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शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

राक्षसी लङ्का - समये सौम्य तिष्ठंति सत्त्ववंतो महाबला: [सुंदरकाण्ड - 6]

सुंदरकाण्ड -5 से आगे:

लङ्का। वैश्विक आतंक और अत्याचार की नाभि लङ्का। महाकपि के सामने वह लङ्का थी जो विश्वकर्मा द्वारा निर्मित और राक्षसेन्द्र द्वारा पालित थी -  पालितां राक्षसेन्द्रेण निर्मितां विश्वकर्मणा। विकृत विद्या, आहार और विहार से उन्मत्त महाभोगी राक्षस समृद्ध लङ्का सामने थी जिसका पूरा तंत्र ही शोषण, अपहरण, बलात्कार, हत्या और रुधिर से समन्वित था।  
सागर उसकी सुरक्षा में था। त्रिकूट लम्ब पर्वत के शिखर पर स्थित अट्टालिकाओं में रहने वाला दुरात्मा व्यभिचारी रावण चहुँओर फैले स्कन्धावारों के माध्यम से अपनी आतंकी श्रेष्ठता का उद्घोष करता था जिसे सुदूर कैलास तक सुना जा सकता था।
उसके अपने वेदविद ब्रह्मराक्षस थे, अपने अभिचारी यजन सत्र थे और सुव्यवस्थित सुनियोजित प्रचारतंत्र भी:
षडङ्गवेदविदुषां क्रतुप्रवरयाजिनाम्
शुश्राव ब्रह्मघोषांश्च विरात्रे ब्रह्मरक्षसा

देव, विद्याधर, यक्ष, नाग, गन्धर्व आदि सब उससे काँपते थे, ग्रामीण और नागर मनुष्यों या वनवासी वानर भल्लूकों को तो वह गिनता ही नहीं था। जाने कितनी स्त्रियाँ अपहृत बलत्कृत कर लङ्का के वासनापङ्क में लायी गयीं और भुला दी गयीं। निर्बल जग ने लङ्का की रीति कह स्वीकार सा कर लिया, सबल की सामर्थ्य क्षम्य हो गयी।

ऐसे में एक और स्त्री, वह भी एक निर्वासित राजकुमार की स्वयं रावण द्वारा अपहृत मानवी पत्नी को ढूँढ़ने वह आये थे और सामने विराट लङ्का के उत्तुङ्ग भवनशिखर थे - अट्टालकशताकीर्णां ...गिरिमूर्ध्नि स्थितां लङ्कां

उत्तरी द्वार के निकट पहुँच हनुमान चिंतित हो उठे - द्वारमुत्तरमासाद्य चिन्तयामास वानरः। इस राक्षस नगरी में भीतर कोई सहायता नहीं मिलनी, वह तो आगे की बात है, प्रविष्ट कैसे हों? वह तो भयङ्कर शस्त्रास्त्र धारी घोर राक्षसों द्वारा रक्षित थी, जैसे विषधर सर्प अपनी गुहाओं की करते हैं - दंष्ट्रिभिर्बहुभिः शूरैः शूलपट्टिशपाणिभिः रक्षितां राक्षसैर्घोरैर्गुहामाशीविषैरपि
वह उस स्त्री की भाँति थी जिसकी जघनस्थली चहारदीवारी हो, विशाल जलराशि और गहन वनप्रांतर जिसके वस्त्र हों, शतघ्नी और शूल सरीखे अस्त्र जिसके केश हों और अट्टालिकायें कर्णफूल:
वप्रप्राकारजघनां विपुलाम्बुनवाम्बराम्
शतघ्नीशूलकेशान्तामट्टालकवतंसकाम्
 लम्पटों द्वारा प्रताड़ित दीन स्त्रियों को बन्दी बना कर रखने वाली लङ्का का रम्य रूप भी अभेद्य था!    

उसे तो युद्ध द्वारा भी जीता नहीं जा सकता था – नहि युद्धेन वै लङ्का शक्या। विषमां लङ्का दुर्गां, पहुँच कर भी राघव क्या कर लेंगे – किं करिष्यति राघव:?
राक्षसों पर साम, दान, भेद और युद्ध, इनमें से कोई भी नीति सफल नहीं होनी:
अवकाशो न सान्त्वस्य राक्षसेष्वभिगम्यते
न दानस्य न भेदस्य नैव युद्धस्य दृश्यते
मेरे अतिरिक्त केवल तीन वानरों, अङ्गद, नील और सुग्रीव की गति ही यहाँ तक हो सकती है।
घोर चिंता में महाकपि की विचारसरि बह चली, अच्छा, पहले पता तो लगा लूँ कि वैदेही जीवित हैं भी या नहीं – वैदेहीं यदि जीवति वा न वा?
नगरी में आँख बचा कर, कोई ऐसा रूप धारण कर जो दिखने पर भी अनदेखा रह जाये, लक्ष्यालक्ष्य रूप धारण कर ही प्रवेश करना चाहिये।

उन्हें दूत के कर्तव्य की सुध भी हो आई - मेरे कारण कार्य बिगड़ना नहीं चाहिये। विकल दूत द्वारा देशकाल के प्रतिकूल आचरण करने के कारण कई बार स्वामी के बने बनाये कार्य भी बिगड़ जाते हैं। अपने को पण्डित मानने वाले दूत भी कई बार सब चौपट कर देते हैं – घातयंतीह कार्याणि दूता: पण्डितमानिना:। कैसे करूँ कि मुझे विकलता न हो, समुद्र लङ्घन का उद्योग व्यर्थ न जाने पाये और कार्य भी न बिगड़े – न विनश्येत्कथं कार्यं वैक्लव्यं न कथं भवेत्, लङ्घनं च समुद्रस्य कथं नु न वृथा भवेत्? यहाँ छिपे बैठे रहने से भी कुछ नहीं होना, ऐसे ही रहा तो मारा जाऊँगा और स्वामी का कार्य भी विनाश को प्राप्त हो जायेगा।
मैं रात में अपने इसी रूप में ह्रस्व हो लङ्का में प्रवेश करूँगा - तदहं स्वेन रूपेण रजन्यां ह्रस्वतां गतः

प्रदोषकाल में हनुमान जी ने परकोटा फाँदा और नगरी में प्रविष्ट हो गये। भीतर जो लम्बशिखरे लम्बे लंबतोयदसन्निभे ...खमिवोत्पतितां लङ्का का रूप दिखा वह मन को हराने वाला अचिंत्य था, अद्भुत था; साथ ही उन लघुदेह को विदेह कन्या के दर्शन की उत्सुकता की पूर्ति की आस बँधी थी, इसलिये प्रसन्नता भी थी - विषण्णता और हर्ष का विचित्र समन्वय घटित हुआ था:
अचिन्त्यामद्भुताकारां दृष्ट्वा लङ्कां महाकपिः
आसीद्विषण्णो हृष्टश्च वैदेह्या दर्शनोत्सुकः

मन को थोड़ी ठाँव मिली तो मेधावी समीक्षा पुन: प्रवाहित हुई। इस बार कुछ आशा बलवती हुयी थी इसलिये सतर्क विवेचन से कपि ने अनुमान लगाया। मेरे अतिरिक्त वानरों में केवल कुमुद, मैन्द, द्विविद, सुषेण, अङ्गद, सुग्रीव, कुशपर्वा  और जाम्बवान ही इस पुरी के भीतर प्रविष्ट हो सकते हैं। तत्क्षण राघव और लक्ष्मण के विक्रम पराक्रम ध्यान में आये और कपि प्रसन्नचित्त हो गये:
समीक्ष्य तु महाबाहो राघवस्य पराक्रमम्
लक्ष्मणस्य च विक्रान्तमभवत्प्रीतिमान्कपिः

लङ्का के रम्य रूप पर पुन: ध्यान गया – वह नगरी वस्त्राभूषणों से विभूषित सुन्दरी युवती के समान थी। उसके वस्त्र रत्नमय थे। गोष्ठागार और भवन उसके आभूषण थे।  परकोटों पर लगे यंत्रों के गृह ही उसके स्तन थे और वह सब प्रकार की समृद्धियों से सम्पन्न थी:
तां रत्नवसनोपेतां कोष्ठागारावतंसकाम्
यन्त्रागारस्तनीमृद्धां प्रमदामिव भूषिताम्

प्रशंसा करते कपि आगे बढ़े ही थे कि रंग में भंग पड़ गया। लङ्का का विकृत स्त्री रूप सामने था। गर्जना करती हुई वह सामने आ गयी – रे वानर! तू कौन है, यहाँ किस उद्देश्य से आया है? तू इस रावण सैन्य रक्षित पुरी में प्रवेश नहीं कर सकता।
वीर हनुमान अपनी धुन में पूछ पड़े – हे दारुण स्त्री! जो पूछ रही है, वह तो बता दूँगा लेकिन पहले तू ये बता कि है कौन? तेरे नयन बड़े विरूप हैं। तू किस कारण मुझे इस तरह भर्त्सना पूर्वक डाँट रही है? किमर्थं चापि मां क्रोधान्निर्भतर्सयसि दारुणे!      

उत्तर मिला – मैं महात्मा रावण की आज्ञा की प्रतीक्षा करने वाली सेविका हूँ और मैं इस नगरी की रक्षा करती हूँ। आज तू मेरे हाथों मारा जायेगा। तू मुझे ही लङ्का नगरी समझ, अतिक्रमण करोगे तो कठोर वाणी से सत्कार होगा ही।

मेधावी और सत्त्ववान वानरशिरोमणि ने कूटनिवेदन किया – मुझे इस अद्भुत नगरी को देखने का बड़ा कौतुहल है। इसके वन, उपवन, कानन और मुख्य भवन आदि को देखने के लिये ही मेरा आगमन हुआ है।
 इसे सुन कर लङ्का ने पुन: परुष वाणी में उनका तिरस्कार किया – दुर्बुद्धि वानराधम! मुझे परास्त किये बिना तू इस पुरी को नहीं देख सकता। मैं राक्षसेश्वर रावण की पालिता हूँ (कोई ऐरी गैरी नहीं!)।

हनुमान जी ने बिना धैर्य खोये और विनम्र हो कर निवेदन किया – भद्रे! इस पुरी को देख कर मैं जैसे आया हूँ, वैसे ही लौट जाऊँगा (मुझे जाने दें)। दृष्ट्वा पुरीमिमां भद्रे पुनर्यास्ते यथागतम्

इस पर अत्यंत क्रुद्ध हो राक्षसी ने भयङ्कर महानाद कर वानरश्रेष्ठ को बड़े जोर से एक तमाचा जड़ दिया। इस प्रकार पीटे जाने पर वीर मारुति ने उससे भी अधिक तीव्र महानाद किया।
तत: कृत्वा महानादं सा वै लङ्का भयंकरम्
तलेन वानरश्रेष्ठं ताडयामास वेगिता
तत: स हरिशार्दूलो लङ्कया ताडितो भृशम्
ननाद सुमहानादं वीर्यवान् मारुतात्मज:

उन्हों ने बायें हाथ का एक मुक्का उसे जड़ दिया। उस प्रहार से व्याकुल हुई वह धरती पर गिर पड़ी। तमाचे के व्याज में मुक्का खाने से उसकी अहंकार विचलित बुद्धि स्थिर हो गयी। सतोगुणी वीर वज्राङ्ग द्वारा राक्षसी का पराभव हो गया।

 उसने गद्गद वाणी में निवेदन किया -  महाबाहो! प्रसन्न होइये, मुझे त्राण दीजिये। हे सौम्य! सत्त्वगुणशाली वीर पुरुष शास्त्र की मर्यादा में स्थिर रहते हैं (स्त्री अवध्य होती है, ध्यान रखिये)।
प्रसीद सुमहाबाहो त्रायस्व हरिसत्तम
समये सौम्य तिष्ठंति सत्त्ववंतो महाबला:
मुझे आप ने अपने विक्रम से परास्त कर दिया। जाइये जिस हेतु आये हैं वह सब पूरा कीजिये – विधत्स्व सर्वकार्याणि यानि यानीह वाञ्छसि!
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 (रामायण का यह प्रसंग पर्याप्त नाट्य सम्भावनायें लिये हुये है। विचित्रता तो है ही, हास्य और रससृजन के भी अवसर हैं। एक समय ऐसा आया होगा जब आख्यान गायन मंचित भी होने लगा होगा। हरिवंश में यादवों द्वारा रामायण प्रसंग के मंचन के अंत:साक्ष्य हैं।)     

बुधवार, 2 नवंबर 2016

चार गुण – धृतिर्दृष्टिर्मतिर्दाक्ष्यं [सुन्दरकाण्ड-5]


मनुष्य प्रज्ञा प्रेरित सम सम्यक संतुलन के कारण मनुष्य होता है। ऊर्ध्वरेता प्रज्ञा के कारण मूल प्रवृत्तियों का संतुलन सत की पहचान है। सत का सजग चयन वरेण्य है। वह प्रकाशमय सविता है जिसकी प्रेरणा निरंतर ऊँचाइयों की ओर ले जाती है।   
क्षुधा, निद्रा, भय और मैथुन - ये चार प्राकृत हैं, पाशव हैं, मूल प्रवृत्तियाँ हैं, समस्त जंतुओं में होती हैं। इनके एकल या बहुल समुच्चय ही बस हों तो तमस की स्थिति है। इस स्थिति में पाशव वृत्ति ही काम करती है, सम् वाद अर्थात संवाद नहीं। किसी भी अभियान में यदि ऐसी बाधा आये तो बेझिझक कठोरता पूर्वक उसका संहार शमन ही मार्ग है। तमस से उलझना उसे बढ़ाना और बली बनाना होता है।
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पहली दो विघ्न बाधाओं में सजग देव तत्त्व की प्रेरणा और हस्तक्षेप थे लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं था। हनुमान जी की गति को मूल प्रवृत्ति ‘क्षुधा’ से प्रेरित राक्षसी सिंहिका ने रोक लिया – बहुत दिनों पश्चात मोटा आहार मिला है, इसे खा लूँ तो आज पेट भर जायेगा अद्य दीर्घ कालस्य भविष्याम्यहमाशिता
उसके द्वारा पकड़े जाने के कारण हनुमान जी का पराक्रम पङ्गु हो गया जैसे सागर में प्रतिलोम वायु के कारण विशाल जलयान की गति अवरुद्ध हो जाती है – सहसा पङ्गुकृतपराक्रम:, प्रतिलोमेन वातेन महानौरिवे सागरे!
सब ओर देखने पर समुद्र के जल के ऊपर उठा विशालकाय प्राणी दिखा और उन्हें स्मृति हो आयी कि सुग्रीव ने इसी महापराक्रमी छायाग्राही जीव के बारे में चेताया था, इसमें संशय नहीं कि वही है – छायाग्राहि महावीर्यं तदिदं नात्र संशय:। पानी में थोड़े गहरे रहने वाले कुछ हिंसक जीव तैरते जीवों की छाया से ही आहार की उपस्थिति का अनुमान कर आक्रमण करते हैं, छायाग्राही से उसी ओर संकेत है।
उनकी गति अवरुद्ध कर सिंहिका मेघ घटा के समान गर्जना करती हुई ‘दौड़ी’ – घनराजीव गर्जन्ती वानरं समभिद्रवत्।
तमस विघ्न आक्रमण पर था। हनुमान जी पहचान चुके थे, कोई दुविधा नहीं, कोई झिझक नहीं और न पहले की तरह संवाद करने की आवश्यकता भी थी, कोई लाभ नहीं होता। कपि ने उसके मर्मस्थलों को चिह्नित किया कि इन पर वार करने से इसका नाश हो जायेगा, कायमात्रं च मेधावी मर्माणि च महाकपि - नीति चयनित आक्रमण।  
वे उसके मुँह में समा गये जैसे कि पूर्णिमा का चन्द्र राहु का ग्रास बन गया हो – ग्रस्यमानं यथा चन्द्रं पूर्णं पर्वणि राहुणा!
भीतर उसके मर्मस्थलों को अपने तीखे नखों से विदीर्ण कर दिया, राक्षसी मृत हो गिर पड़ी – पतितां वीक्ष्य सिंहिकाम्
आकाशचारी प्राणियों ने कपि की सराहना की (न देवता, न विद्याधर, न गन्धर्व, केवल प्राणी)। इस विजय पर उन प्राणियों ने हनुमान जी से यह सूत्र कहा:
यस्य त्वेतानि चत्वारि वानरेन्द्र यथा तव
धृतिर्दृष्टिर्मतिर्दाक्ष्यं स कर्मसु न सीदति
हे वानरेन्द्र! जिसमें तुम्हारे समान धैर्य, सूझ बूझ वाली सूक्ष्म दृष्टि, बुद्धि और दक्षता - ये चार गुण होते हैं, उसे अपने कार्य में कभी असफलता नहीं होती।
(सुकवि मर्मस्थलों को पहचानता और उदात्त मानवीयता की प्रतिष्ठा करता चलता है, यहाँ वही किया गया है)।

हनुमान जी को आगे विविध वृक्षों से विभूषित द्वीप दिखा, मलय पर्वत दिखा और उसके उपवन भी – विविधद्रुमविभूषितम्, द्वीपं ..मलयोपवनानि च
सागर, उसके तटीय जलप्राय क्षेत्र, तटीय वृक्ष और सागरपत्नी समान सरिताओं के मुहाने भी दिखे:
सागरं सागरानूपान्सागरानूपजान्द्रुमान्
सागरस्य च पत्नीनां मुखान्यपि विलोकयन्
लङ्का निकट आ गयी, कहीं मेरी इस गति को देख राक्षसों के मन में कौतुहल न उत्पन्न हो जाय, ऐसा विचार कर महाकपि देह को ढील दे पुन: वैसे ही प्रकृतिस्थ हो गये जैसे मोहरहित हुआ व्यक्ति अपने मूल स्वभाव में प्रतिष्ठित हो गया हो – वीतमोह इवात्मवान्, जैसे तीन पग में समूचे लोकों को नापने के पश्चात बलि की वीरता का हरण करने वाले हरि ने स्वयं को समेट लिया था – त्रीन् क्रमानिव विक्रम्य बलिवीर्यहरो हरि:। हरि का अर्थ वानर भी होता है और विष्णु भी। कपि ने सागर पार कर लिया था। 

...अंतिम तमस परीक्षा के साथ ही त्रिगुण परीक्षा को सफलता पूर्वक सम्पन्न कर महाबली हनुमान जी ने त्रिकूट पर्वत के शिखर पर स्थित लङ्का को सावधान हो देखा - त्रिकूटशिखरे लङ्कां स्थितां स्वस्थो ददर्श ह

अब तक तो केवल परीक्षायें थीं, वास्तविक चुनौतियाँ तो अब आनी थीं। उनका आत्मविश्वास हिलोरें ले रहा था:
शतान्यहं योजनानां क्रमेयं सुबहून्यपि
किं पुनः सागरस्यान्तं संख्यातं शतयोजनम्

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

अमोघ राघवनिर्मुक्त: शर: [सुंदरकाण्ड - 1]

रामायण वह आख्यान है जिसके ऐश्वर्य में उदात्त उद्योगी मानवता वैसे ही पगी हुई है जैसे देह में प्राण। विराट स्वप्न, तैयारी, प्रतीक्षा, उत्सर्ग अभियान और परिणाम की इस पंचगंगा से त्रिदेव झाँकते हैं – निर्माण, पोषण और अनुशासन।  लिखित मानव इतिहास में सफल आमूल चूल परिवर्तन का यह पहला उदाहरण है। पुरुषोत्तम के नेतृत्त्व में सारे नृजातीय भेद भुला संगठित नर, वानर, भल्लूक आदि का औपनिवेशिक बर्बर सत्ता के विरुद्ध यह वह सुफल जन अभियान है जिसकी पहली छलाँग सुन्दरकाण्ड है।

सुन्दरकाण्ड उस एकल पुरुष का शौर्य है जो सु नर-सुन्नर-सुन्दर है और उस एकल स्त्री की तपस्विनी धैर्यश्रद्धा है जो सुनारी-सुन्दरी है। यह अपरिचय को निरी जैविकता से परे माता और पुत्र सम्बन्ध की अतुल्य भावभूमि में परिवर्तित कर देने वाले राम रसायन का प्रभावी चित्रण है।

वाल्मीकि जी ने राम आख्यान के लिये संज्ञा चुनी – राम+अयन, रामायण। सूर्य विष्णु हैं। सूर्य की गति अयन गति है जो उत्तरायण दक्षिणायन करते पूरी होती है। सूर्यवंशी राम भी यह यात्रा पूरी कर ऋत सम्मत समाज की स्थापना करते हैं और अवतार शृंखला में स्थान पाते हैं, वनवास के चौदह वर्ष मानों चौदह भुवनों में गड़े उनके कीर्ति स्तम्भ हैं। अगस्त्य जिसके सूत्रधार थे उस उत्तर दक्षिण संगम एकता आख्यान का उपसंहार राघव ने रचा। राघव का रामसेतु उत्तर और दक्षिण के बीच का संवादसेतु हो गया। 
    
रावण शोषण का पहला सुनियोजित और संगठित नेतृत्त्व था। उत्तर में कैलास से नीचे दक्षिणी महासमुद्र तक उसके स्कन्धावार फैले हुये थे। वह लंका का मूलनिवासी नहीं था। चरम भोग और उससे प्रेरित हिंसा अत्याचार का आश्रय ले उसने गिरोहबाजी का एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो बहुत प्रभावी थी, जिसके आगे सभी शक्तियाँ झुक सी गईं। लंका के मूलनिवासी यक्ष साम, दाम, दण्ड और भेद नीतियों द्वारा राक्षस जाति में परिवर्तित कर दिये गये और वहाँ राक्षस सत्ता का औपनिवेशिक केन्द्र स्थापित हुआ। 

पहचान मिटाना राक्षसों की नीति का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय था। सुदूर समुद्री प्रदेश और उत्तर की ओर रक्ष संस्कृति के प्रसार का जो अभियान प्रारम्भ हुआ वह कैलास की चढ़ाई पर महादेव द्वारा ही रोका जा सका। उस ब्रह्मराक्षस को जैसे अपनी सांस्कृतिक सीमा मिल गई, उत्तर के कैलास वासी उसके लिये परम पूज्य हो गये और नीचे समस्त अवनी को वह मेदिनी संज्ञा से मढ़ता सा चला गया।
पीडित प्राकृत जन और उनके अगुवे भी हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहे। जो जिस योग्य था, प्रतिरोध करने और अंतिम संघर्ष के लिये एक योद्धा समान स्वयं को तैयार करने में लगा रहा। राक्षस स्कन्धावारों के साथ ऋषि आश्रमों का लम्बा सह-अस्तित्त्व यूँ ही नहीं था, उसके लिये बहुत तप और पराक्रम चाहिये थे जिन्हें जननेतृत्त्व ने सँजोया हुआ था।

कृषि अनुसन्धानी गोतम के क्षेत्र में राज करते परम ज्ञानी ‘सीर’ध्वज ‘जनक’ ने शिव का अतिगुरु महाधनुष प्राप्त कर लिया लेकिन चलाये कौन? वह श्रद्धास्पद वस्तु बन गया। वैसे भी एक स्थान पर स्थापित कर ऊँचाई से मार करने वाला वह भारी धनुष मैदानों में कितना कारगर होता? मैदानों में तो क्षिप्र और एक-जन-वह्य शस्त्र चाहिये था। कौन लाये?

गाथिन कौशिक और भृगु परम्परा रक्तसम्बन्ध से जुड़ी थी। नवग्व और दशग्व ऋषियों से युक्त इन दो कुलों में एक तो परम अनुसन्धानी विश्व के मित्र विश्वामित्र हुये तो दूसरे महापराक्रमी राम जामदग्नेय। राम जामदग्नेय का परशु वनप्रांतर का सबसे विकसित शस्त्रास्त्र है। उससे पेंड़ काटे जा सकते हैं, सम्मुख युद्ध में लड़ा जा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर फेंक कर मार भी की जा सकती है लेकिन उसकी सीमायें है - नुकीला न होना और संग्राम में चलाने के लिये अतिमानवीय बल और कौशल की आवश्यकता। परशु जाते हुये उस युग का अंतिम चिह्न है जिसके द्वार कृषिकर्म खटखटा रहा था। क्षत्रिय उसकी अगुवाई में थे। व्यवस्थित वन जीवन में उनकी अवांछित घुसपैठ की भयानकता रेणुका और सहस्रार्जुन जैसी गाथाओं में सुरक्षित है। बड़ी लम्बी और हिंसक रही यह लड़ाई। क्षत्रियों का राम जामद्ग्नेय द्वारा कथित इक्कीस बार उच्छेद स्थापित समाज की शक्ति तो दर्शाता ही है, साथ में यह भी दर्शाता है कि समय की करवट को  कोई रोक नहीं सकता।
मीठी घास ईंख से शर्करा निकालने हेतु इक्ष्वाकु क्षत्रियों के पास कृषि तकनीक थी और भिषग-वनस्पति अथर्वण ज्ञानभूमि भी जिसमें स्त्री पुरुष का सहकर्म अनिवार्य था। ये क्षत्रिय सिंहासन पर बैठने वाले राजा या मार काट करने वाले सैनिक भर नहीं थे। विश् प्रजा की अभिवृद्धि और उसके कल्याण हेतु नित नवीन आविष्कार उनकी थाती रहे। ‘क्षत्रिय कर्म’ वैश्यकर्म की वह उच्चस्थ छाया थी जिसके तले विद्याब्रह्म और सेवाशूद्र फलते फूलते रहे।  

विश्वामित्र साधना में लगे शस्त्र अनुसन्धान करते रहे, नये संसार गढ़ते रहे। वृद्ध होती देह लिये सुपात्र शिष्य को ढूँढ़ लेने का तनाव आसान नहीं रहा होगा। कहना न होगा कि इक्ष्वाकु रघुवंशियों की राजसभा में उनका पधारना अचानक नहीं था। न तो मिथिला की यात्रा में प्रशिक्षण अचानक था और न ही रक्ष स्कन्धावार की राह ले पहली संघर्ष परीक्षा। गोतम की अश्म बनी अहल्या के पास तक राघव राम को ले जाना विश्वामित्र द्वारा ली जा रही परीक्षाओं का अंत था। उन्हों ने सफलता पर कहा होगा क्या कि राम! जीवन का एक पहलू यह भी है। दक्षिणायन होगे तो इसे स्मृति में बनाये रखना!      
राम की सुपात्रता पर पूरी तरह सुनिश्चित हो उन्हों ने ‘वीर्यशुल्का’ सीता का वृतांत बताया - देखने चलोगे राम? यज्ञ भी हो रहा है। वीरता की कसौटी बना वह शिवधनु भी देख लेना!
कहना न होगा कि विश्वामित्र ने उसकी तकनीक भी सिखा दी थी - वह अब अनुपयोगी है राम! भार्गव राम जाने किस शंकामोह में पड़े हुये हैं, पर्वतप्रांतर की रुद्री वनप्रांतर में नहीं चलेगी, उसे सूर्य किरणों की चाहना है, भूमि पुकार रही है। चलोगे राम? सीता पुकार रही है।     
  
हल जोतते क्षत्रिय ‘सीर’ध्वज की ‘अयोनिजा’ कन्या सीता संज्ञा वाली यूँ ही नहीं हुई। सीता खेत के घोहे को भी कहते हैं। कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं, सीरध्वज क्या करते? सीता का हाथ किसे दे दें, तब जब कि राक्षस स्कन्धावारों की घुसपैठ रोकनी कठिन होती जा रही है? विश्वामित्र से मिले थे क्या? उस धनुष का सन्धान ही सुपात्र की कसौटी होगी जो अस्त्र  और सीता दोनों को धारण कर सकेगा??

राजघोषणा फैलती गयी सीता उस वीर की सहधर्मिणी बनेगी जो शिवधनु पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा। कई आये लेकिन 'भारी' धनुष को बस बर्बर बल से कौन साध सकता था, उसके लिये तो कुछ और भी चाहिये थी!

राजन! ये इक्ष्वाकु कुल नन्दन आये हैं। शिव धनुष देखना चाहते हैं, दिखाइये न! – यही कहा था विश्वामित्र ने। पहिये लगी पेटी में बन्द उस भारी धनुष को हजारो खींचते हुये ले आये। मानसिक संवाद हुआ होगा - देख लो राम! रुद्र ऐसी दशा देख रोते होंगे कि नहीं?
इसे चढ़ाने का प्रयास करूँ गुरुदेव? – राम ने पूछा।  हाँ, हाँ, क्यों नहीं?
और प्रत्यंचा चढ़ाते हुये धनुष टूट गया, या तोड़ दिया गया? धन्य राघव! अब भार्गव राम का तेज सहने को सन्नद्ध हो जाओ।

भार्गव राम,  इक्ष्वाकु राम – आमने सामने। संवाद क्या हुये, दोनों एक दूसरे को जैसे तौलते रहे। रुद्र की रौद्रता और विष्णु की ममता को निज अस्तित्त्व में समोये भार्गव ने पाया, अब और प्रतीक्षा नहीं। इससे अधिक सुपात्र मिलने से रहा। रुद्र काल बीत गया, विष्णु काल प्रारम्भ हुआ – युगपरिवर्तन। कवियों ने रचा – भार्गव राम के पास जो विष्णु का धनुष था, वह अपने आप इक्ष्वाकु राम के हाथ चला गया! उस दिन विष्णु के दो अवतारी एक दूसरे से मिले।
मात्र पूजनीय भारी पिनाक के स्थान पर उपयोगी हल्का शार्ङ्ग धनुष मनुष्य के हाथ आया, मानव के हाथ अवतरण। दो दो विष्णु अवतार, प्रज्ञा सिद्धांत और अनुप्रयोग। परशुराम संक्रमण कड़ी हैं, अलौकिक और लौकिक की सन्धि हैं। अलौकिक कौन? वह जो कृषि आधारित लोकसंस्कृति के लिये पुरनिया है।
  
पुरनिये भार्गव द्वारा अर्जित लोक का नाश कर जैसे इक्ष्वाकु राम ने तर्पण विदा दी, जाइये पितर! अब आगे मुझे देखना है। निश्चिंत रहिये। आप का यह आशीर्वाद अमोघ है, इक्ष्वाकु राम भी अमोघ है। मुझे तो जन जन में रमना है। रमते राम अमोघ होते हैं न!  रक्त सम्बन्धी गाथिन विश्वामित्र और राम जामदग्नेय की यात्रायें पूरी हुईं। वे दोनों नेपथ्य में चले गये और आगे राम ने गुरु अगस्त्य की राह पकड़ी।

विन्ध्य को पहली बार पार कर उत्तर को दक्षिण से जोड़ने वाली अद्भुत अगस्त्य परम्परा जैसे मूर्तिमान सजग प्रतीक्षा है। जाने कैसा पारस है उसके स्पर्श में कि शबरी, शरभंग, सुतीक्ष्ण, कबन्ध आदि सभी हिरण्यतेज से पूरित लगते हैं। कच्चे मांस का भी व्यञ्जनवत भक्षण करने वाले राक्षस प्रभुत्त्व क्षेत्र में भी अगस्त्य की उपस्थिति सभी वनवासियों को जिजीविषा और उत्साह से जिलाये रखती है।
राक्षस क्रूर हैं, महाबली हैं, उच्च तकनीकी और क्षिप्र यातायात के साधनों से युत हैं, स्वामी हैं किंतु अल्पसंख्यक हैं, बाहरी आक्रांता हैं। जन के स्थान को उपनिवेश बनाये हुये आखेटक हैं।

पीढ़ी दर पीढ़ी जमा आक्रोश अगस्त्य की संगति में कर्मठ हो गया – प्रतीक्षा करो, उचित समय की और उचित नायक की भी लेकिन तैयारी में कोई कमी नहीं रहनी चाहिये।
स्त्री स्मिता का हरण और बलात्कार रक्ष संस्कृति की पहचान थे। कुमारियाँ और विवाहितायें तिरस्कृत होतीं, अपहृत होतीं, बलत्कृत होतीं और अंतत: वस्तुस्थिति को सब चुप स्वीकार भी कर लेते लेकिन उनके पीछे के आक्रोश का क्या? राम के वनवास के चौदह वर्ष सीतायन भी हैं। वह सीता जो सुकुमारी होने पर भी साथ चलती सारे कष्ट सहती वनप्रांतर में विहँसती कृषिकन्या है, प्रेरणा भी हैं। सीर गोत्रा सीता इतने वर्ष अनुद्योगी तो नहीं रही होगी!

वनवासियों के बीच ऐसे मानव अवतरित हुये थे जो सहते नहीं थे, दण्ड देते ही थे। राम द्वारा जनस्थान को राक्षसशून्य कर उसका वास्तविक रूप पुन: स्थापित करना वनवासियों के लिये बहुत ही प्रेरक रहा। सीता का हरण हुआ किंतु प्रतिरोध भी हुआ और सब जानते हुये भी उसके पथ पर दृष्टि भी रखी गयी। आगे जो हुआ वह अकल्पनीय था। रोता भटकता सबको बताता, सबसे पूछता राजन्य राम मानसिक जड़ता को तोड़ता गया। उससे पहले दबी ढकी चुप्पी थी, ऐसा स्वीकार और प्रतिकार की ऐसी उत्कट चेतना अनदेखी थी। दोनों भाई जहाँ भी जाते, परिचय में सीता का अपहरण अवश्य बताते। अरण्यकाण्ड नीतियों द्वारा जनसंगठन है तो किष्किन्धाकाण्ड सक्रिय आयोजन। वालिवध उसका चरम है।
रावण को भी मर्दित कर उससे समझौते में रहने वाले बाली का वध कर श्रीराम ने अपने लिये सेना ढूँढ़ ली। वनवासियों और लड़ाकू यूथपों के बीच स्पष्ट सन्देश गया – यदि रावण को पराजित करने वाला बाली मारा जा सकता है तो रावण भी। वह अजेय नहीं, उसके पास कोई अमृत नहीं। हमारे द्वारा संगठित अभियान की कमी का विष ही उसका अमृत है।
सुग्रीव की भार्या को बाली के चंगुल से मुक्ति दे राम ने रावणी संस्कृति के अवसान की प्रस्तावना लिख दी। यदि एक अकिंचन निर्वासित राजन्य झूठी लज्जा छोड़ अपनी अपहृता पत्नी के लिये अकेले इतना बड़ा कर्म कर सकता है तो अन्य क्यों नहीं? श्रीराम ने वर्षों से जमा आक्रोश को न केवल तोड़ा बल्कि उसके प्रवाह को दिशा दे दी।      
कृतज्ञ सुग्रीव का सन्देश वानर यूथपों तक फैलता चला गया – अपहृत सीता को ढूँढ़ना है। प्रतिरोध हेतु किसी नेतृत्त्व द्वारा चिरप्रतीक्षित आदेश का स्वीकार स्वाभाविक था और नियोजन की सफलता भी। चार दल बना कर चार दिशाओं में भेजे गये और एक को छोड़ सभी दल लौट आये, वह दक्षिणी दल था।  

दक्षिणी दल के महावीर वातात्मज हनुमान लंका तक की छलाँग को तैयार हो गये। आँखें पार नहीं पा सकती, ऐसा अगाध महोदधि सामने था। लक्ष्य - शत्रुओं से भरे नितांत अपरिचित प्रदेश में उसके वासनामलिन राजा द्वारा अपहृत सुन्दरी स्त्री की खोज।
स्वामी ने तो कह दिया था – यथा योग्यं तथा कुरु! अब तो जो करना है, उन्हें ही करना था। प्रदेश तो दूर था, मार्ग की बाधायें क्या कम थीं?
महेन्द्रगिरि की ऊँचाई से क्षितिज पर द्वीप दिखा। हनुमान जी ने अंतरीप मार्ग पकड़ा।

वाल्मीकि जी इस अभियान के लिये एक अर्थगहन शब्द और उसकी व्युत्पत्तियाँ चुनते हैं – प्लव। इसमें तैरना, छलाँग मारना, गोते लगाना और उड़ना सभी समाहित हैं। हनुमान वातात्मज हैं – वायु के पुत्र। तरल माध्यम चाहे द्रव हो, चाहे वायु; उनकी गति दोनों में हैं। हनुमान वानर हैं, प्लवग। सुग्रीव प्लवगराज हैं।

वृक्षों से भरे उभरे द्वीपों से युक्त अंतरीप मार्ग से अभियान हनुमान जैसे प्लवग वनवासी नर के लिये उपयुक्त था। लम्बी यात्रा में बिना रुके वृक्षों पर छलाँग मारते कभी उड़ते से तो कभी तैरते इस अभियान को सुगमता से पूरा किया जा सकता था। द्वीपों की रेखा मार्ग के लिये दिशा सूचक थी।
अपहृत संस्कृति समास संयुक्ता सीता दूर देश में उद्धार की प्रतीक्षा में बैठी हुई हैं - अदीनां भर्तृ तेजसा रक्षितां स्वेन शीलेन। ब्रह्मराक्षस को शील कितने दिन रोक पायेगा, भर्तार के तेज को पहुँचना ही होगा।

महेन्द्र पर्वत को पाँवों से दबाते उसे पीड़ित करते वायुपुत्र प्लवग हनुमान ने छलाँग ली:      

स महान् सत्त्वसन्नाद: शैलपीडानिमित्तज:
पृथिवीं पूरयामास दिशश्चोपवनानि च
राघवनिर्मुक्त: शर: श्वसनविक्रम:
गच्छेत् तद्वद् गमिष्यामि लङ्का रावणपालिताम्

भार्गव का पराभव साक्षी है, राम का बाण अमोघ है। महर्षि वाल्मीकि हनुमान के इस छलाँग की तुलना राम के निर्मुक्त शर से करते हैं, लक्ष्य है रावणपालित लङ्का। यह अमोघ बाण बिना ध्वंस के वापस तूणीर में नहीं आने वाला।

सारे संशय मिट गये थे। शोषक और अत्याचारी औपनिवेशिक रक्षदुर्ग के विरुद्ध प्लवग ने 'पहला पग' नहीं उठाया, सीधे छलाँग मारी। आत्मविभूतिदर्शन का परिणाम तो आगे आने वाला था!