travelogue लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
travelogue लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 13 : योजना पर शैव, शाक्त और तंत्रमार्ग के प्रभाव

भाग 1,  2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 और 12 से आगे...
surya-namaskar-sun-salutation-postures-mantras
कोणार्क मन्दिर की चर्चा पंचदेवों की अवधारणा के बिना पूरी नहीं होगी। स्मार्त सनातन परम्परा पाँच देवताओं की नित्य आराधना को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती आयी है। ये पाँच देव हैं – गणेश, आदित्य, महादेव, दुर्गा और विष्णु। उड़िया जन ने अपनी पवित्र भूमि को भी इन पाँच देवताओं के आधार पर पाँच क्षेत्रों में बाँट दिया था।
राजा नरसिंहदेव की राजधानी जाजपुर के पास महाविनायक पहाड़ियों वाला क्षेत्र गणेश क्षेत्र कहलाता था जहाँ महाविनायक मन्दिर है। एकाम्रक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध भुवनेश्वर में लिंगराज शिव का मन्दिर, जाजपुर या यज्ञपुर विरजाक्षेत्र में देवी दुर्गा का बिरजा मन्दिर और विष्णु या शंखक्षेत्र पुरी में जगन्नाथ मन्दिर।
ये चारो मन्दिर सूर्यमन्दिर के बनने के पहले भी विद्यमान थे और समन्वय की अद्भुत परम्परा के तहत एक ही गर्भगृह में एक ही प्रतिमा के भीतर पंचदेवों की उपासना महाविनायक मन्दिर में आज भी होती है जो कि ऐसा एकमात्र उदाहरण है। साम्ब निर्मित लघु मन्दिर और चन्द्रभागा तट पर पवित्र स्नान मेले के प्रचलित होने पर भी उस युग की यह विडम्बना ही थी कि केवल अर्कक्षेत्र यानि कोणार्क में आदित्य का भव्य मन्दिर नहीं था।
इस बात के प्रमाण हैं कि राजा की माँ ने इस कारण भी उन्हें वहाँ एक भव्य मन्दिर बनवाने का निर्देश दिया जो कि नरसिंहदेव की महत्त्वाकांक्षा और उसकी भव्य कीर्ति के अनुकूल भी होता। यह मन्दिर पवित्र उड़िया भूमि को पूर्णता प्रतीक देने वाला था जिससे राजा की कीर्ति इतिहास में सुरक्षित हो जाती।
mahavinayak
गणेश क्षेत्र:
महाविनायक
konark
अर्क क्षेत्र:
कोणादित्य
lingraj
एकाम्र क्षेत्र: भुवनेश्वर लिंगराज
biraja
बिरजा क्षेत्र:
देवी दुर्गा
Jagannath
शंख क्षेत्र:
पुरुषोत्तम (जगन्नाथ)
पहले बताया जा चुका है कि उड़ीसा में नरसिंह शिव के रूप भी माने जाते हैं और जगन्नाथ का वर्तमान स्वरूप बहुत बाद का है। उसके पहले उड़ीसा में बौद्धों के साथ ही शैव शाक्त परम्परा सशक्त थी। इसका प्रमाण महाभारत में वर्णित पूर्वी तट के प्रसिद्ध स्वयम्भू लोकेश्वर से मिलता है जिन्हें वेदी पर स्थापित बताया गया है। पिछ्ले अंक में यह दर्शाया जा चुका है कि कैसे त्रिभुज आधारित मिथुन चित्र से श्रीयंत्र का विकास हुआ और कैसे अंतत: वह स्त्री स्वरूप वह पीठ बन गया जिस पर पुरुष स्वरूप लिंग विराजता था। महाभारत का वर्णन भी शिवलिंग की ओर ही संकेत करता है।
बिरजाक्षेत्र एक शक्तिपीठ है जिसे ओडरतीर्थ कहा जाता है। मान्यता है कि दक्ष प्रजापति के यज्ञ में जली देवी के देह को लेकर शिव विक्षिप्त हो घूमने लगे थे तो उन्हें मुक्त करने के लिये विष्णु ने चक्र से उस देह के 52 टुकड़े कर दिये। वे जहाँ जहाँ गिरे वहाँ शक्तिपीठ बन गये। बिरजाक्षेत्र जाजपुर में देवी की नाभि या उस पर पहने जाना वाला आभूषण उड्डयान बन्ध गिरा था। शाक्त मत के यहाँ सशक्त होने का यही कारण है। पुरी के वर्तमान मन्दिर के निर्माण के पहले वहाँ शिव नरसिंह का मन्दिर बना जो आज भी है और देवी से अनुमति स्वरूप प्रांगण में उनका देवालय बनवाने की और प्रसाद के बिना उन पर चढ़े महाप्रसाद नहीं माने जाने की बात पहले ही बता चुका हूँ।
पुरी यानि एक ओर महौदधि सागर और दूसरी ओर भाग्येश्वरी(बरगाबी) नदी से घिरा आकार में दक्षिणावर्त शंख जैसे तद्नाम शंखक्षेत्र के जगन्नाथ से पहले शैव शाक्त व्याप्त होने के प्रमाण आज भी उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिये शंखक्षेत्र को दर्शाता यह पारम्परिक चित्र देखिये:
shankh_kshetra - Copy
 (बड़ा देखने के लिये चित्र पर क्लिक करें)
शंखक्षेत्र के मुख पर लोकनाथ या लोकेश्वर महादेव हैं तो पुच्छ भाग में विल्वेश्वर महादेव। इन्हें मिलाते अक्ष के लगभग लम्बवत एक छोर पर देवी अलम्बा हैं तो दूसरे पर देवी वाराही। वाराही देवी से लगी हुई है आचार्य शंकर की पीठ। जगन्नाथ मन्दिर की आंतरिक चहारदीवारी प्राथमिक श्रीयंत्र की वर्गाकार परिधि है जिसके चार द्वारों पर व्याघ्र, हाथी, सिंह और अश्व हैं। त्रिकोणयुग्म यंत्र स्पष्ट दर्शाया गया है जिसके गर्भ में जगन्नाथ विराजमान हैं। यंत्र को घेरे सोलह कलाओं को प्रदर्शित करता कमल है जिसकी पंखुड़ियों पर एकानुक्रम से शिवलिंग और देवी प्रतीक वही त्रिकोणयुग्म प्रतिष्ठित हैं। समूचा क्षेत्र अन्य कई शिव और देवी मन्दिरों से भरपूर है। मन्दिर के प्रांगण में ही कोणार्क से लाई गई इन्द्र प्रतिमा स्थापित है। समन्वय और समाहित करने की सनातनी प्रकृति का दर्शन यहाँ भी होता है, इस प्रतिमा को कोणार्क सूर्य कहा जाता है।
राजा के सामने स्थापित और सशक्त शैव शाक्त परम्परा थी और आँखों में उड़िया भूमि को आदित्य मन्दिर निर्माण द्वारा पंचदेव पवित्र भूमि की पूर्णता देने का सपना। वास्तुविद और स्थापति को लिंगराज मन्दिर से प्रेरणा लेने को कहा गया। यह मन्दिर पारम्परिक उड़िया नागर शैली में बना था और गर्भगृह शिखर से लगे दो बाहरी उपमन्दिरों के कारण उस त्रिकोण को भी धारण किये हुये था जो तंत्रमार्ग में बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। इस त्रिकोण की प्रतिलिपि करने पर कोणार्क में उदय, मध्याह्न और अस्ताचल सूर्य प्रतिमाओं की स्थापना द्वारा आदित्य को सम्पूर्ण रूप में प्रदर्शित किया जा सकता था।
plan_lingraj
लिंगराज मन्दिर
konark_geometry1
कोणार्क (गुगल मैप से आकाशीय छवि) : लिंगराज मन्दिर से त्रिकोण साम्यता
देवालय के मनुष्य शरीर रूप होने में भोगमंडप और नृत्यमंडप का अलगाव बाधा उत्पन्न करता था, इसलिये कोणार्क की योजना में दोनों को एक कर दिया गया।
पिछले आलेख में देवालय के देह स्वरूप होने की बात बता चुका हूँ, इसे इन चित्रों से और आसानी से समझा जा सकता है। दक्षिण की द्रविड़ शैली हो या उत्तर की नागर शैली, यह देहप्रतीक दोनों पर लागू है।
Image2
lyingman
final_compiled
vishnu
arun_stambha
यहाँ यह भी दर्शनीय है कि वास्तुपुरुष की संकल्पना विष्णु से भी मिलती है जिनकी नाभि से
vastu-purusha-205x300
निर्माणी ब्रह्मा उपजते हैं। वास्तुपुरुष का केन्द्रीय उदरभाग भी ब्रह्मा कहलाता है। लेटे हुये विष्णु के शरीर की साम्यता भी दर्शनीय है जिनके मस्तक पर शेषनाग शिखर की सृष्टि करता है तो ब्रह्मकमल ध्वजस्तम्भ स्वरूप प्राथमिक लिंग का। नाग वैष्णव और शैव दोनों मतों में बहुत ही महत्त्वपूर्ण रहे हैं। तन्त्र मार्ग में कुंडलिनि की परिकल्पना सर्पिणी के रूप में है।
ध्वज प्राथमिक लिंग के रूप में ‘काम ऊर्जा’ का प्रतीक है जिसका उदात्तीकरण मन्दिर प्रवेश के साथ प्रारम्भ होना चाहिये और गर्भगृह के सामने आते आते पूर्ण हो जाना चाहिये। बीच का विमर्शी मंडप ‘जगमोहन’ सम्बन्धित साधना क्रिया को दर्शाता है जो कि उदर है और ब्रह्मा सहित तमाम देवों का स्थान भी।
ध्वज के लिंग रूप होने का प्रमाण कोणार्क के इस अरुण स्तम्भ(अब पुरी में स्थापित) के पुराने चित्र से हो जाता है जिसके मूलस्थान पर योनिवेदी स्वरूप अनेक त्रिभुजों को कलात्मक रूप देते कमल की आकृति बनी हुई है। स्तम्भ का घेरा भी सोलह भुजाओं वाला बहुभुज है जो सोलह पंखुड़ियों वाले कमल का ही सूक्ष्म नैरंतर्य है।  
kamkalayantra_shilpa_prakash_2
कोणार्क मन्दिर की क्षैतिज योजना (plan) में त्रिकोण और अरुण स्तम्भ एक तांत्रिक यंत्र से भी सम्बन्धित लगते हैं जिसे ‘कामकला’ यंत्र कहा जाता है। किसी मन्दिर के तांत्रिक मन्दिर या ‘वीर’ मन्दिर होने के लिये उसका निर्माण इस यन्त्र के अनुसार होना चाहिये। यहाँ भी त्रिकोण दर्शनीय है।
जब हम क्षैतिज योजना को मन्दिर की भित्तियों पर लगी हुई विभिन्न मिथुन मूर्तियों से मिला कर देखते हैं तो आदित्य पूजा के साथ साथ मन्दिर के तांत्रिक अनुष्ठान केन्द्र होने में कोई शंका नहीं रह जाती और न राजा के समन्वयी महत्त्वाकांक्षा के बारे में जिसे रूप दे कर वह पुरुषोत्तम (वर्तमान जगन्नाथ) के समांतर ही एक और अनूठा आराधना केन्द्र विकसित करना चाहता था।

chakras_indriya Ardhanari
(जारी)

शनिवार, 7 जुलाई 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 9 : अपरा इतिहास

भाग 1,  2, 3, 4, 5, 6, 7 और 8 से आगे...
four-sunsपरा इतिहास से अब हम अपरा इतिहास की ओर चलते हैं। नरसिंह से मिलते जुलते रूप में सूर्य का उकेरण मेक्सिको की एज़्टेक सभ्यता में भी मिलता है। अपनी तीखी ताप के कारण वहाँ भी सूर्य उग्र रूप में चित्रित है और उसका एक प्रकार सिंह जाति का प्राणी जगुआर है।
इन्द्रद्युम्न का अभिजान दसवीं-ग्यारहवीं सदी के राजा इन्द्ररथ से किया गया है। उड़ीसा में यह समय आदिम सूर्यपूजा, बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त, वैष्णव आदि के समन्वय का था। इन्द्ररथ से पहले के सैलोद्भव राजाओं ने माधव आराधना को प्रसार दिया था और नियाली माधव, कंटिलो आदि की स्थापना उनके समय में हुई थी।
सैलोद्भवों के पश्चात आये शाक्त भौम शासकों ने पुरी में नीलमाधव की आराधना बाधित कर शक्ति पूजा केन्द्रों की स्थापना की। पुरी में देवी के विमला रूप की पूजा होने लगी, ककटपुर में मंगला की और भुबनेश्वर में भुवनेश्वरी की।  उल्लेखनीय है कि पुरी का वर्तमान मन्दिर एक बहुत ही प्राचीन मन्दिर के ध्वंस पर बना हुआ है और उसके घेरे में शक्तिरूपा देवी का वह लघु मन्दिर भी है, 'महाप्रसाद' होने के लिये जहाँ जगन्नाथ का प्रसाद चढ़ाया जाना अनिवार्य है। कहते हैं कि शक्ति ने जगन्नाथ को स्थापित होने की अनुमति इसी पूर्व अभिसंधि के साथ दी थी। स्पष्ट है कि सूर्य पूजा के अतिरिक्त शक्ति पूजा भी जगन्नाथ से पहले के हैं और राजा इन्द्ररथ द्वारा दारुब्रह्म यानि लकड़ी के शाबर देव नरसिंह की पुरुषोत्तम रूप में स्थापना इसी समय के निकट हुई। 
शाक्तों के समान तंत्र की एक परम्परा में नरसिंह को पुरुषोत्तम कहा गया है जो अपनी संगिनी विमला के साथ विराजते हैं। उल्लेखनीय है कि उड़िया शैव परम्परा में नरसिंह शिव को व्यक्त करते हैं। वैष्णव नरसिंह और शैव नरसिंह का यह समन्वय राजसत्ता के संरक्षण के कारण सूर्य पूजा और ब्रह्मा की परम्परा पर भारी पड़ा। भौम शासकों के समय ही तंत्र से समानता के कारण महायानी बौद्धों के त्रिरत्नों की उपासना प्रारम्भ हुई। भौम शासकों के पश्चात आये सोमवंशियों ने आराधना पद्धति को पुनर्संस्कारित किया और पुरी के वर्तमान  मन्दिर का निर्माण प्रसार किया।
जिस समय गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम ने कोणार्क में सूर्यमन्दिर का निर्माण कराया उस समय भी पुरुषोत्तम जगन्नाथ के वर्तमान रूप में नहीं आ पाये थे। इसके दो प्रमाण हैं।
सन् 1313 के आसपास के एक दान अभिलेख में पहली बार पुरी के पुरुषोत्तम के लिये 'जगन्नाथ' शब्द का प्रयोग हुआ है जो कि कोणार्क मन्दिर बनने के लगभग 60 वर्ष पश्चात की बात है।
king_worshipping_trinity1दूसरा प्रमाण स्वयं कोणार्क मन्दिर की प्रतिमायें दे देती हैं। इनमें राजा नरसिंहदेव शिवलिंग, पुरुषोत्तम (कालान्तर के जगन्नाथ) और शक्तिस्वरूपा दुर्गा की उपासना करते दर्शाये गये हैं।
trinity_1

उल्लेखनीय है कि किसी भी प्राचीन स्रोत में बलभद्र और सुभद्रा की चर्चा पुरुषोत्तम के साथ नहीं मिलती है।
कोणार्क सूर्यमन्दिर बनने के समय तक शैव, वैष्णव और शाक्त मतों के समन्वय का एक महत्त्वपूर्ण चरण पूर्ण हो चुका था जिनके क्रमश: तीन प्रतीक भैरवरूप शिव, पुरुषोत्तम और शक्ति पुरी के गर्भगृह में बौद्धों के त्रिरत्न को चुनौती देते विराजमान थे।
ऐसे में छलयुद्ध द्वारा इस्लामी आक्रांता को परास्त कर विजय स्मारक के रूप में राजा नरसिंहदेव ने सूर्यमन्दिर की एक बहुत ही महत्त्वाकांक्षी संकल्पना की, एक तीर से कई आखेट - माँ के श्रद्धा भगवान सूर्य की उपासना को राजकीय प्रश्रय, इस्लाम को पराजित कर अपने सर्वश्रेष्ठ सनातनी शासक होने का प्रतिपादन, पुरी के पुरुषोत्तम के समांतर प्राचीन सूर्य और तंत्र पद्धतियों का समन्वय कर इतिहास में वैकल्पिक व्यवस्था के प्रदाता राजा के रूप में स्थान आदि।
तंत्र मार्ग के मिथुन प्रतीक मन्दिर की भित्तियों पर प्रचुरता और प्रमुखता से अंकित किये जाने थे जिनके लिये वास्तुशास्त्र के विधान की आड़ भी थी। राजा नरसिंहदेव के शिल्पियों ने पुरुषोत्तम से भिन्नता दर्शाने के लिये शिव और शक्ति को क्रमश: लिंग और दुर्गा रूप में उकेरा। तीनों जिस पीठ पर विराजमान दर्शाये गये हैं, वह पुरी मन्दिर के गर्भगृह की पीठ ही है।
मन्दिर का कितने योजनाबद्ध ढंग से निर्माण हुआ था, इसका प्रमाण उन ताड़पत्र अभिलेखों से मिलता है जिनमें समूचा 'प्रोजेक्ट प्लान' वर्णित है। सम्भवत: कोणार्क का मन्दिर भारत का एकमात्र प्राचीन मन्दिर है जिसके सभी वास्तुकारों, शिल्पियों और प्रमुख कार्मिकों  के नाम तक पता हैं! 
सुदृढ़ रूप से स्थापित पुरी की पुरुषोत्तम परम्परा ने इसे बहुत उदारता से नहीं स्वीकार किया। कालांतर में प्राचीन सूर्य के पुरुषोत्तम रूप के स्थान पर वैष्णव परम्परा के कृष्णरूपी जगन्नाथ, भैरव के स्थान पर उड़ीसा में लोकप्रिय देवता बलभद्र और शक्ति के स्थान पर उनकी बहन सुभद्रा स्थापित कर दिये गये। कृष्ण की किसी पत्नी या राधा के स्थान पर बहन सुभद्रा की स्थापना कर अनुज वधू की जेठ से परदा की उड़िया लोक रीति का सम्मान भी किया गया। और तो और सुदर्शन चक्र के रूप में सूर्यरथ के चक्र की स्थापना और सेवामंडल में सूर्यपूजक प्राचीन शाबर जाति का स्थान सुव्यवस्थित और सुनिश्चित कर उन्हें भी अपनी ओर मिला लिया गया।
इस्लाम विजयी राजा नरसिंहदेव, पुरी की पुरातन परम्परा के समांतर उससे भी पुरानी सूर्य शाक्त परम्परा की स्थापना की लड़ाई में पराजित हुये - एक व्यक्ति तो बस अपने जीवन भर ही ध्यान रख सकता है! परवर्ती वंशजों में उतना उत्साह नहीं था।
 ऐसे में जगन्नाथ समर्थकों ने धर्मग्रंथों में ब्राह्मणपुत्री चन्द्रभागा के साथ सूर्यदेवता द्वारा किये दुर्व्यवहार और उसके कारण घटित आत्महत्या का मिथक जोड़ ब्रह्मा की तरह ही सूर्य की परिणति सुनिश्चित कर दी। इस्लामी आक्रमण के पश्चात मूलविग्रह और उपासना आचार हीन उपेक्षित कोणार्क मन्दिर के कई भागों को उखाड़ उखाड़ कर पुरी का मन्दिर समृद्ध किया जाता रहा। यह काम उन्नीसवीं सदी तक अंग्रेजों की दृष्टि पड़ने तक होता रहा। जगन्नाथ की भक्ति में लीन आम जन तो कोणार्क को भूल ही चुके थे - जिस मन्दिर में देवता ही न हों, वहाँ कैसी पूजा?
काला पहाड़ के आक्रमण के कालखण्ड में पुरी के गर्भगृह से भी विग्रह हटा कर छिपा दिये गये थे। बहुत दिनों तक वहाँ भी उपासना खण्डित रही किंतु आपदा टल जाने पर वहाँ की काष्ठ प्रतिमायें पुन: स्थापित कर दी गईं।कोणार्क में ऐसा नहीं हो पाया। अब तो वहाँ के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा का अभिजान ही विवादास्पद है। कुछ कहते हैं कि बालू में तोप दी गई प्रतिमा वैसे ही विलुप्त हो गई जैसे कभी नीलमाधव हुये थे, कुछ कहते हैं कि पुरी के प्रांगण में स्थित इन्द्र के मन्दिर में वह प्रतिमा लगी है तो कुछ कहते हैं कि दिल्ली संग्रहालय में रखी गई यह प्रतिमा ही वह प्रतिमा है
(कोणार्क ध्वंस की दीवारों पर बाहर स्थापित सूर्य की तीन प्रतिमाओं से तुलना करें तो साम्यता तो दिखती है किंतु तुलनात्मक रूप से सौष्ठव बहुत ही हीन है और शारीरिक अनुपात भी ठीक नहीं हैं, अत: इस दृढ़कथन का सच होना सम्भव नहीं लगता। तुलना के लिये इस लेख में ही सबसे नीचे दी गई तीन प्रतिमाओं में से एक का चित्र देखें।):
IMG_5241_aw तेरहवीं सदी में पुरी के इस्लामी आक्रांताओं पर विजय के स्मारक स्वरूप सूर्यमन्दिर की स्थापना से लेकर सोलहवीं सदी में इस्लामी आक्रांता काला पहाड़ के उस पर आक्रमण से पूर्व गर्भगृह से विग्रह के हटाये जाने तक के बीच लगभग ढाई सौ वर्षों तक वहाँ उपासना होती रही किंतु नरसिंहदेव के पश्चात न तो राज्य संरक्षण मिला और न ही मन्दिर के रखरखाव के लिये पर्याप्त राजकीय सहायता, जब कि उसी कालखण्ड में पुरी का मन्दिर दिन दूनीरात चौगुनी की गति से समृद्ध एवं व्यवस्थित होता रहा।
यह जानना रोचक होगा कि पुरी की रथयात्रा सूर्य के उस रथयात्रा की प्रतिकृति है जिसका वर्णन वेदों से लेकर प्राचीन अभिलेखों तक में मिलता है। पाँचवी सदी के अभिलेखों में मथुरा और साम्बपुर में इस प्रथा के होने के वर्णन हैं। दक्षिण भारत में भी यह प्रथा प्रचलित थी। यह भी कि आज भी जब पुरी की मूर्तियाँ रथ पर सवार होती हैं तो उनसे पहले नरसिंह भगवान सवार होते हैं। उनके विधिवत स्तुति पूजन के पश्चात ही जगन्नाथ रथारूढ़ होते हैं। कोणार्क मन्दिर तो विशालकाय सूर्यरथ के रूप में बना ही था।
जाने कितनी ही उपासना पद्धतियों का समन्वय कर जगन्नाथ दशावतार से भी ऊपर की कोटि में गिने जाने लगे जिनसे सारे अवतार निकसते थे। अब ऐसे विराट देव के आगे 'विरंचि नारायण' के नाम से जाने जाने वाले कोणार्क के सूर्य देव कहाँ ठहर सकते थे!
विडम्बना ही है कि आस्था केन्द्र पुरी को बचाने के विजय अभियान का स्मारक उसी के अनुयायियों की उपेक्षा एवं तिरस्कार के कारण अंतत: खंडहर में बदल गया। धार के विरुद्ध नाव खेने में असफल होने की सम्भावनायें कुछ अधिक ही अधिक होती हैं। इतिहास, धर्म और राजनीति की वीथियाँ विचित्र भूलभुलइया हैं।
अगली कड़ी में यह बताऊँगा कि इस्लामी हमलावरों का दुस्साहस किस स्तर का था, उनकी दुर्गति कैसे की गई!
surya_western(क्रमश:)

बुधवार, 4 जुलाई 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 8 : परा इतिहास

भाग 1,  2, 3, 4, 5, 6 और 7 से आगे...
यायावर को मिहिर के साथ मन्दिर के पूर्वी द्वार पर छोड़ हम इतिहास की स्वर्णिम वीथियों में प्रवेश करेंगे। यह नहीं पता कि मन्दिर में प्रवेश के पश्चात उनकी बातें कब किस ओर बह चलेंगी इसलिये यह इतिहास गवेषणा अभी करनी आवश्यक है ...  
... पहले की कड़ियों में पर्याप्त संकेत दिये जा चुके हैं कि मिथकों से इतिहास झाँकता है। झाँकते इतिहास से मैंने अब तक इन सम्भावनाओं की बातें की हैं:
(1)  लुप्तप्राय सरस्वती नदी के किनारे कभी फलती फूलती संस्कृति को विश्वामित्र की गायत्री और सूर्यपूजक गुर्जरों के सहयोग से ब्रह्मा ने एक नयी दिशा दी। सूर्य उपासना की यह धारा धीरे धीरे पूर्व दिशा की ओर बढ़ी। साथ ही पहले से स्थापित विष्णु और शिव उपासना पद्धतियों से उसका संघर्ष भी प्रारम्भ हुआ। उल्लेखनीय है कि विष्णु का विकास वेदों के जिस विष्णु देव से हुआ था वह वास्तव में सूर्य ही थे। ब्रह्मा की ध्वजवाहक यह वैकल्पिक उपासना पद्धति वैदिक मूल का ही पुनर्निरूपण थी। पूर्वी तट पर पहुँच कर इन उपासकों ने वहाँ प्राकृतिक रूप से उत्पन्न केवड़े के फूल को अपना प्रिय बनाया। अन्तत: संघर्ष और समन्वय के परिणामस्वरूप ब्रह्मा की उपासना पद्धति शमित हो गई किंतु सूर्य उपासक बचे रह गये।
(2)  पश्चिमी तट पर कृष्ण ने द्वारका पुरी बसाई। साथ ही दूर समुद्र पार देशों से व्यापार हेतु पत्तन का विकास भी किया। किसी व्यापारिक जलपोत में चढ़ कर यमपुरी यानि कि वर्तमान मालागासी (मेडागास्कर) पहुँच गये गुरु के पुत्र को वापस लाने कृष्ण स्वयं वहाँ गये जहाँ उनकी मित्रता पंचजनों और मगदेशी (साकल या शाकलदेश या शकद्वीप - वर्तमान ईरान) ब्राह्मणों से हुई जो सूर्योपासक थे।
जब कृष्ण के पुत्र साम्ब को त्वचा का कोढ़ हो गया तब उसे निरोग करने के लिये कृष्ण ने उन्हीं ब्राह्मणों को बुलावा भेजा। वे अपने साथ मालागासी की वनस्पति वनसरू ले कर आये। उपचार के लिये उन्हें प्राकृतिक रूप में जिस सूर्यकिरण अवशोषी वनस्पति की आवश्यता थी उसकी पहचान मदार या अर्क के रूप में हुई। उन्हें मीठे और खारे पानी का संगम और अपरिचय के एकांत की भी आवश्यकता थी लिहाजा कृष्ण ने उन्हें पूर्वी तट पर अर्कक्षेत्र भेजा जहाँ चन्द्रभागा नदी बहती हुई समुद्र से मिलती थी।
उपचार से साम्ब स्वस्थ हुये। मग ब्राह्मणों का यश और उनकी सूर्य उपासना पद्धति फैलते चले गये। पहले से ही सूर्योपासना की स्मृति जनमानस में होने के कारण उन्हें लाभ भी मिला। वे इस दृढ़ता के साथ स्थापित हुये और फैले कि वर्तमान बिहार का नाम ही उनके प्रभुत्त्व के कारण मगध पड़ गया और पूरे भारत में अनेक सूर्यमन्दिर स्थापित हुये। उल्लेखनीय है कि मौर्यवंश का संस्थापक चाणक्य, उस वंश का उच्छेदक पुष्यमित्र शुंग, कामसूत्र का रचयिता वात्स्यायन, आधुनिक आयुर्वेद का जनक चरक और प्रख्यात ज्योतिर्विद वाराहमिहिर, सभी मग ब्राह्मण थे जिन्हें मूल परम्परा के ब्राह्मणों ने या तो बहुत हेय दृष्टि से देखा या ब्राह्मण माना ही नहीं।
सूर्यपूजक मग ब्राह्मणों और पहले से ही विद्यमान देशी सूर्यपूजकों के सम्मिलन से एक अनूठी सूर्य उपासना पद्धति विकसित हुई जिसके अवशेष आज भी बिहार के पुरोहित विहीन छ्ठ पर्व में दिखते हैं।
साम्ब के कारण ही कोणार्क भी एक स्थापित पत्तन बना और बहुत बाद तक बना रहा। इसका एक  प्रमाण पेरिप्लस द्वारा उसका उल्लेख है।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब विष्णु और शिव की उपासना पद्धतियाँ प्रबल थीं, जब कि पुरी में कृष्ण स्वरूप जगन्नाथ स्वयं विद्यमान थे, भुबनेश्वर में लिंगराज शिव विराज रहे थे तो राजा नरसिंह देव को पुन: सूर्यपूजा स्थापित करने के लिये सूर्यमन्दिर बनाने की क्या आवश्यकता आन पड़ी?
इसका उत्तर यह है कि सूर्यपूजा लुप्त नहीं हुई थी, प्रचलित थी। चन्द्रभागा तट पर साम्ब का लघु सूर्यमन्दिर श्रद्धा का केन्द्र था और राजा पर कुछ नया करने की धुन सवार थी। उनके ऊपर अपनी सूर्यपूजक माँ का भी प्रभाव था। एक और सशक्त कारण था जिसके सूत्र मग ब्राह्मण चाणक्य की कूट युद्धनीति से जुड़ते हैं और जिसे पारम्परिक धर्मबुद्धि ने सर्वथा  हेय माना।
लेकिन उसके पहले एक और मिथकधारा जो कि इतिहास के बहुत निकट है - हमें पुरी के भगवान जगन्नाथ के इतिहास को भी जानना होगा।
भारत में मिलती जुलती उपासना पद्धतियों के हजारो वर्षों तक चलने वाले सम्मिलन से नयी उपासना पद्धतियों के विकसित होने का यह सबसे बड़ा प्रमाण है। 
प्राचीन स्रोतों में जगन्नाथ नाम नहीं है। पुरी को पुरुषोत्तमक्षेत्र कहा गया है। कौन थे यह पुरुषोत्तम?
पुराण कहते हैं कि एक राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में यह संकेत मिला कि पुरी तट पर स्वयं भगवान विष्णु स्थापित हैं जिनके दर्शनमात्र से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। विष्णु नीलमाधव यानि नीलम पत्थर के प्रतिमा रूप में ऐसे गुप्त स्थान पर थे जिसे केवल शाबर कबीला जानता था। शाबर टोने टोटके जानने वाली और वृक्ष पूजक एक प्राचीन वनवासी जाति है जिसे इतिहास में ‘सौर’, ‘सावर’, ‘सबर’ आदि नामों से भी जाना जाता है। माधव शब्द चौंकाता है, साथ ही सौर भी। आज का यह सच भी चौंकाता है कि सकलदीपी ब्राह्मणों को टोने टोटके में सिद्धहस्त माना जाता है।
 मधु कैटभ नाम के दो दैत्यों का वध करने के कारण विष्णु को माधव कहा जाता है। कथा है कि विष्णु की नाभि से कमलासीन ब्रह्मा का प्रादुर्भाव हुआ जिन्हें सृष्टि रचना का कार्य सौंप विष्णु योगनिद्रा में लीन हो गये। सोते समय उनके कानों की खोट से मधु और कैटभ का जन्म हुआ जिन्हों ने सृष्टि निर्माण की राह ढूँढ़ते तपलीन ब्रह्मा को खूब सताया। बाद में विष्णु ने उनका वध कर ब्रह्मा की राह प्रशस्त की।
पृथ्वी पर का जीवन सूर्य की देन है। दहकती पृथ्वी पहले जलप्लावित हुई फिर धीरे धीरे सृष्टि से युक्त हुई। विष्णुरूपी सूर्य का क्षीरसागर शयन इसी को इंगित करता है। नाभि, कमल, ब्रह्मा और मधु कैटभ द्वय भी किसी अनजान खगोलीय तथ्य के अबूझ संकेत भर हैं।
खगोलीय घटनायें मिथक बनीं। मिथकों से अनेक कथायें जन्मीं। छाया सूर्य की पत्नी हो गयी। उसके साँवलेपन और अद्भुत तेज राशि के साथ भ्रमण करते सूर्य के साम्राज्य नभ की नील रंगत का आभास कराती सूर्य प्रतिमायें धरती पर नीलकृष्ण पत्थरों से बनने लगीं। प्रात:काल गर्भगृह में इन प्रतिमाओं को सूर्यरश्मियाँ प्रकाशित करती थीं।
उल्लेखनीय है कि कुशीनगर जिले की सूर्यप्रतिमा नीलम पत्थर की बनी है तो कोणार्क की तीनों सूर्यप्रतिमायें भी नीलहरिताभ क्लोराइट पत्थर की। अन्य स्थानों पर भी सूर्य की नील प्रतिमायें पाई गई हैं। इन सबके मूल में वही सूर्य उपासक वृक्षपूजक ‘सौर’ यानि शबर जाति के आराध्यश्रेष्ठ नीलमाधव हैं। वैष्णवों का पवित्र श्यामल शालिग्राम भी इसी से जुड़ता है।
राजा इन्द्रद्युम्न के दूत को कबीले के सरदार ने बताया था कि राजा आयेंगे भी तो दर्शन नहीं होंगे क्यों कि ‘यम’ से किये वादे के अनुसार तब तक ‘नीलमाधव’ रेत में विलीन हो जायेंगे। इस बात में कृष्णयुग के यमक्षेत्र की धमक है। राजा जब पहुँचे तो नीलमाधव वस्तुत: रेत में विलीन हो चुके थे।
daru_narsinh
राजा को उनके स्थान पर वृक्षस्तम्भ पर उकेरे भयानक देवता से सामना हुआ। शाबरों में यमक्षेत्र से लाये गये वनसरू की स्मृति था वह स्तंभ और साथ ही स्थानीय वृक्षपूजा की परम्परा का पूज्य प्रतीक भी! बड़ी विकराल आँखों वाले भयानक देवता की पहचान राजा ने अपने सनातनी संस्कार से की – नृसिंह या नरसिंह!
पशु और मनुष्य के बीच की, नागर और वानर के बीच की, स्थापित परम्परा और विकल्प के बीच की कड़ी यानि नरसिंह। यही नरसिंह पहला पुरुषोत्तम हुआ।
नरसिंह जो कि विष्णु का अवतार है, विष्णु जो कि सूर्य का विकास है; आश्चर्य नहीं कि कोणार्क में सिंह और सिंहसवार नर की विजयी मूर्तियों की बहुलता है। कोणार्क में सूर्यपूजा की परिपाटी को पुन: गौरवमंच दिलाने की राह में भुबनेश्वर के लिंगराज शिव रोड़े नहीं थे बल्कि आड़े थे एक और सूर्यरूप यानि पुरी के विष्णु जगन्नाथ!
आश्चर्य नहीं कि इन्द्रद्युम्न को वृक्षरूप ईश्वर यानि दारुब्रह्म तक पहुँचाने वाले कोई और नहीं बल्कि ब्रह्मा के पुत्र यानि उनके उत्तराधिकारी नारद थे। क्या चाहते थे नारद? पिता का प्रतिशोध – विष्णु के समांतर एक सर्वथा नये देव की स्थापना? नीलाम्बुज श्यामल विष्णु की नील प्रस्तर प्रतिमा का स्थान लकड़ी के बने काले नरसिंह ने ले लिया।
बड़े का अहम भी बड़ा। कालान्तर में प्रथम पुरुषोत्तम नामधारी राजा नरसिंहदेव के मन में कहीं समय गंगा को उल्टा बहा पुन: नीलप्रस्तर को स्थापित करने की महत्त्वाकांक्षा तो नहीं थी? नीलमाधव नहीं नीलार्क! जिसके लिये उन्हों ने दारु यानि वृक्षतनों पर सवार पत्थरों के अवरोध और बहाव से छेड़छाड़ द्वारा मृतप्राय चन्द्रभागा नदी की बलि ही दे डाली!   
मिथकों की आड़ से इतिहास निकल कर सामने आ गया है। राजा इन्द्रद्युम्न के ऐतिहासिक रूप की पहचान हो चुकी है और नरसिंहदेव तो इतिहासपुरुष हैं ही...
...यायावर मिहिर के साथ व्यस्त है, उन दोनों को व्यस्त रहने दीजिये क्यों कि इतिहास तो खुल कर अब आया है सामने! पुरुषोत्तम के विकास की कहानी का एक पड़ाव तो सूर्यमन्दिर की भित्ति पर भी चित्रित है।
साथ बने रहिये। (जारी)

शुक्रवार, 29 जून 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 7 : देहरी और मिहिर से भेंट

भाग 1,  2, 3, 4, 5 और 6 से आगे...
बीते युग के सामने खड़ा हूँ, भीतर टटोल रहा हूँ – कुछ नहीं है, कुछ भी नहीं। कदम बढ़ते हैं और सामने जो है धीरे धीरे आहत सा श्रद्धा भाव उड़ेलता है – काश! ....
बद्रीनाथ धाम प्राण हथेली पर लेकर गया था - वर्षा और भयावह भू स्खलन से संघर्षरत। उनसे साक्षात हुआ, झेला, सीधी ऊँचाई पर पैरों के नीचे की भूमि को काँपते अनुभव किया और आँखों के आगे पूरी पहाड़ी को खिसकते देखा। यह प्रतीति पुष्ट हुई कि जीवन कुछ नहीं है। वर्तमान होता नहीं, भविष्य अज्ञात  और भूत तो जो बीत गई सो बीत गई। गर्भगृह में उस दिन सम्भवत: दस जन भी नहीं पहुँचे। विधिवत और सम्पूर्ण दर्शन, समय की कोई रोक टोक नहीं  – अम्मा का गद्गद कंठ स्वर सारे भाव ले डूबा।
समुद्र के प्रभास तट पर द्वारकाधीश मन्दिर की सन्ध्या आरती के समय दर्शन हुये और आँखों से आँसू बह चले थे - पहली बार किसी मन्दिर में उसके आँसू जिसने कभी वर्षों मन्दिरों में प्रवेश तक नहीं किया। मैं स्तब्ध हुआ था कि कहाँ से आये ये आँसू? कहाँ छिपे थे?
जगनाथ पुरी मन्दिर के बाहर की जीवन्तता से जितना ही प्रभावित हुआ, अन्त:पुर की गन्दगी से उतना ही विरक्त। गन्धाते चमगादड़ों की आहटें द्वार पर स्वागत करती हैं और भीतर!
मुक्तिमंडप(धाम?) के किनारे ऊँचाई पर बैठे पाँव लटकाये अनेक पतितपावन, उनके पाँव से मस्तक स्पर्श करा दो तो परम पुण्य, मुक्ति। हाय ईश्वर!  एक पंडे ने पूछा था – दर्शन करना हो तो ... नहीं करना मुझे दर्शन वर्सन। आँखों के आगे बोधगया मन्दिर का गर्भगृह नाच उठा।
...सामने स्वर्णमंडित बुद्ध हैं। चढ़ाये गये श्रद्धारूप रक्तकमल वेदी से झाड़ू से बुहार कर कचरे के प्लास्टिक पात्र में कुचले जा रहे हैं। राह में श्रीलंका, जापान, थाईलैंड और जाने कहाँ कहाँ से आये स्तोत्र पढ़ते मन्दिर जाते पंक्तिबद्ध श्रद्धालुओं के हाथ में रक्तकमल देख रोमांच हो आया था। यहाँ उनका इतना अनादर!
जीवंत मन्दिर, कुचली आत्मायें। नहीं करना दर्शन मुझे, पाँव द्वार से ही लौट गये थे। बोधिवृक्ष की बाड़ से कुछ स्वर्णअंश ले मैं लौट आया। बाहर हाथ के कमल को यथावत देख एक भिक्षु की विद्रूप मुस्कान देखा ही था कि उसका मोबाइल बज उठा था - जादू तेरी नज़र...तू है मेरी किरण। पास जा कर मैंने पूछ लिया - इस किरण की तलाश है या बुद्ध के बोध किरण की? वह नासमझ मुस्कान दे कर चलता बना...        
...लेकिन आज जो सामने है वह तो काव्य है! गहन आदर भाव जगाता है, बुलाता है कि आओ! मुझे निहारो...लम्बे गलियारे के सामने उत्तुंग श्यामल शिखर, दूर न हो कर भी दूर। प्रात: की छिपी किरणें ध्वस्त महालय के शेष अंशों के मध्य आराध्य को जैसे ढूँढ़ रही हैं और मेरे मन में एक वाक्यांश उठता है – प्रस्तर महाकाव्य कोणार्क! शिल्पियों का शब्दहीन दृश्य काव्य – कोणार्क। अभी तो भीतर गया भी नहीं, तो भी? पूर्व परिचय साक्षात हुआ है, नयनों से नयनों के पहले साक्षात्कार का पल है।  पुरी तट की लहरों पर रात रची कविता पराती बन आगे बढ़ उठी है:
Thousands and thousands of waves,
Millions of 'Kash' flowers dancing before eyes,
Dark cloudy sky, the moon listening attentive
To the tunes of wind and sea.
I'm in love at Puri beach.
....
Not only are by your pen o poet!
Words immortal in poetry cast
Watch the magic of chisel and sweat
Stones are here to long and last.
पत्थरों की कामना - ध्वंस के भीतर सनातन अस्तित्त्व। ऐसे ही होते रहे होंगे ऋचाओं के दर्शन:  
प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं
रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि ।
सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं
ब्रह्मा हरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ॥...
...बेटी ने हाथ पकड़ा है – “पापा... टिकट।“ तन्द्रा टूट गयी है। मुस्कुराते गुड्डू के मन में क्या है? क्या सोच रही होगी बेटी?
झेंप मिटाने को कहता हूँ – आगे खड़ी हो, तुम्हारा चित्र उतार लूँ।
konark_oil_1 
गुड्डू ने संकेत किया है – मैं वहाँ इंतज़ार करूँगा।
“जाओ गुड्डू! मुझे कोई जल्दी नहीं है।“
मैं वापस इहलोक में हूँ। पुरातत्त्व विभाग के लगाये प्रस्तर अभिलेख सामने हैं। हिन्दी में ‘शदी’ और ‘सुरक्षित स्थित’ की वर्तनी त्रुटियों से आहत अंग्रेजी देखता हूँ – पहली सदी में दूर देश के पेरिप्लस ने लिखा इस क्षेत्र का नाम कइनापारा या कैणापारा?...
konark_photo_1
... यहाँ स्थापित पत्तन था जहाँ जहाज रुकते थे, समुद्र मार्ग से व्यापार होता था। साम्ब की प्राचीन गाथा सच है। इस क्षेत्र में आक के पौधों की बहुलता भी उसे सिद्ध करती है। वैद्यकी में आक (अर्क या मदार) को सूर्य के गुणों का शोषक माना गया है। उसके कुष्ठ रोग से मुक्तिदायी होने के उल्लेख आयुर्वेद में मिलते हैं:
जीवितुं यदि वाञ्छन्ति सत्यर्के मयि भूतले ।
अन्धा: कुतोऽवसीदन्ति श्वासश्वित्रकफार्दिता:॥
(यदि नेत्रज्योति खोकर अंधे हो गये हो, श्वास, कास, श्वेत कुष्ठ और कफ के रोगों से पीड़ित हो और अब भी तुम्हारे जीने की इच्छा है तो मुझ आक के रहते हुए तुम कष्ट क्यों उठा रहे हो?)
‘कण्डूकुष्ठकृमिविनाशनः’ और ‘वातकुष्ठव्रणान्हन्ति’ आदि से भी स्पष्ट है कि अर्क कुष्ठरोग के उपचार में प्रयुक्त होता है। उल्लेखनीय है कि आधुनिक आयुर्वेद के जनक माने जाने वाले चरक भी सूर्यपूजक मग ब्राह्मण थे और आज भी गाँव देहात में त्वचा के श्वेतकुष्ठ को ‘चरक रोग’ कहा जाता है। ...   
...मन पुन: अनुमान लगाने लगा है - कइनापारा = कइना+पारा। पारा तो पुर या पुरी से निकसा होगा। आज भी भारत में गाँव या बस्तियों के नाम पीछे पुरवा, पाड़ा, पारा आदि लगते हैं लेकिन कइना? स्पष्ट है कि पुराने नाम में ‘अर्क’ नहीं है लेकिन ‘कइना’ है तो यह मानें कि स्थान नाम या तो केवड़े से सम्बन्धित है या कोण से? मैंने सिर को झटक दिया है – यह भी हो सकता है कि इसका उत्स इन सबसे न होकर किसी दूसरे अज्ञात कारक से हो, किस लिये सिर खपाना? मेरा मन कितना झूलता है रे! कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है? भाव भी कैसे इतनी तेज बदल जाते हैं! पल में तोला, पल में मासा!...
हम पहले आ पहुँचे दर्शकों में एक हैं। मन्दिर के और निकट हो एक और चित्र लेता हूँ।
konark_oil_2मुग्ध निहारता खड़ा हूँ कि सामने से एक स्वर आता है – साहब, गाइड करेंगे? ... मैं गवर्नमेंट अप्रूव्ड गाइड हूँ।
मन में भुनभुनाता हूँ – यायावर! तुम जिस तरह से चाहत का प्रदर्शन कर रहे हो, ताड़ने वाले ताड़ ही लेंगे कि बन्दा आसक्त है! लेकिन प्रकट में मैं निर्णय ले चुका हूँ – चार्ज कितना है?
“सौ रुपये”
मैंने सहमति में सिर हिला दिया है।
पूछ पड़ता हूँ – आप का नाम क्या है?
“मिहिर दास”
कानों पर विश्वास नहीं होता – मिहिर?
“हाँ, मिहिर दास।“
मैं पूछ बैठता हूँ – आप जानते हैं कि मिहिर माने सूर्य होता है?
वह सहमति में सिर हिलाते हैं।
निज महालय के दर्शन कराने को सूर्यदेव ने अपने अनुचर को भेज दिया है, और क्या चाहिये?
नन्दन कानन में जो गाइड मिले थे उनका नाम सनातन था। सनातन और मिहिरदास। सिवाय मिहिर नामधारी अपने भतीजे के ऐसे नामों वाले पहले जन मिले हैं मुझसे। उड़ीसा के नाम संस्कार अलग से हैं!
बात पक्की समझ मिहिर दास हमें एक वृक्ष की छाँव में ले जाते हैं – मन्दिर में प्रवेश के पहले कुछ बातें जान लीजिये।
वह हाथ जोड़ कर हमें प्रणाम करते हैं, औपचारिक अभिनन्दन करते हैं –पुरातत्त्व विभाग की ओर से मैं उड़ीसा के कोणार्क क्षेत्र में आप का स्वागत करता हूँ। मेरा नाम मिहिर दास है और मैं ...
मैं उनकी हिन्दी से थोड़ा अचम्भित सा हुआ हूँ लेकिन वह तेज प्रवाह में आ चुके हैं...अचानक मुझे सुध आती है – रिकॉर्ड कर लूँ, यहाँ तो कोयल की कूक भी है।


वह राजा के माँ की मन्नत बताते हैं। चन्द्रभागा नदी की बात करते हैं। यह भी बताते हैं कि मन्दिर खंडोलाइट पत्थरों से बना हुआ है जिनमें 32% तक लोहा होता है। मन्दिर के प्रवेशद्वार चौखट ग्रेनाइट पत्थरों में उकेरे गये हैं।
मन्दिर के पत्थरों को आपस में भी लोहे की छ्ड़ों से जोड़ा गया है। समुद्र की क्षारीय हवाओं से अभिक्रिया के कारण लौह तत्त्व का क्षरण हो रहा है और वह काला पड़ता जा रहा है – ब्लैक पैगोडा। वह मन्दिर की नागर उपशैली कलिंग की बात करते हैं जिसमें मन्दिर के चार द्वारों पर चार जंतुओं सिंह, शेर(?), हाथी, अश्व की प्रतिमायें होती हैं। प्रवेश में नवग्रह की मूर्तियाँ होती हैं।
 
एक सीधी रेखा में चार मंडप होते हैं – भोग, नृत्यनाट्य, प्रार्थना और मुख्यमन्दिर। नक्काशी बाहर तक सीमित होती है और भीतर की दीवारें सपाट रखी जाती हैं...
...उनकी बातों में गम्भीर त्रुटियाँ भी हैं। सेकुलरी प्रशिक्षण के कारण वह काला पहाड़ वाले दुखद इतिहास को छोड़ 55 टन भारी विराट मिथकीय चुम्बक पत्थर की बात करते हैं जिसने आकर्षण शक्ति से सभी पत्थरों को एक साथ बाँध रखा था। पुर्तगाली व्यापारियों ने उसे निकाल दिया। इस कारण मन्दिर ध्वस्त हो गया।    
परिचय व्याख्यान के पश्चात वह हमें पूर्वी सिंहद्वार पर ले आये हैं।
 (सिंहद्वार पर मैं और गाइड मिहिर दास) 
(जारी)

___________
कोणार्क यात्रा के पहले इन्टरनेट पर ही पर्याप्त अध्ययन किया था और उपयोगी सामग्री को अपने लैप टॉप में रक्षित कर लिया था। अब लिखते हुये उस सामग्री से उद्धरण दे रहा हूँ, दुबारा गोते लगा रहा हूँ। निरूपण में बहुत सहायता मिल रही है। वेब पर इन सामग्रियों के प्रदाताओं को मेरा नमन और आभार।