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शनिवार, 7 जुलाई 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 9 : अपरा इतिहास

भाग 12, 3, 4, 5, 6, 7 और 8 से आगे...
four-sunsपरा इतिहास से अब हम अपरा इतिहास की ओर चलते हैं। नरसिंह से मिलते जुलते रूप में सूर्य का उकेरण मेक्सिको की एज़्टेक सभ्यता में भी मिलता है। अपनी तीखी ताप के कारण वहाँ भी सूर्य उग्र रूप में चित्रित है और उसका एक प्रकार सिंह जाति का प्राणी जगुआर है।
इन्द्रद्युम्न का अभिजान दसवीं-ग्यारहवीं सदी के राजा इन्द्ररथ से किया गया है। उड़ीसा में यह समय आदिम सूर्यपूजा, बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त, वैष्णव आदि के समन्वय का था। इन्द्ररथ से पहले के सैलोद्भव राजाओं ने माधव आराधना को प्रसार दिया था और नियाली माधव, कंटिलो आदि की स्थापना उनके समय में हुई थी।
सैलोद्भवों के पश्चात आये शाक्त भौम शासकों ने पुरी में नीलमाधव की आराधना बाधित कर शक्ति पूजा केन्द्रों की स्थापना की। पुरी में देवी के विमला रूप की पूजा होने लगी, ककटपुर में मंगला की और भुबनेश्वर में भुवनेश्वरी की।  उल्लेखनीय है कि पुरी का वर्तमान मन्दिर एक बहुत ही प्राचीन मन्दिर के ध्वंस पर बना हुआ है और उसके घेरे में शक्तिरूपा देवी का वह लघु मन्दिर भी है, 'महाप्रसाद' होने के लिये जहाँ जगन्नाथ का प्रसाद चढ़ाया जाना अनिवार्य है। कहते हैं कि शक्ति ने जगन्नाथ को स्थापित होने की अनुमति इसी पूर्व अभिसंधि के साथ दी थी। स्पष्ट है कि सूर्य पूजा के अतिरिक्त शक्ति पूजा भी जगन्नाथ से पहले के हैं और राजा इन्द्ररथ द्वारा दारुब्रह्म यानि लकड़ी के शाबर देव नरसिंह की पुरुषोत्तम रूप में स्थापना इसी समय के निकट हुई। 
शाक्तों के समान तंत्र की एक परम्परा में नरसिंह को पुरुषोत्तम कहा गया है जो अपनी संगिनी विमला के साथ विराजते हैं। उल्लेखनीय है कि उड़िया शैव परम्परा में नरसिंह शिव को व्यक्त करते हैं। वैष्णव नरसिंह और शैव नरसिंह का यह समन्वय राजसत्ता के संरक्षण के कारण सूर्य पूजा और ब्रह्मा की परम्परा पर भारी पड़ा। भौम शासकों के समय ही तंत्र से समानता के कारण महायानी बौद्धों के त्रिरत्नों की उपासना प्रारम्भ हुई। भौम शासकों के पश्चात आये सोमवंशियों ने आराधना पद्धति को पुनर्संस्कारित किया और पुरी के वर्तमान  मन्दिर का निर्माण प्रसार किया।
जिस समय गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम ने कोणार्क में सूर्यमन्दिर का निर्माण कराया उस समय भी पुरुषोत्तम जगन्नाथ के वर्तमान रूप में नहीं आ पाये थे। इसके दो प्रमाण हैं।
सन् 1313 के आसपास के एक दान अभिलेख में पहली बार पुरी के पुरुषोत्तम के लिये 'जगन्नाथ' शब्द का प्रयोग हुआ है जो कि कोणार्क मन्दिर बनने के लगभग 60 वर्ष पश्चात की बात है।
king_worshipping_trinity1दूसरा प्रमाण स्वयं कोणार्क मन्दिर की प्रतिमायें दे देती हैं। इनमें राजा नरसिंहदेव शिवलिंग, पुरुषोत्तम (कालान्तर के जगन्नाथ) और शक्तिस्वरूपा दुर्गा की उपासना करते दर्शाये गये हैं।
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उल्लेखनीय है कि किसी भी प्राचीन स्रोत में बलभद्र और सुभद्रा की चर्चा पुरुषोत्तम के साथ नहीं मिलती है।
कोणार्क सूर्यमन्दिर बनने के समय तक शैव, वैष्णव और शाक्त मतों के समन्वय का एक महत्त्वपूर्ण चरण पूर्ण हो चुका था जिनके क्रमश: तीन प्रतीक भैरवरूप शिव, पुरुषोत्तम और शक्ति पुरी के गर्भगृह में बौद्धों के त्रिरत्न को चुनौती देते विराजमान थे।
ऐसे में छलयुद्ध द्वारा इस्लामी आक्रांता को परास्त कर विजय स्मारक के रूप में राजा नरसिंहदेव ने सूर्यमन्दिर की एक बहुत ही महत्त्वाकांक्षी संकल्पना की, एक तीर से कई आखेट - माँ के श्रद्धा भगवान सूर्य की उपासना को राजकीय प्रश्रय, इस्लाम को पराजित कर अपने सर्वश्रेष्ठ सनातनी शासक होने का प्रतिपादन, पुरी के पुरुषोत्तम के समांतर प्राचीन सूर्य और तंत्र पद्धतियों का समन्वय कर इतिहास में वैकल्पिक व्यवस्था के प्रदाता राजा के रूप में स्थान आदि।
तंत्र मार्ग के मिथुन प्रतीक मन्दिर की भित्तियों पर प्रचुरता और प्रमुखता से अंकित किये जाने थे जिनके लिये वास्तुशास्त्र के विधान की आड़ भी थी। राजा नरसिंहदेव के शिल्पियों ने पुरुषोत्तम से भिन्नता दर्शाने के लिये शिव और शक्ति को क्रमश: लिंग और दुर्गा रूप में उकेरा। तीनों जिस पीठ पर विराजमान दर्शाये गये हैं, वह पुरी मन्दिर के गर्भगृह की पीठ ही है।
मन्दिर का कितने योजनाबद्ध ढंग से निर्माण हुआ था, इसका प्रमाण उन ताड़पत्र अभिलेखों से मिलता है जिनमें समूचा 'प्रोजेक्ट प्लान' वर्णित है। सम्भवत: कोणार्क का मन्दिर भारत का एकमात्र प्राचीन मन्दिर है जिसके सभी वास्तुकारों, शिल्पियों और प्रमुख कार्मिकों  के नाम तक पता हैं! 
सुदृढ़ रूप से स्थापित पुरी की पुरुषोत्तम परम्परा ने इसे बहुत उदारता से नहीं स्वीकार किया। कालांतर में प्राचीन सूर्य के पुरुषोत्तम रूप के स्थान पर वैष्णव परम्परा के कृष्णरूपी जगन्नाथ, भैरव के स्थान पर उड़ीसा में लोकप्रिय देवता बलभद्र और शक्ति के स्थान पर उनकी बहन सुभद्रा स्थापित कर दिये गये। कृष्ण की किसी पत्नी या राधा के स्थान पर बहन सुभद्रा की स्थापना कर अनुज वधू की जेठ से परदा की उड़िया लोक रीति का सम्मान भी किया गया। और तो और सुदर्शन चक्र के रूप में सूर्यरथ के चक्र की स्थापना और सेवामंडल में सूर्यपूजक प्राचीन शाबर जाति का स्थान सुव्यवस्थित और सुनिश्चित कर उन्हें भी अपनी ओर मिला लिया गया।
इस्लाम विजयी राजा नरसिंहदेव, पुरी की पुरातन परम्परा के समांतर उससे भी पुरानी सूर्य शाक्त परम्परा की स्थापना की लड़ाई में पराजित हुये - एक व्यक्ति तो बस अपने जीवन भर ही ध्यान रख सकता है! परवर्ती वंशजों में उतना उत्साह नहीं था।
 ऐसे में जगन्नाथ समर्थकों ने धर्मग्रंथों में ब्राह्मणपुत्री चन्द्रभागा के साथ सूर्यदेवता द्वारा किये दुर्व्यवहार और उसके कारण घटित आत्महत्या का मिथक जोड़ ब्रह्मा की तरह ही सूर्य की परिणति सुनिश्चित कर दी। इस्लामी आक्रमण के पश्चात मूलविग्रह और उपासना आचार हीन उपेक्षित कोणार्क मन्दिर के कई भागों को उखाड़ उखाड़ कर पुरी का मन्दिर समृद्ध किया जाता रहा। यह काम उन्नीसवीं सदी तक अंग्रेजों की दृष्टि पड़ने तक होता रहा। जगन्नाथ की भक्ति में लीन आम जन तो कोणार्क को भूल ही चुके थे - जिस मन्दिर में देवता ही न हों, वहाँ कैसी पूजा?
काला पहाड़ के आक्रमण के कालखण्ड में पुरी के गर्भगृह से भी विग्रह हटा कर छिपा दिये गये थे। बहुत दिनों तक वहाँ भी उपासना खण्डित रही किंतु आपदा टल जाने पर वहाँ की काष्ठ प्रतिमायें पुन: स्थापित कर दी गईं।कोणार्क में ऐसा नहीं हो पाया। अब तो वहाँ के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा का अभिजान ही विवादास्पद है। कुछ कहते हैं कि बालू में तोप दी गई प्रतिमा वैसे ही विलुप्त हो गई जैसे कभी नीलमाधव हुये थे, कुछ कहते हैं कि पुरी के प्रांगण में स्थित इन्द्र के मन्दिर में वह प्रतिमा लगी है तो कुछ कहते हैं कि दिल्ली संग्रहालय में रखी गई यह प्रतिमा ही वह प्रतिमा है
(कोणार्क ध्वंस की दीवारों पर बाहर स्थापित सूर्य की तीन प्रतिमाओं से तुलना करें तो साम्यता तो दिखती है किंतु तुलनात्मक रूप से सौष्ठव बहुत ही हीन है और शारीरिक अनुपात भी ठीक नहीं हैं, अत: इस दृढ़कथन का सच होना सम्भव नहीं लगता। तुलना के लिये इस लेख में ही सबसे नीचे दी गई तीन प्रतिमाओं में से एक का चित्र देखें।):
IMG_5241_aw तेरहवीं सदी में पुरी के इस्लामी आक्रांताओं पर विजय के स्मारक स्वरूप सूर्यमन्दिर की स्थापना से लेकर सोलहवीं सदी में इस्लामी आक्रांता काला पहाड़ के उस पर आक्रमण से पूर्व गर्भगृह से विग्रह के हटाये जाने तक के बीच लगभग ढाई सौ वर्षों तक वहाँ उपासना होती रही किंतु नरसिंहदेव के पश्चात न तो राज्य संरक्षण मिला और न ही मन्दिर के रखरखाव के लिये पर्याप्त राजकीय सहायता, जब कि उसी कालखण्ड में पुरी का मन्दिर दिन दूनीरात चौगुनी की गति से समृद्ध एवं व्यवस्थित होता रहा।
यह जानना रोचक होगा कि पुरी की रथयात्रा सूर्य के उस रथयात्रा की प्रतिकृति है जिसका वर्णन वेदों से लेकर प्राचीन अभिलेखों तक में मिलता है। पाँचवी सदी के अभिलेखों में मथुरा और साम्बपुर में इस प्रथा के होने के वर्णन हैं। दक्षिण भारत में भी यह प्रथा प्रचलित थी। यह भी कि आज भी जब पुरी की मूर्तियाँ रथ पर सवार होती हैं तो उनसे पहले नरसिंह भगवान सवार होते हैं। उनके विधिवत स्तुति पूजन के पश्चात ही जगन्नाथ रथारूढ़ होते हैं। कोणार्क मन्दिर तो विशालकाय सूर्यरथ के रूप में बना ही था।
जाने कितनी ही उपासना पद्धतियों का समन्वय कर जगन्नाथ दशावतार से भी ऊपर की कोटि में गिने जाने लगे जिनसे सारे अवतार निकसते थे। अब ऐसे विराट देव के आगे 'विरंचि नारायण' के नाम से जाने जाने वाले कोणार्क के सूर्य देव कहाँ ठहर सकते थे!
विडम्बना ही है कि आस्था केन्द्र पुरी को बचाने के विजय अभियान का स्मारक उसी के अनुयायियों की उपेक्षा एवं तिरस्कार के कारण अंतत: खंडहर में बदल गया। धार के विरुद्ध नाव खेने में असफल होने की सम्भावनायें कुछ अधिक ही अधिक होती हैं। इतिहास, धर्म और राजनीति की वीथियाँ विचित्र भूलभुलइया हैं।
अगली कड़ी में यह बताऊँगा कि इस्लामी हमलावरों का दुस्साहस किस स्तर का था, उनकी दुर्गति कैसे की गई!
surya_western(क्रमश:)

बुधवार, 26 अगस्त 2009

इस मोड़ से जाते हैं...


67 साल के वृद्ध मनोहर नाथ रैना के चेहरे पर विस्थापन की प्रगाढ़ पीड़ा पसर जाती है। दो दशकों की स्मृतियाँ भागती सी वापस आती हैं। आँखें नम हो जाती हैं और स्वर भावना ज्वार में घुट सा जाता है। उफान को नियंत्रित करने के साथ ही वह खुलते हैं,”मेरी शरीर यहाँ है लेकिन मैंने अपनी आत्मा अपने कश्मीरी गाँव के चिनार के वृक्षों पर छोड़ रखी है।“
सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक श्री रैना कश्मीर लौटना चाहते हैं लेकिन उनके इस गृह राज्य में स्थिति अभी भी बहुत अनिश्चित और जोखिम भरी है। श्रीनगर से 19 किलोमीटर दूर गाँव कनिहामा में उनके खेत और हवेली है। लेकिन आज वह दिल्ली के उपनगरी इलाके द्वारका के मलिन से एक कमरे के फ्लैट में रहते हैं। रैना कहते हैं,“मैं अपनी मृत्यु से पहले एक बार अपने गाँव को देखना चाहता हूँ।“
रैना की तरह ही दूसरे शरणार्थी कश्मीरियों, जिन्हों ने भय के कारण अपनी धरती हड़बड़ी में छोड़ दी, की भी यही इच्छा है। 1980 के उत्तरार्ध में यह पलायन प्रारम्भ हुआ जब सीमा पार से प्रशिक्षित हो कर आए स्थानीय आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को अपना निशाना बनाया। बहुतेरे पंडित मारे गए। जो बच गए उन्हों ने पलायन किया। जम्मू की झोपड़पट्टियाँ और जर्जर ढाँचे ही उनके नए घर हो गए।
सुरक्षित होते हुए भी जम्मू में कोई आश नहीं थी। कुछ वर्षों के भीतर ही दूसरा बहिर्गमन करना पड़ा। बहुतों ने उत्तर भारत के दूसरे नगरों की ओर रुख किया। रैना ने भी यही किया। उनके दो बेटे अपने परिवारों के साथ दिल्ली आए और बलबीर नगर के शरणार्थी शिविर में पनाह लिए। चार साल पहले दिल्ली सरकार ने रैना को द्वारका में एक कमरे का फ्लैट अलॉट किया।
विस्थापित कश्मीरियों के एक संघटन कश्मीरी सभा के प्रमुख भारत भूषण बताते हैं,” हम पंडित बहुत पढ़े लिखे हैं। लेकिन हमारे पास काम नहीं है। बहुत पहले हमारे घर छीन लिए गए और अब बिना काम के हमारे युवा निराशा में हैं। यदि सरकार हमारी मदद करना चाहती है तो उसे आर्थिक रूप से पिछड़े हमारे युवाओं को काम देना चाहिए।“
आज के बेकार भूषण कभी घाटी में एक फलते फूलते व्यवसाय के मालिक हुआ करते थे। विस्थापन के प्रारम्भिक दिनों में दिल्ली की जिस कम्पनी में वह काम करते थे वह बन्द हो गई। एक लम्बे संघर्ष के बाद उन्हों ने दूसरी जगह काम पकड़ा। लेकिन मन्दी के प्रकोप के कारण छँटनी किए जाने वालों में वह पहले थे। कश्मीर लौटना उनकी तात्कालिक प्राथमिकता नहीं है। बेटे के स्कूल की फीस अब उनकी पहली चिन्ता है।
हर शरणार्थी कैम्प की यही रामकहानी है। उच्च शैक्षिक स्तर और कुशाग्र बुद्धि के कारण कभी कश्मीर की सरकारी नौकरियों में पंडितों की धाक थी लेकिन आज नहीं रही। पलायन के प्रारम्भ में वहाँ सरकारी नौकरियों में 15000 से अधिक पंडित थे। दो दशकों के बाद यह संख्या घट कर मात्र 3000 रह गई है। पंडितों के पुनर्वास हेतु काम करते संघटन पुनुन कश्मीर की मानें तो केवल 400 पंडितों के पास सरकारी नौकरियों के लिए प्रस्ताव हैं।


कश्मीर से विस्थापित चार लाख पंडितों में से ढाई लाख जम्मू के शरणार्थी शिविरों और किराए के घरों में रहते हैं। एक लाख दिल्ली और उत्तर भारत के बाकी नगरों में रहते हैं। बहुतेरे अपनी भूमि पर लौटना चाहते हैं और पनुन कश्मीर के पास इसके लिए उपाय है। इस संघटन ने इसके लिए सरकार को एक विस्तृत योजना सौंपी है। इसके अनुसार कश्मीर के एक भाग को संघ शासित क्षेत्र घोषित कर वहाँ पंडितों को बसाया जा सकता है। पुनुन कश्मीर के उपाध्यक्ष उत्पल कौल बताते हैं कि कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की अधिकतर योजनाएँ सरकारी कार्यालयों में धूल खा रही हैं। सरकार हमेशा वादाखिलाफी करती है। यह हमारे घर और जमीन लौटाने की बात करते हुए भी आतंकवादियों को संरक्षण देती है।
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(विशेष रिपोर्ट : अनिल पाण्डेय, ‘संडे इंडियन मैगज़ीन’, मूल अंग्रेजी लेख)
दित्य राज कौल के लेख से ब्लॉग लेखक द्वारा अनुवादित
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आभार: 'संडे इंडियन मैगज़ीन, अनिल पाण्डेय और आदित्य राज कौल'

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शनिवार, 25 अप्रैल 2009

Flash ! Taliban in Delhi !!

अभी अभी साथी कर्मचारियों को एक मेल लिख कर घर लौटा हूँ. टी.वी. के किसी खबरिया चैनल पर चल रहा है दिल्ली में तालिबानी(?). मुझे लगता है कि अपना अंग्रेज़ी मेल जस का तस ब्लॉग में देना उचित होगा. थोड़ा बैक ग्राउण्ड - कश्मीरी लोगों और विशेषकर पंडितों पर चले अत्याचार पर एक रिपोर्ट दिखी, मन द्रवित और आन्दोलित हुआ तो मेल लिख मारा. मेल में संदर्भित अटैचमेंट यहाँ है: http://ikashmir.net/atrocities/index.html

एक दु:खद सत्य:
google में atrocities in kashmir लिख कर सर्च करने पर तथाकथित हिन्दू और भारतीय अत्याचार के कितने ही परिणाम आते हैं जो पाकिस्तानियों या उनके सरपरस्तों द्वारा लिखे गए हैँ. उन्हीं के बीच यह लिंक भी अकेला दिखता है. हम अपनी और अपने लोगोँ की समस्याओँ के प्रति कितने उदासीन हैं ! एक बात और - यह दस्तावेज़ नग्न सत्य है, किसी मज़हब के ख़िलाफ नहीं. आप पाएंगें कि इसमें उन तथाकथित इस्लाम के झण्डाबरदारों द्वारा मुसलमानों पर किए गए अत्याचारों का भी लेखा जोखा है.

अथ
Pls. be patient, logical and free from collective hypnotism of secularism, liberalism, idealism, intellectual idealisation and philosophical moorings before and while going through the attached article.
Sometimes the truth is so bare that it demands not your interpretation but your action and even change in your day to day thinking.
Taliban is standing at your borders. Despite all advancements in thought process and civilisation, we by our own in-actions and mal-actions, have invited this danger. How many Talibans in infancy are roaming around you, you don't know. But with just a little of caution and alertness, you can sense them and act to kill them in infancy. It is not an attempt to create fear psychosis. Taliban is a reality to tackle with. Taliban is a thought process solid in action. Don't wait for a big action by state when they'll stand before you in full gory and glory. Your alert day to day acts will help in and will result in preventing the infant from developing as adult. All you have to do is, act before it is too late !!

इति
सच जानना हो तो यहां जाएं :
http://www.kashmiri-pandit.org/projectr3/survivorstories.php?sid=0