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सोमवार, 7 सितंबर 2009

चँवर में डूबे धान

यह लेख इस लेख पर की गई एक टिप्पणी भर है। (चित्राभार: वीकीपिडिया)
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चँवर में डूबे धान से उपर आसमान को झाँकते पत्ते से लगते हैं हम।
हम जो हिन्दी की किताबें पढ़ते हैं, कभी जोश में बोलने लगें तो अकेले हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? कहीं हम अलग दुनिया में तो नहीं जी रहे? कहीं ऐसा तो नहीं कि जमाना गली नं. 36 में जा रहा है और हम अभी भी गली नं. 63 में हाँक पार रहे हैं?..
पानी चँवर की खासियत और पहचान है लेकिन कभी कभी धान को गला भी देता है।...
धान की कितनी ही किस्में खत्म हो गईं। जो बची हैं वो मिलावटी हैं। धान को तो पेट भी भरना है- विकराल गति से बढ़ती आँख मूँदे भागती दुनिया का। आम जन का पेट 'काला नमक' चावल से तो नहीं भरेगा, उसे तो 'चाइना 4' चाहिए।
...हिन्दी वाले। बहुत जल्दी पल्ला पटक देते हैं। शायद कुछ को बुरा लगे लेकिन धार के विपरीत चलना हो या साथ बहते हुए भी अपनी विशिष्टता ऐसे बनाए रखनी हो कि धारा में योगदान भी हो - दोनों में तप, निष्ठा और निरंतरता की आवश्यकता होती है। कितने हैं ऐसे ?
ब्लॉग जगत में ही कितने ही समर्पित और प्रतिभाशाली लोग कुछ देर हाँक पारने के बाद चुप हो गए! 
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सीमित आय में मैकडोनाल्ड से बच्चे को नए डिश खिला दो या हिन्दी एकेडमी से किताबें ले लो। दोनों नहीं हो सकते। प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?
मैं बैकवर्ड आज भी मेनू कार्ड और किताबों दोनों पर पहले दाम देखता हूँ। एक बार ऐसे ही खरीद ली तो 
एक कविता ही रच मारी थी।
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लाइब्रेरियाँ और पुस्तकों से बातें ! अच्छी कही। वहाँ शांति होनी चाहिए। शांति भंग करने के लिए हमारे पास समय कहाँ है? लाइब्रेरी तक जाना, पढ़ना और आना, मॉल में सिनेमा जाने के सामने कहाँ ठहरता है!....

लगे रहो बन्धु। ...धान की 'काला नमक' वेराइटी अभी भी माँग में है। चँवर अभी सूखे नहीं हैं और कभी कभी गला देने के उपद्रव के बाद भी धान तो उपजा ही रहे हैं....