(1) अथ लंठ महाचर्चा।
(2) बहुत दिनों तक टालने के बाद आज अंगुलियाँ इस बिषै (विषय नहीं) पर चल ही पड़ीं। आलस की भी एक सीमा होती है !
चिट्ठा जगत के शिशुओं, जवानों और बुजुर्गों सबको (नारी जाति को भी सम्मिलित समझा जाय) पहले यह स्पष्टीकरण कि न तो मैं शब्दशास्त्री हूँ और न ही पंडित। इस लेखमाला में मैं जो भी लिखूँगा वह काफी खतरनाक है और मात्र अनुभव अर्जित है या श्रौत परम्परा से आया है जिसे मैं सत्य मानता हूँ। खतरनाक मेरे लिए क्यों कि अनुभववादी, मनोगतवादी , प्रतिक्रियावादी , संशोधनवादी , समाजद्रोही , राष्ट्रद्रोही , साम्प्रदायिक , अश्लील...आदि टाइप की गालियों के मिलने की पूरी सम्भावना है और आप के लिए क्यों कि आप की संस्कारवान आँखों और मस्तिष्क को तेज़ झटके लगेंगे। अत: कमजोर दिल वाले न पढ़ें । .... घबरा गए? ऐसा नहीं भी हो सकता है। और अगर ऐसा नहीं होता है तो आप या तो ‘लंठ’ हैं या ‘भठ्ठर’ टाइप के व्यक्ति। इसकी व्याख्या इस तर्ज पर कि प्रकाश अति अधिक हो या एकदम न हो, दोनों ही स्थितियों में चीजें नहीं दिखती हैं।
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हरि अनन्त हरि कथा अनंता । यह बिषै बहुत ही गूढ़ है और प्रस्तुत कर्त्ता मूढ़ है। दुस्साहस इसलिए कर रहा है कि महारथियों और अतिरथियों की असफलता के बाद ब्याख्या की इस सनातन समस्या से जूझने का बीड़ा उठाने को यह पैदल (अक्ल से या चाहे जैसे) सैनिक ही बचता है।
अविगत गति कछु कहत न आवै। गूँगे का गुड़। सो महाचर्चा ‘विपरीत पंचतंत्र’ की शैली में होगी।