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सोमवार, 20 अप्रैल 2020

Ramayan Notes रामायण वार्त्तिक - ४ : अयोध्या पहुँच अपना क्षात्रधर्म दिखाइयेगा - दुष्टों का दलन राजन्य का कर्तव्य

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शबरी और शरभङ्ग, दोनों ने श्रीराम से मिलने के पश्चात उनके वहाँ रहते ही स्वयं को अग्नि को समर्पित कर दिया।
चमत्कार और कल्प कहानियों को किनारे कर विचार करें कि कितना सञ्चित अवसाद, कितनी यातना, कितनी घुटन उन दोनों में रहे होंगे!
राक्षसों को प्रश्रय देने वाले राज में सन्त दमित होते ही हैं। राज्य ही नहीं, केन्द्र में भी बैठे उच्च पीठासीनों को आत्ममन्थन करना चाहिये। कुछ अपराधों के प्रति शून्य सहिष्णुता होनी चाहिये। जिस देश के राजन्य भौंकने वाले कुत्तों से भय खा सियार बने रहते हों, उसका कल्याण नहीं हो सकता।
राजा वह जो निर्वासन में भी हाथ उठा कर कहे -
तपस्विनाम् रणे शत्रून् हन्तुम् इच्छामि राक्षसान्
पश्यन्तु वीर्यम् ऋषयः सः ब्रातुर्मे तपोधनाः
दत्त्वा अभयम् च अपि तपोधनानाम्

और कर के दिखा भी दे -
विप्रकारम् अपाक्रष्टुम् राक्षसैः भवताम् इमम्
भवताम् अर्थ सिद्ध्यर्थम् आगतोऽहम् यदृच्छया
तस्य मे अयम् वने वासो भविष्यति महाफलः

... 
और देवी सीता ने कहा, वन में हैं तो यहाँ के अनुसार रहिये, अयोध्या पहुँच कर अपना क्षात्र धर्म दिखाइयेगा माने राक्षसों के नाश की प्रतिज्ञा मुझे नहीं सुहाती -
क्व च शस्त्रम् क्व च वनम् क्व च क्षात्रम् तपः क्व च
व्याविद्धम् इदम् अस्माभिः देश धर्मः तु पूज्यताम्
तदार्य कलुषा बुद्धिः जायते शस्त्र सेवनात्
पुनर्गत्वात् तत् अयोध्यायाम् क्षत्र धर्मम् चरिष्यसि
(i.e. in Rome do what Romans do Rāma! Thus spake the future queen.)...
देवी सीता ने कह तो दिया किन्तु साथ ही यह भी जोड़ा कि स्त्रीसुलभ बात कर रही हूँ, तब भी विचार करें। सीता चाहती ही नहीं थीं कि राम घनघोर दण्डकारण्य में प्रविष्ट हों!
sixth senseऔर राम तो राम ठहरे, पहले ही कह चुके थे कि पिता के वचन का पालन तो है ही किन्तु आप तपस्वी लोगों की दुर्दशा भी दूर करनी है - विप्रकारम् अपाक्रष्टुम्! सुतीक्ष्ण मुनि भी अहिंसक ही थे, कहे कि जाओ, उन तपस्वियों की दशा देख लो किन्तु लौट कर यहीं आ जाना -
आगन्तव्यम् च ते दृष्ट्वा पुनः एव आश्रमम् प्रति।
राम ने सीता को उत्तर देना आरम्भ किया, महान जनक कुल की प्रशंसा के साथ सीता की भी प्रशंसा की, अपनी प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती और नैहर की हो जाय तो स्त्री परमानन्दित हो जाती है - आप तो महा कुलीन धर्मज्ञ जनक की आत्मजा हैं, भला ऐसा क्यों न कहेंगी!
हितम् उक्तम् त्वया देवि स्निग्धया सदृशम् वचः
कुलम् व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनक आत्मजे

कहीं इस बात में उलाहना भी थी कि ऐसा होते हुये भी आप धर्म की सूक्ष्म गति से अज्ञान दर्शाती हैं!
और राम तुरन्त ही अपने पर आ गये - क्षत्त्रियैः धार्यते चापो न आर्त शब्दो भवेद् इति, क्षत्त्रिय धनुष इसीलिये धारण करते हैं कि कहीं भी आर्तनाद न हो और यहाँ तो मेरे पास कितने ही विप्रश्रेष्ठ अपना दुखड़ा ले स्वयं चल कर आये हैं, मुझे स्वत: संज्ञान ले वहाँ पहुँचना था न! हम आप की शरण में आये हैं, ऐसा अनुनय विनय ले कर वे आये, यह तो बड़ी उल्टी बात हो गई, उनसे आदेश लेने, उनकी शरण तो हमें जाना था न! यह मेरे लिये अतुल लज्जा की बात है - मे ह्रीः एषा तु मम अतुला!
ते च आर्ता दण्डकारण्ये मुनयः संशित व्रताः
माम् सीते स्वयम् आगम्य शरण्याः शरणम् गताः
..
अस्मान् अभ्यवपद्य इति माम् ऊचुर् द्विज सत्तमाः
कृत्वा वचन शुश्रुषाम् वाक्यम् एतत् उदाहृतम्
प्रसीदन्तु भवन्तो मे ह्रीः एषा तु मम अतुला
यद् ईदृशैः अहम् विप्रैः उपस्थेयैः उपस्थितः

उनकी सुन मैं उन्हें रक्षा का वचन दे चुका हूँ - मया च एतत् वचः श्रुत्वा कार्त्स्न्येन परिपालनम्। आपको तो पता ही है कि जीवित रहते मैं उससे विचलित नहीं हो सकता। मैं अपना जीवन त्याग सकता हूँ, लक्ष्मण को छोड़ सकता हूँ, आपको छोड़ सकता हूँ किन्तु सत्य का त्याग नहीं कर सकता, ब्राह्मणों की बात तो विशेष भी है। मैं ऋषियों का परिपालन अवश्य करूँगा।
संश्रुत्य न च शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम्
मुनीनाम् अन्यथा कर्तुम् सत्यम् इष्टम् हि मे सदा
अपि अहम् जीवितम् जह्याम् त्वाम् वा सीते स लक्ष्मणाम्
न तु प्रतिज्ञाम् संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः
तत् अवश्यम् मया कार्यम् ऋषीणाम् परिपालनम्

राम से हम यह भी सीख सकते हैं कि पत्नी को कैसे तुष्ट रखें, कैसे बात न मानते हुये भी सहधर्मिणी का मान बनाये रखें -
मम स्नेहात् च सौहार्दात् इदम् उक्तम् त्वया वचः
परितुष्टो अस्मि अहम् सीते न हि अनिष्टो अनुशास्यते
सदृशम् च अनुरूपम् च कुलस्य तव शोभने
सधर्मचारिणी मे त्वम् प्राणेभ्यो अपि गरीयसी
सीते, मुझसे स्नेह व सौहार्द वश ही आपने वे बातें की, मैं परितुष्ट हूँ (आप मुझे रुष्ट न समझें)। शोभने, जो आपने कहा, वह आपके योग्य है, आप ही वैसा कह सकती हैं। आपकी बातें आपके महान कुल के अनुरूप हैं। आप मेरी सधर्मचारिणी हैं अर्थात मेरे साथ का धर्म तो आपको निभाना ही होगा, आप मुझे प्राणों से भी प्रिय हैं (अर्थात पहले जो कहा उसे ऐसे समझें कि प्राण जाने पर ही आपसे विलगाव होगा।)
...
स्त्री मन की समझ रखने वाले राम ने इस प्रकार प्रशंसा और नैहर की महानता से आरम्भ कर वहीं पर समाप्त भी किया। सीता को अपने साँवरे पर रीझना ही था।
°°° तीनों प्राणी घनघोर वन की ओर चल पड़े। आगे उन मुनियों, महात्माओं व ब्राह्मणों की अस्थियाँ उनकी प्रतीक्षा में थीं जिन्हें दुरात्मा राक्षस रावण ने अन्तिम संस्कार तक से वञ्चित कर दिया था...
... आगे वह काल भी प्रतीक्षा में था जब राक्षसों हेतु भी न्याय भाव रखने वाली विदेहकन्या वैदेही का अपमान भरा अपहरण होने वाला था। आगे रावण का काल भी प्रतीक्षा में था।
दुर्गम वन में तीनों मूर्ति जायें तो जायें, मैं तो तुलसी बाबा के संग ताली बजाते गा रहा हूँ -
आगे राम लखन बने पाछे
तापस भेस बिराजत काछे
उभय बीच सिय सोहति कैसे
ब्रह्म जीव बिच माया जैसे
... kids, so replied and acted the future king of Vasundharā.
॥जय श्रीराम॥

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

Ramayan Notes रामायण वार्त्तिक - २

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गदहा रावण 
राक्षसो रावणो मूर्खो। खर अर्थात गदहे से रावण का सम्बन्ध है। काश्मीर तन्त्र के विद्वान रावण को नाम व लक्षण साम्यता के आधार पर राक्षस रावण बना दिया गया प्रतीत होता है - लगे हाथ खरानना देवी कुलदेवी भी हो गयीं उसकी, ससुराल भी, वहीं बसते उसके श्रीमाली वंशज भी।
भारत कथा प्रधान देश है और उत्तर भारत मनोरञ्जन प्रधान, कोढ़ में खाज। नाम साम्यता के आधार पर ही पुराणियों ने शान्ता को राम की बहन घोषित कर दिया।
पाणिनि खर/खारी जाति का उल्लेख किये हैं। खर और आनणा जाटों के गोत्र हैं। खर+आनणा का भी खरानना हुआ हो सकता है। योद्धा जातियाँ थी हीं।
राक्षस रावण के यहाँ अश्व उतने सुलभ नहीं थे। सीताहरण व युद्ध में भी उसने खर जुते रथ का प्रयोग किया। युद्ध गहन होने पर अश्व भी जोते गये। (मार्क्सवादी जन अश्व को ass बनाने में विशेष प्रवीण होते हैं, राक्षस रावण भी वाममार्गी ही था। वाम अर्थात सामान्य से विपरीत रीति। )
वाल्मीकि जी राक्षस रावण के रथ हेतु बताते हैं कि चीपों चीपों करते गधे तो जुते ही थे, पहियों की ध्वनि भी गधों की ही भाँति थी - खरश्वन!
मय का दामाद बना दिये गये राक्षस रावण हेतु अब कोई यह स्वीकार नहीं करेगा कि उसकी तकनीकी बहुत आदिम थी जो लकड़ी के पहियों व धुरों की रगड़ की ध्वनि पर भी विराम नहीं लगा सकती थी। उच्च तकनीकी का पुष्पक तो उसने कुबेर से छीना था।
आज जिस प्रकार पाकिस्तान परमाणु आयुध सम्पन्न है, वैसे ही तब लंका रही होगी। लाहौर, कराँची आदि के समृद्ध क्षेत्रों में जिस प्रकार आज भी खच्चर जुते रथ दौड़ते हैं, उसी प्रकार त्रिकूट से सुन्दर पहाड़ी तक खररथ दौड़ते रहे होंगे। कुल मिला कर हर प्रकार से लंका आज के पाकिस्तान समान ही रही होगी, रावण इमरान समान व राक्षस मोहमदी जनता समान।
सावधानीपूर्वक पढ़ने पर सकल रूप में लंका वह देश लगती है जिसे आजकल rogue state कहते हैं, जबर की जबरी खूब चलती रही होगी।
लंका में मुर्गी-पालन भी होता रहा होगा। भैंसा भात के साथ रावण ऑमलेट भी खाता रहा हो तो आश्चर्य नहीं। ऐसा मनई वेद तो पढ़ने से रहा। वह वेदपारग नहीं था, वेदपाठी ब्रह्मराक्षस अवश्य उसके यहाँ रहते रहे होंगे। बिना ज्ञान के विधान थोड़े चलता है! पाकिस्तान में भी ज्ञानी होते ही होंगे।
कुल मिला कर भौकाल ही बचा था उसका, जब परायी नार हर लाया। सहमा भी हुआ था। उसके विरुद्ध सब ने राम को सहयोग दिया, समुद्र तटनायक, इन्द्र, वैनतेय, गीध, वानरादि जातियाँ सभी। सभी के भीतर इतनी पीड़ा सञ्चित थी कि अवसर मिलते ही....
हाँ, रावण ब्राह्मण नहीं था।
॥हरिः ॐ॥
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परिष्पन्द
इस शब्द का अर्थ होता है, समूह में नियम व व्यूहबद्ध हो एक साथ वाहनों पर चलना। ट्रेन हेतु भी इसका प्रयोग हो सकता है।
सार्थवाह (वैश्य यात्रायें) व युद्ध में (अङ्गरक्षक टुकड़ी के साथ मुख्य योद्धा) में परिष्पन्द का प्रयोग होता रहा है। कुबेर बहुत धनी, यक्ष दिक्पाल थे। युद्ध कर के तो धनी होने से रहे तथा मोहमदी लूटमार का कोई प्रमाण नहीं। वे मूल्यवान वस्तुओं के व्यापारी गण के प्रमुख रहे होंगे जो परिष्पन्द में चलते होंगे। मरुस्थली मोहमदियों की भाँति ही उन पर आक्रमण कर कर रावण ने लूटा होगा तथा अन्ततः दुर्गम कैलास क्षेत्र में सिमटने को विवश कर दिया होगा। कुबेर की परिष्पन्द तकनीक ही उसने अपना ली होगी, परिष्पन्द से पुष्पक हुआ होगा। अनुमान ही है।
नितान्त भौतिक स्तर पर विचारने पर लगता है कि रावण वध पश्चात राम वानर भालुओं की परिष्पन्द सुरक्षा में अयोध्या लौटे होंगे। रावण का एक पूरा लूट व भोग का तन्त्र था, वैसी सुरक्षा आवश्यक रही होगी। विचारने पर यह भी ठीक लगता है कि विजयादशमी के दिन रावण मरा होगा, आश्विन में तथा थल मार्ग से राम चैत्र में अयोध्या पहुँचे होंगे। द्रुतगति वाले आञ्जनेय को किञ्चित पहले राम भेज दिये होंगे।
दीपावली राम से भी बहुत पुरातन पर्व है। महान मर्यादा पुरुषोत्तम के सम्मान में उस वर्ष अनूठे व नवोन्मेषी ढंग से मनाई गई हो तो आश्चर्य नहीं!
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श्रीराम अयोध्या में नौ हजार वानरों के परिष्पन्द, व्यूह संरक्षण में लौटे थे, पुष्पक विमान अनुमान। वे सभी वानर राज्याभिषेक पूर्व श्रीराम की शोभायात्रा में नौ हजार हाथियों पर आरूढ़ हो सम्मिलित हुये थे। विष्णु के चक्र से जो चक्रव्यूह है, वही उनके करस्थ पद्म से पद्मव्यूह के नाम से भी जाना जाता है। पद्मपुष्प से पुष्पक व्यूह रहा होगा जिसका ज्ञान यक्षों को था तथा जिनसे राक्षसों ने वह विद्या छीन ली रही होगी। रामायण काल में पद्मव्यूह में नौ हजार योद्धा लगते होंगे। पुष्पक विमान को सात स्तरों वाला बताया गया है, पुष्पव्यूह में भी सात द्वार होते हैं। सात स्तरीय भवन भी विमान कहलाता है। ... नवनागसहस्राणि ययुरास्थाय वानराः मानुषन् विग्रहन् कृत्वा सर्वाभरणभूषिताः
...
रामायण आख्यान अति प्राचीन है तथा रामायण काव्य में अनेक भाषिक स्तर हैं। इस कारण ही भाषिक या अन्य आधुनिक विधियोंं से मैं राम के काल निर्धारण को शक्य नहीं मानता। महाभारत का कर लें तो कर लें, रामायण का असम्भव है।
पतङ्ग शब्द को लें, जिसका अर्थ उड़ने से है। आकाश में सूर्य उड़ता हुआ प्रतीत होता है अत: पक्षियों की भाँति ही पतङ्ग कहलाता है। इस शब्द की धातु से ही पतन शब्द बना है, गिरना या डूबते जाना। कहाँ उड़ना, कहाँ गिरना, मूल धातु एक।
रामायण में सागरसन्तरण व आकाशचारण को एक ही भाँति दर्शाया गया है। वाल्मीकि की काव्य कला के इस पक्ष पर सम्भवत: लोगों का ध्यान ही नहीं गया है कि किस प्रकार आञ्जनेय के अभियान में दोनोंं एक हो गये हैं!
उड़ना वेग से सम्बंधित है, निर्बाध गति से। पुरातन काल में जलमार्ग से यात्रा की गति थल मार्ग की तुलना में अति तीव्र होती थी। व्यापार व सैन्य अभियान जहाँ शक्य हो, जलमार्ग से ही होते थे।
दक्षिण से किष्किन्धा होते हुये अयोध्या तक नदियों के जाल को देखें। श्रीराम ने लौटते समय अधिकतर जल पर तैरते व्यूह पुष्पक विमान का ही प्रयोग किया होगा, ऐसी सैन्य व्यूह रचना जो पानी पर पुष्प की भाँति तैरती दिखे। विमान का तीव्र गति से तैरना उसका उड़ना था जिस प्रकार मारुति का सागर सन्तरण चट्टानों से उछलते मानो आकाश में उड़ते एवंं तैरते पूरा हुआ था।
इस भाषिक अनूठेपन के कारण भी रामायण बहुत प्राचीन रचना सिद्ध होती है, भले उसका परिष्कार आगामी शताब्दियों में किया जाता रहा हो।
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युद्धकाण्ड में ही राज्याभिषेक पश्चात श्रीराम द्वारा पुत्रों एवं बंधुओं के साथ दस हजार वर्षदिन राज्य करना बताया गया है -
राघवश्चापि धर्मात्मा प्राप्य राज्यमनुत्तमम्
ईजे बहुविधैर्यज्ञैः ससुतभ्रातृबान्धवः

सीतात्याग का कहींं उल्लेख नहीं, समापन तक। यदि ऐसा कुछ हुआ होता तो इतनी महत्वपूर्ण बात को पुत्रों सहित राज्य करना बताने से पूर्व अवश्य लिखा जाता।
राम नाम/कथा की महिमा भी है -
निरामया विशोकाश्च रामे राज्यं प्रशासति
रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः
नित्यपुष्पा नित्यफलास्तरवः स्कन्धविस्तृताः
कालवर्षी च पर्जन्यः सुखस्पर्शश्च मारुतः
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा लोभविवर्जिताः

॥इति॥
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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

Ramayan Notes रामायण वार्त्तिक - १

माता कौसल्या का औषधि ज्ञान
इक्ष्वाकु हों या अन्य, क्षत्राणियाँ भिषग विद्या में पारङ्गत होती थीं। क्षत होने पर प्राथमिक चिकित्सा करने में कुशल, जड़ी बूटियों की ज्ञाता।
कौसल्या तो अथर्वण विदुषी थीं। जिस विशल्यकरणी औषधि का उल्लेख युद्ध में क्षत विक्षत राम लक्ष्मण को स्वस्थ करने हेतु हुआ है, उसे देवी कौसल्या ने वनगमन के पूर्व राम के हाथों में मन्त्र पढ़ते हुये रक्षासूत्र में पिरो कर बाँधा था -
इति पुत्रस्य शेषाश्च कृत्वा शिरसि भामिनी, गन्धांश्चापि समालभ्य राममायतलोचना 
ओषधीम् च अपि सिद्ध अर्थाम् विशल्यकरणीम् शुभाम्, चकार रक्षाम् कौसल्या मन्त्रैः अभिजजाप च

(वसागोलकों से पूछ कर देखें, उत्तर मिलेगा कि स्त्री को वेद का अधिकार नहीं है।)
कविहृदय लक्ष्मण
लक्ष्मण कविहृदय थे। उन्होंने अद्भुत ऋतुवर्णन किये हैं । 
[क्या आप को उनके इस गुण से किसी वसागोलक कथावाचक ने कभी परिचय कराया? कथावाचक आप को १४ वर्ष न सोने का गल्प सुनायेगा, लक्ष्मणरेखा बतायेगा, शबरी के जूठे बेरों पर मुँह बिचकाना बतायेगा और हास्यास्पद रूप में उग्रता भी। कथावाचकों ने समस्त इतिहास की निर्मम हत्या करुणा व प्रेम के आँसू बहाते हुये कर दी! यही सच है।]
'कवि' लक्ष्मण का हेमंत ऋतु वर्णन -
अयम् स कालः संप्राप्तः प्रियो यः ते प्रियंवद
 अलंकृत इव आभाति येन संवत्सरः शुभः
नीहार परुषो लोकः पृथिवी सस्य मालिनी
जलानि अनुपभोग्यानि सुभगो हव्यवाहनः
नव आग्रयण पूजाभिर्भ्यर्च्य पितृ देवताः
कृत आग्रयणकाः काले सन्तो विगत कल्मषाः
प्राज्यकामा जनपदाः संपन्नतर गो रसाः
विचरन्ति महीपाला यात्र अर्थम् विजिगीषवः
सेवमाने दृढम् सूर्ये दिशमन्तक सेविताम्
विहीन तिलका इव स्त्री न उत्तरा दिक् प्रकाशते
प्रकृत्या हिम कोश आढ्यो दूर सूर्याः च सांप्रतम्
यथार्थ नामा सुव्यक्तम् हिमवान् हिमवान् गिरिः
अत्यन्त सुख संचारा मध्याह्ने स्पर्शतः सुखाः
दिवसाः सुभग आदित्या: छ्हाया सलिल दुर्भगाः
मृदु सूर्याः सनीहाराः पटु शीताः समारुताः
शून्य अरण्या हिम ध्वस्ता दिवसा भान्ति सांप्रतम्
निवृत्त आकाश शयनाः पुष्यनीता हिम अरुणाः
शीता वृद्धतर आयामः त्रि यामा यान्ति सांप्रतम्
रवि संक्रान्त सौभाग्यः तुषार अरुण मण्डलः
निःश्वास अन्ध इव आदर्शाः चंद्रमा न प्रकाशते
ज्योत्स्ना तुषार मलिना पौर्णमास्याम् न राजते
सीता इव च आतप श्यामा लक्ष्यते न तु शोभते
प्रकृत्या शीतल स्पर्शो हिमविद्धाः च सांप्रतम्
प्रवाति पश्चिमो वायुः काले द्वि गुण शीतलः
बाष्पच्छ्हन्नानि अरण्यानि यव गोधूमवंति च
शोभन्ते अभ्युदिते सूर्ये नदद्भिः क्रौञ्च सारसैः
खर्जूर पुष्प आकृतिभिः शिरोभिः पूर्ण तण्डुलैः
शोभन्ते किंचिद् आलंबाः शालयः कनक प्रभाः
मयूखैः उपसर्पद्भिः हिम नीहार संवृतैः
दूरम् अभ्युदितः सूर्यः शशांक इव लक्ष्यते
अग्राह्य वीर्यः पूर्वाह्णे मध्याह्ने स्पर्शतः सुखः
संरक्तः किंचिद् आपाण्डुः आतपः शोभते क्षितौ
अवश्याय निपातेन किंचित् प्रक्लिन्न शाद्वला
वनानाम् शोभते भूमिर् निविष्ट तरुण आतपा
स्पृशन् तु सुविपुलम् शीतम् उदकम् द्विरदः सुखम्
अत्यन्त तृषितो वन्यः प्रतिसंहरते करम्
एते हि समुपासीना विहगा जलचारिणः
न अवगाहन्ति सलिलम् अप्रगल्भा इव आवहम्
अवश्याय तमो नद्धा नीहार तमसा आवृताः
प्रसुप्ता इव लक्ष्यन्ते विपुष्पा वन राजयः
बाष्प संचन्न सलिला रुत विज्ञेय सारसाः
हिमार्द्र वालुकैः तीरैः सरितो भान्ति सांप्रतम्
तुषार पतनात् चैव मृदुत्वात् भास्करस्य च
शैत्यात् अग अग्रस्थम् अपि प्रायेण रसवत् जलम्
जरा जर्जरितैः पत्रैः शीर्ण केसर कर्णिकैः
नाल शेषा हिम ध्वस्ता न भान्ति कमलाकराः

पञ्चवटी में जब भैया भाभी को स्नान कराने हेतु लक्ष्मण ले जाते हैं तो नदी किनारे यह वर्णन राम से करते हैं।
[विश्वामित्र का गाथा गायक गाथिन कुल हो, इक्ष्वाकुओं की घुमंतू कुशीलव गायन परम्परा हो, कुरुओं के सूत गायक हों या सहस्र वर्ष पीछे परमारों के यशगायक पँवरिये; क्षत्रियों का काव्य से प्रेम उतना ही प्रबल रहा जितना आन्विक्षिकी व ब्रह्मविद्या से। कालप्रवाह में सब समाप्त हो गया। कान्यकुब्जाधिपति महाराज जयचंद्र के यश को धूमिल करने वाला गल्पी चंद्रबरदाई चारण उस विकृत होती परम्परा का एक उदाहरण है।]
लक्ष्मण का भरत प्रेम  
लक्ष्मण कहते हैं, भैया! आप से दूर हैं भरत, राज करना था उन्हें किंतु आप ही के समान समस्त भोगों को त्याग नियताहारी तापस व्रत अपनाये हुये हैं।
आह, वे कोमल श्यामवदन कैसे हेमंत की शीत में सरयू के शीतल जल में रात रहते ही स्नान करते होंंगे, कैसे इस शीत में भुँइया सोते होंगे! ...
... हेमन्त का वर्णन करते करते कविहृदय लक्ष्मण का ध्यान दूर अपने तापस भ्राता भरत पर चला गया। शब्दप्रयोग देखेंं- शेते शीते महीतले! अंतर का दाह हृदय चीर कर शीत की ठिठुरन भरता चला जाता है!
अस्मिन् तु पुरुषव्याघ्र काले दुःख समन्वितः 
तपश्चरति धर्मात्मा त्वत् भक्त्या भरतः पुरे
त्यक्त्वा राज्यम् च मानम् च भोगांश्च विविधान् बहून्
तपस्वी नियताहारः शेते शीते महीतले
सोऽपि वेलाम् इमाम् नूनम् अभिषेक अर्थम् उद्यतः
वृतः प्रकृतिभिर् नित्यम् प्रयाति सरयूम् नदीम्
अत्यन्त सुख संवृद्धः सुकुमारो हिमार्दितः
कथम् तु अपर रात्रेषु सरयूम् अवगाहते
पद्मपत्रेक्षणः श्यामः श्रीमान् निरुदरो महान्
धर्मज्ञः सत्यवादी च ह्री निषेधो जितेन्द्रियः
प्रियाभिभाषी मधुरो दीर्घबाहुः अरिन्दमः
संत्यज्य विविधान् भोगान् आर्यम् सर्वात्मना आश्रितः
जितः स्वर्गः तव भ्रात्रा भरतेन महात्मना
वनस्थम् अपि तापस्ये यः त्वाम् अनुविधीयते

कहते कहते माता कैकेयी के लिये लक्ष्मण कटु हो जाते हैं - कथम् नु सा अम्बा कैकेयी तादृशी क्रूरदर्शिनी! 
तब राम की प्रशांत वाणी फूट पड़ती है -
न ते अम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या कथञ्चन
ताम् एव इक्ष्वाकु नाथस्य भरतस्य कथाम् कुरु

[और मुझे कुरुक्षेत्र में अर्जुन मोह का प्रबोधन करते कृष्ण दिखने लगते हैं - कुत: त्वा कश्मलम्‌ इदम्‌ विषमे समुपस्थितम्‌ ! इतना मनोविज्ञान भरा पड़ा है किंतु कोई कथावाचक नहीं सुनायेगा, कदापि नहीं!]
अंगद अभियान
राजनीतिक दृष्टि से अंगद को भेजना उपयुक्त था - एक राजकुमार का सन्देश ले दूसरा राजकुमार तीसरे राजा के यहाँ औपचारिक रूप से भेजा गया। राम ने राजमर्यादा का पालन किया। साथ ही अङ्गद का दौत्य युद्धपूर्व मनोवैज्ञानिक आक्रमण भी था।
राम के सन्देश में रावण को सुनाया गया - वरदान बहुत हो गया, तुम्हें मार कर अब महर्षियों व राजर्षियों की गति दूँगा। मेरी पत्नी का हरण कर तुमने काल को आमन्त्रित किया है, उसे नहीं लौटाने पर मैं लङ्का को अराक्षस बना दूँगा और विभीषण भावी राजा होंगे।
संकेत था कि अभी भी जो टूट कर आना चाहते हैं, आ जायें। अपनी शक्ति व बल विश्वास दर्शा शत्रु में भय व्याप्त करना था, हुआ भी वही।
गृह्यताम् एष दुर्मेधा वध्यताम् - पकड़ो इस दुर्बुद्धि को एवं मार डालो, रावण ने अंगद हेतु यही निर्णय सुनाया।अंगद ने जानबूझकर पहले तो स्वयं को चार राक्षसों द्वारा पकड़वाया और तब उन्हें झटकते हुये कूद कर प्रासाद के शिखर पर चढ़ कर उसे ध्वस्त कर दिया। राजा का मानमर्दन तो था ही, एक वानर ने अकेले कर दिया, शक्ति प्रदर्शन भी था।
राघव द्वारा अपने शर की परीक्षा भी हो गई कि दुरात्मा रावण तो वालि का मित्र भी था, यदि अपने पिता के वध के कारण अंगद के मन में कोई चोर रह गया हो तो वहाँ भेजने का निर्णय सब प्रकट कर देता। क्रोधवश रावण ने कोई प्रयास ही नहीं किया, एक अन्य वानर हनुमान द्वारा पहले की गयी दुर्गति ध्यान में रही होगी।
अंगद लौट आये। विपुल वानर सैन्य से घिरी लंका के आतंकित निवासियों की चीख पुकार ने सिद्ध कर दिया कि राघव का अमोघ शर इस बार भी लक्ष्यसिद्ध हो लौटा।

कुम्भकर्ण उपदेश 
सुषुप्तस्त्वम् न जानीषे मम रामकृतम् भयम्, तुम सोये रहे और जाने ही नहीं कि राम ने मुझे भयाक्रांत कर रखा है!  रावण बोला -
एष दाशरथी रामः सुग्रीवसहितो बली
समुद्रम् लङ्घयित्वा तु कुलम् नः परिकृन्तति

यह बलवान दाशरथि राम सुग्रीव के साथ समुद्र लाँघ कर आ पहुँचा है और हमारे कुल के विनाश में लगा है।
सेतु मार्ग से आये वानरों की अगाध राशि द्वारा लङ्का के वन उपवन आच्छादित हो गये हैं - सेतुना सुखमागत्य वानरैकार्णवम् कृतम्। उन्होंने युद्ध में मुख्य मुख्य राक्षसों को मार डाला है - ये राक्षसा मुख्यतमा हतास्ते वानरैर्युधि। लंका में केवल बाल वृद्ध बचे हैं - लङ्काम् बालवृद्धावशेषिताम्। पूरा राजकोश रिक्त हो गया है - सर्वक्षपितकोशम् (आर्थिक चोट)...
... कितना आतङ्कित है न रावण!
[यही डर, यही भय आजकल के सिंगल सोर्स राक्षसों में भी होना चाहिये किंतु ....]
कुम्भकर्ण ने सुना और अट्टहास कर उठा - प्रजहास च। उसने ध्यान दिलाया कि पहले तुम्हारे कुकर्म के परिणाम की जो चेतावनियाँ दी गई थीं, वे आन पड़ीं। आगे कुम्भकर्ण ने राजनीति का जो उपदेश दिया है, अद्भुत है। कुछ श्लोक देखें -
अनभिज्ज़्नाय शास्त्रार्थान् पुरुषाः पशुबुद्धयः
प्रागल्भ्याद्वक्त्मिच्छिन्ति मन्त्रेष्वभ्यन्तरीकृताः
अशास्त्रविदुषाम् तेषाम् कार्यम् नाभिहितं वचः
अर्थशास्त्रानभिज्ञानाम् विपुलाम् श्रियमिच्छताम्
अहितम् च हिताकारम् धार्ष्ट्याज्जल्पन्ति ये नराः
अवश्यम् मन्त्रबाह्यास्ते कर्तव्याः कृत्यदूषकाः
विनाशयन्तो भर्तारम् सहिताः शत्रुभिर्बुधैः
विपरीतानि कृत्यानि कारयन्तीह मन्त्रिणः
तान् भर्ता मित्रसम्काशानमित्रान् मन्त्रनिर्णये
व्यवहारेण जानीयात्सचिवानुपसम्हितान्
चपलस्येह कृत्यानि सहसानुप्रधावतः
चिद्रमन्ये प्रपद्यन्ते क्रौञ्चस्य खमिव द्विजाः
यो हि शत्रुमवज्ञाय नात्मानमभिरक्षति
अवाप्नोति हि सोऽनर्थान् स्थानाच्च व्यवरोप्यते

[अन्योक्तियों के प्रयोग द्वारा कुम्भकर्ण ने रावण को बहुत गरियाया है - पशुबुद्धि आदि।]

राघवों की मूर्च्छा और हनुमान के सञ्जीवनी अभियान 
जब दोनों भाइयों सहित समस्त वानरसेना आहत मूर्च्छित पड़ी थी, तब जाम्बवान ने हनुमान को औषधियों का नाम बता कर लाने को भेजा। 
श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं तथापि व्यथितेन्द्रियः
पुनर्जातमिवात्मानं स मेने ऋक्षपुङ्गवः
...
ऋक्षवानरवीराणामनीकानि प्रहर्षय
विशल्यौ कुरु चाप्येतौ सादितौ रामलक्ष्मणौ
...
मृतसञ्जीवनीं चैव विशल्यकरणीम् अपि
सौवर्णकरणीं चैव सन्धानीं च महौषधीम्

लक्ष्मण भूमि पर पड़े थे, राघव राम ने विलाप करते हुये तीनों माताओं का नाम लिया कि मैं उन्हें क्या मुख दिखाऊँगा?
उपालम्भं न शक्ष्यामि सोढुं दत्तं सुमित्रया
किं नु वक्ष्यामि कौसल्यां मातरं किं नु कैकयीम्

...
सुषेण वानर सेना के यूथप थे, राक्षस लङ्का से अपहृत वैद्य नहीं।
एवमुक्तः स रामेण महात्मा हरियूथपः
लक्ष्मणाय ददौ नस्तः सुषेणः परमौषधम्

पर्वतों में नगाधिराज हिमालय की बड़ी प्रतिष्ठा रही। पौराणिक परम्परा में मेरु की रही। दक्षिण में आज भी संकल्प में मेरोः दक्षिणे पार्श्वे बोला जाता है। यह मेरु विराट भारत की भौगोलिक प्रसार व उसके केन्द्र का कूट है।
रामायण लोककाव्य भी रहा। घुमन्तू कुशीलव गायकों ने उस पर्वत को भी हिमालय बना दिया जहाँ से हनुमान औषधियाँ लाये थे।
सागर संतरण जैसे महान अभियान के कारण मारुति हनुमान के प्रति विशेष आदर व नायकप्रतिष्ठा का भाव बढ़ता चला गया जिसकी परिणति उनके दैवीय निरूपण में हुई। वाल्मीकीय रामायण में उनके द्वारा दो बार औषधियों हेतु पर्वत पर जाने की बात है। एक बार तब जब राम और लक्ष्मण, दोनों भाई मूर्च्छित होते हैं, दूसरी बार जब केवल लक्ष्मण।
आश्चर्य है कि दोनों बार वह औषधियों का अभिज्ञान नहीं कर पाते जबकि होना यह चाहिये कि एक समान औषधियों के होने पर दूसरी बार अभिज्ञान करने में उन्हें सक्षम हो जाना चाहिये। वास्तविकता यह है कि पहली बार जो उन्हें हिमालय पर गया बताया गया है, वह अतिशयोक्ति है। सागर संतरण में ही उन्हें बहुत समय लग गया था जबकि लंका से तो हिमालय बहुत दूर है तथा वहाँ तक पहुँच कर लौटने में जो समय लगता, वह दोनों भाइयों एवंं सैन्य हेतु घातक होता। जैसा कि महाभारत के रामोपाख्यान में एवं रामायण में ही दूसरी बार के समय संकेत है, वह कोई बहुत दूर नहीं गये थे। पहली बार की यात्रा को सागर संतरण के समान ही काव्य युक्तियों से दैवीय बना दिया गया है।
यही स्थिति लंकादहन की भी है। जब दोनों भाई मूर्च्छित थे, तब लंकादहन का एक प्रसंग मिलता है जोकि स्वाभाविक है कि सेना थी, परिस्थितियाँ वैसी थीं, विविध यूथप थे, लंकादहन सामान्य था। हनुमान द्वारा लंकादहन में भी अतिशयोक्तियाँ हैं। यहाँ तक कह दिया गया है कि विभीषण का प्रासाद छोड़ उन्होंंने अन्य सभी राक्षसों के घर जला दिये मानो उन घरों पर नामपट्टिकायें लगी थीं! रामायण विविध स्तरों में परिवर्द्धित हुआ तथा उनके इसी प्रकार अंत:प्रमाण मिलते जाते हैं। सुंदरकाण्ड में तो चालिस के लगभग श्लोकों को चमत्कारपूर्ण वर्णन को स्थान देने हेतु यथावत दुहरा दिया गया है!
औषधियों को लाने जाने हेतु हनुमान की छलांग कोई बहुत लम्बी नहीं है, न कालनेमि है, न भरत द्वारा हनुमान पर प्रहार। हनुमान उचक कर मात्र एक श्लोक में वहाँ पहुँच जाते हैं। उस शैल का नाम था - ओषधिपर्वत। ऐसा पर्वत जहाँ औषधियों का प्राचुर्य था।
सौम्य शीघ्रमितो गत्वा शैलमोषधिपर्वतम्
पूर्वन् हि कथितो योअसौ वीर जाम्बवता शुभः
दक्षिणे शिखरे तस्य जातामोषधिमानय
विशल्यकरणी नाम विशल्यकरणीन् शुभाम्
संजीवकरणीं वीर संधानीं च महौषधीम्
संजीवनार्थं वीरस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः
इत्येवमुक्तो हनुमान्गत्वा चौषधिपर्वतम्
चिन्तामभ्यगमच्छ्रीमानजानंस्ता महौषधीः



शब्दविशारद यूथपति डॉक्टर सुषेण द्वारा लक्ष्मण का चिकित्सकीय परीक्षण
(देहलक्षण व मनोविज्ञान, बंधु का self-suggestion द्वारा प्रबोधन) 
राममेवं ब्रुवाणं तु शोकव्याकुलितेन्द्रियम् 
आश्वासयन्नुवाचेदं सुषेणः परमं वचः
शोक से व्याकुलइंद्रिय हुये राम को आश्वस्त करते हुये सुषेण ने कहा -
त्यजेमां नरशार्दूल बुद्धिं वैक्लब्यकारिणीम्
शोकसंजननीं चिन्तां तुल्यां बाणैश्चमूमुखे

हे नरसिंह! बुद्धि पर क्लैब्यता लाने वाली इस चिंता का त्याग करें जो शोक की कारक है तथा युद्ध में बाण के समान ही घातक है।
[अब शब्द प्रयोगके साथ देखें]
नैव पञ्चत्वमापन्नो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः
नह्यस्य विकृतं वक्त्रं न च श्यामत्वमागतम्

पञ्चत्वम्‌ उसे कहा जिसमें आप की देह के पाँच तत्त्व अपने मूल में लीन हो जायें - मृत्यु। लक्ष्मिवर्धन कहा कि लक्ष्मण तो जीवनशक्ति को बढ़ाने वाले हैं। [एक अन्य निरूपण सीता को लक्ष्मी का रूप मान कर हो सकता है। वन में रहते हुये लक्ष्मण ने सीता की सेवकाई की थी, वे नहीं रहते तो सीता हेतु वन बहुत दुष्कर होता]
लक्ष्मण की मृत्यु नहीं हुई है, उनका रूप विकृत नहीं हुआ है, न ही उसमें मृत्युजनित कालिमा है।
सुप्रभन् च प्रसन्नं च मुखमस्याभिलक्ष्यते 
पद्मरक्ततलौ हस्तौ सुप्रसन्ने च लोचने
[सब ने वह स्तोत्र तो सुना ही होगा - प्रसन्नवदना सौभाग्यं ... । लक्ष्मी का एक नाम है रम्य मुख वाली। पहले लक्ष्मिवर्धन कहा, अब प्रसन्नं च कहते हैं]उनके मुख पर कांति है, वह रम्य है। पञ्जे कमलदल के समान आरक्त हैं (उनका वर्ण मलिन नहीं हुआ) और आँखें भी सुप्रसन्न हैं।
नेदृशं दृश्यते रूपं गतासूनां विशां पते
विषादं मा कृथा वीर सप्राणोऽयमरिंदम
[गतासून शब्द का प्रयोग देखें कि भगवद्गीता में भी भगवान कहते हैं - गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति। मृत्यु हेतु यह शब्द प्रयुक्त । राम 'विशां पते' हैं। विश्‌ बहुत पुराना शब्द है, जब जनसाधारण को विश्‌ कहा जाता था। वैश्य इसी से है। आरम्भ में समस्त जन वैश्य, उनमें से रक्षा हेतु निकले राजन्य क्षत्रिय और जटिल होते समाज व राजकर्म को दिशा देने हेतु हुये ब्राह्मण। श्रुति इसी को संकेतरूप में कहती है, ऋग्वेद से वैश्य, यजुर्वेद से क्षत्रिय और सामवेद से ब्राह्मण। साम बहुत ही विकसित व सूक्ष्म दशा है, जब केवल वाणी से ही नियन्त्रण व दिशा का बोध कराया जा सके। अस्तु। तो विश्‌ कहते हैं प्रजा को, प्रजा कहते हैं संतान को, राम को कौसल्या-सु-प्रजा कहा गया है। राजा हेतु समस्त प्रजा संतान की भाँति होती है। विशाम्‌ पते प्रजा को संतान के समान समझने वाला प्रजा का पति अर्थात राजा। राम को इस सम्बोधन द्वारा सुषेण उनके कंधों पर महत दायित्व का बोध कराते हैं।]हे राजन्, मृतक का रूप ऐसा नहीं दिखता।
हे अरिंदम अर्थात शत्रुओं का दमन करने वाले (पुन: एक वैद्य का मनोवैज्ञानिक संकेत कि अभी तो शत्रु बचे हुये हैं, ऐसी दशा को प्राप्त होंगे तो उनका दमन कैसे करेंगे?) लक्ष्मण प्राणयुक्त हैं। आप विषाद न करें। विषाद वह अवस्था है जब आप का नियंत्रण समाप्त हो जाता है। यह सामान्य दु:ख नहीं है। इस शब्द का प्रयोग भी संकेतक है।
आख्याति तु प्रसुप्तस्य स्रस्तगात्रस्य भूतले
सोच्छ्वासं हृदयं वीर कम्पमानं मुहुर्मुहुः

[इतना कहने के पश्चात चिकित्सक स्पष्ट लक्षणों की बात करता है। आख्यातो शब्द पर ध्यान दें, आज भी उत्तरप्रदेश में सरकारी शब्दावली का अङ्ग है - जाँच कर अपनी आख्या प्रस्तुत करें। आख्यान होता है आँखों देखी कहना, साक्षी हो कर कहना। रामायण और महाभारत आख्यान कहे गये, किसी अन्य शास्त्र को यह पद नहीं दिया है, इस कारण ही ये इतिहास हैं - इति ह आस - ऐसा ही हुआ!]
भूमि पर पड़े प्रसुप्त वीर लक्ष्मण की हृदय की मुहुर्मुह अर्थात रह रह होने वाली धुकधुक और स+उत्‌+श्वास = सोच्छवास, आती जाती साँसें अपनी आख्या प्रस्तुत कर रही हैं [कि लक्ष्मण अभी भी लक्ष्मीवर्द्धन हैं, जीवित हैं।]
सुषेण ने मृत्यु शब्द का प्रयोग तक नहीं किया।
[विचार करें कि यहाँ तो शुभ कहना था कि आहत को कुछ नहीं हुआ, तब देश, काल व परिस्थिति को देखते हुये शब्दों पर इतना ध्यान है, अशुभ समाचार सुनाते समय चिकित्सक डॉक्टर किस प्रकार की मानसिक दशा में होते होंगे! डॉक्टरों का सम्मान न करें, न हो पाये तो कटु न बोलें, अपमान न करें।
थूकने व मारने पीटने का निषेध नहीं कर रहा क्योंकि वैसा तो मुसलमान करते हैं, मनुष्य सोच भी नहीं सकते!]
केवल अनुवाद में बात बहुत ही सपाट हो जाती न? मूल शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। संस्कृत का प्राथमिक ज्ञान प्रत्येक सनातनी हेतु आवश्यक है। सीखें।
यज्ञ परम्परा और जाली उत्तरकाण्ड 
रामायण का अंतिम युद्धकाण्ड श्रीराम द्वारा अनेक पौण्डरीक, वाजपेय, अश्वमेध एवं अन्य यज्ञों के किये जाने की सूचना देता है जिनमें अश्वमेधों की संख्या सौ है। युद्धकाण्ड में राजसूय करने का नाम से उल्लेख नहीं मिलता।
ध्यातव्य है कि आधुनिक काल में भी ये यज्ञ विविध श्रोत्रियों एवं यजमानों द्वारा सम्पन्न किये जाते रहे हैं। राजसूय कोई नहीं करता।
राजसूय का लिखित प्रमाण युधिष्ठिर से लेकर कन्नौजाधिपति जयचंद्र तक मिलता है। अश्वमेध आदि के भी प्रमाण बिखरे पड़े हैं।
जाली उत्तरकाण्ड में श्रीराम राजसूय करने का प्रस्ताव करते हैं जिसका भरत द्वारा निषेध किया जाता है। वह कारण बताते हैं - राजन्य हानि, पृथिव्यां राजवंशानां विनाशो अर्थात धरती से राजाओं का नाश हो जायेगा।
यह उस पौराणिक अंधविश्वास की प्रतिध्वनि है जिसके अनुसार युधिष्ठिर द्वारा राजसूय किये जाने के कारण ही महाभारत का महाविनाश हुआ।
पुराणों में ही कलियुग में राजसूय सहित अश्वमेधादि का भी निषेध मिलता है जो कि स्पष्टत: अर्वाचीन है। इसके कारण जनमेजय एवं वैशम्पायन के विवाद से जुड़ते हैं जिसमें याज्ञवल्क्य द्वारा शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी) आधारित समांतर यज्ञ परम्परा का आरम्भ व जनमेजय द्वारा उसका समर्थन भी कारक रहे। उत्तर भारत में आज भले वाजसनेयी अधिक मिलेंगे किंतु कभी उन्हें तिरस्कार से देखा जाता था। वाजसनेयियों का उत्कर्ष भार्गवों के अपकर्ष से जुड़ा है। अस्तु।
राजसूय अपेक्षतया नया यज्ञ प्रतीत होता है जो अश्वमेध के विकल्प में किया गया होगा। ध्यातव्य है कि इसमें क्षत्रिय का स्थान ब्राह्मण से ऊँचा होता है।
राजसूय का भरत द्वारा विशेष निषेध यह दर्शाता है कि उत्तरकाण्ड कालांतर में जोड़ा गया। कब जोड़ा गया?
यह प्रश्न शोध की माँग करता है किंतु अनुमानत: इसे उत्तर भारत में वर्द्धनों की शक्ति क्षीण होने के उपरांत जोड़ा गया माना जा सकता है जिसकी पुष्टि उत्तरकाण्ड की भाषा और शब्द भी करते हैं। जयचंद द्वारा शताब्दियों पश्चात राजसूय आयोजन उनकी शक्ति, प्रभाव और समृद्धि को दर्शाता है, साथ ही भाँड़ चंद्रबरदाई द्वारा प्रतिक्रिया में खल चित्रण भी वैसा ही है जैसा श्रीराम के चरित्र को कलंकित करने के लिये उत्तरकाण्ड का प्रणयन।
उत्तरकांडी अश्वमेध आयोजन भी उसके क्षेपक होने की पुष्टि करता है। जहाँ युद्धकाण्ड सौ अश्वमेधों का उल्लेख करता है, वहीं उत्तरक्षेपक में एक अश्वमेध में ही सब काण्ड हो जाते हैं।
अश्वमेध का अश्व श्वेतवर्णी होना चाहिये जिसके मस्तक पर कृष्णकेश चित्ति हो किंतु उत्तरक्षेपक का अश्व पूरे काले रंग का है। यह तथ्य भी किसी अन्य धारा द्वारा इसे जोड़े जाने की ओर संकेत करता है।
[दक्षिण भारत में ऐसे विद्वान मिल जायेंगे जो ब्राह्मणों पर मांसभक्षण निषेध का एक रोचक कारण बताते हैं। उनके अनुसार यज्ञ में मंत्रपूत (प्रोक्षण क्रिया) पशु की बलि का मांस ब्राह्मण ग्रहण करते थे, अन्य नहीं। कलियुग में उन यज्ञों का निषेध होने के कारण उनके द्वारा मांसभक्षण को सामान्य नियम से निषिद्ध कर दिया गया, यज्ञ होंगे ही नहीं तो मांस मिलेगा कैसे? इसकी कड़ी भी वैशम्पायन द्वारा जनमेजय को शापित किये जाने से जुड़ती है। एक बात और ध्यान देने की है, उत्तर भारत में कृष्ण यजुर्वेदियों को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता। यजुर्वेद की पुरातन मूल धारा कृष्ण थी जिसमें मंत्र भाग व ब्राह्मण भाग मिश्रित थे।]

बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

भार्गव वाल्मीकि एवं जातीय गतिशीलता

जातीय गतिशीलता को नहीं समझने से, काल की बृहद परास में घटित की विस्मृति से या उपेक्षा करने से आज कल की बहुत सी समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। भारत तोड़क प्रचार तंत्र की भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका है।
भार्गव कुल एवं संततियाँ नवोन्मेष हेतु जानी जाती हैं। पनही, छाता, आँवा में पकाये मृद्भाण्ड, परशु आदि कुछ ऐसे क्रांतिकारी नवोन्मेष हैं जिनका उन्हें श्रेय है। महाभारत में कुम्भकार का कर्मस्थल 'भार्गवकर्मशाला' कहा गया है। 
गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां; पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ।
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीतौ; भिक्षेत्यथावेदयतां नराग्र्यौ॥
[महाभारत (बड़ौदा संस्करण), ०१.१८२.००१]
भार्गवों ने ही स्मृति, पुराण, आख्यान आदि का पुनर्सम्पादन किया, लुप्तप्राय को पुनर्जीवित किया। वाल्मीकि भी भार्गव थे। यदि अतिप्राचीन एकत्त्व से कोई वर्ग आज कहता है कि वाल्मीकि 'वाल्मीकि समाज' से थे तो उसे आज के परिप्रेक्ष्य में नहीं, सहस्राब्दियों पूर्व के एकत्त्व से समझा जाना चाहिये। क्या यह सम्भव नहीं कि कुछ भार्गवों ने शिल्प व्यवसाय चुना हो तथा उसी में रह गये हों? गोत्र की अवधारणा को ही देखिये, क्या सभी समान गोत्र वाले एक ही पुरुष की संतान हैं या एकसमान गुरु, शिक्षा एवं दीक्षा परम्परा के कारण एक गोत्र के कहलाते हैं?
विविधता एवं विविध घटित की उपेक्षा कर अपेक्षतया नये रूपों की संकीर्णता में देखेंगे तो सामाजिक विघटन ही होगा, संगठन नहीं। सनातन शत्रु यही चाहते हैं। कोई आवश्यक नहीं कि सदैव प्रतिक्रिया दी ही जाय, मौन का अपना महत्त्व है। अध्ययन की परास लम्बी अवश्य होनी चाहिये जिससे कि समझ विकसित हो सके।

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

अरण्यकाण्ड का एक श्लोक : कोयष्टि टिट्टिभ, टिटहरी, कठफोड़वा, कीचक, कीरक

अरण्यकाण्ड का एक श्लोक है:  
कोयष्टिभिश्चार्जुनकैः शतपत्रैश्च कीच(र)कैः। 
एतैश्चान्यैश्च विविधैर्नादितं तद्वनं महत् ॥ 

यह महत्वपूर्ण श्लोक है। पहला अर्द्धांश तोड़ते हैं: 
कोयष्टि+भि / कोयष्टिभि: 
च 
अर्जुनक+ ऐ (मात्रा बहुवचन हेतु) 
शतपत्र + ऐ (मात्रा बहुवचन हेतु) 
कीचक + ऐ (मात्रा बहुवचन हेतु)/ पाठभेद कीरक+ऐ 
... 
संदर्भ है जब पम्पा सरोवर तक पहुँचने से पूर्व राम लक्ष्मण गहन वन प्रांतर में होते हैं जोकि भाँति भाँति के वृक्षों से भरा हुआ है, विविध प्रकार के पक्षियों का कोलाहल है। 
... 
कोयष्टि का अर्थ होता है तन्वी लकड़ी की भाँति शाखा / पाँव वाला। भि: बहुवचन के लिये भी प्रयुक्त हो सकता है एवं संज्ञा का अंग भी हो सकता है। विद्वानों ने दो अर्थ किये - ऐसा वृक्ष जिसकी टहनियाँ बहुत पतली होती हैं, भोजपुरी में कहें तो छरका। 
दूसरा अर्थ टिभि से आया - टिट्टिभि - टिटहरी। इसके स्वर से तो आप परिचित ही होंगे। आजकल सुनाई दे तो कहते हैं सूखा पड़ेगा। गँवई घर की महिलायें सुनते ही आँगन में दो तीन बाल्टी पानी उड़ेल देती हैं - टोटका। 
विविधै: नादितं - विविध प्रकार के खग रव से जोड़ कर देखें तो यह अर्थ उचित लगता है किंतु प्रसंग में वानस्पतिक विविधता का ऐसा वर्णन मिलता है कि पहला अर्थ भी ठीक प्रतीत होता है। 
आगे बढ़ें अर्जुनक - पुन: समस्या, अर्जुन(क) वृक्ष भी होता है तथा अर्जुनक कठफोड़वे को भी कहते हैं, अर्जुन के वृक्ष सम्भवत: उसे अधिक प्रिय होते हों। खट खट की ध्वनि होती है जब चोंच मारता है - विविधैर्नादितं तद्वनं महत्! 
अगला शब्द - शतपत्र, पुन: समस्या। शतपर्णी वृक्ष होता है तथा मोर को भी शतपत्र कहते हैं। नाचते नर मोर के पंख ऐसे लगते हैं कि नहीं कि सैकड़ो पत्तों का घाघरा पहन नाच रहा हो! 
कीचक - एक प्रकार का पोला लम्बा छरहरा बाँस। इसके वन की विशेषता होती है कि जब इससे होकर वायु प्रवाह होता है तो कई प्रकार से सीटियों के बजने सी ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। प्रसंग से तथा विविध नाद से यह शब्द उपयुक्त है - विविधैर्नादितं तद्वनं महत्। 
ठहरिये! एक पाठ कीरक भी तो है! 
कीरक कहते हैं तोते को। बहुत से तोते एक साथ हों तो जो कोलाहल करते हैं, उसे तो आप जानते ही हैं - विविधैर्नादितं तद्वनं महत्। 
... 
काव्यकर्म इसे कहते हैं जो आप को चेतना के अनेक आयामों का स्पर्श करा दे। इसे वही लिख सकता है जो वन वन का साथी रहा हो, यायावर हो, प्रेक्षक हो। 
... 
रामायण एवं महाभारत आख्यान कहे गये हैं। आख्यान अर्थात जो घटित हुआ उसका गान। सहस्राब्दियों तक कुशीलव एवं सूत गायकों ने इन्हें लोक में जीवित रखा। दिक्काल भेद से इनमें परिवर्तन भी हुये, परिवर्द्धन भी किंतु सतर्क सावधान पाठ से मूल तक अधिकांशत: पहुँचा जा सकता है जिसके लिये दो विधियाँ अपनायी जाती हैं - निम्न समीक्षा, उच्च समीक्षा - Lower Criticism, Higher Criticism. 
विशेषज्ञों का काम है। आप को मात्र यह ध्यान रखना है कि इन महाकाव्यों में प्राचीन भारत की समृद्धि को लिख कर संरक्षित कर दिया गया है, यह काम सहस्राब्दियों तक होता रहा।
रामायण काव्य एवं रामायण घटना - इन दो में अन्तर सम्भव हैं जिनके लिये लज्जित होने की आवश्यकता नहीं है अपितु गर्वित होने की आवश्यकता है कि हमारे पास ऐसा तंत्र था जिसने जाने कितनी आपदाओं के होते हुये भी समृद्धि को आगे की पीढ़ियों तक पहुँचाना सुनिश्चित किया। आप को पढ़ना है, मनन करना है, समझना है एवं आगे बढ़ना है। पुन: कह दूँ, आगे बढ़ना है। 
वैष्णवों! रामायण में मदिरा या मांस के प्रकरणों से मुँह चुराने की आवश्यकता नहीं है। उसे इतिहास कहा गया है, संदर्भ एवं प्रसंग के अनुसार पढ़ें। सातत्य का ध्यान रखें, क्षेपक होगा तो पता चल ही जायेगा। विविध प्रकार की मदिरा वही सभ्यता बना एवं उनका सभ्य अनुप्रयोग कर सकती है जो अति उन्नत हो। आसव, अरिष्ट, रस, रसायन तो आयुर्वेद के अंग हैं। यही बात विविध प्रकार के खाद्य के लिये भी सच है। 
दृष्टि ठीक रखिये, हीनता से मुक्ति मिलेगी। 
... पवित्रात्माओं! इसका अर्थ यह नहीं कि मैं दारूबाजी एवं मांस भक्षण का प्रचार कर रहा हूँ। यदि आप को ऐसा प्रतीयमान है तो मेरी असफलता। 
... 
शुभमस्तु।

बुधवार, 2 नवंबर 2016

चार गुण – धृतिर्दृष्टिर्मतिर्दाक्ष्यं [सुन्दरकाण्ड-5]


मनुष्य प्रज्ञा प्रेरित सम सम्यक संतुलन के कारण मनुष्य होता है। ऊर्ध्वरेता प्रज्ञा के कारण मूल प्रवृत्तियों का संतुलन सत की पहचान है। सत का सजग चयन वरेण्य है। वह प्रकाशमय सविता है जिसकी प्रेरणा निरंतर ऊँचाइयों की ओर ले जाती है।   
क्षुधा, निद्रा, भय और मैथुन - ये चार प्राकृत हैं, पाशव हैं, मूल प्रवृत्तियाँ हैं, समस्त जंतुओं में होती हैं। इनके एकल या बहुल समुच्चय ही बस हों तो तमस की स्थिति है। इस स्थिति में पाशव वृत्ति ही काम करती है, सम् वाद अर्थात संवाद नहीं। किसी भी अभियान में यदि ऐसी बाधा आये तो बेझिझक कठोरता पूर्वक उसका संहार शमन ही मार्ग है। तमस से उलझना उसे बढ़ाना और बली बनाना होता है।
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पहली दो विघ्न बाधाओं में सजग देव तत्त्व की प्रेरणा और हस्तक्षेप थे लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं था। हनुमान जी की गति को मूल प्रवृत्ति ‘क्षुधा’ से प्रेरित राक्षसी सिंहिका ने रोक लिया – बहुत दिनों पश्चात मोटा आहार मिला है, इसे खा लूँ तो आज पेट भर जायेगा अद्य दीर्घ कालस्य भविष्याम्यहमाशिता
उसके द्वारा पकड़े जाने के कारण हनुमान जी का पराक्रम पङ्गु हो गया जैसे सागर में प्रतिलोम वायु के कारण विशाल जलयान की गति अवरुद्ध हो जाती है – सहसा पङ्गुकृतपराक्रम:, प्रतिलोमेन वातेन महानौरिवे सागरे!
सब ओर देखने पर समुद्र के जल के ऊपर उठा विशालकाय प्राणी दिखा और उन्हें स्मृति हो आयी कि सुग्रीव ने इसी महापराक्रमी छायाग्राही जीव के बारे में चेताया था, इसमें संशय नहीं कि वही है – छायाग्राहि महावीर्यं तदिदं नात्र संशय:। पानी में थोड़े गहरे रहने वाले कुछ हिंसक जीव तैरते जीवों की छाया से ही आहार की उपस्थिति का अनुमान कर आक्रमण करते हैं, छायाग्राही से उसी ओर संकेत है।
उनकी गति अवरुद्ध कर सिंहिका मेघ घटा के समान गर्जना करती हुई ‘दौड़ी’ – घनराजीव गर्जन्ती वानरं समभिद्रवत्।
तमस विघ्न आक्रमण पर था। हनुमान जी पहचान चुके थे, कोई दुविधा नहीं, कोई झिझक नहीं और न पहले की तरह संवाद करने की आवश्यकता भी थी, कोई लाभ नहीं होता। कपि ने उसके मर्मस्थलों को चिह्नित किया कि इन पर वार करने से इसका नाश हो जायेगा, कायमात्रं च मेधावी मर्माणि च महाकपि - नीति चयनित आक्रमण।  
वे उसके मुँह में समा गये जैसे कि पूर्णिमा का चन्द्र राहु का ग्रास बन गया हो – ग्रस्यमानं यथा चन्द्रं पूर्णं पर्वणि राहुणा!
भीतर उसके मर्मस्थलों को अपने तीखे नखों से विदीर्ण कर दिया, राक्षसी मृत हो गिर पड़ी – पतितां वीक्ष्य सिंहिकाम्
आकाशचारी प्राणियों ने कपि की सराहना की (न देवता, न विद्याधर, न गन्धर्व, केवल प्राणी)। इस विजय पर उन प्राणियों ने हनुमान जी से यह सूत्र कहा:
यस्य त्वेतानि चत्वारि वानरेन्द्र यथा तव
धृतिर्दृष्टिर्मतिर्दाक्ष्यं स कर्मसु न सीदति
हे वानरेन्द्र! जिसमें तुम्हारे समान धैर्य, सूझ बूझ वाली सूक्ष्म दृष्टि, बुद्धि और दक्षता - ये चार गुण होते हैं, उसे अपने कार्य में कभी असफलता नहीं होती।
(सुकवि मर्मस्थलों को पहचानता और उदात्त मानवीयता की प्रतिष्ठा करता चलता है, यहाँ वही किया गया है)।

हनुमान जी को आगे विविध वृक्षों से विभूषित द्वीप दिखा, मलय पर्वत दिखा और उसके उपवन भी – विविधद्रुमविभूषितम्, द्वीपं ..मलयोपवनानि च
सागर, उसके तटीय जलप्राय क्षेत्र, तटीय वृक्ष और सागरपत्नी समान सरिताओं के मुहाने भी दिखे:
सागरं सागरानूपान्सागरानूपजान्द्रुमान्
सागरस्य च पत्नीनां मुखान्यपि विलोकयन्
लङ्का निकट आ गयी, कहीं मेरी इस गति को देख राक्षसों के मन में कौतुहल न उत्पन्न हो जाय, ऐसा विचार कर महाकपि देह को ढील दे पुन: वैसे ही प्रकृतिस्थ हो गये जैसे मोहरहित हुआ व्यक्ति अपने मूल स्वभाव में प्रतिष्ठित हो गया हो – वीतमोह इवात्मवान्, जैसे तीन पग में समूचे लोकों को नापने के पश्चात बलि की वीरता का हरण करने वाले हरि ने स्वयं को समेट लिया था – त्रीन् क्रमानिव विक्रम्य बलिवीर्यहरो हरि:। हरि का अर्थ वानर भी होता है और विष्णु भी। कपि ने सागर पार कर लिया था। 

...अंतिम तमस परीक्षा के साथ ही त्रिगुण परीक्षा को सफलता पूर्वक सम्पन्न कर महाबली हनुमान जी ने त्रिकूट पर्वत के शिखर पर स्थित लङ्का को सावधान हो देखा - त्रिकूटशिखरे लङ्कां स्थितां स्वस्थो ददर्श ह

अब तक तो केवल परीक्षायें थीं, वास्तविक चुनौतियाँ तो अब आनी थीं। उनका आत्मविश्वास हिलोरें ले रहा था:
शतान्यहं योजनानां क्रमेयं सुबहून्यपि
किं पुनः सागरस्यान्तं संख्यातं शतयोजनम्

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

गच्छ सौम्य यथासुखम् [सुंदरकाण्ड - 4]


महर्षि कहते हैं कि हनुमान जी द्वारा मैनाक को इस प्रकार पार करना उनका दूसरा दुष्कर कर्म था – द्वितीयं हनुमत्कर्म दृष्ट्वा तत्र सुदुष्करम्। सागर को पार कर शत्रु क्षेत्र के अत्यंत अपरिचित, हिंस्र और दुर्जेय लङ्का में प्रवेश का निर्णय ले छलाँग भरना पहला दुष्कर कर्म था:
रामार्थं वानरार्थे च चिकीर्षन् कर्म दुष्करम्।
समुद्रस्य परं पारं दुष्प्रापं प्राप्तुमिच्छति॥

परीक्षा अभी पूर्ण नहीं हुयी थी - लङ्का पुरी में तो इच्छा अनुसार रूप धारण करने वाले कामरूपियों से पाला पड़ेगा जो कि भय के साथ बुद्धि को भी चुनौती देंगे, मारुति क्या उनसे पार पा सकेंगे?
राक्षसों से पीड़ित देव, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि; ये चार मिल कर नागमाता सुरसा के पास गये – मारुति के मार्ग में मुहुर्त भर के लिये विघ्न डाल दो। भय उत्पन्न करने वाली राक्षसी का भयंकर रूप बनाओ – द्रंष्टाकरालं पिङ्गाक्षं वक्त्रं कृत्वा नभ:स्पृशम्! हम सब पुन: मारुति के बल और पराक्रम को जानना चाह रहे हैं को संकट के समय ये उपाय कर तुम्हें जीतने के लिये कार्य करेंगे या विषाद में पड़ जायेंगे – त्वां विजेष्यत्युपायेन विषादं वा गमिष्यति?

राक्षसों की अजेयता का इतना आतङ्क था कि श्रीराम हित उनका भी कार्य सम्पन्न करने जा रहे मारुति को वे सभी ठोंक पीट कर परीछ लेना चाहते थे – आगे की सम्भावित दारुण परिणति से अच्छा है कि अभी निर्णय हो जाय। उन्हें केवल अपनी पड़ी है। पिटी पिटायी परिस्थिति में स्वयं अभियान न कर किसी अन्य उद्योगी को परीक्षित करना उसके लिये रजोगुणी बाधा उत्पन्न करना है। स्थैतिक बल और गतिक पराक्रम की पर्याप्तता जाँचना रजस है।
सुरसा अर्थात सुर-सा। नागमाता हैं किंतु उन चार के वर्गहित में पीड़ित नागों का भी हित देख कर नागमाता सहमत हो गयीं, रजोगुणी का यह भी एक लक्षण है। वह भयङ्कर रूप धारण कर पथ में अड़ गयीं - विकृतं च विरूपं च सर्वस्य च भयावहम्!

हनुमान! देवताओं ने तुम्हें भक्ष्य बता मुझे अर्पित कर दिया है। मैं तुम्हें खाऊँगी, मेरे मुख में प्रवेश करो। यहीं पर नहीं रुकीं, कहा कि यह तो मुझे पुराना ब्रह्म वरदान है – वर एष पुरा दत्तो मम! सुजन वरदानों के भ्रष्ट उपयोग और उनसे निवृत्ति के उदाहरण पूरी रामायण में व्याप्त हैं। विशिष्ट के विरुद्ध साधारण किंतु अप्रतिहत मानवीयता की अंतत: विजय ही तो रामाख्यान है। इस महत्त्वपूर्ण घड़ी भी उसे उपस्थित होना ही था। (आगे लङ्का में भी ऐसी स्थिति आनी है जहाँ दैहिक बल और पराक्रम से अधिक बुद्धि उपयुक्त होगी। महाकाव्य की विशेषता इसमें है कि मानवीयता को दृढ़ खड़ा रखता है - देखते हैं। सब कुछ जान समझ कर ‘देखी जायेगी’ कह कर उद्यत होने वाला रजस भाव यहाँ प्रतिष्ठित है।)    

मारुति ने धैर्य धारण किया, भयभीत तो हुये ही नहीं। प्रसन्नमुख अपना पक्ष निवेदित किये – प्रहृष्टवदनोऽब्रवीत्। राक्षसों से तो राम का भी वैर है और उनकी यशस्विनी पत्नी का हरण रावण ने कर लिया है – सीता हृता भार्या रावणेन यशस्विनी। अर्थात श्रीराम वैरी के वैरी हैं और पीड़ित स्त्री को मुक्त करना चाहते हैं, तुम तो राम की प्रजा भी हो। माता! ऐसे में तुम्हें तो उनकी सहायता करनी चाहिये – कर्तुमर्हसि रामस्य साह्यं विषयवासिनी। (उल्टे बाधा डाल रही हो?)

ध्यान देने योग्य है कि सीता यशस्विनी हैं, वनवास के वर्ष उन्हों ने ऐसे ही नहीं बिता दिये थे। राम के अभियान का जनपक्ष यहाँ भी उद्धृत है। नाग भी उनके विषयवासी प्रजा थे और वे भी राक्षसों से पीड़ित थे। अभियान साधारण नहीं था।

मारुति ने विकल्प भी दे दिया। मैथिली का दर्शन कर श्रीराम जी से मिल लूँगा तब तुम्हारे पास आ जाऊँगा, यह मेरा सत्यवचन है – आगमिष्यामि ते वक्त्रं सत्यं प्रतिशृणोमि ते, अभी तो जाने दे माँ! राजन्य वर्ग में वचन की बड़ी प्रतिष्ठा थी। इक्ष्वाकु कुल तो प्रसिद्ध ही था। मारुति ने यह कह स्मृति सी दिलायी कि मैं रघुवंशी राम का दूत हूँ, तुम्हें मेरे वचन को मान देना ही चाहिये।

राजा, प्रजा, कुल, वचन-प्रतिष्ठा, स्त्री पीड़ा आदि सबको मिला कर स्थिर प्रसन्न बुद्धि से मारुति ने जो संवाद किया उससे उनकी बुद्धिमत्ता प्रमाणित हो गयी लेकिन सुरसा को तो हनुमान की क्षमता भी जाननी थी – बलं जिज्ञासमाना, उसे युक्ति पूर्वक प्रयोग में ला भी सकता है या नहीं, यह भी तो जानना है।

माता ने मुख फैला दिया – तुम्हें तो मेरे मुख में प्रवेश कर के ही आगे जाना होगा, मेरी अवहेलना कर कोई आगे नहीं बढ़ सकता! निविश्य वदनं मेऽद्य गंतव्यं वानरोत्तम

हनुमान और उनमें होड़ सी लग गयी – वे मुख फैलाती गयीं, हनुमान भी बढ़ते गये। सीमा समझ हनुमान ने अपना आकार अंङ्गूठे के बराबर कर लिया, मुख में प्रवेश कर बाहर निकल नमस्कार मुद्रा में खड़े हो गये – दाक्षायणि! तुम्हें नमन है। अब तो तुम्हारा वर भी सत्य हो गया, मैं तुम्हारे मुख में प्रवेश कर बाहर जो आ गया। मैं अब वहाँ जाऊँगा जहाँ वैदेही हैं। (विद्वानों ने दाक्षायणि का अर्थ दक्ष पुत्री किया है। नागमाता का दक्ष पुत्री होना एक अलग विषय है।)

रजोगुणी परीक्षा पूर्ण हुई, बलबुद्धिनिधान हनुमान सफल हुये। आश्वस्त माता ने प्रकृत रूप धारण कर उन्हें आशीर्वाद दिया:
अर्थसिद्ध्यै हरिश्रेष्ठ गच्छ सौम्य यथासुखम्
समानय च वैदेहीं राघवेण महात्मना
हे हरिश्रेष्ठ! वांछित कार्यसिद्धि के लिये सुख पूर्वक जाओ। हे सौम्य! वैदेही को राघव से शीघ्र मिलाओ।

हमुमान जी द्वारा यह तीसरा दुष्कर कार्य सम्पन्न हुआ - तत्तृतीयं हनुमतो दृष्ट्वा कर्म सुदुष्करम्

... तमस परीक्षा आगे थी।