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शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

Shrirama Crown Price Coronation श्रीराम यौवराज्याभिषेक तिथि का निर्धारण राजा दशरथ ने किया


अद्य चन्द्रोऽभ्युपगतः पुष्यात्पूर्वं पुनर्वसू
श्वः पुष्ययोगं नियतं वक्ष्यन्ते दैवचिन्तकाः
ततः पुष्येऽभिषिञ्चस्व मनस्त्वरयतीव माम्
श्वस्त्वाऽहमभिषेक्ष्यामि यौवराज्ये परन्तप
महातेजस्वी, समस्त भूतों में स्वयम्भू के समान, कौशल्या के सुत वैसे जैसे अदिति के वज्रपाणि इन्द्र, रूपोपन्न, वीर्यवान, अनसूयक, भूमावनुपम, प्रशान्तात्मा, मृदुभाषी, दूसरों की कठोर बातों का भी प्रत्युत्तर न देने वाले अर्थात प्रतिक्रियावादी नहीं, कृतज्ञ, अपकारास्मर, शील-ज्ञान-वय-वृद्धों से विमर्शी, बुद्धिमान, प्रियम्वद, अविस्मित, नानृतकथ, विद्वान, वृद्धप्रतिपूजक, प्रजानुरञ्जक, जितक्रोध, सानुक्रोश, ब्राह्मणप्रतिपूजक, दीनानुकम्पी, धर्मज्ञ, प्रग्रहवान, शुचि, कीर्तिमानी, कुलोचितमति, क्षात्रधर्ममानी, नाश्रेयरत, विरुद्धकथाऽरुचि, वाचस्पतिसम उत्तरोत्तरयुक्ति वक्ता, अरोग, तरुण, वाग्मी, वपुष्मान, देशकालविद, पुरुषसारज्ञ, लोकसाधु एक, प्रजा के प्राणप्रिय, सम्यक विद्या युक्त स्नातक, साङ्गवेदविद, धनुर्विद्या में पिता से भी श्रेष्ठ, धर्मार्थदर्शीद्विजशिक्षित, स्मृतिमान, धर्मकामार्थतत्त्वज्ञ, प्रतिभानवान, लौकिक समयाचार कृतकल्पविशारद, निभृत, संवृताकार, गुप्तमन्त्र, सहायवान, अमोघहर्षक्रोध, त्यागसंयमकालविद...

... यौवराज्याभिषेक की भूमिका में आदर्श राजा के गुणों को गिनाते व उनके राम में होने को बताते हुये महामुनि वाल्मीकि अयोध्याकाण्ड के पहले सर्ग में ही मर्यादा पुरुषोत्तम के भावी रामराज्य की झाँकी दिखा देते हैं जो दशरथ के सुराज से भी बढ़ चढ़ कर होगी। नगर-वन-नगर के राम अयन के अन्तिम युद्धकाण्ड के अन्त में सम्राट के राज्याभिषेक में विस्तार से लिखने को कुछ बचा ही नहीं, राम का जीवनवृत्त एक ऐसा वृत्त है जिसका आदि अन्त ही नहीं ...

दृढभक्तिः स्थिरप्रज्ञो नासद्ग्राही न दुर्वचाः
निस्तन्द्रिरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित्
शास्त्रज्ञश्च कृतज्ञश्च पुरुषान्तरकोविदः
यः प्रग्रहानुग्रहयोर्यथान्यायं विचक्षणः
सत्संग्रहप्रग्रहणे स्थानविन्निग्रहस्य च
आयकर्मण्युपायज्ञः संदृष्टव्ययकर्मवित्
श्रैष्ठ्यं शास्त्रसमूहेषु प्राप्तो व्यामिश्रकेषु च
अर्थधर्मौ च संगृह्य सुखतन्त्रो न चालसः
वैहारिकाणां शिल्पानां विज्ञातार्थविभागवित्
आरोहे विनये चैव युक्तो वारणवाजिनाम्
धनुर्वेदविदां श्रेष्ठो लोकेऽतिरथसम्मतः
अभियाता प्रहर्ता च सेनानयविशारदः
अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्धैरपि सुरासुरैः
अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी
न चावमन्ता भूतानां न च कालवशानुगः
एवं श्रेष्ठगुणैर्युक्तः प्रजानां पार्थिवात्मजः
सम्मतस्त्रिषु लोकेषु वसुधायाः क्षमागुणैः
बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्येणापि शचीपतेः
तथा सर्वप्रजाकान्तैः प्रीतिसञ्जननैः पितुः
गुणैर्विरुरुचे रामो दीप्तः सूर्य इवांशुभिः

°°°
लोकपाल इन्द्र के समान ऐसे राम को अपना नाथ बनाने हेतु मेदिनी ही मानो कामना कर उठी!
इत्येतैर्विविधैस्तैस्तैरन्यपार्थिवदुर्लभैः
शिष्टैरपरिमेयैश्च लोके लोकोत्तरैर्गुणैः
तं समीक्ष्य महाराजो युक्तं समुदितैः शुभैः
निश्चित्य सचिवैः सार्धं युवराजममन्यत

ऐसी स्थिति हो जाने पर कि राम योग्यता में उनसे बहुत आगे हो चुके हैं, राजा ने 'समीक्षा' कर, सचिवों के साथ विमर्श कर राम को युवराज बनाने का निर्णय लिया।
आत्मनश्च प्रजानां च श्रेयसे च प्रियेण च
प्राप्तकालेन धर्मात्मा भक्त्या त्वरितवान् नृपः

प्राप्तकालेन, उचित अवसर आ चुका था। उस पद हेतु राम न्यूनतम वय की सीमा भी पूरी कर चुके थे। राम का जन्मदिन आ पहुँचा था, राजा ने बिना विलम्ब के त्वरित ही चन्द्रमा के समान मुख वाले रामचन्द्र का अभिषेक करने का निर्णय लिया, जो वैसे ही शोभते हैं जैसे चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र के साथ -
तं चन्द्रमिव पुष्येण युक्तं धर्मभृतां वरम्
यौवराज्ये नियोक्तास्मि प्रीतः पुरुषपुंगवम्

साथ ही सभा में उपस्थित विविध राजाओं की सम्मति माँगी कि परस्पर विरोधी मतों के घर्षण पश्चात ही ऐसा महत्वपूर्ण काम किया जाना चाहिये -
यद्यप्येषा मम प्रीतिर्हितमन्यद्विचिन्त्यताम्
अन्या मद्यस्थचिन्ता हि विमर्दाभ्यधिकोदया

राजतन्त्र का लोकतन्त्र था, समस्त प्रजा के प्रतिनिधि उपस्थित थे। सबने एक स्वर से अनुमोदन किया किन्तु दशरथ ने तब भी पूछा कि ऐसा क्या है मेरे कहे में जो सभी मान गये?
श्रुत्वैव वचनं यन्मे राघवं पतिमिच्छथ
राजानः संशयोऽयं मे तदिदं ब्रूत तत्त्वतः

प्रतिनिधियों व राजाओं ने वही गुण दुहराये जो ऊपर लिखे जा चुके हैं।
सुभ्रूरायतताम्राक्षः साक्षाद् विष्णुरिव स्वयम्
रामो लोकाभिरामोऽयं शौर्यवीर्यपराक्रमैः
तब दशरथ ने वसिष्ठ, वामदेव व अन्य ब्राह्मणों से कहा -
चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पितकाननः
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्

वसिष्ठ मुनि ने अगले दिन अभिषेक हेतु सारी व्यवस्थायें करने का आदेश दे दिया।
पिता ने पुत्र को बुला कर कहा, पुष्ययोग में तुम्हारा अभिषेक होगा -

तस्मात्त्वं पुष्ययोगेन यौवराज्यमवाप्नुहि।
कहा कि यद्यपि तुम गुणवान हो, तथापि -
भूयो विनयमास्थाय भव नित्यं जितेन्द्रियः
कामक्रोधसमुत्थानि त्यजेथा व्यसनानि च
विनयी रहो, जितेन्द्रिय हो, काम, क्रोध व व्यसनों का त्याग कर के!
...
समय का निर्णय दशरथ का था, वसिष्ठ मुनि ने कार्यक्रम निर्धारित किया। दशरथ की चेतावनी मानो भावी हेतु ही उनके अवचेतन से निस्सृत हुई थी।
पौराणिक व लौकिक लन्तरानियों से इतर मूल को पढ़ें, ध्यान से। व्यर्थ के वितण्डा से मुक्ति मिलेगी। रामायण हो या महाभारत, राजन्यों के ज्योतिष ज्ञान के विशद विवरण बिखरे पड़े हैं। तब मुहूर्त देख कर काम नहीं किये जाते थे, काम करने का निर्णय ले कर उपलब्ध में से शुभ का चयन कर लिया जाता था। दोनों में अन्तर है।
जिस दिन निर्णय लिया गया, चैत्र माह में चन्द्र पुनर्वसु नक्षत्र पर थे, राम की जन्मतिथि। पुनर्वसु की अधिष्ठात्री मघवा माता अदिति हैं। उपेन्द्र विष्णु से अधिक राम की गढ़न महेन्द्र की है।
पुनर्वसु का अगला नक्षत्र पुष्य था, बृहस्पति का।

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

Ramayan Notes रामायण वार्त्तिक - ४ : अयोध्या पहुँच अपना क्षात्रधर्म दिखाइयेगा - दुष्टों का दलन राजन्य का कर्तव्य

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शबरी और शरभङ्ग, दोनों ने श्रीराम से मिलने के पश्चात उनके वहाँ रहते ही स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया।
चमत्कार और कल्प कहानियों को किनारे कर विचार करें कि कितना सञ्चित अवसाद, कितनी यातना, कितनी घुटन उन दोनों में रहे होंगे!
राक्षसों को प्रश्रय देने वाले राज में सन्त दमित होते ही हैं। राज्य ही नहीं, केन्द्र में भी बैठे उच्च पीठासीनों को आत्ममन्थन करना चाहिये। कुछ अपराधों के प्रति शून्य सहिष्णुता होनी चाहिये। जिस देश के राजन्य भौंकने वाले कुत्तों से भय खा सियार बने रहते हों, उसका कल्याण नहीं हो सकता।
राजा वह जो निर्वासन में भी हाथ उठा कर कहे -
तपस्विनाम् रणे शत्रून् हन्तुम् इच्छामि राक्षसान्
पश्यन्तु वीर्यम् ऋषयः सः ब्रातुर्मे तपोधनाः
दत्त्वा अभयम् च अपि तपोधनानाम्

और कर के दिखा भी दे -
विप्रकारम् अपाक्रष्टुम् राक्षसैः भवताम् इमम्
भवताम् अर्थ सिद्ध्यर्थम् आगतोऽहम् यदृच्छया
तस्य मे अयम् वने वासो भविष्यति महाफलः

... 
और देवी सीता ने कहा, वन में हैं तो यहाँ के अनुसार रहिये, अयोध्या पहुँच कर अपना क्षात्र धर्म दिखाइयेगा माने राक्षसों के नाश की प्रतिज्ञा मुझे नहीं सुहाती -
क्व च शस्त्रम् क्व च वनम् क्व च क्षात्रम् तपः क्व च
व्याविद्धम् इदम् अस्माभिः देश धर्मः तु पूज्यताम्
तदार्य कलुषा बुद्धिः जायते शस्त्र सेवनात्
पुनर्गत्वात् तत् अयोध्यायाम् क्षत्र धर्मम् चरिष्यसि
(i.e. in Rome do what Romans do Rāma! Thus spake the future queen.)...
देवी सीता ने कह तो दिया किन्तु साथ ही यह भी जोड़ा कि स्त्रीसुलभ बात कर रही हूँ, तब भी विचार करें। सीता चाहती ही नहीं थीं कि राम घनघोर दण्डकारण्य में प्रविष्ट हों!
sixth senseऔर राम तो राम ठहरे, पहले ही कह चुके थे कि पिता के वचन का पालन तो है ही किन्तु आप तपस्वी लोगों की दुर्दशा भी दूर करनी है - विप्रकारम् अपाक्रष्टुम्! सुतीक्ष्ण मुनि भी अहिंसक ही थे, कहे कि जाओ, उन तपस्वियों की दशा देख लो किन्तु लौट कर यहीं आ जाना -
आगन्तव्यम् च ते दृष्ट्वा पुनः एव आश्रमम् प्रति।
राम ने सीता को उत्तर देना आरम्भ किया, महान जनक कुल की प्रशंसा के साथ सीता की भी प्रशंसा की, अपनी प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती और नैहर की हो जाय तो स्त्री परमानन्दित हो जाती है - आप तो महा कुलीन धर्मज्ञ जनक की आत्मजा हैं, भला ऐसा क्यों न कहेंगी!
हितम् उक्तम् त्वया देवि स्निग्धया सदृशम् वचः
कुलम् व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनक आत्मजे

कहीं इस बात में उलाहना भी थी कि ऐसा होते हुये भी आप धर्म की सूक्ष्म गति से अज्ञान दर्शाती हैं!
और राम तुरन्त ही अपने पर आ गये - क्षत्त्रियैः धार्यते चापो न आर्त शब्दो भवेद् इति, क्षत्त्रिय धनुष इसीलिये धारण करते हैं कि कहीं भी आर्तनाद न हो और यहाँ तो मेरे पास कितने ही विप्रश्रेष्ठ अपना दुखड़ा ले स्वयं चल कर आये हैं, मुझे स्वत: संज्ञान ले वहाँ पहुँचना था न! हम आप की शरण में आये हैं, ऐसा अनुनय विनय ले कर वे आये, यह तो बड़ी उल्टी बात हो गई, उनसे आदेश लेने, उनकी शरण तो हमें जाना था न! यह मेरे लिये अतुल लज्जा की बात है - मे ह्रीः एषा तु मम अतुला!
ते च आर्ता दण्डकारण्ये मुनयः संशित व्रताः
माम् सीते स्वयम् आगम्य शरण्याः शरणम् गताः
..
अस्मान् अभ्यवपद्य इति माम् ऊचुर् द्विज सत्तमाः
कृत्वा वचन शुश्रुषाम् वाक्यम् एतत् उदाहृतम्
प्रसीदन्तु भवन्तो मे ह्रीः एषा तु मम अतुला
यद् ईदृशैः अहम् विप्रैः उपस्थेयैः उपस्थितः

उनकी सुन मैं उन्हें रक्षा का वचन दे चुका हूँ - मया च एतत् वचः श्रुत्वा कार्त्स्न्येन परिपालनम्। आपको तो पता ही है कि जीवित रहते मैं उससे विचलित नहीं हो सकता। मैं अपना जीवन त्याग सकता हूँ, लक्ष्मण को छोड़ सकता हूँ, आपको छोड़ सकता हूँ किन्तु सत्य का त्याग नहीं कर सकता, ब्राह्मणों की बात तो विशेष भी है। मैं ऋषियों का परिपालन अवश्य करूँगा।
संश्रुत्य न च शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम्
मुनीनाम् अन्यथा कर्तुम् सत्यम् इष्टम् हि मे सदा
अपि अहम् जीवितम् जह्याम् त्वाम् वा सीते स लक्ष्मणाम्
न तु प्रतिज्ञाम् संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः
तत् अवश्यम् मया कार्यम् ऋषीणाम् परिपालनम्

राम से हम यह भी सीख सकते हैं कि पत्नी को कैसे तुष्ट रखें, कैसे बात न मानते हुये भी सहधर्मिणी का मान बनाये रखें -
मम स्नेहात् च सौहार्दात् इदम् उक्तम् त्वया वचः
परितुष्टो अस्मि अहम् सीते न हि अनिष्टो अनुशास्यते
सदृशम् च अनुरूपम् च कुलस्य तव शोभने
सधर्मचारिणी मे त्वम् प्राणेभ्यो अपि गरीयसी
सीते, मुझसे स्नेह व सौहार्द वश ही आपने वे बातें की, मैं परितुष्ट हूँ (आप मुझे रुष्ट न समझें)। शोभने, जो आपने कहा, वह आपके योग्य है, आप ही वैसा कह सकती हैं। आपकी बातें आपके महान कुल के अनुरूप हैं। आप मेरी सधर्मचारिणी हैं अर्थात मेरे साथ का धर्म तो आपको निभाना ही होगा, आप मुझे प्राणों से भी प्रिय हैं (अर्थात पहले जो कहा उसे ऐसे समझें कि प्राण जाने पर ही आपसे विलगाव होगा।)
...
स्त्री मन की समझ रखने वाले राम ने इस प्रकार प्रशंसा और नैहर की महानता से आरम्भ कर वहीं पर समाप्त भी किया। सीता को अपने साँवरे पर रीझना ही था।
°°° तीनों प्राणी घनघोर वन की ओर चल पड़े। आगे उन मुनियों, महात्माओं व ब्राह्मणों की अस्थियाँ उनकी प्रतीक्षा में थीं जिन्हें दुरात्मा राक्षस रावण ने अन्तिम संस्कार तक से वञ्चित कर दिया था...
... आगे वह काल भी प्रतीक्षा में था जब राक्षसों हेतु भी न्याय भाव रखने वाली विदेहकन्या वैदेही का अपमान भरा अपहरण होने वाला था। आगे रावण का काल भी प्रतीक्षा में था।
दुर्गम वन में तीनों मूर्ति जायें तो जायें, मैं तो तुलसी बाबा के संग ताली बजाते गा रहा हूँ -
आगे राम लखन बने पाछे
तापस भेस बिराजत काछे
उभय बीच सिय सोहति कैसे
ब्रह्म जीव बिच माया जैसे
... kids, so replied and acted the future king of Vasundharā.
॥जय श्रीराम॥

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

Ramayan Notes रामायण वार्त्तिक - २

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गदहा रावण 
राक्षसो रावणो मूर्खो। खर अर्थात गदहे से रावण का सम्बन्ध है। काश्मीर तन्त्र के विद्वान रावण को नाम व लक्षण साम्यता के आधार पर राक्षस रावण बना दिया गया प्रतीत होता है - लगे हाथ खरानना देवी कुलदेवी भी हो गयीं उसकी, ससुराल भी, वहीं बसते उसके श्रीमाली वंशज भी।
भारत कथा प्रधान देश है और उत्तर भारत मनोरञ्जन प्रधान, कोढ़ में खाज। नाम साम्यता के आधार पर ही पुराणियों ने शान्ता को राम की बहन घोषित कर दिया।
पाणिनि खर/खारी जाति का उल्लेख किये हैं। खर और आनणा जाटों के गोत्र हैं। खर+आनणा का भी खरानना हुआ हो सकता है। योद्धा जातियाँ थी हीं।
राक्षस रावण के यहाँ अश्व उतने सुलभ नहीं थे। सीताहरण व युद्ध में भी उसने खर जुते रथ का प्रयोग किया। युद्ध गहन होने पर अश्व भी जोते गये। (मार्क्सवादी जन अश्व को ass बनाने में विशेष प्रवीण होते हैं, राक्षस रावण भी वाममार्गी ही था। वाम अर्थात सामान्य से विपरीत रीति। )
वाल्मीकि जी राक्षस रावण के रथ हेतु बताते हैं कि चीपों चीपों करते गधे तो जुते ही थे, पहियों की ध्वनि भी गधों की ही भाँति थी - खरश्वन!
मय का दामाद बना दिये गये राक्षस रावण हेतु अब कोई यह स्वीकार नहीं करेगा कि उसकी तकनीकी बहुत आदिम थी जो लकड़ी के पहियों व धुरों की रगड़ की ध्वनि पर भी विराम नहीं लगा सकती थी। उच्च तकनीकी का पुष्पक तो उसने कुबेर से छीना था।
आज जिस प्रकार पाकिस्तान परमाणु आयुध सम्पन्न है, वैसे ही तब लंका रही होगी। लाहौर, कराँची आदि के समृद्ध क्षेत्रों में जिस प्रकार आज भी खच्चर जुते रथ दौड़ते हैं, उसी प्रकार त्रिकूट से सुन्दर पहाड़ी तक खररथ दौड़ते रहे होंगे। कुल मिला कर हर प्रकार से लंका आज के पाकिस्तान समान ही रही होगी, रावण इमरान समान व राक्षस मोहमदी जनता समान।
सावधानीपूर्वक पढ़ने पर सकल रूप में लंका वह देश लगती है जिसे आजकल rogue state कहते हैं, जबर की जबरी खूब चलती रही होगी।
लंका में मुर्गी-पालन भी होता रहा होगा। भैंसा भात के साथ रावण ऑमलेट भी खाता रहा हो तो आश्चर्य नहीं। ऐसा मनई वेद तो पढ़ने से रहा। वह वेदपारग नहीं था, वेदपाठी ब्रह्मराक्षस अवश्य उसके यहाँ रहते रहे होंगे। बिना ज्ञान के विधान थोड़े चलता है! पाकिस्तान में भी ज्ञानी होते ही होंगे।
कुल मिला कर भौकाल ही बचा था उसका, जब परायी नार हर लाया। सहमा भी हुआ था। उसके विरुद्ध सब ने राम को सहयोग दिया, समुद्र तटनायक, इन्द्र, वैनतेय, गीध, वानरादि जातियाँ सभी। सभी के भीतर इतनी पीड़ा सञ्चित थी कि अवसर मिलते ही....
हाँ, रावण ब्राह्मण नहीं था।
॥हरिः ॐ॥
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परिष्पन्द
इस शब्द का अर्थ होता है, समूह में नियम व व्यूहबद्ध हो एक साथ वाहनों पर चलना। ट्रेन हेतु भी इसका प्रयोग हो सकता है।
सार्थवाह (वैश्य यात्रायें) व युद्ध में (अङ्गरक्षक टुकड़ी के साथ मुख्य योद्धा) में परिष्पन्द का प्रयोग होता रहा है। कुबेर बहुत धनी, यक्ष दिक्पाल थे। युद्ध कर के तो धनी होने से रहे तथा मोहमदी लूटमार का कोई प्रमाण नहीं। वे मूल्यवान वस्तुओं के व्यापारी गण के प्रमुख रहे होंगे जो परिष्पन्द में चलते होंगे। मरुस्थली मोहमदियों की भाँति ही उन पर आक्रमण कर कर रावण ने लूटा होगा तथा अन्ततः दुर्गम कैलास क्षेत्र में सिमटने को विवश कर दिया होगा। कुबेर की परिष्पन्द तकनीक ही उसने अपना ली होगी, परिष्पन्द से पुष्पक हुआ होगा। अनुमान ही है।
नितान्त भौतिक स्तर पर विचारने पर लगता है कि रावण वध पश्चात राम वानर भालुओं की परिष्पन्द सुरक्षा में अयोध्या लौटे होंगे। रावण का एक पूरा लूट व भोग का तन्त्र था, वैसी सुरक्षा आवश्यक रही होगी। विचारने पर यह भी ठीक लगता है कि विजयादशमी के दिन रावण मरा होगा, आश्विन में तथा थल मार्ग से राम चैत्र में अयोध्या पहुँचे होंगे। द्रुतगति वाले आञ्जनेय को किञ्चित पहले राम भेज दिये होंगे।
दीपावली राम से भी बहुत पुरातन पर्व है। महान मर्यादा पुरुषोत्तम के सम्मान में उस वर्ष अनूठे व नवोन्मेषी ढंग से मनाई गई हो तो आश्चर्य नहीं!
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श्रीराम अयोध्या में नौ हजार वानरों के परिष्पन्द, व्यूह संरक्षण में लौटे थे, पुष्पक विमान अनुमान। वे सभी वानर राज्याभिषेक पूर्व श्रीराम की शोभायात्रा में नौ हजार हाथियों पर आरूढ़ हो सम्मिलित हुये थे। विष्णु के चक्र से जो चक्रव्यूह है, वही उनके करस्थ पद्म से पद्मव्यूह के नाम से भी जाना जाता है। पद्मपुष्प से पुष्पक व्यूह रहा होगा जिसका ज्ञान यक्षों को था तथा जिनसे राक्षसों ने वह विद्या छीन ली रही होगी। रामायण काल में पद्मव्यूह में नौ हजार योद्धा लगते होंगे। पुष्पक विमान को सात स्तरों वाला बताया गया है, पुष्पव्यूह में भी सात द्वार होते हैं। सात स्तरीय भवन भी विमान कहलाता है। ... नवनागसहस्राणि ययुरास्थाय वानराः मानुषन् विग्रहन् कृत्वा सर्वाभरणभूषिताः
...
रामायण आख्यान अति प्राचीन है तथा रामायण काव्य में अनेक भाषिक स्तर हैं। इस कारण ही भाषिक या अन्य आधुनिक विधियोंं से मैं राम के काल निर्धारण को शक्य नहीं मानता। महाभारत का कर लें तो कर लें, रामायण का असम्भव है।
पतङ्ग शब्द को लें, जिसका अर्थ उड़ने से है। आकाश में सूर्य उड़ता हुआ प्रतीत होता है अत: पक्षियों की भाँति ही पतङ्ग कहलाता है। इस शब्द की धातु से ही पतन शब्द बना है, गिरना या डूबते जाना। कहाँ उड़ना, कहाँ गिरना, मूल धातु एक।
रामायण में सागरसन्तरण व आकाशचारण को एक ही भाँति दर्शाया गया है। वाल्मीकि की काव्य कला के इस पक्ष पर सम्भवत: लोगों का ध्यान ही नहीं गया है कि किस प्रकार आञ्जनेय के अभियान में दोनोंं एक हो गये हैं!
उड़ना वेग से सम्बंधित है, निर्बाध गति से। पुरातन काल में जलमार्ग से यात्रा की गति थल मार्ग की तुलना में अति तीव्र होती थी। व्यापार व सैन्य अभियान जहाँ शक्य हो, जलमार्ग से ही होते थे।
दक्षिण से किष्किन्धा होते हुये अयोध्या तक नदियों के जाल को देखें। श्रीराम ने लौटते समय अधिकतर जल पर तैरते व्यूह पुष्पक विमान का ही प्रयोग किया होगा, ऐसी सैन्य व्यूह रचना जो पानी पर पुष्प की भाँति तैरती दिखे। विमान का तीव्र गति से तैरना उसका उड़ना था जिस प्रकार मारुति का सागर सन्तरण चट्टानों से उछलते मानो आकाश में उड़ते एवंं तैरते पूरा हुआ था।
इस भाषिक अनूठेपन के कारण भी रामायण बहुत प्राचीन रचना सिद्ध होती है, भले उसका परिष्कार आगामी शताब्दियों में किया जाता रहा हो।
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युद्धकाण्ड में ही राज्याभिषेक पश्चात श्रीराम द्वारा पुत्रों एवं बंधुओं के साथ दस हजार वर्षदिन राज्य करना बताया गया है -
राघवश्चापि धर्मात्मा प्राप्य राज्यमनुत्तमम्
ईजे बहुविधैर्यज्ञैः ससुतभ्रातृबान्धवः

सीतात्याग का कहींं उल्लेख नहीं, समापन तक। यदि ऐसा कुछ हुआ होता तो इतनी महत्वपूर्ण बात को पुत्रों सहित राज्य करना बताने से पूर्व अवश्य लिखा जाता।
राम नाम/कथा की महिमा भी है -
निरामया विशोकाश्च रामे राज्यं प्रशासति
रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः
नित्यपुष्पा नित्यफलास्तरवः स्कन्धविस्तृताः
कालवर्षी च पर्जन्यः सुखस्पर्शश्च मारुतः
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा लोभविवर्जिताः

॥इति॥
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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

Ramayan Notes रामायण वार्त्तिक - १

माता कौसल्या का औषधि ज्ञान
इक्ष्वाकु हों या अन्य, क्षत्राणियाँ भिषग विद्या में पारङ्गत होती थीं। क्षत होने पर प्राथमिक चिकित्सा करने में कुशल, जड़ी बूटियों की ज्ञाता।
कौसल्या तो अथर्वण विदुषी थीं। जिस विशल्यकरणी औषधि का उल्लेख युद्ध में क्षत विक्षत राम लक्ष्मण को स्वस्थ करने हेतु हुआ है, उसे देवी कौसल्या ने वनगमन के पूर्व राम के हाथों में मन्त्र पढ़ते हुये रक्षासूत्र में पिरो कर बाँधा था -
इति पुत्रस्य शेषाश्च कृत्वा शिरसि भामिनी, गन्धांश्चापि समालभ्य राममायतलोचना 
ओषधीम् च अपि सिद्ध अर्थाम् विशल्यकरणीम् शुभाम्, चकार रक्षाम् कौसल्या मन्त्रैः अभिजजाप च

(वसागोलकों से पूछ कर देखें, उत्तर मिलेगा कि स्त्री को वेद का अधिकार नहीं है।)
कविहृदय लक्ष्मण
लक्ष्मण कविहृदय थे। उन्होंने अद्भुत ऋतुवर्णन किये हैं । 
[क्या आप को उनके इस गुण से किसी वसागोलक कथावाचक ने कभी परिचय कराया? कथावाचक आप को १४ वर्ष न सोने का गल्प सुनायेगा, लक्ष्मणरेखा बतायेगा, शबरी के जूठे बेरों पर मुँह बिचकाना बतायेगा और हास्यास्पद रूप में उग्रता भी। कथावाचकों ने समस्त इतिहास की निर्मम हत्या करुणा व प्रेम के आँसू बहाते हुये कर दी! यही सच है।]
'कवि' लक्ष्मण का हेमंत ऋतु वर्णन -
अयम् स कालः संप्राप्तः प्रियो यः ते प्रियंवद
 अलंकृत इव आभाति येन संवत्सरः शुभः
नीहार परुषो लोकः पृथिवी सस्य मालिनी
जलानि अनुपभोग्यानि सुभगो हव्यवाहनः
नव आग्रयण पूजाभिर्भ्यर्च्य पितृ देवताः
कृत आग्रयणकाः काले सन्तो विगत कल्मषाः
प्राज्यकामा जनपदाः संपन्नतर गो रसाः
विचरन्ति महीपाला यात्र अर्थम् विजिगीषवः
सेवमाने दृढम् सूर्ये दिशमन्तक सेविताम्
विहीन तिलका इव स्त्री न उत्तरा दिक् प्रकाशते
प्रकृत्या हिम कोश आढ्यो दूर सूर्याः च सांप्रतम्
यथार्थ नामा सुव्यक्तम् हिमवान् हिमवान् गिरिः
अत्यन्त सुख संचारा मध्याह्ने स्पर्शतः सुखाः
दिवसाः सुभग आदित्या: छ्हाया सलिल दुर्भगाः
मृदु सूर्याः सनीहाराः पटु शीताः समारुताः
शून्य अरण्या हिम ध्वस्ता दिवसा भान्ति सांप्रतम्
निवृत्त आकाश शयनाः पुष्यनीता हिम अरुणाः
शीता वृद्धतर आयामः त्रि यामा यान्ति सांप्रतम्
रवि संक्रान्त सौभाग्यः तुषार अरुण मण्डलः
निःश्वास अन्ध इव आदर्शाः चंद्रमा न प्रकाशते
ज्योत्स्ना तुषार मलिना पौर्णमास्याम् न राजते
सीता इव च आतप श्यामा लक्ष्यते न तु शोभते
प्रकृत्या शीतल स्पर्शो हिमविद्धाः च सांप्रतम्
प्रवाति पश्चिमो वायुः काले द्वि गुण शीतलः
बाष्पच्छ्हन्नानि अरण्यानि यव गोधूमवंति च
शोभन्ते अभ्युदिते सूर्ये नदद्भिः क्रौञ्च सारसैः
खर्जूर पुष्प आकृतिभिः शिरोभिः पूर्ण तण्डुलैः
शोभन्ते किंचिद् आलंबाः शालयः कनक प्रभाः
मयूखैः उपसर्पद्भिः हिम नीहार संवृतैः
दूरम् अभ्युदितः सूर्यः शशांक इव लक्ष्यते
अग्राह्य वीर्यः पूर्वाह्णे मध्याह्ने स्पर्शतः सुखः
संरक्तः किंचिद् आपाण्डुः आतपः शोभते क्षितौ
अवश्याय निपातेन किंचित् प्रक्लिन्न शाद्वला
वनानाम् शोभते भूमिर् निविष्ट तरुण आतपा
स्पृशन् तु सुविपुलम् शीतम् उदकम् द्विरदः सुखम्
अत्यन्त तृषितो वन्यः प्रतिसंहरते करम्
एते हि समुपासीना विहगा जलचारिणः
न अवगाहन्ति सलिलम् अप्रगल्भा इव आवहम्
अवश्याय तमो नद्धा नीहार तमसा आवृताः
प्रसुप्ता इव लक्ष्यन्ते विपुष्पा वन राजयः
बाष्प संचन्न सलिला रुत विज्ञेय सारसाः
हिमार्द्र वालुकैः तीरैः सरितो भान्ति सांप्रतम्
तुषार पतनात् चैव मृदुत्वात् भास्करस्य च
शैत्यात् अग अग्रस्थम् अपि प्रायेण रसवत् जलम्
जरा जर्जरितैः पत्रैः शीर्ण केसर कर्णिकैः
नाल शेषा हिम ध्वस्ता न भान्ति कमलाकराः

पञ्चवटी में जब भैया भाभी को स्नान कराने हेतु लक्ष्मण ले जाते हैं तो नदी किनारे यह वर्णन राम से करते हैं।
[विश्वामित्र का गाथा गायक गाथिन कुल हो, इक्ष्वाकुओं की घुमंतू कुशीलव गायन परम्परा हो, कुरुओं के सूत गायक हों या सहस्र वर्ष पीछे परमारों के यशगायक पँवरिये; क्षत्रियों का काव्य से प्रेम उतना ही प्रबल रहा जितना आन्विक्षिकी व ब्रह्मविद्या से। कालप्रवाह में सब समाप्त हो गया। कान्यकुब्जाधिपति महाराज जयचंद्र के यश को धूमिल करने वाला गल्पी चंद्रबरदाई चारण उस विकृत होती परम्परा का एक उदाहरण है।]
लक्ष्मण का भरत प्रेम  
लक्ष्मण कहते हैं, भैया! आप से दूर हैं भरत, राज करना था उन्हें किंतु आप ही के समान समस्त भोगों को त्याग नियताहारी तापस व्रत अपनाये हुये हैं।
आह, वे कोमल श्यामवदन कैसे हेमंत की शीत में सरयू के शीतल जल में रात रहते ही स्नान करते होंंगे, कैसे इस शीत में भुँइया सोते होंगे! ...
... हेमन्त का वर्णन करते करते कविहृदय लक्ष्मण का ध्यान दूर अपने तापस भ्राता भरत पर चला गया। शब्दप्रयोग देखेंं- शेते शीते महीतले! अंतर का दाह हृदय चीर कर शीत की ठिठुरन भरता चला जाता है!
अस्मिन् तु पुरुषव्याघ्र काले दुःख समन्वितः 
तपश्चरति धर्मात्मा त्वत् भक्त्या भरतः पुरे
त्यक्त्वा राज्यम् च मानम् च भोगांश्च विविधान् बहून्
तपस्वी नियताहारः शेते शीते महीतले
सोऽपि वेलाम् इमाम् नूनम् अभिषेक अर्थम् उद्यतः
वृतः प्रकृतिभिर् नित्यम् प्रयाति सरयूम् नदीम्
अत्यन्त सुख संवृद्धः सुकुमारो हिमार्दितः
कथम् तु अपर रात्रेषु सरयूम् अवगाहते
पद्मपत्रेक्षणः श्यामः श्रीमान् निरुदरो महान्
धर्मज्ञः सत्यवादी च ह्री निषेधो जितेन्द्रियः
प्रियाभिभाषी मधुरो दीर्घबाहुः अरिन्दमः
संत्यज्य विविधान् भोगान् आर्यम् सर्वात्मना आश्रितः
जितः स्वर्गः तव भ्रात्रा भरतेन महात्मना
वनस्थम् अपि तापस्ये यः त्वाम् अनुविधीयते

कहते कहते माता कैकेयी के लिये लक्ष्मण कटु हो जाते हैं - कथम् नु सा अम्बा कैकेयी तादृशी क्रूरदर्शिनी! 
तब राम की प्रशांत वाणी फूट पड़ती है -
न ते अम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या कथञ्चन
ताम् एव इक्ष्वाकु नाथस्य भरतस्य कथाम् कुरु

[और मुझे कुरुक्षेत्र में अर्जुन मोह का प्रबोधन करते कृष्ण दिखने लगते हैं - कुत: त्वा कश्मलम्‌ इदम्‌ विषमे समुपस्थितम्‌ ! इतना मनोविज्ञान भरा पड़ा है किंतु कोई कथावाचक नहीं सुनायेगा, कदापि नहीं!]
अंगद अभियान
राजनीतिक दृष्टि से अंगद को भेजना उपयुक्त था - एक राजकुमार का सन्देश ले दूसरा राजकुमार तीसरे राजा के यहाँ औपचारिक रूप से भेजा गया। राम ने राजमर्यादा का पालन किया। साथ ही अङ्गद का दौत्य युद्धपूर्व मनोवैज्ञानिक आक्रमण भी था।
राम के सन्देश में रावण को सुनाया गया - वरदान बहुत हो गया, तुम्हें मार कर अब महर्षियों व राजर्षियों की गति दूँगा। मेरी पत्नी का हरण कर तुमने काल को आमन्त्रित किया है, उसे नहीं लौटाने पर मैं लङ्का को अराक्षस बना दूँगा और विभीषण भावी राजा होंगे।
संकेत था कि अभी भी जो टूट कर आना चाहते हैं, आ जायें। अपनी शक्ति व बल विश्वास दर्शा शत्रु में भय व्याप्त करना था, हुआ भी वही।
गृह्यताम् एष दुर्मेधा वध्यताम् - पकड़ो इस दुर्बुद्धि को एवं मार डालो, रावण ने अंगद हेतु यही निर्णय सुनाया।अंगद ने जानबूझकर पहले तो स्वयं को चार राक्षसों द्वारा पकड़वाया और तब उन्हें झटकते हुये कूद कर प्रासाद के शिखर पर चढ़ कर उसे ध्वस्त कर दिया। राजा का मानमर्दन तो था ही, एक वानर ने अकेले कर दिया, शक्ति प्रदर्शन भी था।
राघव द्वारा अपने शर की परीक्षा भी हो गई कि दुरात्मा रावण तो वालि का मित्र भी था, यदि अपने पिता के वध के कारण अंगद के मन में कोई चोर रह गया हो तो वहाँ भेजने का निर्णय सब प्रकट कर देता। क्रोधवश रावण ने कोई प्रयास ही नहीं किया, एक अन्य वानर हनुमान द्वारा पहले की गयी दुर्गति ध्यान में रही होगी।
अंगद लौट आये। विपुल वानर सैन्य से घिरी लंका के आतंकित निवासियों की चीख पुकार ने सिद्ध कर दिया कि राघव का अमोघ शर इस बार भी लक्ष्यसिद्ध हो लौटा।

कुम्भकर्ण उपदेश 
सुषुप्तस्त्वम् न जानीषे मम रामकृतम् भयम्, तुम सोये रहे और जाने ही नहीं कि राम ने मुझे भयाक्रांत कर रखा है!  रावण बोला -
एष दाशरथी रामः सुग्रीवसहितो बली
समुद्रम् लङ्घयित्वा तु कुलम् नः परिकृन्तति

यह बलवान दाशरथि राम सुग्रीव के साथ समुद्र लाँघ कर आ पहुँचा है और हमारे कुल के विनाश में लगा है।
सेतु मार्ग से आये वानरों की अगाध राशि द्वारा लङ्का के वन उपवन आच्छादित हो गये हैं - सेतुना सुखमागत्य वानरैकार्णवम् कृतम्। उन्होंने युद्ध में मुख्य मुख्य राक्षसों को मार डाला है - ये राक्षसा मुख्यतमा हतास्ते वानरैर्युधि। लंका में केवल बाल वृद्ध बचे हैं - लङ्काम् बालवृद्धावशेषिताम्। पूरा राजकोश रिक्त हो गया है - सर्वक्षपितकोशम् (आर्थिक चोट)...
... कितना आतङ्कित है न रावण!
[यही डर, यही भय आजकल के सिंगल सोर्स राक्षसों में भी होना चाहिये किंतु ....]
कुम्भकर्ण ने सुना और अट्टहास कर उठा - प्रजहास च। उसने ध्यान दिलाया कि पहले तुम्हारे कुकर्म के परिणाम की जो चेतावनियाँ दी गई थीं, वे आन पड़ीं। आगे कुम्भकर्ण ने राजनीति का जो उपदेश दिया है, अद्भुत है। कुछ श्लोक देखें -
अनभिज्ज़्नाय शास्त्रार्थान् पुरुषाः पशुबुद्धयः
प्रागल्भ्याद्वक्त्मिच्छिन्ति मन्त्रेष्वभ्यन्तरीकृताः
अशास्त्रविदुषाम् तेषाम् कार्यम् नाभिहितं वचः
अर्थशास्त्रानभिज्ञानाम् विपुलाम् श्रियमिच्छताम्
अहितम् च हिताकारम् धार्ष्ट्याज्जल्पन्ति ये नराः
अवश्यम् मन्त्रबाह्यास्ते कर्तव्याः कृत्यदूषकाः
विनाशयन्तो भर्तारम् सहिताः शत्रुभिर्बुधैः
विपरीतानि कृत्यानि कारयन्तीह मन्त्रिणः
तान् भर्ता मित्रसम्काशानमित्रान् मन्त्रनिर्णये
व्यवहारेण जानीयात्सचिवानुपसम्हितान्
चपलस्येह कृत्यानि सहसानुप्रधावतः
चिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः
यो हि शत्रुमवज्ञाय नात्मानमभिरक्षति
अवाप्नोति हि सोऽनर्थान् स्थानाच्च व्यवरोप्यते

[अन्योक्तियों के प्रयोग द्वारा कुम्भकर्ण ने रावण को बहुत गरियाया है - पशुबुद्धि आदि।]

राघवों की मूर्च्छा और हनुमान के सञ्जीवनी अभियान 
जब दोनों भाइयों सहित समस्त वानरसेना आहत मूर्च्छित पड़ी थी, तब जाम्बवान ने हनुमान को औषधियों का नाम बता कर लाने को भेजा। 
श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं तथापि व्यथितेन्द्रियः
पुनर्जातमिवात्मानं स मेने ऋक्षपुङ्गवः
...
ऋक्षवानरवीराणामनीकानि प्रहर्षय
विशल्यौ कुरु चाप्येतौ सादितौ रामलक्ष्मणौ
...
मृतसञ्जीवनीं चैव विशल्यकरणीम् अपि
सौवर्णकरणीं चैव सन्धानीं च महौषधीम्

लक्ष्मण भूमि पर पड़े थे, राघव राम ने विलाप करते हुये तीनों माताओं का नाम लिया कि मैं उन्हें क्या मुख दिखाऊँगा?
उपालम्भं न शक्ष्यामि सोढुं दत्तं सुमित्रया
किं नु वक्ष्यामि कौसल्यां मातरं किं नु कैकयीम्

...
सुषेण वानर सेना के यूथप थे, राक्षस लङ्का से अपहृत वैद्य नहीं।
एवमुक्तः स रामेण महात्मा हरियूथपः
लक्ष्मणाय ददौ नस्तः सुषेणः परमौषधम्

पर्वतों में नगाधिराज हिमालय की बड़ी प्रतिष्ठा रही। पौराणिक परम्परा में मेरु की रही। दक्षिण में आज भी संकल्प में मेरोः दक्षिणे पार्श्वे बोला जाता है। यह मेरु विराट भारत की भौगोलिक प्रसार व उसके केन्द्र का कूट है।
रामायण लोककाव्य भी रहा। घुमन्तू कुशीलव गायकों ने उस पर्वत को भी हिमालय बना दिया जहाँ से हनुमान औषधियाँ लाये थे।
सागर संतरण जैसे महान अभियान के कारण मारुति हनुमान के प्रति विशेष आदर व नायकप्रतिष्ठा का भाव बढ़ता चला गया जिसकी परिणति उनके दैवीय निरूपण में हुई। वाल्मीकीय रामायण में उनके द्वारा दो बार औषधियों हेतु पर्वत पर जाने की बात है। एक बार तब जब राम और लक्ष्मण, दोनों भाई मूर्च्छित होते हैं, दूसरी बार जब केवल लक्ष्मण।
आश्चर्य है कि दोनों बार वह औषधियों का अभिज्ञान नहीं कर पाते जबकि होना यह चाहिये कि एक समान औषधियों के होने पर दूसरी बार अभिज्ञान करने में उन्हें सक्षम हो जाना चाहिये। वास्तविकता यह है कि पहली बार जो उन्हें हिमालय पर गया बताया गया है, वह अतिशयोक्ति है। सागर संतरण में ही उन्हें बहुत समय लग गया था जबकि लंका से तो हिमालय बहुत दूर है तथा वहाँ तक पहुँच कर लौटने में जो समय लगता, वह दोनों भाइयों एवंं सैन्य हेतु घातक होता। जैसा कि महाभारत के रामोपाख्यान में एवं रामायण में ही दूसरी बार के समय संकेत है, वह कोई बहुत दूर नहीं गये थे। पहली बार की यात्रा को सागर संतरण के समान ही काव्य युक्तियों से दैवीय बना दिया गया है।
यही स्थिति लंकादहन की भी है। जब दोनों भाई मूर्च्छित थे, तब लंकादहन का एक प्रसंग मिलता है जोकि स्वाभाविक है कि सेना थी, परिस्थितियाँ वैसी थीं, विविध यूथप थे, लंकादहन सामान्य था। हनुमान द्वारा लंकादहन में भी अतिशयोक्तियाँ हैं। यहाँ तक कह दिया गया है कि विभीषण का प्रासाद छोड़ उन्होंंने अन्य सभी राक्षसों के घर जला दिये मानो उन घरों पर नामपट्टिकायें लगी थीं! रामायण विविध स्तरों में परिवर्द्धित हुआ तथा उनके इसी प्रकार अंत:प्रमाण मिलते जाते हैं। सुंदरकाण्ड में तो चालिस के लगभग श्लोकों को चमत्कारपूर्ण वर्णन को स्थान देने हेतु यथावत दुहरा दिया गया है!
औषधियों को लाने जाने हेतु हनुमान की छलांग कोई बहुत लम्बी नहीं है, न कालनेमि है, न भरत द्वारा हनुमान पर प्रहार। हनुमान उचक कर मात्र एक श्लोक में वहाँ पहुँच जाते हैं। उस शैल का नाम था - ओषधिपर्वत। ऐसा पर्वत जहाँ औषधियों का प्राचुर्य था।
सौम्य शीघ्रमितो गत्वा शैलमोषधिपर्वतम्
पूर्वन् हि कथितो योअसौ वीर जाम्बवता शुभः
दक्षिणे शिखरे तस्य जातामोषधिमानय
विशल्यकरणी नाम विशल्यकरणीन् शुभाम्
संजीवकरणीं वीर संधानीं च महौषधीम्
संजीवनार्थं वीरस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः
इत्येवमुक्तो हनुमान्गत्वा चौषधिपर्वतम्
चिन्तामभ्यगमच्छ्रीमानजानंस्ता महौषधीः



शब्दविशारद यूथपति डॉक्टर सुषेण द्वारा लक्ष्मण का चिकित्सकीय परीक्षण
(देहलक्षण व मनोविज्ञान, बंधु का self-suggestion द्वारा प्रबोधन) 
राममेवं ब्रुवाणं तु शोकव्याकुलितेन्द्रियम् 
आश्वासयन्नुवाचेदं सुषेणः परमं वचः
शोक से व्याकुलइंद्रिय हुये राम को आश्वस्त करते हुये सुषेण ने कहा -
त्यजेमां नरशार्दूल बुद्धिं वैक्लब्यकारिणीम्
शोकसंजननीं चिन्तां तुल्यां बाणैश्चमूमुखे

हे नरसिंह! बुद्धि पर क्लैब्यता लाने वाली इस चिंता का त्याग करें जो शोक की कारक है तथा युद्ध में बाण के समान ही घातक है।
[अब शब्द प्रयोगके साथ देखें]
नैव पञ्चत्वमापन्नो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः
नह्यस्य विकृतं वक्त्रं न च श्यामत्वमागतम्

पञ्चत्वम्‌ उसे कहा जिसमें आप की देह के पाँच तत्त्व अपने मूल में लीन हो जायें - मृत्यु। लक्ष्मिवर्धन कहा कि लक्ष्मण तो जीवनशक्ति को बढ़ाने वाले हैं। [एक अन्य निरूपण सीता को लक्ष्मी का रूप मान कर हो सकता है। वन में रहते हुये लक्ष्मण ने सीता की सेवकाई की थी, वे नहीं रहते तो सीता हेतु वन बहुत दुष्कर होता]
लक्ष्मण की मृत्यु नहीं हुई है, उनका रूप विकृत नहीं हुआ है, न ही उसमें मृत्युजनित कालिमा है।
सुप्रभन् च प्रसन्नं च मुखमस्याभिलक्ष्यते 
पद्मरक्ततलौ हस्तौ सुप्रसन्ने च लोचने
[सब ने वह स्तोत्र तो सुना ही होगा - प्रसन्नवदना सौभाग्यं ... । लक्ष्मी का एक नाम है रम्य मुख वाली। पहले लक्ष्मिवर्धन कहा, अब प्रसन्नं च कहते हैं]उनके मुख पर कांति है, वह रम्य है। पञ्जे कमलदल के समान आरक्त हैं (उनका वर्ण मलिन नहीं हुआ) और आँखें भी सुप्रसन्न हैं।
नेदृशं दृश्यते रूपं गतासूनां विशां पते
विषादं मा कृथा वीर सप्राणोऽयमरिंदम
[गतासून शब्द का प्रयोग देखें कि भगवद्गीता में भी भगवान कहते हैं - गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति। मृत्यु हेतु यह शब्द प्रयुक्त । राम 'विशां पते' हैं। विश्‌ बहुत पुराना शब्द है, जब जनसाधारण को विश्‌ कहा जाता था। वैश्य इसी से है। आरम्भ में समस्त जन वैश्य, उनमें से रक्षा हेतु निकले राजन्य क्षत्रिय और जटिल होते समाज व राजकर्म को दिशा देने हेतु हुये ब्राह्मण। श्रुति इसी को संकेतरूप में कहती है, ऋग्वेद से वैश्य, यजुर्वेद से क्षत्रिय और सामवेद से ब्राह्मण। साम बहुत ही विकसित व सूक्ष्म दशा है, जब केवल वाणी से ही नियन्त्रण व दिशा का बोध कराया जा सके। अस्तु। तो विश्‌ कहते हैं प्रजा को, प्रजा कहते हैं संतान को, राम को कौसल्या-सु-प्रजा कहा गया है। राजा हेतु समस्त प्रजा संतान की भाँति होती है। विशाम्‌ पते प्रजा को संतान के समान समझने वाला प्रजा का पति अर्थात राजा। राम को इस सम्बोधन द्वारा सुषेण उनके कंधों पर महत दायित्व का बोध कराते हैं।]हे राजन्, मृतक का रूप ऐसा नहीं दिखता।
हे अरिंदम अर्थात शत्रुओं का दमन करने वाले (पुन: एक वैद्य का मनोवैज्ञानिक संकेत कि अभी तो शत्रु बचे हुये हैं, ऐसी दशा को प्राप्त होंगे तो उनका दमन कैसे करेंगे?) लक्ष्मण प्राणयुक्त हैं। आप विषाद न करें। विषाद वह अवस्था है जब आप का नियंत्रण समाप्त हो जाता है। यह सामान्य दु:ख नहीं है। इस शब्द का प्रयोग भी संकेतक है।
आख्याति तु प्रसुप्तस्य स्रस्तगात्रस्य भूतले
सोच्छ्वासं हृदयं वीर कम्पमानं मुहुर्मुहुः

[इतना कहने के पश्चात चिकित्सक स्पष्ट लक्षणों की बात करता है। आख्यातो शब्द पर ध्यान दें, आज भी उत्तरप्रदेश में सरकारी शब्दावली का अङ्ग है - जाँच कर अपनी आख्या प्रस्तुत करें। आख्यान होता है आँखों देखी कहना, साक्षी हो कर कहना। रामायण और महाभारत आख्यान कहे गये, किसी अन्य शास्त्र को यह पद नहीं दिया है, इस कारण ही ये इतिहास हैं - इति ह आस - ऐसा ही हुआ!]
भूमि पर पड़े प्रसुप्त वीर लक्ष्मण की हृदय की मुहुर्मुह अर्थात रह रह होने वाली धुकधुक और स+उत्‌+श्वास = सोच्छवास, आती जाती साँसें अपनी आख्या प्रस्तुत कर रही हैं [कि लक्ष्मण अभी भी लक्ष्मीवर्द्धन हैं, जीवित हैं।]
सुषेण ने मृत्यु शब्द का प्रयोग तक नहीं किया।
[विचार करें कि यहाँ तो शुभ कहना था कि आहत को कुछ नहीं हुआ, तब देश, काल व परिस्थिति को देखते हुये शब्दों पर इतना ध्यान है, अशुभ समाचार सुनाते समय चिकित्सक डॉक्टर किस प्रकार की मानसिक दशा में होते होंगे! डॉक्टरों का सम्मान न करें, न हो पाये तो कटु न बोलें, अपमान न करें।
थूकने व मारने पीटने का निषेध नहीं कर रहा क्योंकि वैसा तो मुसलमान करते हैं, मनुष्य सोच भी नहीं सकते!]
केवल अनुवाद में बात बहुत ही सपाट हो जाती न? मूल शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। संस्कृत का प्राथमिक ज्ञान प्रत्येक सनातनी हेतु आवश्यक है। सीखें।
यज्ञ परम्परा और जाली उत्तरकाण्ड 
रामायण का अंतिम युद्धकाण्ड श्रीराम द्वारा अनेक पौण्डरीक, वाजपेय, अश्वमेध एवं अन्य यज्ञों के किये जाने की सूचना देता है जिनमें अश्वमेधों की संख्या सौ है। युद्धकाण्ड में राजसूय करने का नाम से उल्लेख नहीं मिलता।
ध्यातव्य है कि आधुनिक काल में भी ये यज्ञ विविध श्रोत्रियों एवं यजमानों द्वारा सम्पन्न किये जाते रहे हैं। राजसूय कोई नहीं करता।
राजसूय का लिखित प्रमाण युधिष्ठिर से लेकर कन्नौजाधिपति जयचंद्र तक मिलता है। अश्वमेध आदि के भी प्रमाण बिखरे पड़े हैं।
जाली उत्तरकाण्ड में श्रीराम राजसूय करने का प्रस्ताव करते हैं जिसका भरत द्वारा निषेध किया जाता है। वह कारण बताते हैं - राजन्य हानि, पृथिव्यां राजवंशानां विनाशो अर्थात धरती से राजाओं का नाश हो जायेगा।
यह उस पौराणिक अंधविश्वास की प्रतिध्वनि है जिसके अनुसार युधिष्ठिर द्वारा राजसूय किये जाने के कारण ही महाभारत का महाविनाश हुआ।
पुराणों में ही कलियुग में राजसूय सहित अश्वमेधादि का भी निषेध मिलता है जो कि स्पष्टत: अर्वाचीन है। इसके कारण जनमेजय एवं वैशम्पायन के विवाद से जुड़ते हैं जिसमें याज्ञवल्क्य द्वारा शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी) आधारित समांतर यज्ञ परम्परा का आरम्भ व जनमेजय द्वारा उसका समर्थन भी कारक रहे। उत्तर भारत में आज भले वाजसनेयी अधिक मिलेंगे किंतु कभी उन्हें तिरस्कार से देखा जाता था। वाजसनेयियों का उत्कर्ष भार्गवों के अपकर्ष से जुड़ा है। अस्तु।
राजसूय अपेक्षतया नया यज्ञ प्रतीत होता है जो अश्वमेध के विकल्प में किया गया होगा। ध्यातव्य है कि इसमें क्षत्रिय का स्थान ब्राह्मण से ऊँचा होता है।
राजसूय का भरत द्वारा विशेष निषेध यह दर्शाता है कि उत्तरकाण्ड कालांतर में जोड़ा गया। कब जोड़ा गया?
यह प्रश्न शोध की माँग करता है किंतु अनुमानत: इसे उत्तर भारत में वर्द्धनों की शक्ति क्षीण होने के उपरांत जोड़ा गया माना जा सकता है जिसकी पुष्टि उत्तरकाण्ड की भाषा और शब्द भी करते हैं। जयचंद द्वारा शताब्दियों पश्चात राजसूय आयोजन उनकी शक्ति, प्रभाव और समृद्धि को दर्शाता है, साथ ही भाँड़ चंद्रबरदाई द्वारा प्रतिक्रिया में खल चित्रण भी वैसा ही है जैसा श्रीराम के चरित्र को कलंकित करने के लिये उत्तरकाण्ड का प्रणयन।
उत्तरकांडी अश्वमेध आयोजन भी उसके क्षेपक होने की पुष्टि करता है। जहाँ युद्धकाण्ड सौ अश्वमेधों का उल्लेख करता है, वहीं उत्तरक्षेपक में एक अश्वमेध में ही सब काण्ड हो जाते हैं।
अश्वमेध का अश्व श्वेतवर्णी होना चाहिये जिसके मस्तक पर कृष्णकेश चित्ति हो किंतु उत्तरक्षेपक का अश्व पूरे काले रंग का है। यह तथ्य भी किसी अन्य धारा द्वारा इसे जोड़े जाने की ओर संकेत करता है।
[दक्षिण भारत में ऐसे विद्वान मिल जायेंगे जो ब्राह्मणों पर मांसभक्षण निषेध का एक रोचक कारण बताते हैं। उनके अनुसार यज्ञ में मंत्रपूत (प्रोक्षण क्रिया) पशु की बलि का मांस ब्राह्मण ग्रहण करते थे, अन्य नहीं। कलियुग में उन यज्ञों का निषेध होने के कारण उनके द्वारा मांसभक्षण को सामान्य नियम से निषिद्ध कर दिया गया, यज्ञ होंगे ही नहीं तो मांस मिलेगा कैसे? इसकी कड़ी भी वैशम्पायन द्वारा जनमेजय को शापित किये जाने से जुड़ती है। एक बात और ध्यान देने की है, उत्तर भारत में कृष्ण यजुर्वेदियों को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता। यजुर्वेद की पुरातन मूल धारा कृष्ण थी जिसमें मंत्र भाग व ब्राह्मण भाग मिश्रित थे।]

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

शत्रु कपटी हो, शक्तिशाली हो तो कपट से या छिप कर मारें


श्रीराम ने बाली को छिप कर मारा। रामायण में बाली ने उन्हें बहुत खरी खोटी सुनाई है। स्वयं क्या किया था उसने? भाई को निर्वासित कर एक निश्चित घेरे में रहने पर विवश कर दिया था। पुत्रवधू समान अनुजवधू से बलात संसर्ग करता था, मारा गया तो धर्म की बातें करने लगा।
बाली के चरित्र को आजकल के कम्युनिस्टों एवं मुसलमानों का प्रतिनिधि समझें, अपने तो सारे कुकर्म करेंगे किंतु जब प्रतिकार होगा तो स्वयं को धर्मात्मा बताते हुये सामने वाले पर टूट पड़ेंगे। मीडिया से ले कर नेता अभिनेता तक जो कुछ हो रहा है, बाली कर्म ही है।
बाली ने क्या बातें कहीं हैं! पठनीय हैं -
राजा के गुण गिनाते हुये श्रीराम की भर्त्सना करता है - दम: शम: क्षमा धर्मो धृति: सत्य पराक्रम: । पार्थिवानां गुणा राओजन् दण्डश्चाप्ययकारिषु॥
तुमको तो बड़ा धर्मात्मा सुना था, बड़े अधर्मी निकले ! तुम्हारी बुद्धि मारी गयी है - विनिहतात्मानं। तुम्हारा आचार पापपूर्ण है - पापसमाचारम्। तुम घास फूस से ढके कुँये के समान धोखा देने वाले हो - तृणै: कूपमिवावृतम्। साधुओं के वेश में पापी हो - सतां वेषधरं पापं, राख से ढकी अग्नि समान हो, धर्म का छ्द्माभ्यास करते हो - धर्मच्छद्मानिसंवृतम् ।
मैं तो तुम्हारे राज्य में कोई उपद्रव नहीं कर रहा था, तब भी मुझ निरपराध को क्यों मारा? - विषये वा पुरे वा ते यदा पापं करोम्यहम् ... कस्मात् तं हंस्य?
महान क्षत्रियकुल में जन्मा, धर्म ज्ञाता बताते हुये उसने उन्हें क्रूरकर्मा कह कर ग्लानि से ग्रस्त करने का प्रयास भी किया, जैसे आज कल बरखा से रबिश तक सभी हिंदुओं पर लगे हुये हैं - धर्मलिङ्गप्रतिच्छन्न: क्रूरं कर्म समाचरेत् ! अखलाक के वध पर जैसी प्रतिक्रियायें आई थीं, इस अंश को पढ़ते हुये वे सभी ध्यान में आती हैं।
तुम्हें नीति एवं विनय नहीं ज्ञात, दण्ड एवं अनुग्रह का राजधर्म भी नहीं पता, तुम तो बड़े संकीर्ण, क्रोधी अमर्यादित हो - कोपनश्चानवस्थित:, संकीर्ण:। जहाँ कहीं भी बाण चलाते फिरते हो - शरासनपरायण:। तुम्हारी बुद्धि स्थिर नहीं है।
मुसलमानों की ही भाँति विक्टिम कार्ड भी खेलने लगा -
हत्वा बाणेन काकुत्स्थ मामिहानपराधिनम् ।
किं वक्ष्यसि सतां मध्ये कर्म कृत्वा जुगुप्सितम् ॥
मुझ निरपराध को बाण से मारने का जुगुप्सित कर्म कर तुम सत्पुरुषों के बीच में क्या कहोगे?

बाली ने इतना तक कह दिया कि अरे !  तुम शठ हो, अपकारी हो, क्षुद्र हो,  मिथ्या ही अपने को शांतचित्त दिखाते रहते हो। महात्मा जैसे राजा दशरथ से तुम्हारे जैसा पापी कैसे उत्पन्न हो गया !
शठो नैकृतिक: क्षुद्रो मिथ्याप्रश्रितमानस: । कथं दशरथेन त्वं जात: पापो महात्मना !
श्रीराम आज कल के मोहनदासी हिंदू होते तो पानी पानी हो गये होते!

श्रीराम ने उत्तर देना आरम्भ किया - धर्म, अर्थ, काम एवं लौकिक आचार को तो तुम स्वयं नहीं जानते, बालोचित अविवेक से ग्रस्त हो मेरी निंदा करते हो? - अविज्ञाय कथं बाल्यान्मामिहाद्य विगर्हसे ! यह समस्त पृथ्वी इक्ष्वाकुओं की है, वे पशु पक्षी सहित समस्त मनुष्यों पर दया करने एवं दण्ड देने के अधिकारी हैं।
धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वी का पालन करते हैं - तां पालयति धर्मात्मा भरत: सत्यवानृजु:। भरत की ओर से हमें तथा अन्य पार्थिवों को यह आदेश प्राप्त है कि जगत में धर्म पालन एवं प्रचार का यत्न किया जाय। अत: हमलोग धर्म का प्रसार करने की इच्छा से इस पृथ्वी पर विचरते हैं :
तस्य धर्मकृतादेशा वयमन्ये च पार्थिवा: ।
चरामो वसुधां कृत्स्नां धर्मसंतानमिच्छव: ॥
राम ने भरत की महिमा बताई तथा आगे वह कारण गिनाये जिनके कारण बाली को उन्हें मारना पड़ा, तुलसीदास ने अनुवाद किया - अनुजबधू भगिनी सुतनारी  ...
राम ने पापकर्म का दण्ड भरत के प्रतिनिधि होने के कारण दिया।
तदेतत्कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हतः
भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्
अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः
रुमायां वर्तसे कामात्स्नुषायां पापकर्मकृत्
तद्व्यतीतस्य ते धर्मात्कामवृत्तस्य वानर
भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन्दण्डोऽयं प्रतिपादितः
न हि धर्मविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुषः
दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप
औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य यः
प्रचरेत नरः कामात्तस्य दण्डो वधः स्मृतः
भरतस्तु महीपालो वयं त्वादेशवर्तिनः
त्वं च धर्मादतिक्रान्तः कथं शक्यमुपेक्षितुम्
गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन्
भरतः कामवृत्तानां निग्रहे पर्यवस्थितः
वयं तु भरतादेशं विधिं कृत्वा हरीश्वर
त्वद्विधान्भिन्नमर्यादान्नियन्तुं पर्यवस्थिताः
श्रीराम ने यह भी बताया कि दण्ड देने में प्रमाद करने पर राजा को दूसरों के पाप भोगने पड़ते हैं। भारत की समस्या यही है कि राजदण्ड या तो है ही नहीं या मोहनदासी प्रभाव में चलता ही नहीं।
लोकतंत्र में तो लोक ही राजा है न? सरकार उसकी प्रतिनिधि। प्रतिनिधि दण्ड नहीं देगा तो राजा पाप भोगेगा अर्थात लोग कष्ट भोगेंगे। भारत की जनता भोग रही है।
victim card ख़ेल कर आजकल के वामपंथी प्रयासों की भाँति उन्हें अवसाद एवं पछतावे, ग्लानि आदि से भर देने के बाली के कथनों पर श्रीराम ने बहुत स्पष्ट कह दिया :
न मे तत्र मनस्तापो न मन्युर्हरिपुङ्गव ।
वागुराभिश्च पाशैश्च कूटैश्च विविधैर्नरा :॥
इस कार्य के लिये मेरे मन में न तो संताप होता है और न खेद ही। मनुष्य जाल बिछा कर, पाश पसार कर तथा नाना प्रकार के कूट उपाय कर मृगों को पकड़ लेते हैं, तू तो शाखामृग (उत्पाती) है - यस्माच्छाखामृगो ह्यसि !
...
शत्रु कपटी हो, शक्तिशाली हो तो कपट से या छिप कर मारें । मन में कोई अपराध भाव या ग्लानि न रखते हुये दुरात्माओं को येन केन प्रकारेण नष्ट करने वाले क्षात्रधर्म की आवश्यकता है।  

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

रावण द्वारा सीताहरण : रामेति सीता दु:खार्त्ता ... हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक !

रावण ने छल का रूप धारण किया - शिखा, दण्ड, कमण्डल, काषाय वस्त्र, पाँवों में उपानह, छाता - एक परिव्राजक, परिभ्रमण करने वाले भिखारियों का जो रूप होता है, वह धारण किया। (3044001-3)
तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः । स विकाङ्क्षन्भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव ॥
तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः । अभिचक्राम वैदेहीं परिव्राजकरूपधृक् ॥
श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही । वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू ।
परिव्राजकरूपेण वैदेहीं समुपागमत् ॥

इतना कायर था कि लक्ष्मण के रहते वहाँ नहीं आया, चले जाने की प्रतीक्षा करता रहा। सीता तो सरलमना हैं, अपहृत होने से पूर्व उनका उसके साथ का जो संवाद है, वह उनके मन में करुणा जगाता है जो आगत जानते हैं। सीता कुछ नहीं छिपातीं। आज भी गाँव गिराम में भ्रमण करते वैरागियों के प्रति स्त्रियों का जो सहज भाव होता है, वह वाल्मीकि के वर्णन में निखर उठता है एवं विडम्बना पर पाठक का मन त्राहि त्राहि करने लगता है (साथ ही मुण्डियों, जटिलों आदि से स्त्रियों को दूर रखने की नीतिज्ञों की चेतावनी भी प्रतिध्वनित होने लगती है।)
उसके आगमन की भयानकता को रेखांकित करने हेतु वाल्मीकि नाक्षत्रिक एवं भौमिक, दोनों उपमाओं का आश्रय लेते हैं, निकट बहती नदी तक मन्द हो जाती है ! राम, लक्ष्मण के न होने पर सीता ऐसे जैसे सूर्य एवं चंद्र के बिना संध्या हो, रावण ऐसे जैसे चित्रा नक्षत्र पर शनि की छाया हो, जैसे तृणों से ढका कुँआ हो ! सीता पति एवं देवर के कुशल की चिन्‍ता में थीं, सोच के कारण भव्य रूप अभव्य हो रहा था किन्‍तु अतिथि  ब्राह्मण के सत्कार हेतु पूर्णत: प्रस्तुत हुईं :   
3044001a तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः
3044001c स विकाङ्क्षन्भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव
3044002a तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः
3044002c अभिचक्राम वैदेहीं परिव्राजकरूपधृक्
3044003a श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही
3044003c वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू
3044003e परिव्राजकरूपेण वैदेहीं समुपागमत्
3044004a तामाससादातिबलो भ्रातृभ्यां रहितां वने
3044004c रहितां सूर्यचन्द्राभ्यां संध्यामिव महत्तमः
3044005a तामपश्यत्ततो बालां राजपुत्रीं यशस्विनीम्
3044005c रोहिणीं शशिना हीनां ग्रहवद्भृशदारुणः
3044006a तमुग्रं पापकर्माणं जनस्थानरुहा द्रुमाः
3044006c समीक्ष्य न प्रकम्पन्ते न प्रवाति च मारुतः
3044007a शीघ्रस्रोताश्च तं दृष्ट्वा वीक्षन्तं रक्तलोचनम्
3044007c स्तिमितं गन्तुमारेभे भयाद्गोदावरी नदी
3044008a रामस्य त्वन्तरं प्रेप्सुर्दशग्रीवस्तदन्तरे
3044008c उपतस्थे च वैदेहीं भिक्षुरूपेण रावणः
3044009a अभव्यो भव्यरूपेण भर्तारमनुशोचतीम्
3044009c अभ्यवर्तत वैदेहीं चित्रामिव शनैश्चरः
3044010a स पापो भव्यरूपेण तृणैः कूप इवावृतः

देवी सीता के रूप को देख रावण कामबाण से आहत हो गया तथा वेदमन्त्र पढ़ने लगा जिससे कि उनमें विश्वास हो जाय कि यह तो कोई महापुरुष हैं ! दृष्ट्वा कामशराविद्धो ब्रह्मघोषमुदीरयन् । तत्पश्चात उसने उनके रूप का विशद वर्णन उन्हीं से किया।
ब्रह्मघोषं को वेद वाचन मानें या ब्राह्मण होने का उद्घोष, दोनों ही स्थितियों में तत्कालीन समय अनुसार छल की पराकाष्ठा ही परिलक्षित होती है।
आर्यावर्त के दो महान कुलों का संस्कार था, देवी सीता ने अतिथि ब्राह्मण का आदर करते हुये पाद्य अर्घ्य समर्पित किया एवं भोजन हेतु निमंत्रण भी दिया किन्‍तु कथित रूप से परम विद्वान, पौलस्त्य राक्षस रावण के मन में तो कुछ और ही था !
3044033a द्विजातिवेषेण समीक्ष्य मैथिली; तमागतं पात्रकुसुम्भधारिणम्
3044033c अशक्यमुद्द्वेष्टुमुपायदर्शना;न्न्यमन्त्रयद्ब्राह्मणवद्यथागतम्
3044034a इयं बृसी ब्राह्मण काममास्यता;मिदं च पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति
3044034c इदं च सिद्धं वनजातमुत्तमं; त्वदर्थमव्यग्रमिहोपभुज्यताम्
3044035a निमन्त्र्यमाणः प्रतिपूर्णभाषिणीं; नरेन्द्रपत्नीं प्रसमीक्ष्य मैथिलीम्
3044035c प्रहस्य तस्या हरणे धृतं मनः; समर्पयामास वधाय रावणः
3044036a ततः सुवेषं मृगया गतं पतिं; प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा
3044036c निरीक्षमाणा हरितं ददर्श त;न्महद्वनं नैव तु रामलक्ष्मणौ

ब्राह्मणवेशधारी राक्षस रावण ने परिचय पूछा एवं देवी सीता ने परिचय देने से पूर्व एक मुहूर्त (दो घटी या आज का 48 मिनट) तक विचार किया - दुविधा समझी जा सकती है कि अपरिचित आगंतुक से कुछ अधिक बताना ठीक नहीं, किन्‍तु ब्राह्मण है, वेदघोष करता है, न बताने पर कहीं रुष्ट हो शाप दे बैठा तो!
3045001a रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा
3045001c परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना
3045002a ब्राह्मणश्चातिथिश्चैष अनुक्तो हि शपेत माम्
3045002c इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत्

अपना परिचय देने के पश्चात देवी सीता ने रावण से परिचय पूछा जो कि समयसम्मत था कि ब्राह्मण से नाम, गोत्र एवं कुल का परिचय पूछा जाना चाहिये - स त्वं नाम च गोत्रं च कुलमाचक्ष्व तत्त्वत: ।
रावण ने क्या ब्राह्मणत्व वाला परिचय दिया !
हे सीता ! देव, सुर, मनुष्य सहित जिससे समस्त लोक त्रस्त हैं, मैं वह रावण नामधारी राक्षसराज हूँ - 
येन वित्रासिता लोका: सदेवासुरमानुषा: ।  अहं स रावणो नाम सीते रक्षोगणेश्वर: ॥
लम्पट ने पटरानी होने का प्रस्ताव रख दिया । देवी सीता तो जैसे आकाश से गिरीं ! श्रीराम के प्रति महेन्द्र एवं सागर, दोनों की उपमा देते हुये मानों उन्हों ने उनके प्रति अपने दृढ़ एवं गहन प्रेम का परिमाण प्रस्तुत कर दिया - ‍महागिरिमिवाकम्प्यं महेन्‍द्रसदृशं पतिं । महोदधिमिवाक्षोभ्यमहं राममनुव्रता ॥
आगे उन्हों ने उसे जो खरी खोटी सुनाई है, वह अप्रतिम है - जम्बुक: सिंहीं इच्छसि ! ब्रह्मराक्षस रावण अपनी लम्पटता के कारण जगविख्यात था। सीता को अपने अपहरण की आशंका हो गई, उन्होंने उसे श्रीराम का बल प्रभाव बताते हुये चेताया कि जलती हुई आग को कपड़े में बाँध ले जाना चाहता है! मारा जायेगा।
राक्षस समझ गया कि प्रलोभन से नहीं मानेगी, स्यात कुल की डींग हाँकने से मान जाय ! कुल के डींग की प्रवृत्ति आज भी दशहरे के निकट कुछ में मरोड़ने लगती है - सवर्ग प्रीति।
उसने कहा - मैं वैश्रवण कुबेर का सौतेला भाई हूँ - भ्राता वैश्रवणस्याहं सापत्न्यो वरवर्णिनि। सीता ने उत्तर दिया - अरे, वे तो समस्त देवों के पूजनीय हैं। तुम उनसे अपने को जोड़ पापकर्म करता है - कथं वैश्रवणं देवं सर्वभूतनमस्कृतम् !
श्रीराम के प्रति विश्वास फूट पड़ा - इंद्र की पत्नी शचि का अपहरण कर सम्भव है जीवित रहना किंतु राम की पत्नी का हरण कर कुशल से रह पाना - असम्भव!
अपने प्रति अभिमान भी भर आया - मेरे जैसी स्त्री का अपहरण कर तू अमृत भी पी ले तो जीते जी तुम्हें छुटकारा नहीं होना - न मादृषीं धर्षयित्त्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्ष: !
रावण ने सौम्य रूप त्याग कर विकराल रूप धारण कर लिया, कामलोलुप हो उन्हें पकड़ लिया मानों बुध ने अपनी माता रोहिणी को उस भाव से पकड़ने का दुस्साहस किया हो - बुध: खे रोहिणीमिव ।
जो ब्रह्मबंधु यह लिखते नहीं थकते कि रावण ने देवी सीता को छुआ तक न था (उनके लिये जब तक बलात्कारी यौन कर्म सम्पन्न न हो जाय, तब तक छुआ क्या?) उनके लिये यह श्लोक :
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण स: । 
ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥
उसने बायें हाथ से कमलनयनी सीता के केश पकड़े, दाहिने हाथ को उनकी जंघाओं के नीचे लगा उठा लिया । 
खरयुक्त: खरस्वन: - गधों से जुता एवं उनके समान ही ध्वनि करने वाले महारथ पर बिठा कर ले चला। 
सीता दु:खी एवं आर्त्त हो राम लक्ष्मण को पुकारने लगीं - रामेति सीता दु:खार्त्ता ... हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक !

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

अरण्यकाण्ड का एक श्लोक : कोयष्टि टिट्टिभ, टिटहरी, कठफोड़वा, कीचक, कीरक

अरण्यकाण्ड का एक श्लोक है:  
कोयष्टिभिश्चार्जुनकैः शतपत्रैश्च कीच(र)कैः। 
एतैश्चान्यैश्च विविधैर्नादितं तद्वनं महत् ॥ 

यह महत्वपूर्ण श्लोक है। पहला अर्द्धांश तोड़ते हैं: 
कोयष्टि+भि / कोयष्टिभि: 
च 
अर्जुनक+ ऐ (मात्रा बहुवचन हेतु) 
शतपत्र + ऐ (मात्रा बहुवचन हेतु) 
कीचक + ऐ (मात्रा बहुवचन हेतु)/ पाठभेद कीरक+ऐ 
... 
संदर्भ है जब पम्पा सरोवर तक पहुँचने से पूर्व राम लक्ष्मण गहन वन प्रांतर में होते हैं जोकि भाँति भाँति के वृक्षों से भरा हुआ है, विविध प्रकार के पक्षियों का कोलाहल है। 
... 
कोयष्टि का अर्थ होता है तन्वी लकड़ी की भाँति शाखा / पाँव वाला। भि: बहुवचन के लिये भी प्रयुक्त हो सकता है एवं संज्ञा का अंग भी हो सकता है। विद्वानों ने दो अर्थ किये - ऐसा वृक्ष जिसकी टहनियाँ बहुत पतली होती हैं, भोजपुरी में कहें तो छरका। 
दूसरा अर्थ टिभि से आया - टिट्टिभि - टिटहरी। इसके स्वर से तो आप परिचित ही होंगे। आजकल सुनाई दे तो कहते हैं सूखा पड़ेगा। गँवई घर की महिलायें सुनते ही आँगन में दो तीन बाल्टी पानी उड़ेल देती हैं - टोटका। 
विविधै: नादितं - विविध प्रकार के खग रव से जोड़ कर देखें तो यह अर्थ उचित लगता है किंतु प्रसंग में वानस्पतिक विविधता का ऐसा वर्णन मिलता है कि पहला अर्थ भी ठीक प्रतीत होता है। 
आगे बढ़ें अर्जुनक - पुन: समस्या, अर्जुन(क) वृक्ष भी होता है तथा अर्जुनक कठफोड़वे को भी कहते हैं, अर्जुन के वृक्ष सम्भवत: उसे अधिक प्रिय होते हों। खट खट की ध्वनि होती है जब चोंच मारता है - विविधैर्नादितं तद्वनं महत्! 
अगला शब्द - शतपत्र, पुन: समस्या। शतपर्णी वृक्ष होता है तथा मोर को भी शतपत्र कहते हैं। नाचते नर मोर के पंख ऐसे लगते हैं कि नहीं कि सैकड़ो पत्तों का घाघरा पहन नाच रहा हो! 
कीचक - एक प्रकार का पोला लम्बा छरहरा बाँस। इसके वन की विशेषता होती है कि जब इससे होकर वायु प्रवाह होता है तो कई प्रकार से सीटियों के बजने सी ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। प्रसंग से तथा विविध नाद से यह शब्द उपयुक्त है - विविधैर्नादितं तद्वनं महत्। 
ठहरिये! एक पाठ कीरक भी तो है! 
कीरक कहते हैं तोते को। बहुत से तोते एक साथ हों तो जो कोलाहल करते हैं, उसे तो आप जानते ही हैं - विविधैर्नादितं तद्वनं महत्। 
... 
काव्यकर्म इसे कहते हैं जो आप को चेतना के अनेक आयामों का स्पर्श करा दे। इसे वही लिख सकता है जो वन वन का साथी रहा हो, यायावर हो, प्रेक्षक हो। 
... 
रामायण एवं महाभारत आख्यान कहे गये हैं। आख्यान अर्थात जो घटित हुआ उसका गान। सहस्राब्दियों तक कुशीलव एवं सूत गायकों ने इन्हें लोक में जीवित रखा। दिक्काल भेद से इनमें परिवर्तन भी हुये, परिवर्द्धन भी किंतु सतर्क सावधान पाठ से मूल तक अधिकांशत: पहुँचा जा सकता है जिसके लिये दो विधियाँ अपनायी जाती हैं - निम्न समीक्षा, उच्च समीक्षा - Lower Criticism, Higher Criticism. 
विशेषज्ञों का काम है। आप को मात्र यह ध्यान रखना है कि इन महाकाव्यों में प्राचीन भारत की समृद्धि को लिख कर संरक्षित कर दिया गया है, यह काम सहस्राब्दियों तक होता रहा।
रामायण काव्य एवं रामायण घटना - इन दो में अन्तर सम्भव हैं जिनके लिये लज्जित होने की आवश्यकता नहीं है अपितु गर्वित होने की आवश्यकता है कि हमारे पास ऐसा तंत्र था जिसने जाने कितनी आपदाओं के होते हुये भी समृद्धि को आगे की पीढ़ियों तक पहुँचाना सुनिश्चित किया। आप को पढ़ना है, मनन करना है, समझना है एवं आगे बढ़ना है। पुन: कह दूँ, आगे बढ़ना है। 
वैष्णवों! रामायण में मदिरा या मांस के प्रकरणों से मुँह चुराने की आवश्यकता नहीं है। उसे इतिहास कहा गया है, संदर्भ एवं प्रसंग के अनुसार पढ़ें। सातत्य का ध्यान रखें, क्षेपक होगा तो पता चल ही जायेगा। विविध प्रकार की मदिरा वही सभ्यता बना एवं उनका सभ्य अनुप्रयोग कर सकती है जो अति उन्नत हो। आसव, अरिष्ट, रस, रसायन तो आयुर्वेद के अंग हैं। यही बात विविध प्रकार के खाद्य के लिये भी सच है। 
दृष्टि ठीक रखिये, हीनता से मुक्ति मिलेगी। 
... पवित्रात्माओं! इसका अर्थ यह नहीं कि मैं दारूबाजी एवं मांस भक्षण का प्रचार कर रहा हूँ। यदि आप को ऐसा प्रतीयमान है तो मेरी असफलता। 
... 
शुभमस्तु।

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

राम आ रहे हैं ... परमानंदं भरत: सत्यविक्रम:

राम आ रहे हैं, सुन कर भरत परमानंद में हैं - श्रुत्वा तु परमानन्दं भरतः सत्यविक्रमः। अयोध्यावासियों के लिये राजाज्ञा प्रसारित होती है - नगरवासी पवित्र हो कुलदेवता एवं सर्वसाधारण देवताओं के मंदिरों में सुगंधि, माला और वाद्य के साथ अर्चन करें - दैवतानि च सर्वाणि चैत्यानि नगरस्य च। 
सूत, वैतालिक, विरुदावली गाने वाले एवं पुराणज्ञ उनके स्वागत में कुशल बजनियों एवं नचनियों के साथ नंदिग्राम हेतु प्रस्थान करें।
... 
शत्रुघ्न व्यवस्था में लग गये- मार्ग के ऊँच नीच सम कर दिये जायँ। हिमशीतल जल का छिड़काव किया जाय - सिञ्चंतु पृथिवीं कृत्स्नां हिमशीतेन वारिणा। वीथियों के किनारे पताकायें फहरें, मार्ग पर पुष्प और लाजा बिखेर दिये जायँ। सूर्योदय के पूर्व ही भवनों की सजावट पूरी कर दी जाय - शोभयन्तु च वेश्मानि सूर्यस्योदयनं प्रति। 
पुष्प पंखुड़ियाँ बिखेर दी जायँ एवं सुगंधित पाँच रङ्गों (की अल्पनाओं) से राजमार्ग सजा दिया जाय - स्रग्दाममुक्तपुष्पैश्च सुगन्धैः पञ्चवर्णकैः। 
... 
अश्वारोही, गजारूढ़ योद्धा, रथी और पदाति सैनिक ध्वजायें लहराते चल पड़े। मातायें उनके साथ नंदिग्राम पहुँच गयीं। 
घोड़ों के खुरों, रथों, शंख एवं दुंदुभि के सम्मिलित नाद का ऐसा प्रभाव हुआ मानो मेदिनी काँप उठी! 
अश्वानां खुरशब्दैश्च रथनेमिस्वनेन च। 
शङ्खदुन्दुभिनादेन संचचालेव मेदिनी॥ 

... 
भरत की क्या स्थिति थी? 
उपवासकृशो दीनश्चीरकृष्णाजिनाम्बरः - उपवास से दुबले हो गये थे, दीन स्थिति में चीर वस्त्र और मृगचर्म पहने हुये थे। 
प्रसन्नता है कि सँभल नहीं रही, आशंका भी है कि क्या यह सच है। राम दिख नहीं रहे... 
भरत हनुमान से पूछ बैठे - कहीं अपनी (वानर) स्वभाव की चञ्चलता वश तो मुझे बनाने नहीं आ गये? कच्चिन्न खलु कापेयी सेव्यते चलचित्तता? 
हनुमान जी ने उत्तर दिया, "ध्यान से सुनिये, मुझे तो वानर सेना द्वारा गोमती नदी पार करने की ध्वनि सुनाई पड़ रही है - मन्ये वानरसेना सा नदीं तरति गोमतीम्। 
उड़ती धूल देखिये, साल वृक्ष शाखाओं का झूमना देखिये, मन्ने लागे कि वानर आ रहे हैं! 
रजोवर्षं समुद्भूतं पश्य वालुकिनीं प्रति। 
मन्ये सालवनं रम्यं लोलयन्ति प्लवङ्गमाः॥
" 
आकाश में उड़ते विमान के लिये विमल चंद्र और तरुण सूर्य, दोनों की उपमायें हनुमान जी ने दीं - दृश्यते दूराद्विमलं चन्द्रसंनिभम् ... तरुणादित्यसंकाशं विमानं रामवाहनम्। 
जनघोष हुआ - यह तो राम हैं - रामोऽयमिति कीर्तितः! 
... 
भरत जी प्रमुदित हैं, बारम्बार स्वागत कर रहे हैं - राममासाद्य मुदितः पुनरेवाभ्यवादयत्। 
श्रीराम क्या करें? 
14 वर्ष बिछुड़न में बीते हैं, दीन मलीन अवस्था में भाई समक्ष है, अभिवादन कर रहा है, क्या करूँ? ... 

... 
स्नेह वात्सल्य उमड़ पड़ा। राजकीय स्वागत की मर्यादायें धरी रह गयीं। श्रीराम ने भरत को उठा गोद में बिठा आलिङ्गन में कस लिया (वैसे ही जैसे कभी बचपन में करते रहे होंगे)। 
 
तं समुत्थाप्य काकुत्स्थश्चिरस्याक्षिपथं गतम्
अङ्के भरतमारोप्य मुदितः परिषष्वजे
~~~~

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

रामायण : अतिथि का आश्वासन

विराध वध के पश्चात श्रीराम ने सीता जी को हृदय से लगा कर आश्वस्त किया - परिष्वज्य समाश्वास्य और लक्ष्मण से कहा कि यह वन दुर्गम कष्ट भरा है और हम लोग भी अभ्यस्त वनचारी नहीं हैं, शीघ्र ही तपोधन शरभङ्ग के पास पहुँचना होगा।
कष्टम् वनम् इदम् दुर्गम् न च स्मो वन गोचराः
अभिगच्छामहे शीघ्रम् शरभङ्गम् तपो धनम्

अरण्यकाण्ड को पढ़ेंगे तो साफ लगेगा कि जैसे किसी योजना के अंतर्गत राम कड़ी से कड़ी जोड़ते बढ़ रहे हैं! शरभङ्ग के यहाँ पहुँचने से पहले ही दूर से दिव्य इन्द्र समस्त देवताओं के साथ दिखते हैं। विचित्र घटित होता है, इन्द्र खिसक लेते हैं!
इह उपयाति असौ रामो यावन् माम् न अभिभाषते
निष्ठाम् नयत तावत् तु ततो मा द्रष्टुम् अर्हति
जितवन्तम् कृतार्थम् हि तदा अहम् अचिराद् इमम्
कर्म हि अनेन कर्तव्यम् महत् अन्यैः सुदुष्करम्
 देखो, राम आ रहे हैं। इससे पहले कि वह मुझसे संवादित हों उन्हें आप उनके कर्तव्य की ओर प्रेरित करें। उनके ऊपर एक दुष्कर और महान कार्य का दायित्त्व है, जब पूरा कर लेंगे तब मैं उनसे मिलूँगा।
राम शरभङ्ग से पूछते हैं - शक्र अर्थात इन्द्र के आने का क्या प्रयोजन था? शरभङ्ग उत्तर देते हैं - मुझे मेरा तपस्या का फल दे ब्रह्मलोक ले जाने के लिये आये थे लेकिन मैंने आप का आगमन जान स्थगित कर दिया कि बिना आप जैसे 'प्रिय अतिथि' के दर्शन के मैं प्रस्थान नहीं करूँगा!
 इसके पश्चात वह घटता है जिसे फल समर्पण कहा गया। जिसे लोक में ऐसे कहते हैं कि देवता आराधक द्वारा पुष्ट होते हैं। जिसे आधुनिक समझ से यह कहा जाता है - मनुष्य ईश्वर का विधाता है। आप के देव की शक्ति आप की शक्ति के अनुक्रमानुपाती होती है। शरभङ्ग कहते हैं:
अक्षया नरशार्दूल जिता लोका मया शुभा:
ब्राह्मयाः च नाक पृष्ठ्याः च प्रतिगृह्णीष्व मामकान्
हे पुरुषसिंह! मैंने अक्षय और शुभ लोक जीत लिये हैं। वे ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक (नाक - हाथी, पृष्ठ - पीठ अर्थात उसका लोक जो हाथी की पीठ पर बैठता है अर्थात इन्द्र का स्वर्ग लोक) मुझसे आप स्वीकृत करें।
रामकथा दर्शाती है कि कैसे विश्वामित्र, जामदग्नेय राम, अगस्त्य, शरभङ्ग आदि उस युग के बुद्धिजीवियों ने अपने समस्त तप का अर्पण मानवता के योद्धा श्रीराम को कर दिया था। सभी भौतिक योद्धा नहीं होते, बहुत बड़ी पात्रता चाहिये होती है किंतु योद्धा पहचान में आ गया तो उसे बली तो कर ही सकते हैं, उसे उत्प्रेरित कर सकते हैं और मनस्वी तो तैयार भी कर सकते हैं। इस युग के बुद्धिजीवी कहाँ लिप्त हैं, ध्यान दीजिये, समझ में आ जायेगा कि समस्या की जड़ कहाँ है!
 राम विचित्र उत्तर देते हैं:
अहम् एव आहरिष्यामि सर्वान् लोकान् महामुने
आवासम् तु अहम् इच्छामि प्रदिष्टम् इह कानने

महामुनि! मैं ही आप को उन सभी लोकों की प्राप्ति कराऊँगा या महामुनि! केवल मैं ही उन लोकों को ग्रहण करूँगा लेकिन अभी तो इस कानन में आवास निर्माण करना है, मुझे निर्दिष्ट कीजिये।
वह सब तो ठीक है लेकिन हमलोग रहें कहाँ, यह तो बताइये? शरभङ्ग क्या करते हैं? राम को सुतीक्ष्ण मुनि की राह बता हैं जैसे कोई अनूठी छड़ी दौड़ हो, धावक एक, कई ठाँव। दौड़ो राम!
तत्पश्चात कहते हैं - मुहुर्त भर, दो घड़ी मुझे देखो राम! जब तक कि मैं इस जीर्ण देह का त्याग न कर लूँ!

 मुनि अग्नि की स्थापना कर अग्नि में प्रवेश कर गये। वाल्मीकि जी ने लिखा - समाधाय हुत्वा मंत्रवत। देह नहीं समिधा है, जैसे मंत्र पढ़ कर  हवन कर दी गयी हो।  कितनी गहरी प्रतीक्षा रही होगी, कितनी पीड़ा, कितने कष्टों और अत्याचारों को सहते शरभङ्ग तपे होंगे कि अवतार को उसकी प्रतिज्ञा के प्रति सुदृढ़ करने के लिये आत्मदाह से अधिक कोई युक्ति सूझी ही नहीं!
इस अग्निमय प्रस्तावना के साथ राम की दीक्षा का पाठ प्रारम्भ होता है, रक्षा हेतु प्रार्थना के बहाने राम से आश्वासन ले लिया जाता है:
मेsयं वने वासो भविष्यतो महाफल:,
तपस्विनां रणे शत्रुन् हंतुमिच्छामि राक्षसान्
(निशिचर हीन करौं मही)।

कितने प्रकार के तपस्वियों ने यह आश्वासन लिया?
वैखानसा वालखिल्याः संप्रक्षाला मरीचिपाः
अश्म कुट्टाः च बहवः पत्र आहाराः च तापसाः
दन्त उलूखलिनः च एव तथा एव उन्मज्जकाः परे
गात्र शय्या अशय्याः च तथा एव अनवकाशिकाः
मुनयः सलिल आहारा वायु भक्षाः तथा अपरे
आकाश निलयाः च एव तथा स्थण्डिल शायिनः
तथा ऊर्ध्व वासिनः दान्ताः तथा आर्द्र पट वाससः
स जपाः च तपो नित्याः तथा पंच तपोऽन्विताः
जैसे वाल्मीकि वनस्पतियों को बताते हैं, जैसे ऋतुवर्णन में वर्णन की झड़ी लगा देते हैं वैसे ही इन श्लोकों में जितने तरह के तापस हो सकते हैं, समेट दिये हैं - वैदिक वैखानस और वालखिल्य, अगले समय के आहार के लिये कुछ भी सहेज कर न रखने वाले, सूर्य किरणों का पान करने वाले, अन्न को बस पत्थर से कूट खा जीने वाले, पत्ते खा कर रहने वाले, दाँतों से ही ऊखल का काम लेने वाले अर्थात बिना कूटे ही अन्न ग्रहण करने वाले, कंठ तक पानी में निमग्न रह तप करने वाले, देह को ही बिछौना मानने वाले अर्थात धरा पर बिना आभरण के सोने वाले, बिना शय्या के रहने वाले अर्थात न सोने वाले, सत्कर्म में निरंतर लगे रह कभी अवकाश न लेने वाले, जल पीकर रहने वाले, वायु पी कर रहने वाले, आकाश के नीचे खुले में विचरने वाले, वेदी पर सोने वाले, पर्वतों पर रमने वाले, सदा भीगे वस्त्र धारण करने वाले, जपी, नित्य तपी और पंचाग्नि अर्थात चार ओर से अग्नि और ऊपर से धूप का सेवन करने वाले।

... ऋग्वेद में भी ढेर सारे भिन्न चर्या वालों के उल्लेख हैं। मतभिन्नता के साथ साहचर्य यहाँ की विशेषता रही है। चूँकि लेखन, काव्य और श्रुति परम्परा सबके पास नहीं थी या सभी उस ओर ध्यान भी नहीं देते थे इसलिये भिन्न धारा द्वारा वर्णन में सूचना का अभाव साफ दिखता है। नाम गिना कर काम चला लिया जाता है। ध्यान से देखें तो इनमें चेतना और कर्म की भिन्न भिन्न स्थितियों के संकेत भी मिलते हैं।
यह धारा अक्षुण्ण चली आ रही है। उपनिषदों ने वर्णित किया, बुद्ध ने बताया, जैनियों ने जिया, अलक्षेन्द्र को भी बैखानस तापस मिले, गुप्त काल, वर्धन काल, राजपूत काल ...
... हर काल में यह प्रवाहित है और उसके साथ यह आदर्श भी कि इनकी और प्रजा की रक्षा क्षात्र धर्म है।