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रविवार, 15 अप्रैल 2018

वर्षा+शरद, हेमन्‍त+शिशिर

By Meinolf Wewel [CC BY 3.0 (https://creativecommons.org/licenses/by/3.0)], from Wikimedia Commons
जमदग्नि एवं ऋग्वैदिक ऋचा 'य॒ज्ञाय॑ज्ञा वो अ॒ग्नये॑ गि॒रागि॑रा च॒ दक्ष॑से । प्रप्र॑ व॒यम॒मृतं॑ जा॒तवे॑दसं प्रि॒यं मि॒त्रं न शं॑सिषम् ॥' पर विचरते आगे बढ़ा तो उसी सूक्त में मुझसे एक खोई हुई कड़ी मिल गयी। शिशिर के पश्चात बसंत ऋतु आती है। शिशिर में पत्ते झड़ने आरम्भ होते हैं तो बसंत तक वृक्ष वसन वस्त्र हीन हो पुन: नये धारण करने लगते हैं, संक्रमण काल होता है नवरसा का। उस सूक्त की आठवीं ऋचा रोचक है: विश्वा॑सां गृ॒हप॑तिर्वि॒शाम॑सि॒ त्वम॑ग्ने॒ मानु॑षीणाम् । श॒तं पू॒र्भिर्य॑विष्ठ पा॒ह्यंह॑सः समे॒द्धारं॑ श॒तं हिमा॑: स्तो॒तृभ्यो॒ ये च॒ दद॑ति ॥ शत शरद जीने के आशीर्वाद तो आप ने बहुत देखे होंगे। वर्षा के पश्चात शरद ऋतु आती है। वर्षा नवजीवन हेतु सृष्टि को समर्थ बनाती है किंतु उसके साथ बहुत कुछ अवांछित भी रहता है। उसका अंत देख एक और सुखदायी शरद देखने की कामना में उस आशीर्वाद का मूल है। किंतु इस ऋचा में शतं हिमा की बात की गयी है। विद्वानों ने इसे शत हेमंत बताया है। हेमंत, हिम का अंत जिसके आगे कड़ाके की ठण्ड वाला शिशिर होता है। हेमंत ऋतु वर्ष की सबसे 'स्वास्थ्यकर' ऋतु है। स्वभाव से ही क्षयी शरीर इस ऋतु में पुष्ट हो विस्तारी देह बनती है। जठराग्नि प्रदीप्त होती है त्वमग्ने मानुषीणां को शतं हिमा से मिला कर देखें तो इस आशीर्वाद में स्वस्थ जीवन बिताते हुये एक और पुष्टिकारक ऋतु तक जी लेने की कामना छिपी हुई है। नवप्रवालोद्रमसस्यरम्यः प्रफुल्लोध्रः परिपक्वशालिः। विलीनपद्म प्रपतत्तुषारोः हेमंतकालः समुपागता-यम्‌॥ (कालिदास, ऋतुसंहार) ब्राह्मण ग्रंथों को देखें तो रोचक तथ्य दिखते हैं। शतपथ में वर्षा एवं शरद को मिला कर पाँच ऋतुओं की बात की गयी है:
लोको॑वसन्त॑ऋतुर्य॑दूर्ध्व॑मस्मा॑ल्लोका॑दर्वाची॑नमन्त॑रिक्षात्त॑द्द्विती॑यम॑हस्त॑द्वस्याग्रीष्म॑ऋतु॑रन्त॑रिक्षमेवा॒स्य मध्यमम॑हरन्त॑रिक्षमस्य वर्षाशर॑दावृतू य॑दूर्ध्व॑म्न्त॑रिक्षादर्वाची॑नं दिवस्त॑च्चतुर्थम॑हस्त॑द्वस्य हेमन्त॑ऋतुर्द्यउ॑रेवा॒स्य पञ्चमम॑हर्द्यउ॑रस्य शि॑शिर ऋतुरि॑त्यधिदेवतम्।
शतपथ के पुरुषमेध का प्रारम्भ पाँव से होता है और पाँव है ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ बसंत! शतपथ का वर्षा और शरद को मिलाना उस ऋग्वैदिक कूट कथ्य से भी जुड़ता है जिसमें इन्द्र वृत्र को मार कर सूर्य और वर्षा दोनों को नया जीवन देते हैं। पुरुषमेध में यह देह का केन्द्रीय भाग अर्थात कटि है। ऐसा क्यों? इसमें उस समय की स्मृति है जब वर्ष का आरम्भ वर्षा से था। शरद मिला देने पर शरद विषुव जोकि वसंत विषुव से छ: महीने के अंतर पर पड़ता है, वर्षा के साथ आ जाता है, नाक्षत्रिक एवं ऋत्विक प्रेक्षणों के सम्मिलन से सुविधा हो जाती है।
ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत एवं शिशिर को मिला दिया गया है: हेमन्‍तशिशिरयो: समासेन तावान्‍संवत्सर: संवत्सर: प्रजापति: प्रजापत्यायतनाभिरेवाभी राध्नोति य एवं वेद। आजकल के आधे कार्त्तिक से आधे फाल्गुन तक के इस कालखण्‍ड में माघ महीना पड़ता है जो कभी संवत्सर का आरम्भ मास था, वही शीत अयनांत वाली उत्तरायण अवधि जिसे अब लोग संक्रांति के रूप में मनाते हैं। पुन: ऐतरेय ब्राह्मण वाला अंश पढ़ें तो! ... शेष पुन: कभी। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारी मान्यताओं में जाने कितनी सहस्राब्दियों के अवशेष छिपे हुये हैं। डूबने की आवश्यकता है।

रविवार, 4 जनवरी 2015

नवग्व दशग्व

भूमा को सिञ्चित करते पर्जन्य को देख कर जो आह्लाद वैदिक ऋचाओं में बरसता है वह मानसूनी जलवायु से ही साम्य रखता है, भैया काहें बुद्धि का दुरुपयोग कर रहे हो?
[यह विवेचना उस दावे को काटने के लिये है जो इन्द्र द्वारा वृत्र के वध और वर्षा के प्रारम्भ को लेकर यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि कथित आर्य मध्यएशिया के स्तेपी घास के मैदानों से भारत में आये थे।] 
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ऋग्वैदिक सत्रों में दो महाविभूति समूहों की बड़ी प्रतिष्ठा है। वे हैं नवग्व और दशग्व। ये दोनों बड़े रहस्यमय हैं। टिळ्क ने इनका प्रयोग यह दर्शाने में किया कि वैदिक जनों का आदि देश आर्कटिक क्षेत्र था जिसे कालान्तर में निरस्त कर दिया गया जब कि वामपन्थी भगवान सिंह इन्हें 'गौ' अर्थात धन, खनिज आदि की खोज में देश विदेश की यात्रायें करने वाले विशिष्ट आङ्गिरस कुल का नाम दे पहचानते हैं जो कि साहित्यिक साक्ष्यों से पुष्ट भी होता है (कभी सप्तर्षि आङ्गिरस कुल के ही थे! और सप्तर्षियों की प्रतिष्ठा जग जाहिर है)। 
सम्भव है ये दो समूह वर्ष के दो और तीन उन महीनों को छोड़ यात्रा करते रहे हों जिनमें जलवायु यात्रा योग्य न रहती हो। 
छ: ऋतुओं से दो दो ले कर सामान्य जन के समझ योग्य तीन लगभग (+/- एक पक्ष) समूह बने: जाड़ा - हेमंत (नवम्बर दिसम्बर), शिशिर (जनवरी फरवरी); गर्मी - बसंत (मार्च अप्रैल), ग्रीष्म (मई जून); बरसात - वर्षा (जुलाई अगस्त), शरद (सितम्बर अक्टूबर)। दो, तीन महीनों से आगे आते परवर्ती काल में हम चातुर्मास अर्थात बरसात के चार महीनों में साधकों के एक ही स्थान पर निवास से परिचित होते हैं।
शरद अर्थात सितम्बर विषुव के पश्चात सूर्य प्राचीन पितृयान (तब का दक्षिणायन) में चले जाते और वसन्त विषुव अर्थात संवत्सर के प्रारम्भ के दिन से देवयान में प्रवेश करते जो कि उत्तरायण माना जाता। तब देवयान की दो ऋतुओं बसंत और ग्रीष्म को ले कर कभी समस्या नहीं रही। समस्या जाड़े के समय अर्थात पितृयान में है। इसकी तीन ऋतुयें शरद, हेमंत और शिशिर श्रौत सत्रों के आयोजकों के लिये कठिन थीं। शतपथ ब्राह्मण में सन्धि ऋतु वर्षा को शरद के साथ संयुक्त कर पाँच ऋतुयें कर दी गईं और पुरुषमेध में पाँच अंगों से इन्हें पहचाना गया। शतपथ के पुरुषमेध का प्रारम्भ पाँव से होता है और पाँव है ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ बसंत! 
ऋग्वैदिक ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत और शिशिर ऋतुओं का समास कर पाँच ऋतुयें बना ली गईं। स्पष्ट है कि 5x2=10 महीनों में ही श्रौत सत्रों की गतिविधियाँ उठान पर रहतीं और बचे दो महीनों अर्थात एक ऋतु के बराबर समय में दशग्व सहित सब मिल कर सत्र अवसान करते। एक पक्ष आगे और पीछे मिला कर विराम पर रहने वाले नवग्व भी सम्मिलित होते। शतपथ का वर्षा और शरद को मिलाना उस ऋग्वैदिक कूट कथ्य से भी जुड़ता है जिसमें इन्द्र वृत्र को मार कर सूर्य और वर्षा दोनों को नया जीवन देते हैं। उल्लेखनीय है कि इन दो ऋतुओं को मिलाने पर सितम्बर का विषुव भी इस कालखंड में पड़ जाता है। संवत्सर प्रारम्भ के लिये एक अन्य आदर्श कालखंड। आश्चर्य नहीं कि पुरुषमेध में यह देह का केन्द्रीय भाग अर्थात कटि है। तो ऐतरेय ब्राह्मण के हेमंत+शिशिर का क्या करें? विश्वामित्र का स्मरण करें जो कि नये संसार के साथ वैकल्पिक संवत्सर के भी जन्मदाता माने जाते हैं। 
स्पष्ट है कि वैदिक युग के श्रौत समाज में एक साथ अनेक पद्धतियाँ प्रचलित थीं जिन्हें न समझने के कारण निरूपण में बहुत सी भूलें हुई हैं।