शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

कोणार्क सूर्य मन्दिर - 16 : क्षैतिज योजना और वास्तुमंडल - 2

भाग 12, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14 और 15 से आगे...
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वास्तुमंडल को सम्यक दिशाओं में स्थापित करने के लिये इस तथ्य का प्रयोग किया जाता था कि सूर्य पूर्व में उदित होता है और पश्चिम में अस्त। यद्यपि वर्ष की दो विषुव तिथियों को छोड़ सूर्य की आभासी गति वास्तविक पूर्व और पश्चिम के मार्ग नहीं चलती और विषुवत वृत्त के सापेक्ष अक्षांश स्थिति के अनुसार उत्तर या दक्षिण की ओर झुकी रहती है; प्रारम्भिक उकेरण के लिये मध्याह्न (दुपहर) के पहले और पश्चात क्रमश: पश्चिम और पूर्व की ओर लम्बवत गड़े दंड की पड़ने वाली छाया पर्याप्त थी। इस काम के लिये जिस यंत्र का प्रयोग किया जाता था उसे ज्यामितीय समानता के कारण 'शंकु यंत्र’ (पश्चिम के gnomon का समतुल्य)  कहा जाता था।
cone2शंकु यंत्र वृत्ताकार आधार पर लम्बवत द्ंडिका को स्थापित कर बनाया जाता था। आधार का व्यास और दंडिका की ऊँचाई समान होते थे। सोलह अंगुल माप के यंत्र अधिक प्रचलित थे। 
शुल्ब सूत्रों में वर्णित ज्यामिति और सरल गणित के प्रयोग द्वारा जटिल यज्ञ वेदियों की रचना की बात पहले बताई जा चुकी है। कात्यायन शुल्ब सूत्र (2200-2300 वर्ष पूर्व?) में शंकु यंत्र और उसके छाया प्रयोगों द्वारा पूर्व और पश्चिम दिशाओं का अंकन करने की विधि बताई गई है। वृत्त की परिधि पर दुपहर के पूर्व एवं पश्चात के छाया विन्दुओं को मिलाने से पूर्व एवं पश्चिम दिशाओं का उपगत अंकन कर लिया जाता था।  EW
 कात्यायन पूर्व पश्चिम रेखा के छोरों से रस्सी तान कर उसे क्रमश: उत्तर और दक्षिण की ओर खींच कर बनाये गये दो समद्विवाहु त्रिभुजों के शीर्षों द्वारा इन दिशाओं का निर्धारण करते हैं तो आपस्तम्ब मिस्री निर्माताओं के 'स्केल विभाजन' की भाँति ही वितस्ति के समान यानि 12 अंगुल माप के समकोणीय विभाजनों की युक्ति अपनाते हैं (5/12, 12/12, 13/12)।
shanku_chhaayaaशुल्ब सूत्रों के युग से प्रारम्भ हो आर्यभट, वाराहमिहिर, लल्ला, भास्कराचार्य के हाथों प्रयुक्त होते हुये यह शंकु यंत्र अठारहवीं सदी (प्र.सं) में जयपुर में बनी वेधशाला तक पिष्ठक, छायायंत्र, सूची आधार, चक्रादि रूप लेता रहा किन्‍तु विधि वही रही।  उज्जैन की वेधशाला में शंकु यंत्र का बड़ा रूप आज भी उपलब्ध है जिसके प्रयोग द्वारा सूर्य के गति पथ पर दृष्टि रखी जाती है। 
सूर्य के झुकाव के कारण दिशा निर्धारण में हुई त्रुटि के शोधन की एक विधि: 
  • एक ही समय पर आगे पीछे के दो दिनों में छाया बिन्दुओं का अन्तर साठ घटिका (आज के चौबीस घंटों) का छाया अंतर होगा।
  • पहले दिन के पूर्वी और पश्चिमी छाया बिन्दुओं के बीच के समयांतराल को छाया अंतर से गुणा करें। गुणनफल को साठ से भाग दें। भागफल उस समय के लिये छाया अन्तर को व्यक्त करेगा।
  • अब दूसरे दिन के छाया अन्तर को ध्यान में रखते हुये पूर्व या पश्चिम बिन्दुओं में से किसी एक को उत्तर या दक्षिण की ओर छाया अन्तर के सम दूरी खिसका दें। खिसकाने के लिये दिशा चयन इस पर निर्भर होगा कि सूर्यदेव उत्तरायण में हैं या दक्षिणायन में।
कालान्‍तर में आर्यभट ने कोण, समय और ज्या सारिणी का प्रयोग करते हुये और परिशुद्ध विधि बताई। वर्ग को अनेक गुना विस्तारित करने की विधि तो शुल्ब सूत्र के समय से ही ज्ञात थी जिसके कारण लघु अंकन को पूर्ण आकार की क्षैतिज योजना का रूप देने में कोई कठिनाई नहीं होती थी।
वास्तुमंडल को दिशा अंकन के समय ही संयोजित किया जाता था। अनेक वर्गों वाले वास्तुमंडल और निर्माण की बाहरी सीमा परिशुद्धि के साथ अंकित करने की आवश्यकता के कारण ज्यामिति किंचित जटिल हुई और आधार वृत्त के साथ दूसरे वृत्त भी प्रयुक्त किये जाने लगे :
  1-1   उत्तर दक्षिण अक्ष अंकित करने के पश्चात पूर्व पश्चिम अक्ष ऐसे अंकित किया जाता था : 1-2
और यह रहा वास्तुमंडल का संयोजन :
sanyojanभिन्न भिन्न परिमापों के वास्तुमंडल एक दूसरे से सटा कर इच्छित ऐक्षिक आरेखण में अंकित किये जाते और गर्भगृह, सभामंडप, नृत्यमंडप और भोगमंडपादि की संयुक्त क्षैतिज योजना भूमि पर अंकित हो जाती।
konark_temple_night
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sculpture_at_konark_templeस्रोत:
  • भारत में गणित - किम प्लोफ्कर gargaj_mahadev_temple_Indore_Plan
  • दक्षिण भारतीय मन्दिर एवं भवन स्थापत्य तंत्र - के. जे. ओइजेवार
  • प्राचीन भारत के ज्योतिष यंत्र - शेखर नारवेकर
  • हिन्दू स्थापत्य पर लेख - राम राज

बुधवार, 22 अगस्त 2012

भोर भर

नींद आँखों से निकल, सँवराई शीतल सलमा सितारों जड़ी, नाचती हवा पर रही फिसल। क्या कहूँ इस भोर को कि भकजोन्हियाँ भूल गई हैं झपकाना, बस एक अंगुल इशारे की प्रतीक्षा में दीवारों पर एल ई डी अनवरत दीप्त और मैं धीमी सुगन्ध से जगा मूर्च्छित। नीम अन्धेरे में अकेली अगरबत्ती रही पिघल धीमे धीमे, जिसे किसी ने कभी नहीं जलाया कि उसकी राख से ही बनी संज्ञा और क्रियायें।

कल्प अकल्पों में बहकती साँसें यूँ सुलगने को प्रेम बताती रहीं। समझा जीवन का नेम।

लाज की चादर हटा उजाला पसरता हो और साँवरी सिमटती हो तो मैं कहूँ कि नींद उचटी नहीं, है सिमट गई आँखों में, ओट से देखने को उजाले की नासमझ बगावतें जो समझेगा थकने पर कि चादर स्मृति है उस अन्धेरे की, जिससे सृष्टि फूटती है और भूलती है सुगन्ध।

राह में धूल नहीं, उड़ती है राख, मेरी जानी पहचानी भस्म। लपेट कर देह पर जिसे मैं सनातन साख - राख। देव उपजते हैं, महानतायें पाती हैं अक्षर और कवि रचते हैं सत्य, शिव, सुन्दर। पलटते पन्नों से आती है सुगन्ध और तुम कहती हो अंगुलियों के स्पर्श आवर्त छोड़ रखे हैं तुमने इन पर जो मेरी छुअन पा तप उठते हैं। कागज यूँ होते हैं पीले, उठती है निर्धूम सुवास।

सच में मैं लिखता नहीं, बस सहलाता हूँ पन्नों को, रुकता नहीं कभी छोड़ने को फिंगर प्रिंट – मुझे आती है हँसी शायरों की क्षुद्र गिरफ्तारियों पर और तुम्हारे चेहरे से झड़ने लगते हैं फूल, पन्ने बन्द, आँखें बन्द राँधने को पलकों के नीचे आँसुओं में – आराधना।
  
लोग सोना कहते हैं जब कि फूल सँजो रहे होते हैं पन्नों के बीच सुगन्धियाँ, साँसें करतीं अदला बदली, ललाट फैलाते वितान - अंतरिक्ष में आकाशगंगायें। निहारिकायें नाचती हैं और आहटें छूट रहती है दो चेहरों पर - सुबह होती है। कहते हैं एक को देख, सुहाने सपने जम गये हैं कर के नींद से विद्रोह, कहेंगे वे दूसरे को देख कि जिसके चेहरे रह गई है अँगड़ाइयाँ लेती भस्म, एक और रात भर सुगन्धि के इंतज़ार में – पगला है अनिद्रारोगी।

सुना है कि अब वो डिग्रियाँ बिकने लगी हैं जिन्हें कभी यूँ ही किसी को दे देता था आसमान – होते थे सच में, धन्वन्तरी नहीं मिथक बस जो चेहरे बाँचते थे। उनकी अंगुलियाँ नाड़ी नहीं, पढ़ती थीं कलाई पर रह गई जकड़नों की धड़कनें। आसमान हो गया कंजूस, मानव शिक्षाकुबेर – पढ़े कौन कि ऐसी बातें हैं ज्यों मिथक भर धन्वन्तरी अब और भोर में जगना एक दुर्लभ रोग - डिग्रीद्रोही?

बुझ गया दीप देवालय खग कूक फूँक सी। नथुने भर रहे उच्छिष्ट गोघृत धूम, जन का जागरण है। सहमी नींद करुआयेगी आँखों तले गोधूलि तक। धूल उड़ती रहेगी साँझ तक। सुगन्ध बाकी है भस्म होने को दिन भर।  बाकी है, भोर तक बाकी है – पुन: होने को।                                   

शनिवार, 18 अगस्त 2012

प्रेम और सुभाषचन्द्र बोस: An Indian Pilgrim ...Ich denke immer an Sie

[पुण्यतिथि पर एक पुनर्प्रस्तुति] 
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सुभाषचन्द्र बसु ( टोकियो, नवम्बर 1943)

भारत में कुछ नायकों को लोग न मृत्यु बदा होने देते हैं और न प्रेम। 
सुभाष चन्द्र बोस ऐसे ही नायक हैं। यह बात अलग है कि उन्हों ने प्रेम किया,विवाह किया और कुछ सप्ताह की पुत्री को छोड़ संसार से विदा भी हुये।
परी देश की कहानी सी लगती है यह प्रेम कहानी लेकिन त्रासद है। देश और प्रेमिका के प्रेम को साथ साथ साधने में अदम्य साहस और कर्म का परिचय देते सुभाष बाबू के जीवन के इस पक्ष से साक्षात्कार होने पर उनके प्रति और प्यार उमड़ता है। साथ ही यह खीझ भरी सीख भी पुख्ता होती है कि प्रेम की राह में काँटे बहुत होते हैं।

समर के संगी दो प्रेमी 
ऑस्ट्रिया में जन्मी और आयु में तेरह वर्ष छोटी एमिली शेंकेल  (Emilie Schenkl) से उनकी मुलाकात यूरोप निर्वासन के दौरान जून 1934 में वियना में हुई। विशार्ट नामक कम्पनी ने सुभाष बाबू को 1920 से आगे भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन पर पुस्तक लिखने को कहा था। अपनी पुस्तक के लिये अंग्रेजी जानने वाले किसी सहायक की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति एमिली ने की और दोनों के सम्बन्ध प्रगाढ़ होते चले गये। एमिली सज्जन, प्रसन्न और नि:स्वार्थ प्रकृति की महिला थीं। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण सुभाष बाबू उन्हें प्यार से बाघिन कह कर पुकारते थे। एमिली ने बाद में बताया कि प्रेम में पहल सुभाष बाबू ने ही की थी।
  
दिसम्बर 1937 में दोनों ने गुप्त रूप से हिन्दू रीति के अनुसार विवाह कर लिया। उस समय जर्मनी में भिन्न नृवंश केमनुष्यों में आपसी विवाह पर रोक थी। 

नवम्बर 1942 में उनकी एकमात्र पुत्री अनीता का जन्म हुआ और कुछ दिनों पश्चात सुभाष बाबू की रहस्यमय(विवादास्पद) दुर्घटनाजन्य मृत्यु हो गई। परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि सुभाष बाबू ने अपने जीवन के इस पक्ष को गोपनीय रखा और अंतिम यात्रा के कुछ पहले ही अपने भाई शरत बाबू को यह बात लिखी जिसमें पत्नी और बेटी का खयाल रखने का अनुरोध भी था। मृत्यु की तरह ही उनका प्रेम सम्बन्ध और वैवाहिक जीवन विवादास्पद हुए। दोनों के प्रेमपत्रों की असलियत पर प्रश्न उठाये गये और सुभाष बाबू के चरित्र और यूरोप जाने के असली मंतव्य पर लांछ्न लगाये गये। उन्हें कायर भी कहा गया जिसने अपने प्रेम सम्बन्ध को दुनिया से छिपाये रखा और बाद में पत्नी और पुत्री को धक्के खाने के लिये छोड़ दिया। 

लोग भूल जाते हैं कि जो योद्धा होगा वह प्रेमी भी होगा। बिना प्रेम केबिना उस भीतरी आग के कोई महान योद्धा नहीं हो सकता।

देखें उनके प्रेमपत्रों से कुछ अंश:

 कभी कभी तैरता हिमशैल भी पिघल जाता है, वैसा ही मेरे साथ हुआ है।...क्या इस प्यार का कोई लौकिक उपयोग है? हम जो कि दो अलग से देशों के वासी हैं, क्या कुछ भी हम दोनों में एक सा है? मेरा देश, मेरे लोग, मेरी परम्परायें, मेरी आदतें, रीति रिवाज, जलवायु ....असल में सबकुछ तुमसे और तुम्हारे परिवेश से अलग है। इस क्षण मैं वे सारे भेद भूल गया हूँ जो हमारे देशों को अलग बनाते हैं। मैंने तुम्हारे भीतर की स्त्री से प्रेम किया है, तुम्हारी आत्मा से प्रेम किया है।

एक खास प्रेमपत्र
नज़रबन्दी के दौरान उनके पत्र सेंसर किये जाते थे। अकेलेपन के इस दौर में एमिली के पत्रों से उन्हें आस मिलती। इस अवधि के औपचारिक पत्रों में भी अपने प्रेम को व्यक्त करने की राह उन्हों ने ढूँढ ली। उन्हों ने कालिदास के नाटक शकुंतला से प्रेरित गोथे की एक कृति के पहले भेजे अंग्रेजी अनुवाद का जर्मन मूल एमिली से ढूँढ़ने को कहा और इसे उद्धृत किया:

Wouldst thou the young year’s blossoms and the fruits of its decline,
And all whereby the soul is enraptured, feasted fed:
Wouldst thou the heaven and earth in one sole name combine,
I name thee, oh Shakuntala! And all at once is said.

कांग्रेस का दुबारा सभापति न बनने की दशा में उन्हों ने 4 जनवरी को यह पत्र लिखा:

 “...एक तरह से यह अच्छा होगा। मैं अधिक मुक्त रहूँगा और स्वयं के लिये मेरे पास अधिक समय रहेगा।“ उन्हों ने आगे जर्मन में जोड़ा ‘Und wie geht es Ihnen, meine Liebste? Ich denke immer an Sie bei Tag und bei Nacht.’ (और तुम कैसी हो मेरी प्रिये! दिन और रात हर समय मैं तुम्हें ही सोचता रहता हूँ।)“

एमिली हमेशा उनके लिये अति खास रहीं। अपनी पुस्तक में उन्हों ने केवल एमिली को ही नाम लेकर आभार व्यक्त किया। 29 नवम्बर 1934 को उन्हों ने पत्र में लिखा:

मैं यह पत्र एयरमेल से भेज रहा हूँ। किसी को यह न बताना कि मैंने तुम्हें एयरमेल से पत्र भेजा है, क्यों कि मैं और किसी को भी एयरमेल से पत्र नहीं भेजता हूँ – उन्हें यह ठीक नहीं लग सकता है।

एक और स्थान पर उन्हें दिल की रानी कहते हुये सुभाष बाबू लिखते हैं:
  तुम पहली स्त्री हो जिसे मैंने प्यार किया है...ईश्वर से प्रार्थना है कि तुम ही अंतिम रहो...मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी स्त्री का प्रेम मुझे बाँध लेगा। पहले कितनी स्त्रियों ने मुझे चाहा लेकिन मैंने उनकी ओर कभी नहीं देखा। लेकिन तूने बदमाश! मुझे पकड़ ही लिया।“ 

1937 के एक बहुत ही आर्द्र और सान्द्र पत्र में उन्हों ने लिखा:
... तुम हमेशा मेरे साथ हो। सम्भवत: मैं संसार में और किसी के बारे में सोच ही नहीं सकता।...मैं तुम्हें बता नहीं सकता कि बीते महीने मैंने कितना दुख और अकेलापन महसूस किया है। केवल एक चीज मुझे प्रसन्न कर सकती है – लेकिन मैं नहीं जानता कि वह सम्भव भी है। फिर भी मैं उसके बारे में दिन रात सोच रहा हूँ और ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ कि मुझे सही राह दिखाये ...”

दिसम्बर 1937 में An Indian Pilgrim नाम से उन्हों ने अपनी अधूरी आत्मकथा लिखना प्रारम्भ किया। उसमें उन्हों ने लिखा:
 मेरे लिये सत्य का आवश्यक अंग प्रेम है। प्रेम जगत का सार है और मानव जीवन में आवश्यक तत्त्व है ...मैं अपने चारो ओर प्रेम का खेल देखता हूँ; मैं अपने भीतर उसे ही पाता हूँ; मुझे लगता है कि अपनी पूर्णता के लिये मुझे अवश्य प्रेम करना चाहिये और जीवन की पुनर्रचना के लिये मुझे प्रेम की एक मौलिक सिद्धांत के रूप में आवश्यकता है।“

एक पत्र में वह एमिली को समय पर दवाइयाँ लेने, वर्तनी की अशुद्धियों में सुधार करने और उन्हें उनकी वास्तविक जन्मतिथि, जन्म समय और स्थान भेजने को कहते हैं। उन्हों ने लिखा:
” Ich denke immer an Sie – Warum glauben Sie nicht?’ (मैं तुम्हारे बारे में हमेशा सोचता रहता हूँ। तुम मेरा भरोसा क्यों नहीं करती?). ....“Ich weiss nicht was ich in Zukunft tun werde. Bitte sagen Sie was ich machen soll (मुझे नहीं पता कि मैं भविष्य में क्या करूँगा। मुझे बताओ न कि मुझे क्या करना चाहिये)...Ich denkeimmer an Sie. Viele Liebe wie immer (मैं तुम्हारे बारे में हमेशा सोचता रहता हूँI हमेशा की तरह ढेर सारा प्यार) ”.

घोषित रूप से अपने पहले प्यार ‘देश’ और अपनी गुप्त ‘हृदयेश्वरी’ के प्रेम की पीर को जीते सुभाष बाबू की मन:स्थिति को सोच आँखें भर आती हैं। उनका अंतिम पत्र यह था:
“...मैं नहीं जानता कि भविष्य ने मेरे लिये क्या रख छोड़ा है। हो सकता है कि मैं अपना जीवन जेल में ही बिता दूँ, मारा जाऊँ या फाँसी पर चढ़ा दिया जाऊँ। चाहे जो हो, मैं तुम्हें याद करता रहूँगा और तुम्हारे प्यार के लिये तुम्हें अपनी मौन कृतज्ञता व्यक्त करता रहूँगा। हो सकता है कि मैं तुम्हें फिर कभी न देख पाऊँ .... हो सकता है कि लौटने पर तुम्हें लिखने लायक भी न रह पाऊँ...लेकिन मेरा भरोसा करो कि तुम हमेशा मेरे हृदय में रहोगी, मेरी सोच में रहोगी और मेरे सपनों में रहोगी। यदि भाग्य हमें इस जीवन में अलग कर देगा तो अगले जन्म में भी मैं तुम्हें चाहूँगा।
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अनीता और एमिली
अगस्त 1945 के अंत की एक साँझ एमिली अपने वियना के घर की रसोई में बैठी ऊन का गोला बनाती रेडियो पर समाचार सुन रही थीं। अचानक ही रेडियो ने घोषणा की कि भारतीय ‘क़िस्लिंग’ सुभाष चन्द्र बोस एक विमान दुर्घटना में तायहोकू (ताइपेय) में मारे गये हैं। एमिली की माँ और बहन ने उन्हें भौंचक्के हो कर देखा। वह धीरे से उठीं और बेडरूम की ओर गईं जहाँ उनकी पुत्री अनीता गहरी नींद में सोई हुई थी। उसके बिस्तर के बगल में झुक कर वह रोने लगीं। 
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आभार: द टेलीग्राफ (कलकत्ता); हिन्दुस्तान टाइम्स; टाइम्स ऑफ इंडिया और सर्मिला बोस  



बुधवार, 15 अगस्त 2012

कोणार्क सूर्य मन्दिर - 15 : क्षैतिज योजना और वास्तुमंडल - 1

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भाग 12, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13 और 14 से आगे...
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सिद्धांत शिरोमणि की अंग्रेजी टीका के वे पृष्ठ जिनमें पृथ्वी के व्यास और परिधि की चर्चा है।
(डा. अर्कसोमायाजी, केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, तिरुपति शृंखला 29)
वर्तमान कर्नाटक के सह्याद्रि क्षेत्र में हुये गणितज्ञ भास्कराचार्य। वे बारहवीं सदी में उज्जयिनी की वेधशाला में कुलपति थे। कोणार्क मन्दिर का निर्माण तेरहवीं सदी में हुआ। इस दृष्टि से आर्यभट, वाराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त की तुलना में इनका कालखंड सबसे निकट का है। अपने गणित ज्योतिष ग्रंथ ‘सिद्धांत शिरोमणि’ में उन्हों बताया कि पृथ्वी की परिधि 4697 योजन और व्यास 1581 योजन है  यानि उनका योजन भी ब्रह्मगुप्त के योजन के लगभग बराबर ही था। उनके अनुसार एक योजन 4 क्रोश के बराबर होता है (तो पिछले लेख में ललित जी की टिप्पणी का सन्दर्भ भास्कराचार्य से था! Smile ) ।

भास्कराचार्य इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण हैं कि उन्हों ने परिधि मापने की विधि और सूत्र भी बताये जो कि सही हैं। उन्हों ने भिन्न भिन्न विद्वानों द्वारा अंगुल और यव की भिन्न मापें दिये जाने की बात बताते हुये यह भी बताया कि परिधि को उन्हों ने 'आगम' आधारित व्यक्त किया है क्यों कि कमोबेश पृथ्वी की परिधि की माप 'सर्वसम्मत' है। 'यव और अंगुल की विभिन्न मापों के प्रचलित होने की बात' और 'पृथ्वी परिधि के सर्वसम्मत माप की बात' महत्त्वपूर्ण है।  काल की निकटता देखते हुये इस मापन पद्धति का ज्ञान कोणार्क के स्थापतियों को होना अधिक सम्भाव्य है जो इस तथ्य से और पुष्ट हो जाता है कि उज्जैन क्षेत्र से विद्वानों का ओड्रदेश आना जाना लगा रहता था।

पृथ्वी के औसत व्यास 1274200000 सेंटीमीटर से तुलना करने पर भास्कराचार्य का एक योजन होता है 805945.60 सेमी.। उनके गणित से एक क्रोश हुआ 201486.40 सेमी. यानि 2.015 किलोमीटर। एक हजार पुरुषों के बराबर क्रोश होने से एक पुरुष, धनु, धनुष, नृ या चाप बराबर हुआ 201.5 सेंटीमीटर। यहाँ समस्या है। देह आधारित मापन पद्धति में यह इकाई बड़ी लगती है। उस समय भारत में साढ़े छ: फीट के कितने  लोग लुगाई होते होंगे ? इसका समाधान एक और तथ्य में है।
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24 की ही शृंखला में पुरुष या पिंड की एक और माप मिलती है – 120 अंगुल (बौधायन शुल्ब सूत्र 1/1-21)। मानव शुल्ब सूत्र (4/5) में हाथ सीधे ऊपर उठाने पर खिंची ऊँचाई को एक पुरुष बताया गया है। हमें पता है कि हाथ ऊर्ध्व ऊपर करने पर ऊँचाई में लगभग एक हाथ यानि 24 अंगुल की वृद्धि होती है। 96+24=120 से यह रहस्य स्पष्ट हो जाता है कि कालभेद से पुरुष या धनुष मापन की दो इकाइयाँ रहीं और विधियाँ भी। केश, विन्यास, पगड़ी, शिरस्त्राण आदि भेदों के कारण सिर के बजाय 'हाथ ऊपर' वाली स्थिति में मापन अधिक सुग्राही होगा।

इस आधार पर एक अंगुल की माप आती है 1.679 सेमी. जो कि 5/3 सेमी. यानि 1.66666666666...सेमी. के निकट है। 3,4,5 की समकोण त्रयी में अनुपात होने से यह वर्तमान मापन पद्धति के ज्यामितीय अनुकूलन में सहायक होगी। 'अंगुल' और 'तीन पाँच' करने की दिव्य लोक परम्परा Smile का निर्वहन भी इस माप में हो जाता है। Geometrical_diagram_showing_Egyptian_seked_systemयहाँ यह बताना उचित होगा कि पुरानी सभ्यतायें अपनी 'स्केल' के ऐसे अनुकूलन करती रही हैं ताकि केवल सरल विधियों से आकृतियों को उकेरना और जाँचना परिशुद्ध हो। मिस्र के पिरामिडों के निर्माण में प्रयुक्त स्केल ऐसे ही विभाजित थी जिससे लगभग 52 अंश के कोण मानक को आसानी से बनाया और जाँचा परखा जा सकता था।

हम पहले देख चुके हैं कि कैसे यवमध्य की चौबिस इकाइयों में अंगुल को परिभाषित किया गया था। आगे के लिये हम 5/3 और 24, 48, 72, 96, 120, 144 ...श्रेणी को गँठिया लेते हैं Smile और चलते हैं कोणार्क की क्षैतिज योजना को समझने।

vastu-shastr2वास्तुपुरुष की संकल्पना के बारे में पहले ही बता चुका हूँ। वर्गाकार वास्तुमंडल में पेट के बल लेटा वास्तुपुरुष अपनी पीठ पर स्थापत्य को धारण करता है।

यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे की अवधारणा के अनुसार सृष्टि की सूक्ष्म इकाई भी अपने भीतर ब्रह्मांड को निहित किये रहती है। जैसे जैसे चेतना का विकास होता है, मनुष्य की मेधा परम सत्य के निकट होती जाती है।

sun_halfएक केन्द्र से प्रसरित होते चेतनामंडल को दर्शाने के लिये वृत्त आदर्श ज्यामिति संरचना होगी और उसे भूमि पर उकेरना भी कठिन नहीं लेकिन क्षैतिज योजना को जब ऊँचाई देनी होती है तो ऊर्ध्व शिखर में उस आकार को कलात्मकता और परिशुद्धि के साथ निबाहना अति कठिन हो जाता है। थोड़ी सी चूक समूचे प्रभाव को दूषित कर सकती है, बनाने में समय अधिक लगेगा सो अलग।

pachtattva_vastuइसके अतिरिक्त भवन के लिये प्रकाश, वायु और ऊष्मा की दृष्टि से चार दिशायें महत्त्वपूर्ण हैं। दिक्विन्यास सही होने पर पंचतत्त्व और पारिस्थितिक अनुकूलन स्वयं सध जाते हैं। पृथ्वी का अपने अक्ष से झुकाव क्षैतिज स्थापन में कोणीय दिशाओं को और महत बना देता है। वर्ग या आयत के चारो कोण समकोण होने के कारण उनका दिशाओं से संयोजन यूँ ही हो जाता है क्यों कि दिशायें समकोण के अन्तर पर ही होती हैं। वर्ग के विकर्ण 90 अंश के अंत:कोण को बराबर 45 अंश में बाँटते हैं जिन्हें ईशान, नैऋत्य, वायव्य और आग्नेय कोणों से युत किया जा सकता है।

square_rotationवर्ग को केन्द्र के सापेक्ष घुमाते हुये और प्रक्षेप देते हुये बहुभुज बनाये जा सकते हैं जो कि धीरे धीरे वृत्त के निकट होते जाते हैं। वर्ग के सादे चार आयामों की तुलना में बहुभुज आयाम निर्माण की ऊँचाई को भव्यता देते हैं साथ ही भिन्न भिन्न ज्यामितीय प्रयोगों द्वारा सजावट की अनंत सम्भावनाओं का सृजन भी करते हैं।

इन कारणों से वृत्त की तुलना में वर्ग उस युग में और आज भी स्थापति के लिये अधिक ग्राह्य है और तार्किक भी। वर्गclip_image004[8] के क्षेत्रफल के बराबर वृत्त या वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर वर्ग की ज्यामितीय रचनाओं में भारतीय निष्णात थे ही।

altersईसा पूर्व शुल्बसूत्रों में जटिल यज्ञ वेदियों की निर्माणविधियाँ बताई गई हैं और सरस्वती सिन्धु सभ्यता में भी ज्यामितीय अग्नि वेदियाँ मिली हैं।
शुल्बसूत्रों में ही समकोण त्रिभुज के निर्माण के लिये दिये त्रिवर्गों 32+42=52, 122+52=132 , 82+152=172 और 122+352=372 को लेकर ही वह ज्यामितीय विधि विकसित हुई है जिसका प्रयोग आज भी भूमि पर समकोण त्रिभुज के निर्माण और उसकी परिशुद्धता की जाँच करने के लिये किया जाता है।
एक ही कर्ण पर दो समकोण त्रिभुज बना कर वर्ग बनाया जा सकता है और उसकी जाँच भी इस तथ्य से की जा सकती है कि वर्ग (या आयत) के दोनों विकर्ण बराबर होते हैं। भारतीय स्थापतियों ने आयत निर्माण के लिये भी वर्ग और उसके अंश विस्तार का प्रयोग किया।

सरस्वती सभ्यता, मोहनजोदड़ो में जो अग्नि मन्दिर मिला है, उसकी क्षैतिज योजना बहुत कुछ वास्तुमंडल की योजना से मिलती है:

vastu_exotic
mohanjodado
temple_symbloism_mahamaryada_sreenivasrao_sulekhaअंतत: प्रकृति की फ्रैक्टल योजना से जुड़ने वाली ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदंति’ की वैदिक धारणा को भी वर्ग विभाजन clip_image008द्वारा आसानी से व्यक्त किया जा सकता है। अनेक लघु वर्ग लघु देवों या सम्भावनायुक्त विलक्षण पुरुषों को व्यक्त करते स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त होने के साथ ही एक विराट ब्रह्मस्वरूप बाहरी वर्ग को भी दर्शाते हैं। आश्चर्यजनक रूप से एक ही आकार की बारम्बारता द्वारा बड़े आकार के सृजन के चित्र बहुत प्राचीन भारतीय शैलचित्रों में भी मिलते हैं।

विराट वर्ग को विभाजित कर समरूप 2x2, 4x4, 6x6, 8x8 … या विषमरूप 3x3,5x5,7x7, 9x9 … ग्रिड बनाये जाते थे। प्रतिष्ठित देवताओं की संख्या, मुख्य देव के लिंग, निर्माण की धनराशि, समय आदि तमाम कारकों के प्रभाव में विभाजन बढ़ता जाता था। बाइनरी सहस्र संख्या यानि 1024 संख्या वाला ग्रिड सबसे उत्तम माना गया और दक्षिण के कुछ मन्दिरों में इसके अनुप्रयोग के प्रमाण हैं किंतु व्यावहारिक दृष्टि से मुख्य देवता के स्त्री या पुरुष होने पर क्रमश: 64 (8x8) या 81 (9x9) के ग्रिड अधिक प्रचलित रहे।
यहाँ यह जानना रोचक होगा कि हजारों वर्ष पुराने अथर्ववेद (9.3.21) में भी दो, चार, छ:, आठ या दश पक्षों की शाला और स्त्री सदन का वर्णन है जिनमें अग्नि वैसे ही निवास करती है जैसे गर्भ में हो।
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ग्रिफिथ ने पक्ष का अर्थ facade किया है। दो facade वाली शाला मुझे समझ में नहीं आई। वास्तव में निर्माण में 2,4,6,8,10 आदि के वर्गमंडल और गर्भगृह में अग्नि स्वरूप तेजस्वी देवता की अवधारणाओं के बीज यहाँ हैं।

अब तक यह स्पष्ट हो गया है कि प्रकृति, जलवायु और परिवेश निरीक्षण, सहज समझ और ज्यामितीय अनुकूलन के आधार पर जो कुछ ईसा से हजारो वर्ष पूर्व विद्यमान था वही विकसित होते हुये जटिल और विशाल वास्तु शास्त्र का रूप ले सका।

वर्ग संख्या और उसके सम या विषम होने के आधार पर कई प्रकार के वास्तुमंडल हुये, जिनमें कुछ निम्नवत हैं:

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इस विन्यास में फ्रैक्टल योजना सहज ही आ जाती है। सामान्यत: मंडूक या परमशायिका मंडलों का प्रयोग मन्दिर विन्यास में किया जाता है। केन्द्रस्थ चार या नौ वर्ग ब्रह्मा के स्थान होते हैं जहाँ मुख्य देव का पूजन विग्रह स्थापित होता है। बाहरी वर्ग गर्भगृह की दीवारों, प्रदक्षिणा पथ (यदि हो) और उसके घेरे के लिये प्रयुक्त होते हैं। स्थापति मूल मंडलों को और छोटे छोटे वर्गों में विभाजित कर वास्तुविन्यास, कलाकारी और संयोजन में लचीलेपन की ढेरों और जटिल सम्भावनाओं का सृजन कर लेते हैं।
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कोणार्क मन्दिर जिस कलिंग  शैली (कुछ विद्वान इसे उत्तरभारतीय नागर शैली की एक उपशैली भी कहते हैं) में बना है उसकी क्षैतिज योजना में प्रवेश से प्रारम्भ कर ये संरचनायें होती हैं:

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(1) नटमन्दिर या नृत्यमंडप - यहाँ देवदासियों द्वारा नृत्य और ललित कला आयोजन होते हैं।
(2) भोगमंडप या यज्ञशाला - यहाँ देवता की भोगसामग्री का प्रबन्धन होता है।

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(3) जगमोहन या मुखशाला या सभामंडप - यहाँ आराधना, देव अनष्ठान, शास्त्रार्थ, विमर्श, कर्मकांड या अन्य ऐसे आयोजन होते हैं।
(4) गर्भगृह या देउल - यहाँ मुख्य देवता विराजते हैं। इस पर शिखर सबसे ऊँचा होता है। 

प्रथम दो संरचनायें वास्तविक मंडप होती हैं यानि इनका शिखर केवल स्तम्भों पर आधारित होता है और चारो ओर से घेरा खुला होता है।
जगमोहन में दीवारें होती हैं जिनमें द्वार और खिड़कियाँ भी लगाई जाती हैं यानि इसे एक बहुत बड़े कमरे की तरह माना जा सकता है।
गर्भगृह का क्षेत्रफल जगमोहन की तुलना में बहुत कम होता है जिसमें एक लघुद्वार और शीर्ष कलश से होते ध्वज तक जाती बहुत पतली नलिका के अतिरिक्त सब बन्द होता है।
सामान्यत: नटमन्दिर मूल मन्दिर के  जनप्रिय हो जाने के बाद ही बनाया जाता था। देवविग्रह से विवाहित और आजन्म पुरुषों से दूर रह देवता को रिझाने के लिये सांस्कृतिक कार्यक्रम करने वाली देवदासियाँ कालांतर में राजसत्ता और पुजारियों के भ्रष्टाचार की शिकार होती चली गईं। परिणामत: यह व्यवस्था भी घृणित हुई। लोकप्रतिष्ठा में कमी, घृणा और समृद्धि के क्षरण के चलते यह प्रथा लगभग समाप्त ही हो गई।

कोणार्क मन्दिर में नटमंडप और भोगमंडप एक ही संरचना में थे जो कि मुख्यमन्दिर की पीठ (plinth) से अलग पीठ पर बनी थी।
यूनेस्को के जिन अभिपत्रों में इसे विश्व धरोहर संख्या 246 घोषित किया गया है, उनमें यह मानचित्र मिलता है:
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इसके पैमाने की जाँच मैंने उपलब्ध मापों, गुगल मैप और स्वयं के कुछ पदमापों से कर ली है। मापन के समस्त परिमाणों और उनके आपसी अनुपातों के बारे में बाद में बातें करेंगे। पहले यह देख लें कि किस तरह से वर्ग वास्तुमंडलों के प्रयोगों और संयोजनों द्वारा क्षैतिज योजना विकसित की गई। इसके लिये मैंने इस मानचित्र के ऊपर ग्राफ को चिह्नित कर भिन्न भिन्न रंगों में वास्तुमंडल अनुप्रयोग दर्शाये हैं:
SQUARE_GEOMETRYवर्गों की स्थिति अलग अलग दर्शाने के लिये उन्हें थोड़ा थोड़ा हटा दिया है।
  • लाल  – गर्भगृह
  • केसरिया – जगमोहन
  • नीला (तीन) - मुख्य मन्दिर की दीवारों से लगे उदय, मध्याह्न, अस्त सूर्यप्रतिमाओं के लघु मन्दिर।
  • हल्का धानी - पीछे के उपमन्दिर को घेरे जगमोहन के केन्द्र तक
  • बैगनी - जगमोहन और गर्भगृह का घेरा। ध्यान दें कि यह धानी घेरे के बराबर है।
  • गुलाबी - उपमन्दिरों की आंतरिक सीमाओं का जगमोहन की मुख्य बाहरी दीवारों से संरेखण दर्शाता है।
  • हरा - यह दीर्घ आयत कई लघु वर्गों से बना है और नटमन्दिर तक जाता है।
  • मुखशाला के आगे खिंची गहरी कथई रेखा नवग्रह प्रतिमाओं के पैनल की स्थिति दर्शाती हैं जो कि 12 हाथ आगे लौह धरनियों (beam) पर स्थापित था और बहुत पहले मराठा राजाओं द्वारा उतारा जा कर अन्यत्र पूजित है। लौह कर्म और नवग्रहों की चर्चा आगे करेंगे। 
ध्यान से देखें तो तीनों उपमन्दिरों के मध्य बिन्दु एक समकोण त्रिभुज का निर्माण करते हैं जिनके दर्पण बिम्ब त्रिभुज का शीर्ष ठीक उस गलियारे के मुहाने पर समाप्त होता है जहाँ से गर्भगृह का द्वार खुलता है। यह गूढ़ तांत्रिक संकेत है जिसकी चर्चा बाद में करेंगे।
पूर्वाभिमुख नटमन्दिर के चार चार स्तम्भों के ग्रिड से होती सूर्य किरणों के चार सम्भावित पथ 1,2,3, और 4 दर्शाये गये हैं। आप देख सकते हैं कि गर्भगृह तक ये किरणें अबाध रूप से पहुँच सकती हैं। सूर्य के उत्तरायण से दक्षिणायन होने और संक्रांति बिन्दुओं पर उसकी स्थिति के अनुकूल ही इन स्तंभों का स्थान, विन्यास और मोटाई रखी गई। किसी नियत पवित्र दिन को सूर्योदय के पश्चात प्रात: के कुछ मिनटों में नृत्य/भोगमंडप में किरणों के खगोलीय ऋतुनृत्य सुनिश्चित कर दिये गये ताकि वे मुख्य प्रतिमा का अभिषेक कर सकें। ऐसी किरणों का मार्ग देख जो कि गर्भगृह तक पहुँचती हों या नृत्यमंडप के चुनिन्दा स्तम्भों के सहारे नृत्यरत हों, दर्शनार्थी अंतरिक्ष में सूर्य के मार्ग से भी अवगत रहते थे।
 
प्रश्न यह उठता है कि इतनी परिशुद्धि के साथ इतना विशाल खाका भूमि पर कैसे उकेरा जाता था? इसका उत्तर ज्यामिति में है। मन्दिरों का खाका या वास्तुमंडलसमूह दिशाओं के सापेक्ष भूमि पर उकेरे जाते थे क्यों कि प्रकाश और वायु की उपलब्धता इस पर निर्भर थी। साथ ही दिशायें देवताओं और पंचमहाभूतों के संतुलन से भी सम्बन्धित थीं।
यह जानना भी रोचक होगा कि दिशा अंकन की परिशुद्धता कैसे सुनिश्चित की जाती थी? इसके लिये इस तथ्य का प्रयोग होता था कि सूर्य प्राची में उदित होता है और पश्चिम में अस्त। उन्हें यह भी पता था कि वर्ष में विषुव (equinox) नामधारी दो दिनों को ही सूर्य वास्तविक पूरब और पश्चिम में उदय अस्त होता है। बाकी दिनों के लिये सूर्य की आभासी गति के अनुसार संशोधन उन्हें पता थे।
अगले अंक में अंकन विधि। (जारी)
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आभार और स्रोत:
सुभाष काक, श्वेता वार्डिया, श्रीनिवासराव, बॉबी बनर्जी, अथर्वण संहिता और अन्य कई
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