मंगलवार, 1 जुलाई 2014
मैं, शंकर के समर्थन में
रविवार, 15 जून 2014
साक्षी भ्रमण ध्यान - 1
कठभठ्ठा नोनछा माटी की लीक। ध्यान सी स्थिति - भ्रमण ध्यान। आरम्भ है किंतु अनुभूति ऐसी जैसे कि ध्यान में थिर हुये चौथाई घड़ी बीत चुकी हो। कानों में धीमी अनवरत सीटी बज रही है, स्वरमय शांति है - टी टी टूँ, टुँइ, टुइँ टिर टिर टिर च्यूँ चू, टिउ टिउ टिउ ट ट ट टी टी टूँ, टी टी टूँ। खगछ्न्द के विन्यास, सुर ताल मन में निर्वात भरते - कोरा, पुरानी धोती सा मन धुलते धुलते धूसर रंग स्वच्छ, लुप्त श्वेतकांति।
यह लीक कहीं नहीं जाती, पग चलते हैं पगले दंडियों के, पगडंडियाँ बनती हैं! खेतों के किनारे श्रमकण खिचड़ी श्मश्रुओं में उलझते हैं, नमी जड़ों तक पहुँचती है, पत्तियों के तीखे कोर बाहों की मछलियों पर गोदने जड़ते हैं, अन्न उपजता है, क्षुधा शांत होती है, ध्यान पकता है। लीक पौढ़ा होती है।
भाठ तापस गेरुआ नहीं ओढ़ता, उसके मटमैले
यादृच्छ चेकित वस्त्र के कोर से हरियाली फूटती है। मुग्ध धरा का हास उनमें जड़ता है, गुड़हल फूलते हैं। पूजा की थाली में मृत पुहुप नहीं, तोड़े गये बलिपुष्प सजते हैं और अक्षत आराधनाओं के घूँघट धूप धूम चर्चित होते हैं। कपूर प्रतिदिन उड़ते हैं, समिधायें पूछती हैं - धरे! जीवन क्या है? वह अनमना उत्तर देती है - अस्थिर संतुलन - फूलने सा, उड़ने सा, जलने सा, बरसने सा और आँकुर अँखुआने सा।
खिले अर्क ने स्वागत किया है। पत्तियों की हरिताभा में शिराओं की दुग्धधार मचल रही है। अभिषेक को न शिव हैं और न हिरण्यपुरुष। भस्मवसना शिवा ने सैरीय नीललोहित वासंत से रंग चुरा निज क्षार दूध मिला दिया तो तुम उपजे? देवी को तो अरुण अड़हुल अर्पित कर चुका, किस आस तुम खिले हो एकाकी??
खिली तो अनामपुष्पा भी है। लहकती किशोरी समीरा का हल्का सा स्प
र्श होगा और सृष्टि के नियम आदिबाबा की पोटली से रवरोर करते निकल भागेंगे। उड़ उड़ यहाँ वहाँ भैंस की पीठ, कौवे की पाँख, दादा की काँख, पगड़ी, चोटी, आँचल, बोरा, टट्टर की छाँव – सब पर सब ओर सवार अचीन्हे अनदेखे फैल जायेंगे नरम गदबदे फाहों के बीच सिमटे नान्हें से बीज। एक ओस आँसू भर किसी मेड़ पर गिरेगा और अंकुरित होगी नान्ही सी घास - धरती एक तिरिन और लजा जायेगी।
रोग लदी हवा हवा हुई। लुप्तप्राय शिंशपा अब लहराने लगे हैं। इनकी सूखी मृत देह ने मन काठ होने का मुहावरा दिया। अभी तो इन्हें लहराते देख मन बाग बाग हुआ जाता है। नीरवता में, ध्यान में उच्छृंखलता आती है, जाती है। द्र्ष्टा हूँ मैं - कहो कि तुम्हारी छाँव इस गोपन में कितनी अभिसारसन्धियों पर अधराक्षर हुये? स्वीकारते अनजाने कौन सी नई फुनगी मसली गयी और कौन सी डार मरोड़ मुड़ महक उठी?
मौन प्रश्न - लटजीरे सी लटों में मोती पिरोये अकेली! पी कहाँ? कंटक इक्ष्वाकुओं की नगरी में तुम्हें अकेली छोड़ कहाँ गया??
सर सर उत्तर - मेरा सखा तो नभ में है। जानते हो, रोहिन गई, मृगडाह लगने वाला है। उसके आने में अभी देर है। जब आयेगा तब इक्ष्वाकुओं की कँटीलियाँ रसभरी होने लगेंगी, मदमाती मेरे सारे मोती छीन लेंगी। तुम साखी हो हमारे, बताना कि उसकी प्रतीक्षा में मैं कैसी सजी थी और मेरे साथ इन्हों ने क्या किया। कहीं वह मुझे छोड़ उन पर न लुभ जाय!
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किसे कह रही है वह बैरन कँटीली? वह तो यहाँ है। भोली आशाओं जैसे कंटक लिये, पूरी हों तो चाहतें और चुभती हैं, न पूरी हों तो बेधती हैं। सुन्दरता हो तो ऐसी। समय संग परिवर्तन ओढ़ती, निर्वसन होती, सिमटती और ... लहूलुहान करती। छूना मत!!
(जारी)
सोमवार, 2 जून 2014
बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 28
सोमवार, 26 मई 2014
चढ़ते सूरज को सलामी भर थी!
~ गिरिजेश राव
सोमवार, 12 मई 2014
मतदान के दिन लौटती बारात के संग
... बारात प्रात: 5 बजे ही वापस चल दी। प्रयाग से बलिया पहुँच कर मतदान अनिवार्यत: करना था, भले बस सीधे बूथ पर ले जानी पड़े! मैं उत्साह को देख अभिभूत हो गया।
लौटती बारात एक स्थान पर चाय के लिये उतरी तो पार्श्वासीन श्वेतकेशी वृद्ध समाचारपत्र ले आये और बस के चलते ही उद्घोषणा किये - अपने ही जड़ मट्ठा डाल दिया! ग़ैर क़ानूनी माल उनके काशी ऑफिस में पकड़ा गया।
मैं नेट पर पहले ही प्रशासन की इस मामले में हुई छीछालेदर पढ़ चुका था लिहाजा मैंने उन्हें वैसे ही सलाह दी जैसे इस मंच पर वहाबियों और सेकुलरों को देता रहता हूँ - पहले पढ़ तो लीजिये!
उन्हों ने मेरी ओर तिरस्कार भरी दृष्टि फेंकी ही थी कि पीछे से नमो समर्थकों के शब्द रेले आये - अरे, पूरा बताइये तो सही, क्या हुआ?
सज्जन समाचार पढ़ कर वास्तविकता जान चुके थे लेकिन हार कैसे मानें? पुन: दुहरा दिये - ग़ैर क़ानूनी माल ...
मुझसे रहा नहीं गया - बासी समाचार है दद्दू! कुछ भी ऐसा वैसा नहीं मिला और जो बरामद हुआ था, उसे वापस भी कर दिया बिना कोई केस किये!
आगे बैठे युवा को मसखरी सूझी - ये बताइये चचा, अबकी किसे भोट देंगे?
चचा उवाच - अब की तो कुंजर को
युवा - कुंजर को या चक्रिका को देने से अच्छा है कि कर को ही दे दें।
चचा भड़क उठे - काहें?
युवा - चुनाव के बाद ये दोनों कर का ही दंडवत करने वाले हैं। दलालों के बजाय सीधे महरानी को ही न दिया जाय, कम से कम क्रय विक्रय जोड़ तोड़ तो न होंगे!
बस में ठहाके गूँज उठे। खिसियाये वृद्ध ने कहा - अरे, मेरे एक भोट से क्या होगा?
युवा ने कहा - वही तो सब सोचते हैं, इसीलिये तो बंटाधार है।
... मामला और लम्बा खिंचता किंतु बस का वीडियो प्लेयर ठीक हो गया था। कलात्मक फिल्म 'गुंडईराज' चल पड़ी और बाल, किशोर, युवा, वृद्ध सभी मुँह बाये, आँखें फाड़े, आँखें चुराते, निर्विकार आदि आदि मुद्राओं में शांत हो महासाहित्यिक भोजपुरी गीत 'देख'ने लगे - ले ल, ले ल, ले ल ... ले ल हमके कोरा में, चोली के बटाम खोल ...
मुझ रात भर के जगे को नींद आने लगी, पब्लिक तो हँचड़ के खाने के बाद ए सी डॉरमेट्री में फसड़ के सोयी थी, तरो ताजा थी सो बटन खुलने के बाद के 'गुंडईराज' की कल्पना के साथ दृश्य़ श्रव्य नृत्य का आनन्द लेने लगी।
मैं इस सोच को लिये निद्रालीन हो गया - इस पब्लिक को लोकतंत्र के बन्द खुलने के बाद उससे हो रहे बलात्कार को देखने में मजा आता है... 'गुंडईराज' सनातन है!