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गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

स्त्री सूक्त

अंत में ईश्वर ने मनुष्य की रचना की और उसने पहली भूल की, उसने उसे जी भर निहारा ।1।  
अपनी इस अद्भुत कृति पर वह मुग्ध हुआ ।2।
इतना मुग्ध कि मनुष्य का साथ तक असहनीय हो गया। उसने उसे पृथ्वी पर दूर भेज दिया ।3।
मनुष्य को पहली सीख मिली – प्रियता की पराकाष्ठा है निकटता का असहनीय हो जाना! दूरी 4।
वह स्वयं के निकट हुआ और बिना किसी ईश्वरीय हस्तक्षेप के एक से अनेक हुआ ।5। 
आसक्त ईश्वर ने मनुष्यों के पास अपना दूत भेजा। उन्हें सब कुछ बताने को कहा और दूत को चेताया कि उनसे आँखें न मिलाना ।6।  
 जीवन, कर्म, मित्रता, प्रेम, विवाह, संतान, धर्म, समाज, विधि, न्याय, अपराध, दंड, मृत्यु आदि सब पर उसने उन्हें सन्देश दिया। मनुष्य सिर झुकाये सुनते रहे। उनकी आत्मायें तृप्त हो गईं। उन्हों ने जीना समझ लिया ।7।  
संतुष्ट दूत प्रस्थान को मुड़ा तो पीछे से एक स्वर आया – रुको!8।  
वह मुड़ा। एक स्त्री उसके विशाल शुभ्र वस्त्र के एक कोने को पकड़े भूमि पर बैठी थी। पहली बार किसी मनुष्य ने उसके सामने सिर उठाया था। स्त्री ने प्रश्न किया – सब कुछ तो ठीक है लेकिन क्या करें यदि प्रेम की टीस सताना न छोड़े?9।  
दूत ने पहली बार किसी मनुष्य से आँख मिलाया। वह पहला अपराध था, स्वर्गीय कहलाया। स्त्री कारण थी, घृणित हुई ।10।  
चमकता सूरज मन्द हो गया,
सुगन्धित समीर बन्द हो गया,
समुद्र की लहरें शांत हो गईं,
ईश्वर की वाणी पथ भूल गई ।11।  
सम्मोहित से दूत ने उत्तर दिया – अभी जा रहा हूँ। यात्रा से लौट कर बताऊँगा ।12।  
दूत कभी नहीं लौटा। वह भटकता रहा। वह प्रेमग्रस्त हो गया था ।13।  
ईश्वर को पहली बार निराशा, क्रोध, क्षोभ और मोह ने ग्रसित किया ।14।  
उसने तय किया कि अब और किसी दूत को नहीं भेजेगा ।15।  
सदियाँ बीतती रहीं। मनुष्य भूलते गये। स्मृति सुरक्षित रखने को उन्हों ने कई कहानियाँ गढ़ डालीं लेकिन भूलना जारी रहा ।16।  
मनुष्यों के बीच से ही स्वयं को दूत कहने वाले होते रहे और अपनी बातों को ईश्वरीय कह कर प्रचारित करते रहे ।17।  
वे सभी पुरुष थे। सबने स्त्री का निषेध किया। उसके लिये आचार संहितायें गढ़ीं और दंड विधान बनाये। मनुष्य का पहला अपराध स्त्री ने किया था ।18।  
सबने माँ, एक स्त्री, की महिमा गाई। इससे उन्हें अपने होने पर गर्व होता था, उनके भीतर कुछ नरम नम होता था ।19।    
कान और आँखें बन्द करने पर भटकते दूत की आहट मिलती है ।20।
मनुष्य अपनी कहानियों और गीतों में प्रेम के उस प्रश्न को समझने सुलझाने के यत्न करता रहता है जिससे ग्रसित दूत उनके भीतर भटकता रहता है ।21।  
आहट भुलाने को गीत गाये जाते हैं। स्त्री के बिना गीत नहीं बनते ।22।
संगीत अंतिम अपराध है। मनुष्य इससे आगे अपराध नहीं कर सकता ।23।
दूत का अंतिम अपराध अभी होना है, वह प्रेम से मुक्ति देगा ।24।
उस दिन ईश्वर की अंतिम भूल घटित होगी। उस दिन प्रलय होगा ।25।
प्रलय का दोष स्त्री के ऊपर होगा। वह ईश्वर को भ्रष्ट करेगी ।26।
वह दोष धारण करेगी और सृष्टि पुन: रच जायेगी ।27।
सृष्टि में पुन: स्त्री मनुष्य से अलग कहलायेगी और ईश्वर पुरुष होगा ।28।
पुन: लिखा जायेगा - अंत में ईश्वर ने मनुष्य की रचना की और उसने पहली भूल की, उसने उसे जी भर निहारा ।29।