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गुरुवार, 11 जून 2020

restoration of broken lingam Agni puran दुष्टलिङ्ग जीर्णोद्धार



काशी के पण्डों के एक वर्ग ने बहुत बवाला मचाया हुआ है कि शिवलिङ्ग एक बार स्थापित हो गया तो हटाया नहीं जा सकता।
वास्तविकता क्या है?

इस प्रश्न से पूर्व उनसे यह पूछा जाना चाहिये कि सोमनाथ हो या विश्वनाथ, जो लिङ्ग भङ्ग कर दिये गये, उनके स्थान तक हड़प लिये गये, उनके लिये शास्त्र मर्यादा क्या है?

विश्वेश्वर के मूल स्थान पर तो आज रजिया की मस्जिद है। ज्ञानवापी विश्वनाथ की तो कहानी ही कारुणिक है!

वास्तविकता यह है कि जीर्णोद्धार का प्रावधान है तथा दुष्टलिङ्ग जैसी सञ्ज्ञा भी है। या तो वे पण्डे सूक्ष्म विधान समझ नहीं पा रहे या स्वार्थवश वितण्डा में लगे हैं।

अग्निपुराण में बहुत विस्तार से जीर्णोद्धार का विधान है किंतु शब्दावली ऐसी है जो ऐसा करने को बहुत ही असामान्य स्थिति में अनुमति देती है। सारा बखेड़ा चालन शब्द को ले कर है जिसका अभिधा अर्थ ले कर कि लिङ्ग को उसके स्थान से नहीं हटाया जा सकता, वितण्डा चल रहा है। चालन शब्द प्रस्तर प्रतिमा हेतु नहीं, मूल स्थान हेतु है अर्थात मूल स्थान वही रहेगा, वहाँ स्थापित लिङ्ग यदि दुष्टलिङ्ग अर्थात दोषयुक्त हो गया हो तो उसे चलायमान कर नया स्थापित किया जा सकता है।

शास्त्रकार लिङ्ग को पाषाण प्रतिमा न मान कर शम्भु की बात कर रहा है जबकि ये पण्डित लिङ्गप्रतिमा को ही सबकुछ माने बैठे हैं।

स्थानभङ्ग, वज्रपात, झुकाव व केंद्रस्थ स्थापना आदि दोषों की स्थिति (दुष्ट को दोष से समझें) में पुन: वही लिङ्ग स्थापित किया जा सकता है यदि क्षत या व्रणचिह्न न हों - निर्ब्रणञ्च। आगे बताता है कि विधिसम्मत ढङ्ग से पुन:स्थापित लिङ्ग अपने स्थान से नहीं हटाया जाना चाहिये -

ततोऽन्यत्रापि संस्थाप्य विधिदृष्टेन कर्म्मणा । सुस्थितं दुस्थितं वापि शिवलिङ्गं न चालयेत् ॥

इस श्लोक की दूसरी अर्द्धाली मात्र को ले कर पण्डे गाल बजा रहे हैं - अधूरी बात। ऐसे कर्म काशी में बहुत पहले से होते रहे हैं, कोई नई बात नहीं। अगला श्लोक देखें -

शतेन स्थापनं कुर्य्यात् सहस्रेण तु चालनं । पूजादिभिश्च संयुक्तं जीर्णाद्यमपि सुस्थितं ॥

यदि स्थापना हेतु सौ (पूजार्पण आदि) करना है तो चालन हेतु हजार का। इस प्रकार की पूजा से संयुक्त होने पर जीर्ण हुआ लिङ्ग भी सुस्थापित हो जाता है। जीर्ण का अर्थ जिसकी स्थिति बिगड़ गयी हो परंतु जिसमें दोष न आये हों।

व्रण, टूट, भङ्ग आदि दोष होने पर क्या करें?

विधाय द्वारपूजादि स्थण्डिले मन्त्रपूजनं
मन्त्रान् सन्तर्प्य सम्पूज्य वास्तुदेवांस्तु पूर्ववत्
दिग्बलिं च वहिर्दत्वा समाचम्य स्वयं गुरुः
ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु 
शम्भुं विज्ञापयेत्ततः

दुष्टलिङ्गमिदं शम्भोः शान्तिरुद्धारणस्य चेत्
रुचिस्तवादिविधिना अधितिष्ठस्व मां शिव
एवं विज्ञाप्य देवेशं शान्तिहोमं समाचरेत्

लम्बी प्रक्रिया है। संक्षेप में जानें कि विधि सम्मत मंत्रपूजा कर, तर्पण कर, वास्तुदेव को संतुष्ट कर, दिग्बलि दे, ब्राह्मण भोजन आदि करा कर स्वयं शम्भु को विज्ञापित करे -

हे शम्भु! यह लिङ्ग दोषयुक्त हो गया है, इसका उद्धार करना है (उद्धार शब्द की व्युत्पत्ति निरुक्त व पाणिनि अनुसार काशी के पण्डों को पढ़नी चाहिये)। हे शिव! यदि आप को रुचे तो इन विधियों के द्वारा आप मुझमें अधितिष्ठ हों! (यजमान स्वयं के भीतर शिव को स्थित रहने को कह रहा है।)
इसके पश्चात उसे शांतिहोम करना चाहिये।

इससे आगे अनेक विधि विधान वर्णित हैं तथा -

सत्त्वः कोपीह यः कोपिलिङ्गमाश्रित्य तिष्ठति
लिङ्गन्त्यक्त्वा शिवाज्ञाभिर्यत्रेष्टं तत्र गच्छतु
विद्याविद्येश्वरैर्युक्तः स भवोत्र भविष्यति

जो भी सत्त्व इस लिङ्ग मेंंआश्रय लिये हुये हैं, शिव की आज्ञा से इस लिङ्ग का त्याग कर जहाँ जाना चाहें, जायें। विद्या व विद्येश्वर से युक्त भव अर्थात शिव यहाँ बने रहेंगे।

आगे सत्त्व शक्तियों को हटाने की विधियाँ हैं - 

दत्वार्घं च विलोमेन तत्त्वतत्त्वाधिपांस्तथा
अष्टमूर्त्तीश्वरान् लिङ्ग पिण्डिकासंस्थितान् गुरुः
विसृज्य स्वर्णपाशेन वृषस्कन्धस्थया तथा  
रज्वा बध्वा तया नीत्वा शिवमन्तं गृणन् जनैः
तज्जले निक्षिपेन् मन्त्री पुष्ठ्यर्थं जुहुयाच्छतं 
तृप्तये दिक्पतीनाञ्च वास्तुशुद्धौ शतं शतं

इसके पश्चात महापाशुपत मंत्र द्वारा भवन को रक्षित कर गुरु नये लिङ्ग की वहाँ विधिवत स्थापना करता है -

रक्षां विधाय तद्धाम्नि महापाशुपता ततः
लिङ्गमन्यत्ततस्तत्र विधिवत् स्थापयेद् गुरुः

वितण्डावादी निम्न श्लोक का आधार ले कर शिवलिङ्गों को हटाये जाने का विरोध उचित बता सकते हैं -

असुरैर्मुनिभिर्गोत्रस्तन्त्रविद्भिः प्रतिष्ठितं
जीर्णं वाप्यथवा भग्नं विधिनापि नचालयेत्

असुरों, मुनियों वा उनके गोत्र वालों, तन्त्रविदों के द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिङ्गों को; चाहे जीर्ण हों, चाहे भग्न हों; विधि अनुसार भी चलायमान न करे।

क्या अर्थ है इसका?

मात्र अभिधात्मक? कौन करे, जिन लोगों पर अर्थ स्पष्ट करने का दायित्त्व है, वे तो स्वार्थी वितण्डा में लगे हैं!

बहुत सीधा सा समाधान है। असुर, मुनि, गोत्र वालोंं व तंत्रविदों को हटा दें तो बचते कौन हैं? सभी सनातनी तो किसी न किसी गोत्र के ही हैं न? जिनका ज्ञात नहीं, उनके लिये कश्यप हैं। तब तो मात्र देवताओं, यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि के द्वारा स्थापित लिङ्ग ही भग्न होने पर हटाये जा सकेंगे! नहीं!! दलहित नवबौद्ध, इसाई व मुसलमान तो शिवलिङ्ग की स्थापना करेंगे नहीं!!!

मुनिभिर्गोत्र का अर्थ कुछ जातिवादी ब्राह्मण जाति से लगाते हैं अर्थात असुर स्थापित लिङ्ग तो रहेंगे, किंतु ब्राह्मणेतर मनुष्यों के द्वारा स्थापित दुष्टलिङ्ग हटाये जा सकते हैं। यह तो अनर्गल बात हो गई!

इसका अर्थ सरल है कि विशिष्ट जन द्वारा विशिष्ट विधानों सहित विशिष्ट स्थानों पर स्थापित शिवलिङ्ग किसी भी स्थिति में हटाये नहीं जाने चाहिये। यह अतिरिक्त सावधानी है, अति महत्त्वपूर्ण स्थलों की मर्यादा को सुरक्षित रखने हेतु जिससे कि लोग उपर्युक्त विधि विधानों का आश्रय ले मनमानी न करने लगें।

दुर्भाग्य से सोमनाथ हो या विश्वेश्वर विश्वनाथ; इसी श्रेणी के लिङ्ग थे। म्लेच्छों ने मूलस्थान तो ह‌ड़पे ही, मूल शिवलिङ्ग भी तोड़ दिये। पण्डों के अनुसार तो तब कुछ कर ही नहीं सकते थे! है न? (आपद्धर्म केवल आपदा हेतु नहीं, अभूतपूर्व स्थितियों हेतु भी प्रयुक्त होता है, उन्हें कौन समझाये?)

क्या उससे सोमनाथ या विश्वेश्वर की आराधना भी समाप्त हो गई? नहीं। सनातन ने प्रवाह को रुकने नहीं दिया। हम लड़ते रहे, पुन: पुन: निर्माण कर अपनी आस्था सँजोते रहे। इन पण्डों की चली रहती तो तीर्थ व दिव्यस्थल कब के लुप्त हो गये रहते! काशी परिक्रमा के जाने कितने हो ही गये न!

निजी स्वार्थ वश जिन्हें सँजोना था उन्हें लुप्त व विकृत कर पण्डे उनके लिये वितण्डा में लगे हैं जिनका कोई विशेष महत्त्व नहीं। यहाँ भी स्वार्थ है।

प्रश्न यह भी है कि किसके पास इतना समय है जो इनके वितण्डा प्रसार की काट समय लगा कर करता रहेगा? क्या मिलना उससे? इस कारण भी इनकी लन्तरानियाँ चलती रहती हैं।

॥हर हर महादेव॥

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

अग्निपुराण के अर्चना क्रम में वार Agnipuran days name order

Agnipuran days name order
[इस लेख के अन्त तक आप को स्पष्ट हो जायेगा कि संस्कृत की सम्पदा तथा शक्ति जानने के लिये क्यों मूल को पढ़ना आवश्यक है तथा क्यों अङ्ग्रेजी या कोई भी अनुवाद संस्कृत के शब्दों की अर्थ समृद्धि तथा प्रयोग उद्देश्य की ऐसी तैसी कर देते हैं!]

भां नेत्रं वस्तथार्क्कास्त्रं राज्ञी शक्तिश्च निष्कुभा ।
सोमोऽङ्गारकोथ बुधो जीवः शुक्रः शनिः क्रमात् ॥
भा कहते हैं दीप्ति को (भास्कर नाम से समझें)। पहले उसकी पूजा, तदुपरान्‍त आँख की जिसके लिये नेत्रं शब्द का प्रयोग है। कभी सोचा है आप ने कि नेत्र तथा नेतृत्त्व एक ही सोते के हैं? नेत्रम् [नयति नीयते वा अनेन नी-ष्ट्रन्]
आँख से ही हम सब देखते हैं, वही हमारा नेतृत्त्व करती है। दीप्ति अर्थात प्रकाश न हो तो आँख किस काम की?
तत्पश्चात सूर्य के अस्त्रों की। सूर्य की अर्क संज्ञा प्रयुक्त हुई है।
अर्क भी अद्भुत शब्द है - अर्चना का बन्धु :) अर्च्-घञ्-कुत्वम्। प्रकाश की किरण। साथ ही अरुण से भी सम्‍बन्‍धित - आविष्कृतारुणपुरःसर एकतोऽर्कः। अरुण कौन? जो रात के अँधेरे के विरुद्ध अंतरिक्ष में रुचता पसरता हो - अरुणकररुचायतेऽन्तरीक्षे।
अस्त्र कौन हैं अर्क के? राज्ञी, शक्ति, निष्कुभा। राज्ञी रानी को कहते हैं किन्‍तु जिस रा+ज+ञ् से यह शब्द आ रहा है, वह रञ्जन से सम्बन्धित है। राजा वह जो प्रजा का रञ्जन करे। अर्क रञ्जक होता है। सूर्योदय कितना लुभावना होता है! एक अन्य रहस्य भी है, पश्चिमी दिशा को भी राज्ञी कहा गया है, वहाँ राज्ञी का अर्थ सूर्य की पत्नी हो जाता है। सूर्य पश्चिम में डूबता है, रात हो जाती है, अपनी पत्नी के साथ विश्राम में चला जाता है।
सूर्य में शक्ति होती है, solar power जानते ही हैं सभी। शक्ति शब्द का उत्स शक् से है। 'सकना', कुछ कर सकना उसी से आ रहा है। सिद्धार्थ गौतम का शाक्य सूर्य वंश भी अपना नाम इसी शब्द से पा रहा है - शक्यते! न शक्यते!! [कहानी पहले बता चुका हूँ]
निष्कुभा पर आइये। पहले कुभा समझिये। काबुल नदी का वैदिक नाम है - कुभा। क्यों भला? इसके लिये भा पर ध्यान दीजिये, कुभा अर्थात जिसकी दीप्ति कु हो, मटमैली हो। कुभा की प्रकृति इस प्रकार की है कि तरङ्गें मिट्टी आदि को सर्वदा विलोड़न में ही रखती हैं।
सूर्य का अस्त्र निष्कुभा, अर्थात जो कुभासित न हो - स्वच्छ हो। चमक भी अस्वच्छ हो सकती है? कभी सूर्यग्रहण के समय देखे हैं चहुँओर का प्रकाश कैसा होता है? अवसादी।
इसके पश्चात जो क्रम है, वह है सोम - चन्‍द्र, अङ्गारक - अङ्गार की तरह लाल दिखता मङ्गल, बुध, जीव बृहस्पति के चक्र में तीसरे पञ्चवर्षी को कहते हैं तथा स्वयं बृहस्पति को भी। जीव कहने का अर्थ यह हो सकता है तीन दिन बीत चुके, चौथा है बृहस्पति (एक प्रमाण कि वार गिनती सोम से आरम्भ हुई, अनुमान भर है, ज्योतिष जानने वाले ठीक ठीक बता पायेंगे)। पाँचवा शुक्र, छठा शनि।
...
वार क्रम पर आज कल बड़े बड़े दुरूह लेख आ रहे हैं, सरल सी बात इतनी है कि पृथ्वी से देखने पर तीव्रतम से मन्दतम गति क्रम में ग्रह पिण्डों को रखा गया तो सोम सबसे पहले तथा शनि सबसे अन्‍त में आया।
ग्रह से ग्रहण लेना भी है तथा लगना भी, पकड़ कर रखने से है कि गतिमान तो है किंतु गति यादृच्छ नहीं।
शनि का नाम शनैश्चर है ही शनै: चर अर्थात शनै शनै, धीमी गति वाला। सबसे धीमे से सबसे तेज को बढ़ें तो क्रम यह है -
शनि, गुरु, मङ्गल, सूर्य, शुक्र, बुध, चंद्र।
इसके पश्चात दिन के कुल 24 घण्टों में से दिन आरम्भ के घण्टे को सबसे तेज का स्वामी बताया गया अर्थात चन्द्र। अब हर घण्टे पर एक एक रखते जाइये, इसी क्रम में - 2-शनि, 3-गुरु इत्यादि। 25 वें घण्टे अर्थात दूसरे दिन पर आयेगा मङ्गल, 49वें अर्थात तीसरे दिन पर आयेगा बुध ... हो गया दिनों के नाम का क्रम!