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मंगलवार, 12 जनवरी 2010

... प्रकाश जिसने अँधेरों के सूरज को डूबने की राह धकेला

बिटिश भारत - उस राज का हिस्सा जिसमें सूरज कभी नहीं डूबता। आम जनता चरम गरीबी, अशिक्षा, अन्धविश्वास, शोषण, अत्याचार, भूख ..... जाने कितने अँधेरों से जूझती हुई। वह सूरज अन्धेरों का शहंशाह था।
राजे,रजवाड़े, जमींदार कायर निर्लज्ज समर्पण के बाद भोग और विलास में व्यस्त उनके साधन जुटाने हेतु मूर्तिमान शोषण और अत्याचार हो गए थे। ब्राह्मण गण जाति प्रथा, छुआछूत, शोषण और नारी प्रताड़ना के सूत्र स्मृतियों में तलाशते हुए उन्हें और मजबूत करने में लगे थे। उपनिषद और श्रुतियाँ आम जन के लिए निषिद्ध थीं। अंग्रेजी पढ़ा लिखा समाज प्रतिक्रियावादी हो सब कुछ नकारने और निस्पृह, निस्संग बौद्धिक विलासों में व्यस्त हो बाबू की नौकरी पाने के साधन जुटाने में लगा हुआ था।
और आम जनता ?
मालगुजारी और हर्जाने तले पिसती हुई भी बरगद की छाल, पुरानी गलित ईंटों और गूलर के दूध से बने 'व्यंजनों' से अकाल में जान बचा लेने की कला में प्रवीण हो चुकी थी। भारत की बर्बादी पूर्ण हो चुकी थी। अन्धेरों के सूरज की दमक दिन ब दिन बढ़ती जा रही थी..जाने कितने अन्धेरे, आदमी की जिन्दगी एक !
और ऐसे में सन् 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन किया। बहाना था प्रशासनिक सुधार लेकिन नीयत थी विद्रोह की किसी सम्भावना की रीढ़ को तोड़ देने की ... भारत के जाने कितने भागों में इसके विरोध में विद्रोह भभक उठा। सशस्त्र । आधुनिक भारत के युवाओं ने सम्भवत: पहली बार इस तरह से उठान दिखाई थी।
ब्रिटिश दमन ने अपना वह चेहरा दिखाया जो पहले कभी नहीं दिखा था। छापे, गिरफ्तारियाँ ...... हथियार भले न बरामद हुए हों लेकिन करीब हर जगह मिला - विवेकानन्द साहित्य । vivekanand
उस संन्यासी की बातें भी उन युवकों की शस्त्रास्त्र बन गई थीं। रोमा रोलाँ ने विवेकानन्द को ऐसे ही योद्धा संन्यासी नहीं कहा था !
 ... योद्धा संन्यासी ने अपना काम कर दिया था। संन्यास और वक्तृता साहित्य की ऐसी मारकता पहले कभी नहीं देखी गई थी। अंग्रेजों की नाक तले सन् 1897 से लेकर 1902 में मृत्यु होने तक विवेकानन्द ने चुपचाप भारत और विशेषकर युवाओं में वह आग भर दी थी जो स्वतंत्रता प्राप्ति तक नहीं बुझने वाली थी।
ऐसा क्या अनोखा था इस योद्धा संन्यासी में जो चालिस की अवस्था भी पार न कर सका लेकिन समूचे देश को झँकझोर गया? मात्र 5 वर्षों में वह कर दिखाया जिसकी परिणति ने अन्धेरों के सूरज को अंतत: डूबने पर मजबूर कर दिया?
विवेकानन्द को समझना हो तो 1893 में धर्म संसद में दी गई शिकागो वक्तृता पर समापन नहीं प्रारम्भ करना होगा। 1897 तक के चार वर्षों में अमेरिका और यूरोप को उन्हों ने दिखा दिया कि भारत केवल विलासी कापुरुष राजाओं, हाथियों और सँपेरों का देश नहीं था। उसकी ज्ञान परम्परा में एक ओर द्रव्य और ऊर्जा के पारस्परिक परिवर्तन के सिद्धांत छिपे थे तो दूसरी ओर सम्पूर्ण मानवता के स्वीकार के मूर्त सिद्धांत प्रस्तुत थे। जाति प्रथा जैसी घनघोर बुराई के बावजूद भारतीय मनीषा सर्वग्राही समावेशी थी।
आज आप को आसान लग रहा होगा लेकिन यह वह समय था जब समुद्र यात्रा पाप थी और श्रुतियाँ आम जन के लिए निषिद्ध थीं। यह वह समय था जब मैक्समूलर और उनके जैसे स्कॉलर आर्य आगमन/आक्रमण के यूरोप केन्द्रित अवधारणा को स्थापित कर चुके थे। मैक्समूलर के प्रशंसक होते हुए भी विवेकानन्द ने यूरोप के सामने भारत केन्द्रित विश्व सभ्यता की बाते रखीं। उनकी पुस्तक 'East and West’ पढ़ने योग्य है।
1897 में भारत वापस आने पर कोलम्बो से लेकर अल्मोड़ा तक किए गए भारत भ्रमण के दौरान दिए गए उनके भाषणों से जनता ने स्वयं को आप्यायित कर लिया। हर भाषण स्वाभिमान और निर्भयता के सम्मोहक सार्थक औपनिषदीय संदेशों से पटा पड़ा था। मूर्तिमान आत्मविश्वास सरीखे इस सुदर्शन योद्धा संन्यासी का सम्मोहन ऐसा था कि ब्रिटिश राज भी भाँप नहीं सका कि इस भ्रमण के दौरान क्या कुछ बोया जा रहा था। वह फसल ब्रिटिश राज को बहुत महँगी पड़ी। एक शांत विद्रोह गौरवशाली भूतकाल की नींव और आधुनिक शिक्षा की इमारत में बसता चला गया।
कितना विशाल अध्ययन था ! विश्व सभ्यता और भारत सब कुछ समेटे हुए। कला, साहित्य, विज्ञान, दर्शन, धर्म, गणित, नाटक, आर्किटेक्चर, कपड़े, खान पान, नृत्य, समाज शास्त्र, नारी उत्थान ..... कोई ऐसा पक्ष नहीं है जो विवेकानन्द की मर्मभेदिनी दृष्टि से बँचा हो। आज शायद एक दो पिज्जाओं की कीमत में विवेकानन्द का सम्पूर्ण साहित्य मिल जाएगा। मैंने दसियों साल पहले बस रु. 125/- में लिया था। हंसराज रहबर की लिखी उनकी जीवनी राजपाल एण्ड संस से प्रकाशित है। खरीद लीजिए और पढ़ डालिए।
उनको पढ़ने से पता चलता है कि नारी या शूद्र विषयों पर उनकी सोच आज के समय के हिसाब से भी बहुत आगे थी। उनका साहस अतुल्य था। नारी समस्या हो, मांसाहार के प्रश्न हों या शिक्षा का आम जन तक प्रसार हो – वे बहुत रेडिकलों से आगे नज़र आते हैं। मुझे आज रोना आता है जब कुछ लोग उनका नाम लेने पर शिकागो में तथाकथित ‘शून्य’ पर दिए गए उनके भाषण की बात करते हैं। नहीं, धर्म संसद में उन्हों ने जो कहा उसमे शून्य नहीं समूचे विश्व, समूची मानवता के लिए बहुत ही विराट सन्देश था। उन्हों ने उपनिषदों के सन्देशों से वहाँ उपस्थित प्रकाण्ड पंडितों को चमत्कृत कर दिया था। उनका वह संक्षिप्त भाषण आधुनिक विश्व के सर्वोत्तम भाषणों में स्थान रखता है। 
सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित संन्यासियों को तैयार करता रामकृष्ण मठ हो या नारी शिक्षा के लिए सर्वसमर्पित भगिनी निवेदिता हों, विवेकानन्द ने अपनी सोच को ठोस परिणति में बदलने का उपक्रम भी कर दिखाया।    
बहुत कम लोगों को पता होगा कि उन्हों ने बाल गंगाधर तिलक और जमशेदजी टाटा को प्रेरित किया था। उनका सक्रिय जीवन उस योजना और प्रण को जी गया जो तिलक ने भारत को राजनीति और उन्हों ने धर्म के माध्यम से जगाने के लिए एक रेल यात्रा के दौरान लिया था। तिलक और विवेकानन्द के अवसान के बाद आए कांग्रेसियों ने उनकी विराट सोच का बंटाधार कर भारत की स्वतंत्रता को हिन्दू मुस्लिम समस्या में बदल दिया जिसकी परिणति उस चरम सुविधाजीवी और समझौतावादी सत्ता परिवर्तन में हुई जिसने भारतीय जन को क्षुद्र स्वार्थ लोलुप शुतुर्मुर्गी समाज में बदल दिया।
क्या कोई ऋषि विवेकानन्द फिर आएगा ? हाँ, वे ऋषि ही थे। स्वयं रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें सप्तर्षियों में से एक कहा था।
आज विवेकानन्द का जन्मदिन है (12 जनवरी, 1863, समय प्रात: 06:33, कोलकाता)। हम बस श्रद्धांजलि दे सकते हैं और उनकी बातों पर मनन कर सकते हैं। हममें जाने कितने छोटे छोटे विवेकानन्द सोए पड़े हैं। जरूरत बस उन्हें जगाने की है।