दलिद्दर खेदते वक्त तुमने जब सूपा खटकाया होगा तो मन ही मन गाजियाबाद और लखनऊ के घरों से भी दु:ख दलिद्दर खेद दिया होगा। नए जमाने की बहुएँ और बीबियों के गुलाम बेटों को इन रस्मो रिवाजों से क्या मतलब? एक क्षण के लिए तुम्हारे मन में ये बात आई होगी लेकिन झट तुमने खुद को धिक्कारा होगा और धर्मसमधा की दुर्गा माई से लेकर गाँव की हठ्ठी माई तक उन घरों की मंगल कामना के लिए कपूर और जेवनार भाखा होगा। मुझे पता है अम्माँ।
 अम्माँ  दियों को धोने के बाद सुखाते समय तुम सोच रही होगी कि रोशनी के इस त्यौहार में डूबते सूरज सरीखे बूढ़ों का क्या काम ? लेकिन फिर मन मार कर तुम पाँच कच्चे दियों में गंगा, यमुना और जाने कितनों के लिए शुभ के घी दीपक बारोगी।
 मुझे याद है अम्माँ दिए में तेल भरते तुम सिखाती रहती थी जाने कितनी बातें जो तुम्हारे हिसाब से लड़कियों को जानना जरूरी था। तुम्हारी कोई बेटी न थी सो बेटों को ही यह सब सिखा कर संतोष कर लेती थी। तुम्हारे बेटे नालायक निकले अम्माँ क्या करोगी ? उन्हें कुछ याद नहीं रहा।
 अम्माँ, तुम्हारी एक बात याद है कि दिये की लौ पूरब की तरफ होनी चाहिए। मैंने अपनी बीबी को बता दिया है, बच्चे भी जानते हैं – बस उन्हें बताना पड़ता है अम्माँ कि पूरब किधर है !
 अम्माँ, मुझे याद है घर की हर महत्त्वपूर्ण चीज पर दिया रखना – जाँता, ढेंका, चूल्हा, बखार, नाद, खूँटा, घूरा, इनार, नीम .... अम्माँ ! मुझे पता है कि कितनी सहजता से तुमने बदलावों को अपनाया है। जाँता की जगह मिक्सी, चूल्हे की जगह गैस स्टोव, बखार की जगह टिन का ड्रम ....
ढेंका, नाद, खूँटा, इनार ..सब अगल बगल रहते हुए भी खो गए अम्माँ! आज इन्हें कोई नहीं पूछता लेकिन मिक्सी, गैस स्टोव और ड्रम के साथ खो चुके निशानों पर भी आज तुम दिया जरूर बारोगी। अम्माँ मुझे पता है।
 बगल के बरम बाबा का अस्थान टूट चुका है। गढ्ढा हो गया है वहाँ। मुझे पता है कि तुम्हें ‘नरेगा’ नाम नहीं मालूम लेकिन ये पता है कि गाँव में खूब पैसा आ रहा है और लूट खसोट मची है। आज बरम बाबा के अस्थान दिया बारते तुम एक क्षण नासपीटों को कोसोगी कि मुए यहाँ तो मिट्टी पटवा देते, फिर राम राम कहोगी। त्यौहार के दिन बद् दुआ? अरे सभी फलें फूलें! अम्माँ एक बार फिर तुम गाँव के सारे देवी देवताओं को गोहराओगी। मुझे मालूम है अम्माँ।
 काली माई के अस्थान पानी भरा है। नवेलियाँ नहीं जाएँगी वहाँ लेकिन कोसते हुए भी तुम किसी लौण्डे को पकड़ कर वहाँ दिया जरूर रखवाओगी। अम्माँ, मुझे पता है।
 परम्परा से ही हठ्ठी माई का अस्थान पट्टीदार के घर में है। आज वहाँ तुम जब दिया जलाने जाओगी तो वह दिन याद करोगी जब बहुरिया बन उस घर में उतरी थी। तब बंटवारा नहीं हुआ था और सात सात भाइयों वाला आँगन कितना गुलजार रहता था ! अम्माँ तुम याद करोगी कि हठ्ठी माई वाले कोठार में तुम कितनी सफाई रखती थी ! आज उस घर की औरतों के फूहड़पने को कोसोगी, और एकाध को खाने भर को झाड़ दोगी, फिर जुट जाओगी सलाना सफाई में – जल्दी जल्दी।
 दिया बार कर चुप चाप अपने घर जब वापस आओगी तो पिताजी को ओसारे में उदास बैठा पाओगी – मेरा इतना बड़ा परिवार और आज कोई नहीं यहाँ ! पिताजी भावुक हो कहेंगे और तुम समझाओगी कि नये बसे घरों में दिवाली के दिन घर की लक्ष्मी को वहीं रहना होता है नहीं तो दिवाला पिट जाता है। दशहरे में ही तो आए थे सभी!  और फिर बच्चों की पढ़ाई, आने जाने का खर्च, छुट्टी . . . जाने कितनी बातें तुम ऐसे बताओगी जैसे उन्हें मालूम ही नहीं ! मुझे पता है अम्माँ !
और फिर घर के भीतर चली जाओगी क्यों कि तुम्हारी सिखावन को भुला कर आँसू ढलक आए होंगे और तुम्हें उन्हें एकांत में पोंछना होगा !
 अम्माँ! मुझे पता है कि घर से बाहर तुम पूजा का प्रसाद और दिया वाली थाली लेकर ही निकलोगी। पूरे दुआर पर पिताजी से जगह जगह दिये रखवाओगी। उन्हें काम में उलझाए रखोगी। दिल के मरीज का बहुत खयाल रखना पड़ता है। अम्माँ, मुझे पता है।
 सबके घर परदेसी बेटे बहुएँ कमा कर आए होंगे। गाँव गुलजार होगा और तुम्हारा घर उदास होगा। अम्माँ कहीं मन के किसी कोने में तुम सोचोगी कि बच्चे अब दशहरे में गाँव क्यों नहीं आते? तुम्हें समझ भले न आए अम्माँ लेकिन इस पाती में मैं समझाता हूँ।
अम्माँ अब गाँव बदल गया है। बताओ अम्माँ अष्टमी के दिन अब कीर्तन क्यों नहीं होता? होली के दिन लोग फगुआ क्यों नहीं गाते ? लोगों में अब प्रेम नहीं रहा सो दशहरे का मिलना जुलना बस दिखावा और लीक पीटना रह गया है। दिवाली में आना तो बस बहाना है अम्माँ, उन्हें अपना नया कमाया धन चमकाना है, लुटाना है और फिर चले जाना है एक साल के लिए ...
अम्माँ ! तुम्हारे राम लक्ष्मी मइया से हार गए। अब दशहरे के दिन जवान गाँव नहीं आएँगे। . . . .