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शुक्रवार, 29 जून 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 7 : देहरी और मिहिर से भेंट

भाग 12, 3, 4, 5 और 6 से आगे...
बीते युग के सामने खड़ा हूँ, भीतर टटोल रहा हूँ – कुछ नहीं है, कुछ भी नहीं। कदम बढ़ते हैं और सामने जो है धीरे धीरे आहत सा श्रद्धा भाव उड़ेलता है – काश! ....
बद्रीनाथ धाम प्राण हथेली पर लेकर गया था - वर्षा और भयावह भू स्खलन से संघर्षरत। उनसे साक्षात हुआ, झेला, सीधी ऊँचाई पर पैरों के नीचे की भूमि को काँपते अनुभव किया और आँखों के आगे पूरी पहाड़ी को खिसकते देखा। यह प्रतीति पुष्ट हुई कि जीवन कुछ नहीं है। वर्तमान होता नहीं, भविष्य अज्ञात  और भूत तो जो बीत गई सो बीत गई। गर्भगृह में उस दिन सम्भवत: दस जन भी नहीं पहुँचे। विधिवत और सम्पूर्ण दर्शन, समय की कोई रोक टोक नहीं  – अम्मा का गद्गद कंठ स्वर सारे भाव ले डूबा।
समुद्र के प्रभास तट पर द्वारकाधीश मन्दिर की सन्ध्या आरती के समय दर्शन हुये और आँखों से आँसू बह चले थे - पहली बार किसी मन्दिर में उसके आँसू जिसने कभी वर्षों मन्दिरों में प्रवेश तक नहीं किया। मैं स्तब्ध हुआ था कि कहाँ से आये ये आँसू? कहाँ छिपे थे?
जगनाथ पुरी मन्दिर के बाहर की जीवन्तता से जितना ही प्रभावित हुआ, अन्त:पुर की गन्दगी से उतना ही विरक्त। गन्धाते चमगादड़ों की आहटें द्वार पर स्वागत करती हैं और भीतर!
मुक्तिमंडप(धाम?) के किनारे ऊँचाई पर बैठे पाँव लटकाये अनेक पतितपावन, उनके पाँव से मस्तक स्पर्श करा दो तो परम पुण्य, मुक्ति। हाय ईश्वर!  एक पंडे ने पूछा था – दर्शन करना हो तो ... नहीं करना मुझे दर्शन वर्सन। आँखों के आगे बोधगया मन्दिर का गर्भगृह नाच उठा।
...सामने स्वर्णमंडित बुद्ध हैं। चढ़ाये गये श्रद्धारूप रक्तकमल वेदी से झाड़ू से बुहार कर कचरे के प्लास्टिक पात्र में कुचले जा रहे हैं। राह में श्रीलंका, जापान, थाईलैंड और जाने कहाँ कहाँ से आये स्तोत्र पढ़ते मन्दिर जाते पंक्तिबद्ध श्रद्धालुओं के हाथ में रक्तकमल देख रोमांच हो आया था। यहाँ उनका इतना अनादर!
जीवंत मन्दिर, कुचली आत्मायें। नहीं करना दर्शन मुझे, पाँव द्वार से ही लौट गये थे। बोधिवृक्ष की बाड़ से कुछ स्वर्णअंश ले मैं लौट आया। बाहर हाथ के कमल को यथावत देख एक भिक्षु की विद्रूप मुस्कान देखा ही था कि उसका मोबाइल बज उठा था - जादू तेरी नज़र...तू है मेरी किरण। पास जा कर मैंने पूछ लिया - इस किरण की तलाश है या बुद्ध के बोध किरण की? वह नासमझ मुस्कान दे कर चलता बना...        
...लेकिन आज जो सामने है वह तो काव्य है! गहन आदर भाव जगाता है, बुलाता है कि आओ! मुझे निहारो...लम्बे गलियारे के सामने उत्तुंग श्यामल शिखर, दूर न हो कर भी दूर। प्रात: की छिपी किरणें ध्वस्त महालय के शेष अंशों के मध्य आराध्य को जैसे ढूँढ़ रही हैं और मेरे मन में एक वाक्यांश उठता है – प्रस्तर महाकाव्य कोणार्क! शिल्पियों का शब्दहीन दृश्य काव्य – कोणार्क। अभी तो भीतर गया भी नहीं, तो भी? पूर्व परिचय साक्षात हुआ है, नयनों से नयनों के पहले साक्षात्कार का पल है।  पुरी तट की लहरों पर रात रची कविता पराती बन आगे बढ़ उठी है:
Thousands and thousands of waves,
Millions of 'Kash' flowers dancing before eyes,
Dark cloudy sky, the moon listening attentive
To the tunes of wind and sea.
I'm in love at Puri beach.
....
Not only are by your pen o poet!
Words immortal in poetry cast
Watch the magic of chisel and sweat
Stones are here to long and last.
पत्थरों की कामना - ध्वंस के भीतर सनातन अस्तित्त्व। ऐसे ही होते रहे होंगे ऋचाओं के दर्शन:  
प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं
रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि ।
सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं
ब्रह्मा हरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ॥...
...बेटी ने हाथ पकड़ा है – “पापा... टिकट।“ तन्द्रा टूट गयी है। मुस्कुराते गुड्डू के मन में क्या है? क्या सोच रही होगी बेटी?
झेंप मिटाने को कहता हूँ – आगे खड़ी हो, तुम्हारा चित्र उतार लूँ।
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गुड्डू ने संकेत किया है – मैं वहाँ इंतज़ार करूँगा।
“जाओ गुड्डू! मुझे कोई जल्दी नहीं है।“
मैं वापस इहलोक में हूँ। पुरातत्त्व विभाग के लगाये प्रस्तर अभिलेख सामने हैं। हिन्दी में ‘शदी’ और ‘सुरक्षित स्थित’ की वर्तनी त्रुटियों से आहत अंग्रेजी देखता हूँ – पहली सदी में दूर देश के पेरिप्लस ने लिखा इस क्षेत्र का नाम कइनापारा या कैणापारा?...
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... यहाँ स्थापित पत्तन था जहाँ जहाज रुकते थे, समुद्र मार्ग से व्यापार होता था। साम्ब की प्राचीन गाथा सच है। इस क्षेत्र में आक के पौधों की बहुलता भी उसे सिद्ध करती है। वैद्यकी में आक (अर्क या मदार) को सूर्य के गुणों का शोषक माना गया है। उसके कुष्ठ रोग से मुक्तिदायी होने के उल्लेख आयुर्वेद में मिलते हैं:
जीवितुं यदि वाञ्छन्ति सत्यर्के मयि भूतले ।
अन्धा: कुतोऽवसीदन्ति श्वासश्वित्रकफार्दिता:॥
(यदि नेत्रज्योति खोकर अंधे हो गये हो, श्वास, कास, श्वेत कुष्ठ और कफ के रोगों से पीड़ित हो और अब भी तुम्हारे जीने की इच्छा है तो मुझ आक के रहते हुए तुम कष्ट क्यों उठा रहे हो?)
‘कण्डूकुष्ठकृमिविनाशनः’ और ‘वातकुष्ठव्रणान्हन्ति’ आदि से भी स्पष्ट है कि अर्क कुष्ठरोग के उपचार में प्रयुक्त होता है। उल्लेखनीय है कि आधुनिक आयुर्वेद के जनक माने जाने वाले चरक भी सूर्यपूजक मग ब्राह्मण थे और आज भी गाँव देहात में त्वचा के श्वेतकुष्ठ को ‘चरक रोग’ कहा जाता है। ...   
...मन पुन: अनुमान लगाने लगा है - कइनापारा = कइना+पारा। पारा तो पुर या पुरी से निकसा होगा। आज भी भारत में गाँव या बस्तियों के नाम पीछे पुरवा, पाड़ा, पारा आदि लगते हैं लेकिन कइना? स्पष्ट है कि पुराने नाम में ‘अर्क’ नहीं है लेकिन ‘कइना’ है तो यह मानें कि स्थान नाम या तो केवड़े से सम्बन्धित है या कोण से? मैंने सिर को झटक दिया है – यह भी हो सकता है कि इसका उत्स इन सबसे न होकर किसी दूसरे अज्ञात कारक से हो, किस लिये सिर खपाना? मेरा मन कितना झूलता है रे! कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है? भाव भी कैसे इतनी तेज बदल जाते हैं! पल में तोला, पल में मासा!...
हम पहले आ पहुँचे दर्शकों में एक हैं। मन्दिर के और निकट हो एक और चित्र लेता हूँ।
konark_oil_2मुग्ध निहारता खड़ा हूँ कि सामने से एक स्वर आता है – साहब, गाइड करेंगे? ... मैं गवर्नमेंट अप्रूव्ड गाइड हूँ।
मन में भुनभुनाता हूँ – यायावर! तुम जिस तरह से चाहत का प्रदर्शन कर रहे हो, ताड़ने वाले ताड़ ही लेंगे कि बन्दा आसक्त है! लेकिन प्रकट में मैं निर्णय ले चुका हूँ – चार्ज कितना है?
“सौ रुपये”
मैंने सहमति में सिर हिला दिया है।
पूछ पड़ता हूँ – आप का नाम क्या है?
“मिहिर दास”
कानों पर विश्वास नहीं होता – मिहिर?
“हाँ, मिहिर दास।“
मैं पूछ बैठता हूँ – आप जानते हैं कि मिहिर माने सूर्य होता है?
वह सहमति में सिर हिलाते हैं।
निज महालय के दर्शन कराने को सूर्यदेव ने अपने अनुचर को भेज दिया है, और क्या चाहिये?
नन्दन कानन में जो गाइड मिले थे उनका नाम सनातन था। सनातन और मिहिरदास। सिवाय मिहिर नामधारी अपने भतीजे के ऐसे नामों वाले पहले जन मिले हैं मुझसे। उड़ीसा के नाम संस्कार अलग से हैं!
बात पक्की समझ मिहिर दास हमें एक वृक्ष की छाँव में ले जाते हैं – मन्दिर में प्रवेश के पहले कुछ बातें जान लीजिये।
वह हाथ जोड़ कर हमें प्रणाम करते हैं, औपचारिक अभिनन्दन करते हैं –पुरातत्त्व विभाग की ओर से मैं उड़ीसा के कोणार्क क्षेत्र में आप का स्वागत करता हूँ। मेरा नाम मिहिर दास है और मैं ...
मैं उनकी हिन्दी से थोड़ा अचम्भित सा हुआ हूँ लेकिन वह तेज प्रवाह में आ चुके हैं...अचानक मुझे सुध आती है – रिकॉर्ड कर लूँ, यहाँ तो कोयल की कूक भी है।


वह राजा के माँ की मन्नत बताते हैं। चन्द्रभागा नदी की बात करते हैं। यह भी बताते हैं कि मन्दिर खंडोलाइट पत्थरों से बना हुआ है जिनमें 32% तक लोहा होता है। मन्दिर के प्रवेशद्वार चौखट ग्रेनाइट पत्थरों में उकेरे गये हैं।
मन्दिर के पत्थरों को आपस में भी लोहे की छ्ड़ों से जोड़ा गया है। समुद्र की क्षारीय हवाओं से अभिक्रिया के कारण लौह तत्त्व का क्षरण हो रहा है और वह काला पड़ता जा रहा है – ब्लैक पैगोडा। वह मन्दिर की नागर उपशैली कलिंग की बात करते हैं जिसमें मन्दिर के चार द्वारों पर चार जंतुओं सिंह, शेर(?), हाथी, अश्व की प्रतिमायें होती हैं। प्रवेश में नवग्रह की मूर्तियाँ होती हैं।
 
एक सीधी रेखा में चार मंडप होते हैं – भोग, नृत्यनाट्य, प्रार्थना और मुख्यमन्दिर। नक्काशी बाहर तक सीमित होती है और भीतर की दीवारें सपाट रखी जाती हैं...
...उनकी बातों में गम्भीर त्रुटियाँ भी हैं। सेकुलरी प्रशिक्षण के कारण वह काला पहाड़ वाले दुखद इतिहास को छोड़ 55 टन भारी विराट मिथकीय चुम्बक पत्थर की बात करते हैं जिसने आकर्षण शक्ति से सभी पत्थरों को एक साथ बाँध रखा था। पुर्तगाली व्यापारियों ने उसे निकाल दिया। इस कारण मन्दिर ध्वस्त हो गया।    
परिचय व्याख्यान के पश्चात वह हमें पूर्वी सिंहद्वार पर ले आये हैं।
 (सिंहद्वार पर मैं और गाइड मिहिर दास) 
(जारी)

___________
कोणार्क यात्रा के पहले इन्टरनेट पर ही पर्याप्त अध्ययन किया था और उपयोगी सामग्री को अपने लैप टॉप में रक्षित कर लिया था। अब लिखते हुये उस सामग्री से उद्धरण दे रहा हूँ, दुबारा गोते लगा रहा हूँ। निरूपण में बहुत सहायता मिल रही है। वेब पर इन सामग्रियों के प्रदाताओं को मेरा नमन और आभार।

सोमवार, 18 जून 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 5 : अपराधी कौन?

 

भाग 12, 3 और 4 से आगे...

 

3609612817_71b08f1233_zखिडकियों के काँच ऊपर करवा दिये हैं। ए सी तीन पर है और टैक्सी में नींद झपकियाँ – नहीं, मुझे इस मार्ग का सब देखना है, जगे रहना होगा। बन्द करो ए सी!

ब्लैक पैगोडा यानि काला देवमन्दिर। काले मन्दिर से याद आता है काला पहाड़, बंगाल का अभिशाप। सोचता हूँ कि कुछ अधिक ही पढ़ लिख गया...

 

...काल में बहुत दूर पहुँच गया हूँ – सम्भवत: 1986 या 87। टाउन में दशहरे का पर्व उत्सव है। धूम धाम थम चुके हैं। रात की नीरवता में 50-60 प्रबुद्ध स्त्री पुरुषों की छोटी सी सभा है और दूर पंजाब से आये ऋषितुल्य वृद्ध पराशर जी प्रवचन दे रहे हैं। प्रवचन नहीं कह सकते, कथा वार्ता कर रहे हैं... पंजाबी, संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं के मिश्रित वाक्य, थीम है – ‘अपराधी कौन?’

 

तेज प्रकाश में सफेद दाढ़ी से घिरे प्रशांत मुखमंडल से आता एक वाक्य जम गया, आज जैसे कैमरे का फ्लैश चमका हो – कालीचन्द्र को कालापहाड़ बनाने का अपराधी कौन?

प्रकट में बुदबुदाता हूँ – सूर्यमन्दिर को खंडहर बनाने का अपराधी कौन?

 

प्रेम या प्रतिशोध, संकीर्णता या कट्टरता? उत्तर में सहम कर मनधुन को चुप कर बैठा हूँ, आज तक जिन प्रश्नों से जूझे जा रहा हूँ, उन्हें यहाँ भी उठना था!

 

उदास दृष्टि पथ की वनस्पतियों पर चली गई है, मैं मौन हूँ, मानस की अतल गहराइयों तक ...आँखों में पहचान धीरे धीरे उठने लगी है, मदार के फूल पथ के दोनों ओर खिले हुये हैं।

मदार यानि अर्क, अर्कक्षेत्र है यह, कोई आश्चर्य नहीं!

 

...लेकिन अर्क के साथ कहीं कतारबद्ध कहीं यूँ ही तितर बितर, दूर तक फैली यह दूसरी वनस्पति कौन है? पहचान गया हूँ।

हे देव! यह कैसा संयोग? पुन: स्मृति की वीथियों में!

 

... दिन है। ऑफिसर्स क्वार्टरों की पंक्तियाँ हैं। वह कोना अभी भी याद है -एक मोहक दृष्टि,”गिरिजेश, यह देखो फूल! कितनी अच्छी महक है।“  पौधे के साथ फूल है - बड़ा जड़ सहित पौधा, विचित्र जड़। तीखी मधुर गन्ध, रूप कमल की पंखुड़ियों जैसा कुछ। किसे देखूँ? फूल को या दिखाने वाले को?...

 

...चड्ढा भैया आये हैं। पूजा की चौकी पर पिताजी विराजमान हैं। पूरा कमरा महमह है – गुरु जी! यह आप के लिये। कई दिनों तक ऐसे ही सुगन्धित रहेगा।...  

...पुस्तक के वल्मीक। पन्नों से सूखे फूल की पंखुड़ियाँ झर रही हैं। मैं लिखते हुये किसी और लोक में हूँ। कैसे कैसे लोग, कैसी कैसी बातें! – देखते देखते सब बदल गया।...अभिशप्त है यह फूल! अभिशप्त है प्रेम, गिरिजेश! यह प्रेम अभिशप्त है...अभिशापों के अनन्त आवर्त। यहाँ, अर्कभूमि में आशीर्वाद ढूँढ़ रहे हो पगले!...

 

... जाने वहाँ सूर्यमन्दिर पर पहुँच कर क्या हो! अभी घर से लिखे जा रहे यात्रावृत्त में तन और मन दोनों हैं लेकिन मन कुछ अधिक ही बौराया हुआ है...

 

संकीर्णता का अभिशाप, क्रूर अट्टहास है, रह रह अल्ला हो अकबर का घोष है।

“बुतपरश्तों ने यहाँ हजारो बुत तामीर किये हैं। बुतखाना ही ढहा दो!”

“दीवारें बहुत मोटी हैं। यह बंगाल नहीं कलिंग है। बुतपरस्तों को अधिक देर रोक पाना मुमकिन नहीं है।“

“हुजूर! यह काफिर बोलता है कि सही रकम मिले तो बता सकता है कि बुतखाना कैसे नेस्तनाबूत हो।“ काफिर ने रकम के वादे पर बताया और बदले में मृत्यु पाया। काला पहाड़ ने उसका स्वयं शिरच्छेद कर दिया...

... मन्दिर के गर्भगृह शिखर का दधिनौति पत्थर यानि key stone - वह पत्थर जो विभिन्न भार विन्दुओं से आती दबाव रेखाओं को एक स्थान बाँधे रखता है ताकि बिना गारे मसाले के जमाये गये पत्थर अपने स्थान पर संतुलित बने रहें।

काला पहाड़ के सिपाहियों ने उसे ढीला करना शुरू कर दिया। हिला हिला कर उसका सारा जोर खत्म कर दिया। गिरा नहीं पाये थे कि उन्मत्त उड़िया सनातनी टूट पड़े। भयंकर प्रतिरोध युद्ध हुआ। काला पहाड़ चला गया लेकिन अपना काम कर गया। संकीर्णता, कट्टरता के अभिशाप काले देवमन्दिर पर अपना रंग भविष्य में दिखाने वाले थे।...

आज लिखते हुये उसके अभिशाप की कथा तो सुना ही दूँ।

...सम्भ्रांत कुल का युवक कालीचन्द्र ढाका की गलियों में काम की तलाश में घूम रहा था। नवाब की पर्दानशीं पुत्री की दृष्टि उस पर पड़ी। दोनों की नजरें चार हुईं और प्रथम दृष्टि का प्रेम हो गया। युवक में इतना साहस कहाँ कि आगे की सोचे? लेकिन आग दोनों ओर थी बराबर लगी हुई। प्यारी पुत्री ने पिता को मजबूर कर दिया।  कालीचन्द्र की बुलाहट हुई, प्रस्ताव रखा गया – इस्लाम स्वीकार करो और मेरी पुत्री से निकाह पढ़ो।

काली ने इस्लाम कुबूलने से मना कर दिया। क्रुद्ध नवाब ने उसके कत्ल का हुक्म दे दिया। ऐन मौके पर पुत्री आ पहुँची – पहले मैं फिर ये। अगर इन्हें मार दिये तो आप मेरा मरा हुआ मुँह देखेंगे।

 

नवाब को झुकना पड़ा। बस अग्नि को साक्षी मान हुये विवाह के साथ ही उठे सनातन धर्म के अभिशाप। धर्म धुरन्धरों ने मलेच्छ यवन कन्या के साथ विवाह को मान्यता देने से मना कर दिया। काली जाति बहिष्कृत हो गया। तड़पती माँ की परवाह किये बगैर पिता ने नवदम्पति को घर में प्रवेश तक नहीं करने दिया। उन्हें तालाब और कुआँ तक की मनाही हो गई।

काली चाहता तो नवाब की शरण में रह सकता था लेकिन उस स्वाभिमानी पर जाने कौन सी धुन सवार थी! पत्नी को साथ ले नवद्वीप के पंडितों के यहाँ पहुँचा – मनाही, तिरस्कार। जिस जगन्नाथ के यहाँ कोई भेद नहीं रह जाता, वहाँ पहुँचा। पंडों ने अपमानित किया, प्रवेश तक नहीं करने दिया!

 

क्षुब्ध प्रतिहिंसा में कालीचन्द्र ने ढाका लौट कलमा पढ़ लिया। उसके बाद उसकी तलवार जिस तरह से काफिरों के गले चली, जिस तरह से इस्लामी परचम का आतंक उसने फहराया और जिस तरह से पूरे पूर्वी बंगाल की बहुसंख्य आबादी को इस्लाम कुबूलने पर उसने मजबूर किया; सबका निचोड़ उसके नये नाम में समाया दिखता है – काला पहाड़!

पराशर अक्सर कहा करते थे –

दिल के फफोले जल उठे सीने के दाग से,

इस घर को आग लग गई घर के चिराग से।...

 

... पुरानी पुस्तक के पीले पड़ चुके पन्ने आज भी हाथ में हैं। इनसे उस अभिशप्त फूल की सूखी पंखुड़ियाँ नहीं झड़ रहीं जिसकी कथा आगे कहनी है, इनके शब्दों से अभिशाप झड़ रहे हैं। ऋषि पराशर की मेघ ध्वनि आज भी कानों में गूँज रही है – अपराधी कौन?

 

2012-06-18-930

शुक्रवार, 8 जून 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर- 3 : पिता पुत्री द्वारा ध्वंस का पुनर्निर्माण

बीते दिनों अपरिहार्य कारण से गाँव भागना पड़ गया इसलिये कोणार्क यात्रावृत्त लेखन में व्यवधान पड़ा। आप को स्मरण होगा कि हम चन्द्रभागा से कोणार्क सूर्यमन्दिर की ओर निकले ही थे...
...गाँव में लगे हाथ मैंने अपने भतीजे का जन्मदिन भी मना लिया जो कि 6 जून को पड़ता है। 
...सूर्यमन्दिर को देखने पर सबसे पहले एक उच्छवास निकलती है जिसमें भव्यता पर चकित होने के भाव के साथ यह पीर भी होती है कि यदि यह ध्वस्त नहीं हुआ होता और तब यह कौतुहल जगता है कि कैसा रहा होगा मन्दिर अपनी सम्पूर्णता में?
इस भाग में कौतुहल शांत करने का यत्न है। यात्रा तो चलती रहेगी...
___________________________
कोणार्क सूर्यमन्दिर के प्रधान शिल्पी का नाम बीसू महराना था जिनके नेतृत्त्व में 1200 शिल्पकारों ने राजा नरसिंहदेव के साथ बारह वर्ष में सूर्य मन्दिर पूरा करने की संविदा की थी। राजा ने राज्य के 12 वर्षों के कराधान के बराबर की पूँजी इस काम के लिये नियत की थी। 12 की संख्या का सम्बंध द्वादश आदित्यों से हो सकता है। 
पिता पुत्र ने उस युग में मन्दिर को पूर्ण किया और हम पिता पुत्री इस डिजिटल युग में बिना किसी राजा और बिना अथाह पूँजी के एक ध्वंस को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। बीसू महराना के बालक पुत्र धर्मपाद के आत्मबलिदान की करुण कहानी आगे बतायेंगे।...
...मैं नेट पर पुराने चित्र ढूँढ़ने में लग जाता हूँ और पुत्री फोटो शॉप पर अपने यंत्र तंत्र...
काम का पहला चित्र मिलता है स्कूल ऑफ प्लानिंग ऐंड आर्किटेक्चर के छात्रों की एक प्रस्तुति में जिसमें मन्दिर का प्लान (क्षैतिज योजना) दर्शाया गया है। देखिये:
पूर्वाभिमुख मन्दिर नागर शैली की ओडिशा उपशैली में बना था जिसमें दक्षिण की भाँति गोपुरम नहीं वरन गर्भगृह का शिखर सबसे प्रमुख और ऊँचा होता है। शिखर पर्वतों की चोटियों की भाँति बनाये जाते हैं जिनके शीर्ष पर आँवले के फल सदृश आमलक पत्थर, कलश और ध्वज होते हैं।
सबसे आगे नृत्य मंडप (नट मन्दिर) था जो कि मुख्य मन्दिर के आधार से असम्‍पृक्त था। यहाँ देवदासियों के नृत्य के अतिरिक्त और सांस्कृतिक गतिविधियाँ होती थीं। इसमें द्वार तो थे किंतु कपाट नहीं थे अर्थात यह चारो ओर से खुला हुआ था जिससे कि जनता सब ओर से नृत्य देख सके। इसका मुख्य द्वार तीन भागों में विभक्त था जिनसे होकर प्रात:कालीन किरणें सम्मुुुख के जगमोहन से होते हुये गर्भगृह की प्रतिमा पर पड़ती थीं। तीन द्वारों में से किस द्वार से किरणें प्रवेश करेंगी, यह इस पर निर्भर था कि अपने वार्षिक चक्र में सूर्य किस राशि पर हैं।
मुख्य मन्दिर और नृत्य मंडप के बीच लगभग 10-11 मीटर ऊँचा अरुण स्तम्भ था जिसके शीर्ष पर सूर्य सारथी अरुण की प्रतिमा थी। यह स्तम्भ जगमोहन प्रवेश द्वार की पूर्व-पश्चिम केन्द्ररेखा से हट कर रहा होगा, सम्भवत: नृत्य मंडप के पूर्वी प्रवेश द्वार को तीन भागों में बाँटने वाले स्तंभों में से किसी एक स्तम्भ की सीध में जिससे कि इसकी छाया गर्भगृह में न जाय। मुख्य मन्दिर का जगमोहन भाग सभा मंडप भी कहा जाता है जिसमें विमर्श या अनुष्ठान हेतु सभायें जुटती होंगी।
जगमोहन के आगे गर्भगृह है जिसमें मुख्य प्रतिमा स्थापित थी। इस सूर्य मन्दिर की विशेषता यह थी कि प्राची को छोड़ गर्भगृह चैत्य की तीन दिशाओं में सूर्य की क्रमश: प्रात: (दक्षिण), मध्याह्न (उत्तर) और अस्ताचल (पश्चिम) प्रतिमायें स्थापित थीं, जिन पर आकाश में भ्रमणशील सूर्य की किरणें क्रमश: इन समयों पर पड़ती थीं। अब ये प्रतिमायें भिन्न दिशाओं में स्थापित हैं और पर्याप्त सुरक्षित हैं।
वर्तमान में कलश के अतिरिक्त जगमोहन सुरक्षित है और छत के अतिरिक्त नृत्य मंडप, शेष सब कुछ ध्वस्त हो चुका है।
इसके पश्चात अंग्रेजों के बनाये दो चित्र मिलते हैं जिनसे यह पता चलता है कि 13 सितम्बर 1820 और 1847 में भी गर्भगृह का कुछ भाग ध्वस्त होने से बचा रह गया था। इन चित्रों से यह अनुमान लग जाता है कि मुख्य विमान आकृति में नागर शैली के मन्दिरों की भाँति ही था।



नेट पर ही एक पुराना रहस्यमय सा चित्र मिलता है जो कि फोटोग्राफ होने का आभास देता है। चूँकि सन् 1820 में भी मुख्य विमान ध्वस्त दशा में था, यह चित्र उससे बहुत पहले का है और स्पष्टत: फोटोग्राफ न हो कर किसी प्रकार की काष्ट नक्कासी या पेंटिंग ही है। इसमें मुख्य विमान सम्पूर्ण दिखता है किन्‍तु पार्श्व का छोटा उपमन्दिर विमान जिसमें कि सूर्य की उल्लिखित तीन प्रतिमाओं में से एक स्थापित रही होगी, ध्वस्त होने का आभास देता है। जिस प्रकार से वनस्पतियाँ दर्शाई गई हैं, निश्चित हैै कि यह किसी प्रशिक्षित यूरोपीय हाथ की कृति है और यह भी कि उस समय मन्दिर का रखरखाव नहीं हो रहा था। हम तय करते हैं कि यही कालखंड पुनर्रचना का आधार होगा।
मैं पुत्री को स्मरण कराता हूँ कि वर्तमान में अरुण स्तम्भ पुरी जगन्नाथ मन्दिर के पूर्वी द्वार के सम्मुख स्थापित है जिसे मराठे वहाँ ले गये थे और मैंने उसे दिखाया भी था। इसकी परिधि वृत्ताकार नहीं, सोलह भुजाओं वाली बहुभुज है। नृत्य मंडप की सीलिंग पर स्थापित कुंजिकाप्रस्तर का गोला भी सोलह भागों में विभक्त था जो कि अब किनारे पड़ा हुआ है। नेट पर स्तम्भ का यह स्पष्ट चित्र मिलता है:
नृत्य मंडप के लिये हम अपने खींचे पैनोरमा चित्र पर भरोसा करते हैं। फोटोशॉप में चित्र और फोटोग्रॉफ को मिश्रित करना सरल होता है।
सूर्य प्रतिमा के ढेर सारे चित्र मिलते हैं किंतु जो काम का मिलता है वह दो टुकड़ों में है। प्रतिमा का अर्धांश सूर्य किरणों से प्रकाशित है। इनका चयन संकटकारी है क्यों कि दोनों भागों को जोड़ने में बहुत समय जाता है। तब भी हमलोग परिणाम से संतुष्ट हैं।
मैं बेटी को बताता हूँ कि परित्यक्त मन्दिर की स्थिति वनस्पतियों के सहसंयोजन से दिखाये। कुछ पौधे मन्दिर के शिखरों पर भी दिखें और ध्वस्त उपमन्दिर का वह भाग जिसमें सूर्य प्रतिमा स्थापित दिखे, वनस्पतियों से घिरा आच्छादित हो जिनके भीतर से पत्थर शिल्प झाँकता दिखे। सूर्य प्रतिमा को इस प्रकार से कोणित कर के स्थापित करे कि पैनोरमा में विषम न दिखे और साथ ही आधे भाग पर पड़ती सूर्य किरणों का प्रकाश दृश्य हो।
नृत्य मंडप की ऊँचाई जगमोहन से अल्प रही होगी किंतु आधार का चत्वर समान ऊँचाई का दिखना चाहिये जो कि आज भी है। अरुण स्तम्भ की ऊँचाई अवश्य ही शिखरों से अल्प रही होगी, किनारे रहने के कारण स्यात उस पर भी सूर्योदय की पहली किरणें पड़ती होंगी।
... तो यह रहा पहला प्रयास:
"... नहीं बेटी! नृत्य मंडप को तो तुमने पूर्णत: जगमोहन की अनुकृति बना दिया! स्मरण रहे कि उसका घेरा खुला हुआ था। फोटो से उस भाग को लो। केवल छत को जगमोहन से ले कर स्केल कर दो। ...वनस्पतियों की एकरूपता निश्चित करो। अरुण स्तम्भ तो दिखाया ही नहीं! ... सूर्य प्रतिमा को थोड़ा और दक्षिणावर्त घुमाओ। कलश कॉपी कर के ठीक लगाया! खंडहर हुआ उपमन्दिर और वनस्पतियाँ ठीक आई हैं।"

पुन: प्रयास कुछ इस प्रकार : 

अंतत: यह रहा पुनर्निर्माण। महान शिल्पी बीसू, उनके पुत्र धर्मपाद और शिल्पी साथियों को डिजिटल युग के एक पिता पुत्री की अति लघु श्रद्धांजलि ...


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"पापा! इसे कॉपीराइट कर दूँ? इतना टाइम लगा!"
"नहीं... शिल्पियों ने तो कॉपीराइट नहीं किया था और उन लोगों ने भी नहीं जिनके चित्रों से हमें इतनी सहायता मिली।... क्या पता कल को कोई और इसे और सँवारना चाहे? अभी भी प्रकाश प्रभाव उतना अच्छा नहीं आ पाया है। नहीं? ... वैसे जैसी तुम्हारी इच्छा।"
बेटी को उसका स्पेस तो मिलना ही चाहिये। 

शनिवार, 2 जून 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर- 1 : शापित आशीर्वाद

2012-05-29-628
मोबाइल अलार्म पर भूमि सूक्त बज उठा है:
पुरी।
रात का अंतिम प्रहर 3:30। प्रथम प्रहर में पुरी तट की लहरों पर अठखेलियाँ करती अंग्रेजी कविता लुप्त हो चुकी है। आज धरती नहीं आदित्य से साक्षात्कार है। पुत्री को जगाता हूँ – उठो! तैयार हो जाओ। टैक्सी साढ़े चार तक आ जायेगी। सूर्योदय चन्द्रभागा तट पर देखेंगे...
...प्रसाधन कपाट बन्द होने के साथ वाक्य मन में पूरा करता हूँ ...और किरणों के स्वामी आदित्य को कोणार्क में।
कोणार्क: सन्धि विच्छेद कोण और अर्क क्रमश: ज्यामिति और सूर्य के लिये या कोण से कोना और अर्क से निचोड़ यानि समस्त दिशाओं के कोनों का निचोड़?
इतने महान उद्देश्य और इतनी उदात्तता के साथ स्थापित मन्दिर ध्वस्त कैसे हो गया? शापित क्यों हो गया?
कुछ भी हो शापित के लिये शापित 'कोणादित्य' ही आराध्य है।
एक मिथक कहता है - अनिन्द्य सुन्दरी सुमन्यु पुत्री चन्द्रभागा के साथ कामवश सूर्य ने दुर्व्यवहार किया और उसके पीछे भागा। निज को बचाती भागती चन्द्रभागा ने लज्जा बचाने को जिस नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली, वह उसके नाम से प्रसिद्ध हुई। पुत्री की आत्महत्या से क्षुब्ध सुमन्यु ने सूर्य को शाप दिया। कालांतर में शापित सूर्यमन्दिर ध्वस्त हो गया...
मन्दिर निर्माण के लिये पत्थर नदी मार्ग से लाये गये थे। कौन थी वह नदी? क्या हुआ उसके साथ?
...प्रश्नगुच्छ लिये बाहर आ गया हूँ। नभ में मेघों का आभास है और ऊषा कहीं नहीं है।
प्रणाम पुरी! ऊषा मिले तो ला दो न! अपने आकाश से मेघ घूँघट हटा दो, मैं देखना चाहता हूँ।
भला प्रकृति ने मनुष्य की कब सुनी जो आज सुनेगी?...
...किसी युग में दो ही आराध्य थे – धरती मैया और सूरज दादा। आज धरती मैया अपूजनीय है, चिंत्य है और गिने चुने सूर्य मन्दिर ही बचे हैं। और किस किसने शाप दिये? कुछ नहीं यह चक्र है - सभ्यतायें उत्कर्ष और अपकर्ष को प्राप्त होती हैं। सूर्य और धरती चुपचाप स्वयं को प्रवादग्रस्त होते देखते हैं। मनुष्य निज पछतावों के मिथक गढ़ते जाते हैं...
उमस है, भीगने लगा हूँ।
“पापा, जाइये नहा लीजिये।“
पहले जल स्नान और फिर टाल्क स्नान – घिसे हुये और सुगन्धित किये कोमल पत्थरों के बारीक प्रवाह - मैं श्वेतांग। आदित्य को स्वेद प्रसाद नहीं चढ़ाना लेकिन इस जलवायु में क्या यह सम्भव है? हम दोनों तैयार हैं। परदा हटा कर खिड़की के काँच से बाहर झाँकता हूँ। प्रत्यूष काल है। एक स्मृति जगती है और आश्चर्य से जड़... चेतन हो बाहर आ जाता हूँ। क्या मैं भविष्य देख सकता हूँ? सब कुछ तो वैसा ही है! प्रार्थना के आँसू छ्लक उठे हैं। वही स्वर पुन: उठ रहे हैं:
बन्द गवाक्षों में सागौन से घिरे क्षीण स्फटिक पल्ले हैं। उनसे झाँकता आसमान कुछ कम नीला है।नीचे धरा की लहलहाती चूनर। कोप प्रदर्शन के पहले की शांति? नहीं। दधि अच्छी नहीं बनी तो क्रोध में निकाल निकाल फेंक दिया।  आसमान में यत्र तत्र श्वेत बादलों के टुकड़े हैं और नीचे शांति। खगरव आज बहुत कम है।
समीर कैसा है? घावों के दाह को कोई फूँक फूँक शमित कर रहा है। रह रह झोंके। छींकें, छींकें... भीतर बन्द रहने को अभिशप्त फिर भी घाव पर रह रह फूँक। बुदबुदाते नाना, आदिम मंत्र पढ़ते, चेहरे पर फूँक मारते नाना। देवमन्दिर में प्रकाश नहीं है। आज आराधना नहीं। आने दो छींक को।
नभ को तज कर गायत्री उद्धत विश्व के मित्र के पास कैसे आई होगी? बस चौबीस पगों में अनंत की दूरी पार कर ली!
विश्वामित्र! कितना अधैर्य, कितनी प्रतीक्षा, कितनी करुणा रही होगी तुम्हारी पुकार में!! उस दिन खगरव अवश्य शून्य रहा होगा। धरा उस दिन भी रूठी रही होगी।  ऋचा गायन छोड़ दधि बिलोने में लग गई होगी।
...  शांति इतनी प्रबल भी हो सकती है। ध्वनियाँ होकर भी नहीं हैं।
ऐसे में प्रार्थना गाने को मन करता है।
क्या गाऊँ?
खेळ चाललासे माझ्या पूर्वसंचिताचा,
पराधीन आहे जगतीं पुत्र मानवाचा?
या
अमृतस्य पुत्रा:..
सब दूसरों के स्वर हैं। मुझे तो अपने स्वरों में गाना है।
छत पर समीर से भेंट कर लूँ। दधि टुकड़े नील श्वेत में लुप्त से होने लगे हैं।...
...और मोबाइल में पुन: भूमि सूक्त बज उठा है, इस बार बुलावा है। टैक्सी चालक बाहर खड़ा है – 4:30। तुम्हारी निष्ठा को प्रणाम चालक! ...हम चल पड़े हैं...कोणार्क को जो पुरी से 35 किलोमीटर की दूरी पर है।
भीतर जैसे बाहर का सारा मौन निचुड़ कर समा गया है। मैं वर्षों पीछे जा पहुँचा हूँ...
Sun-Temple2
तुर्कपट्टी महुअवा, जिला कुशीनगर, उत्तर प्रदेश। सूर्यमन्दिर के प्रांगण में खड़ा हूँ। सूर्य की नीलम प्रतिमा सामने है। गुप्तकाल पाँचवी या आठवीं सदी। सिवाय प्रतिमाओं के कुछ नहीं बचा। आदित्यप्रतिमा से पहला साक्षात्कार है। किसी पुराकथा की अंतिम पंक्ति उड़ी सी आती है – मनुष्य नष्ट हुआ और प्रस्तर बच गया...
“मनुष्य पुनर्जन्म ले रहा है। नहीं लेता तो यह प्रतिमा पुन:स्थापित नहीं होती।“
“किस भुलावे में हो यायावर?”
“मैं यायावर नहीं, यहीं का वासी हूँ और तुम्हारा उत्खनन मेरे जन्म के बाद हुआ है। समझे कि नहीं?“...
...पुत्री सो गई है। मैं कालडाल पर पेंगे मार रहा हूँ – स्वप्न, जागृति, स्वप्न, जागृति ... समय में और पीछे चला गया हूँ...
 कार्तिक शुक्ल पक्ष की छठवीं तिथि। सूर्य षष्ठी का पर्व यानि छठ। अपना जन्म किसे याद आता है?
परंतु मैं निज जन्म की रात के पश्चात के सबेरे में हूँ। घाटों पर स्त्रियाँ दीपक जलाये भोर से ही प्रतीक्षा में हैं। प्रसूतिगृह में जलती हुई लालटेन है। पीड़ा की नदी से उबरी मास्टरनी अब ममता तट पर आह्लादित खड़ी है। मास्टर जी सद्य:जात को गोद में लिये बैठे हैं और मन ही मन जैसे उगते सूर्य को अर्घ्य दे रहे हैं:


...पुरी से 31 किलोमीटर पर समुद्र का चन्द्रभागा तट।
2012-05-29-597
नदी कहाँ है? बताओ देव! कहाँ है?
बाबा घहर रहे हैं - घह घह घह घहा घह घह घहा।
आँधी नहीं आ रही। 
दधि के टुकड़ों से  समीर तृप्त हो डकारे ले रहा है। उसका स्वर ऐसा ही होता है। 
यह मेरे बाबा की घहरन नहीं है?

“भविष्यद्रष्टा! तुम्हें चन्द्रभागा नहीं मिलेगी। प्रतीक्षा करो, आदित्य आ रहे हैं। उन्हीं से पूछ लेना।“

आदित्य! आओ न! देखो, हमने स्तूप बनाया है। शिव को स्थापित किया है और मन्दिर भी बनाया है। प्रकाशित कर जाओ न! आओ न!
2012-05-28-584
2012-05-29-591

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