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मंगलवार, 13 मार्च 2012

सोच यानि बरम अस्थान की लेंड़ियाँ

 2012-03-11-157
गाँवों में 'बरम बाबा' का स्थान पाया जाता है - ब्राह्मण अनुशासन का गँवई रूप। पीपल, बरगद, पाकड़ आदि के किसी वृक्ष के नीचे सादा सा चबूतरा बना दिया जाता है। मन्नत पूरी होने पर या तर त्यौहार पर जेवनार चढ़ाया जाता है। गोंइठी की आग पर गाय के दूध में चावल डाल छोड़ दिया जाता है। दूध उफन कर बाहर गिरता है, तब प्रसाद स्वरूप इस फीकी खीर को उतार कर बाँट दिया जाता है।  बाबा को लँगोट चढ़ाने की भी प्रथा है। हर पर्व त्यौहार में इस स्थान की सफाई होती है और देवताओं के साथ यह भी पहली भेंट के भागी होते हैं।

बचपन से ही इनसे जुड़ी कतिपय आतंक मिश्रित आस्था को धीरे धीरे लुप्त होते देखते आ रहा हूँ। एक समय वह था कि पीपल वाले बरम स्थान के आसपास तो क्या लोग उधर मुँह तक कर  मूतते नहीं थे! केवल कुत्ते ही कभी कभी ...जिनकी पकड़े जाने पर दौड़ा दौड़ा कर पिटाई होती थी लेकिन पशु तो पशु! अगली बार मौका मिलने पर फिर...

 गाँव में किसी को सफेद दाग की बीमारी हो गई तो उसका कारण यह बताया गया कि फलाने पंडित जब ब्रह्मभोज खाने के बाद नल पर हाथ धो रहे थे तो उन महाशय ने उनके हाथ के ऊपर ही अपना हाथ लगा दिया था जिससे धुलता जूठा पंडित के हाथ पर गिरा। नाराज़ होकर बरम बाबा ने पहले उनका वह हाथ और फिर पूरी देह ही धुल दी!  दपादप्प उज्जर! - अन्हरिया रतियो में चमके, ओइसन! यह किसी के ध्यान में नहीं आया कि पंडित हस्तप्रक्षालन शास्त्रोक्त विधि से क्यों नहीं कर रहे थे?
   
यह भी सुना कि दूर देस से पैदल गाँव वापस आते किसी पुरनिया को राह भूल गई तो बरम बाबा पैना से कोंच कोंच सही राह बताये।
ओंहर नाहीं रे! हे पड़े -पहली कोंच।
निराल बागड़े हउअ?  अबकी एँहर ओंहर भइल त देब दू सटहा! - दूसरी कोंच ...

अब बरम बाबा केवल स्त्रियों द्वारा ही पूजित रह गये हैं। वह भी केवल  मरजाद रखती हैं और परम्परा निबाहती हैं  लेकिन स्थान ठीक करने को किसी सँवाग को नहीं धिरातीं!  
सदियों से चला आ रहा बाभन अनुशासन खत्म हो गया। बाबू लोगों का क्षात्र अहम नरम पड़ गया।  चमटोली और दलित गाँवों के जवान अब 'बाबू सलाम' नहीं कहते, सीधे आँख तरेरते हैं, जैसे युगों युगों की त्रासदी का बदला उसी क्षण ले लेंगे। साथ ही मोहभंग भी दिखता है। कभी 15 बनाम 85 आन्दोलन की एक चाहना थी - राज बहुजन का होगा और ये सवर्ण हमारे यहाँ काम करेंगे, इनकी जनानियाँ हमारा चौका बरतन करेंगी।

चमटोली का ___ कहता है - बड़का बड़के रहिहें बाबू! उम्र में मुझसे बड़ा है लेकिन अब सलाम करने लगा है। मैं कहता हूँ - अब तो सब जातियों में बड़के होने लगे हैं। वह बात नहीं मानता और हाथ जोड़ कहता है कि उसका बेटा कम्प्यूटर में डिप्लोमा कर लिया है, कहीं कोई ठाँव नहीं। अगर आप कुछ कर देते तो ... मैं उसे समझा नहीं पाता कि इस व्यवस्था में मैं भी बहुजन हूँ और राज काज प्रभाव आदि जाति निरपेक्ष रूप से उन चन्द जनों के पास ही रहे हैं और रहते हैं जिन्हें हम बाबू कहते हैं - टाइटिल कोई हो। मगध का महापद्म नन्द भी तो ... उसे पोसा बाभन व्यवस्था ने ही। आज की बाभन व्यवस्था है – लोकतंत्र।

जिस तरह से संहिताओं में तमाम अच्छी अच्छी बातें कही गईं लेकिन राज चला अपने हिसाब से, उसी तरह अब विधान में तमाम अच्छी अच्छी बातें कही गई हैं लेकिन राज चल रहा है अपन हिसाब से। संहिताओं की बातें अब क्रूर और अमानवीय लगती हैं, क्या पता हजारो वर्षों के बाद चकतियों और थेगलियों लगे विधान को पढ़ तब के लोग यही कहें?

बरम बाबा के स्थान और घरों के दुआर अब बकरियाँ चरने लगी हैं। बरम के चबूतरे पर पीली  मूत के साथ अब लेंड़ियाँ भी दिखती हैं - कोई नहीं रोकता टोकता। काका गुस्से में लाल हो कर बुदबुदाते हैं - सब नामर्द हो गइलें ... अपने गाँव का   इतिहास कुरेदता हूँ - अस्पृश्यता के निबाह के अलावा दलित उत्पीड़न  की कोई घटना नहीं मिलती । पिताजी के एक अंत्यज शिष्य की कही बात याद आती है - तुम्हारे गाँव इलाके में अत्याचार नहीं हुआ कभी। तो फिर फुफकार की मर्दानगी का कमाल था अनुशासन! गरीबी तो सब जातियों में थी। वर्ण व्यवस्था का बाभन अनुशासन ही कमाल करता था!
अब?

अजीब धुरखेल है। सब एक दूसरे की आँखों में झोंकने में लगे हैं। संतोष है कि सबको समान अवसर हैं! नहीं, यह नहीं -  कम से कम वंचना में वर्ण व्यवस्था का रोल आधिकारिक रूप से नहीं है, हाँ अपनी जाति को प्रमोट करने की  बात और है। सामाजिक क्रांति ऐसे ही तो होगी। गाँव की अस्पृश्यता अब भी वैसे है जिसकी प्रगतिशीलता होटल की चाय गिलास पर होठ निशान छोड़ हवा हो जाती है। रोटी बेटी में आपसी व्यवहार अब भी नहीं है माने बाभन व्यवस्था अब भी वहीं है लेकिन बकरियाँ आ पहुँची हैं। ये सब चर जायेंगी और परम्परा के हर पवित्र मुकाम पर लेंड़ियाँ छोड़ जायेंगी। वहाँ केवल कुत्ते नहीं, सब मूतेंगे।

सूख चके पीलेपन से विधानों के स्याह दूसरे तरीके से रचे जायेंगे। तब जब कि कभी न होने वाली क्रान्तियाँ इन द मेकिंग होंगी, हम जैसे लध्धड़ किसी पीपर अस्थान बैठ ऐसे ही मन डोलाते लेंड़ियों का हिसाब किताब करते रहेंगे... जेवनार चाभने वाले तब भी चाभते रहेंगे।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

कुछ गँवार चित्र


hirnakassap
उल्टा लटका 'हिरणाकस्सप'
hath_ka_dam
देखु हमरे हाथ के दम!
guruwon_ki_nazar

गुरुजी अउर उस्तादजी दुन्नू देखें  

कौन दाँव लगी?
ab_kya_karoon
दाँव त अटक गइल! अब का करीं?
amma_ki_bagiya_boda
अम्मा के कोला - बोड़ा
amma_ki_bagiya_karaili
अम्मा के कोला - करैली 
kanail
इनरा पर के कनइल - फुलै फूल  
mehdi

फुलाइल मेंहदी बाबा के दुआरे! 

 असो क गो बेटी बिदा होइहें रे?  
nabh_men_sona

सासू अम्मा का आसमान 
सोना छिटका बादल सँवार,  विदाई में क्या मिलेगा?
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पपीते पर फैली घेंवड़े की बेल 
            देखें कौन पहले नभ छूता है?
दशहरे की छुट्टियों में इस बार गाँव अकेला गया। मोबाइल से खींचे गये कुछ चित्र पोस्ट कर रहा हूँ। बड़ा देखने के लिये चित्रों पर क्लिक कीजिये।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

दिवाली की पाती- अम्माँ के नाम


. . . अम्माँ, आज जब तुम दिया जलाओगी तो मुझे पता है कि आंसुओं को रोके रखोगी। दो बेटे, बहुएँ, नतिनियाँ और पोते लेकिन बरम बाबा के बगल का गँवारू मकान सूना रहेगा। अकेले पिताजी से इधर उधर की बातें कर अपना और उनका मन बहलाओगी। मुझे पता है अम्माँ कि त्यौहार के दिन रोना अच्छा नहीं होता - तुमसे ही सीखा है। इसीलिए आज तुम आँख नम नहीं करोगी।
 मुझे पता है अम्माँ कि कल दलिद्दर खेदते वक्त तुमने जब सूपा खटकाया होगा तो मन ही मन गाजियाबाद और लखनऊ के घरों से भी दु:ख दलिद्दर खेद दिया होगा। नए जमाने की बहुएँ और बीबियों के गुलाम बेटों को इन रस्मो रिवाजों से क्या मतलब? एक क्षण के लिए तुम्हारे मन में ये बात आई होगी लेकिन झट तुमने खुद को धिक्कारा होगा और धर्मसमधा की दुर्गा माई से लेकर गाँव की हठ्ठी माई तक उन घरों की मंगल कामना के लिए कपूर और जेवनार भाखा होगा। मुझे पता है अम्माँ।
 अम्माँ  दियों को धोने के बाद सुखाते समय तुम सोच रही होगी कि रोशनी के इस त्यौहार में डूबते सूरज सरीखे बूढ़ों का क्या काम ? लेकिन फिर मन मार कर तुम पाँच कच्चे दियों में गंगा, यमुना और जाने कितनों के लिए शुभ के घी दीपक बारोगी।
 मुझे याद है अम्माँ दिए में तेल भरते तुम सिखाती रहती थी जाने कितनी बातें जो तुम्हारे हिसाब से लड़कियों को जानना जरूरी था। तुम्हारी कोई बेटी न थी सो बेटों को ही यह सब सिखा कर संतोष कर लेती थी। तुम्हारे बेटे नालायक निकले अम्माँ क्या करोगी ? उन्हें कुछ याद नहीं रहा।
 अम्माँ, तुम्हारी एक बात याद है कि दिये की लौ पूरब की तरफ होनी चाहिए। मैंने अपनी बीबी को बता दिया है, बच्चे भी जानते हैं – बस उन्हें बताना पड़ता है अम्माँ कि पूरब किधर है !
 अम्माँ, मुझे याद है घर की हर महत्त्वपूर्ण चीज पर दिया रखना – जाँता, ढेंका, चूल्हा, बखार, नाद, खूँटा, घूरा, इनार, नीम .... अम्माँ ! मुझे पता है कि कितनी सहजता से तुमने बदलावों को अपनाया है। जाँता की जगह मिक्सी, चूल्हे की जगह गैस स्टोव, बखार की जगह टिन का ड्रम ....
ढेंका, नाद, खूँटा, इनार ..सब अगल बगल रहते हुए भी खो गए अम्माँ! आज इन्हें कोई नहीं पूछता लेकिन मिक्सी, गैस स्टोव और ड्रम के साथ खो चुके निशानों पर भी आज तुम दिया जरूर बारोगी। अम्माँ मुझे पता है।
 बगल के बरम बाबा का अस्थान टूट चुका है। गढ्ढा हो गया है वहाँ। मुझे पता है कि तुम्हें ‘नरेगा’ नाम नहीं मालूम लेकिन ये पता है कि गाँव में खूब पैसा आ रहा है और लूट खसोट मची है। आज बरम बाबा के अस्थान दिया बारते तुम एक क्षण नासपीटों को कोसोगी कि मुए यहाँ तो मिट्टी पटवा देते, फिर राम राम कहोगी। त्यौहार के दिन बद् दुआ? अरे सभी फलें फूलें! अम्माँ एक बार फिर तुम गाँव के सारे देवी देवताओं को गोहराओगी। मुझे मालूम है अम्माँ।
 काली माई के अस्थान पानी भरा है। नवेलियाँ नहीं जाएँगी वहाँ लेकिन कोसते हुए भी तुम किसी लौण्डे को पकड़ कर वहाँ दिया जरूर रखवाओगी। अम्माँ, मुझे पता है।
 परम्परा से ही हठ्ठी माई का अस्थान पट्टीदार के घर में है। आज वहाँ तुम जब दिया जलाने जाओगी तो वह दिन याद करोगी जब बहुरिया बन उस घर में उतरी थी। तब बंटवारा नहीं हुआ था और सात सात भाइयों वाला आँगन कितना गुलजार रहता था ! अम्माँ तुम याद करोगी कि हठ्ठी माई वाले कोठार में तुम कितनी सफाई रखती थी ! आज उस घर की औरतों के फूहड़पने को कोसोगी, और एकाध को खाने भर को झाड़ दोगी, फिर जुट जाओगी सलाना सफाई में – जल्दी जल्दी।
 दिया बार कर चुप चाप अपने घर जब वापस आओगी तो पिताजी को ओसारे में उदास बैठा पाओगी – मेरा इतना बड़ा परिवार और आज कोई नहीं यहाँ ! पिताजी भावुक हो कहेंगे और तुम समझाओगी कि नये बसे घरों में दिवाली के दिन घर की लक्ष्मी को वहीं रहना होता है नहीं तो दिवाला पिट जाता है। दशहरे में ही तो आए थे सभी!  और फिर बच्चों की पढ़ाई, आने जाने का खर्च, छुट्टी . . . जाने कितनी बातें तुम ऐसे बताओगी जैसे उन्हें मालूम ही नहीं ! मुझे पता है अम्माँ !
और फिर घर के भीतर चली जाओगी क्यों कि तुम्हारी सिखावन को भुला कर आँसू ढलक आए होंगे और तुम्हें उन्हें एकांत में पोंछना होगा !
 अम्माँ! मुझे पता है कि घर से बाहर तुम पूजा का प्रसाद और दिया वाली थाली लेकर ही निकलोगी। पूरे दुआर पर पिताजी से जगह जगह दिये रखवाओगी। उन्हें काम में उलझाए रखोगी। दिल के मरीज का बहुत खयाल रखना पड़ता है। अम्माँ, मुझे पता है।
 सबके घर परदेसी बेटे बहुएँ कमा कर आए होंगे। गाँव गुलजार होगा और तुम्हारा घर उदास होगा। अम्माँ कहीं मन के किसी कोने में तुम सोचोगी कि बच्चे अब दशहरे में गाँव क्यों नहीं आते? तुम्हें समझ भले न आए अम्माँ लेकिन इस पाती में मैं समझाता हूँ।
अम्माँ अब गाँव बदल गया है। बताओ अम्माँ अष्टमी के दिन अब कीर्तन क्यों नहीं होता? होली के दिन लोग फगुआ क्यों नहीं गाते ? लोगों में अब प्रेम नहीं रहा सो दशहरे का मिलना जुलना बस दिखावा और लीक पीटना रह गया है। दिवाली में आना तो बस बहाना है अम्माँ, उन्हें अपना नया कमाया धन चमकाना है, लुटाना है और फिर चले जाना है एक साल के लिए ...
अम्माँ ! तुम्हारे राम लक्ष्मी मइया से हार गए। अब दशहरे के दिन जवान गाँव नहीं आएँगे। . . . .