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रविवार, 15 जून 2014

साक्षी भ्रमण ध्यान - 1

10413419_10204078153622312_9166858868039137010_nकठभठ्ठा नोनछा माटी की लीक। ध्यान सी स्थिति - भ्रमण ध्यान। आरम्भ है किंतु अनुभूति ऐसी जैसे कि ध्यान में थिर हुये चौथाई घड़ी बीत चुकी हो। कानों में धीमी अनवरत सीटी बज रही है, स्वरमय शांति है - टी टी टूँ, टुँइ, टुइँ टिर टिर टिर च्यूँ चू, टिउ टिउ टिउ ट ट ट टी टी टूँ, टी टी टूँ। खगछ्न्द के विन्यास,  सुर ताल मन में निर्वात भरते - कोरा, पुरानी धोती सा मन धुलते धुलते धूसर रंग स्वच्छ, लुप्त श्वेतकांति।

यह लीक कहीं नहीं जाती, पग चलते हैं पगले दंडियों के, पगडंडियाँ बनती हैं! खेतों के किनारे श्रमकण खिचड़ी श्मश्रुओं में उलझते हैं, नमी जड़ों तक पहुँचती है, पत्तियों के तीखे कोर बाहों की मछलियों पर गोदने जड़ते हैं, अन्न उपजता है, क्षुधा शांत होती है, ध्यान पकता है। लीक पौढ़ा होती है।

भाठ तापस गेरुआ नहीं ओढ़ता, उसके मटमैलेIMG_20140608_075801841 यादृच्छ चेकित वस्त्र के कोर से हरियाली फूटती है। मुग्ध धरा का हास उनमें जड़ता है, गुड़हल फूलते हैं। पूजा की थाली में मृत पुहुप नहीं, तोड़े गये बलिपुष्प सजते हैं और अक्षत आराधनाओं के घूँघट धूप धूम चर्चित होते हैं। कपूर प्रतिदिन उड़ते हैं, समिधायें पूछती हैं - धरे! जीवन क्या है? वह अनमना उत्तर देती है - अस्थिर संतुलन - फूलने सा, उड़ने सा, जलने सा, बरसने सा और आँकुर अँखुआने सा। 

IMG_20140608_080308670खिले अर्क ने स्वागत किया है। पत्तियों की हरिताभा में शिराओं की दुग्धधार मचल रही है। अभिषेक को न शिव हैं और न हिरण्यपुरुष। भस्मवसना शिवा ने सैरीय नीललोहित वासंत से रंग चुरा निज क्षार दूध मिला दिया तो तुम उपजे? देवी को तो अरुण अड़हुल अर्पित कर चुका, किस आस तुम खिले हो एकाकी??

खिली तो अनामपुष्पा भी है। लहकती किशोरी समीरा का हल्का सा स्पIMG_20140608_081217436र्श होगा और सृष्टि के नियम आदिबाबा की पोटली से रवरोर करते निकल भागेंगे। उड़ उड़ यहाँ वहाँ भैंस की पीठ, कौवे की पाँख, दादा की काँख, पगड़ी, चोटी, आँचल, बोरा, टट्टर की छाँव – सब पर सब ओर सवार अचीन्हे अनदेखे फैल जायेंगे नरम गदबदे फाहों के बीच सिमटे नान्हें से बीज। एक ओस आँसू भर किसी मेड़ पर गिरेगा और अंकुरित होगी नान्ही सी घास - धरती एक तिरिन और लजा जायेगी।

IMG_20140608_080834815रोग लदी हवा हवा हुई। लुप्तप्राय शिंशपा अब लहराने लगे हैं। इनकी सूखी मृत देह ने मन काठ होने का मुहावरा दिया। अभी तो इन्हें लहराते देख मन बाग बाग हुआ जाता है। नीरवता में, ध्यान में उच्छृंखलता आती है, जाती है। द्र्ष्टा हूँ मैं - कहो कि तुम्हारी छाँव इस गोपन में कितनी अभिसारसन्धियों पर अधराक्षर हुये? स्वीकारते अनजाने कौन सी नई फुनगी मसली गयी और कौन सी डार मरोड़ मुड़ महक उठी?

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मौन प्रश्न - लटजीरे सी लटों में मोती पिरोये अकेली! पी कहाँ? कंटक इक्ष्वाकुओं की नगरी में तुम्हें अकेली छोड़ कहाँ गया??
सर सर उत्तर - मेरा सखा तो नभ में है। जानते हो, रोहिन गई, मृगडाह लगने वाला है। उसके आने में अभी देर है। जब आयेगा तब इक्ष्वाकुओं की कँटीलियाँ रसभरी होने लगेंगी, मदमाती मेरे सारे मोती छीन लेंगी। तुम साखी हो हमारे, बताना कि उसकी प्रतीक्षा में मैं कैसी सजी थी और मेरे साथ इन्हों ने क्या किया। कहीं वह मुझे छोड़ उन पर न लुभ जाय!

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किसे कह रही है वह बैरन कँटीली? वह तो यहाँ है। भोली आशाओं जैसे कंटक लिये, पूरी हों तो चाहतें और चुभती हैं, न पूरी हों तो बेधती हैं। सुन्दरता हो तो ऐसी। समय संग परिवर्तन ओढ़ती, निर्वसन होती, सिमटती और ... लहूलुहान करती। छूना मत!!

(जारी)

बुधवार, 9 मई 2012

...और सुन्दर लहरें


प्रतिदिन की तरह आज भी जब गैरिक यायावर द्वार पर आयेगा, मैं उसे थोड़ी सी चाँदी दूँगा, ठंडी सी चाँदी। पता है कि वह हौले से  मुस्कुरायेगा और पूछेगा - आज ऐसा क्या खास है जो इतने उदार हो रहे हो? मैं उससे कहूँगा - तुम्हें दे रहा हूँ कि बाँट सकूँ सब को, मैं तो अब चल भी नहीं पाता। सम्भवत: वह किंचित दुखी होगा और चमकते हाथ झुलाते चला जायेगा।

मैं लिखने बैठ जाऊँगा - चन्द कतरे, चन्द मीठी बातें - कुछ यहाँ की, कुछ वहाँ की और कुछ सारे जहाँ की। संसार की सबसे सुन्दर स्त्री उन्हें पहनेगी, इठलायेगी कि देखो कैसी लग रही हूँ? मैं कुछ भी नहीं कहूँगा । उसे निहारते मेरी आँखों में चाँदी फैलती जायेगी जिसे यायावर उछाल रहा होगा उन प्रशांत विवरों की ओर जिनके पास जन्मों के अनगिनत महाशंख होंगे। मेरी श्वेत पुतलियों के सूनेपन को भाँप वह रूठ जायेगी, साँझ ढल जायेगी और एक और मृत्यु हो जायेगी - सार्थक मृत्यु। अकथ्य अपार सौन्दर्य को निहारते मरना कोई कमतर घटना नहीं होती। 

रात उस प्रेम का सन्देश ले कर आयेगी जो रहता रहा है लेकिन हुआ कभी नहीं। मेरे सपनों में बादल धरती पर उतर आयेंगे। हाँफता बूढ़ा समुद्र होगा जो अपनी लहरदुहिताओं से खेलते कभी नहीं थकता। बादल उनसे कहेंगे – धरती पर तो तुम सब हम जैसी हो, आओ हम सब खेलें! बाबा समुद्र की उल्लासमय चेतावनियाँ उन्हें घेरेंगी। वह बोलेगा – खेलो तुम सब, मैं थक गया हूँ। विचित्र खेल में जोड़ियाँ बनेंगी, पानी नमकीन हो उठेगा – सब विदा हो जायेंगी। भटकता यायावर ऊपर से ऊर्ध्व जाल फेंकेगा और सब चल देंगे अनजान विवरों की ओर। उनमें बिन पानी मछलियों वाली छटपटाहट नहीं होगी। मेरी नींद टूटेगी, थोड़ा सा पानी पिऊँगा और करवट ले सो जाऊँगा। यूँ सोते सपने बहुत आते हैं!

एक जगा हुआ सपना, भोलेपन की साध लिये कि सब कुछ सुन्दर क्यों नहीं हो सकता? दीवारों से घिरी घूमती हहर माँ की तरह समझायेगी – मुन्ने! तब तुम जानोगे कैसे कि सुन्दरता क्या है? तब तो कुछ भी नहीं होगा! मैं कहूँगा – जो अच्छा लगे वही सुन्दर है। वह एक पुरानी लोरी गाने लगेगी:
तोड़े है मलिया नौ नौ फूल,
राजा की बगिया नौ नौ फूल,
रानी के जूड़े नौ नौ फूल।
तोड़े है मलिया नौ नौ फूल,
देवी के गोड़े नौ नौ फूल,
धूल धगे निगोड़े नौ नौ फूल।
तोड़े है मलिया नौ नौ फूल,
फूले जो रहते हैं फूले फूल
देखे है दुनिया नौ नौ फूल।
“माँ! नौ नौ क्यों?” - उसे मेरे होठों पर काँपते लड़खड़ाते माते प्रश्न की चिंता नहीं होगी, पता होगा कि अभी सो जायेगा। सिरहाने लहरों की ममता छोड़ जायेगी। घुँघराले केशों में सिहरती ममता – तू ऐसा क्यों है रे? क्यों नहीं समझता?
मैं गहरी नींद होऊँगा, जिसमें कोई सपने नहीं होते। अनूठे कृष्ण विवर होते हैं जिनका गुरुत्त्व समय को भी सोख लेता है, पता ही नहीं चलता कि इतनी कालिख यकायक कहाँ से आ गई? कुछ भी पता नहीं चलता – ‘मैं’ भी नहीं।
.....
.....
यायावर ने बताया है कि समय लगेगा, सपनों वाली गहरी नींद आने में समय लगेगा। मैंने उससे कहा है – मेरे पास अब और चाँदी नहीं, बस सुन्दरता है। मैं तुम्हें आँखें देने से रहा!
उसने कहा है – वे तुम पर ही अच्छी लगती हैं, देखते रहो! एक दिन सब सुन्दर होगा। मैंने हाथ जोड़ लिये हैं।                      

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

चम्मच भर गद्य


दिन दिन दिन उतान होते जा रहे हैं और आस पास के जन हैरानियत की सीमा के उस पार पहुँच चुके हैं जहाँ किसी को बेहद आसान सा माना जाने लगता है - वह तो ऐसा ही है जब कि मैं चरम आज्ञाकारी हो गया हूँ - कोई प्रश्न नहीं, कोई खुरपेंच नहीं - यस बॉस! अजीब विरोधाभास है। 
 सुबह उठता हूँ तो पाता हूँ कि प्रकृति ने सारी नियामतें मेरे गले के ऊपर ठूँस दी हैं। जब शॉपिंग अधिक हो जाती है और फ्रिज में जगह नहीं बचती तो आप क्या करते हैं? मैंने न खरीदा और न माँगने गया लेकिन मेहरबानियों का झोला कुछ अधिक ही लबालब हो गया है। आठ दस तो रोज रास्ते में ही गिर जाती हैं फिर भी रोज वही हाल रहता है कि इस कोने ठूँस दूँ या उस कोने! 
ऐसे में शाम्भवी महामुद्रा भी भूल गयी है। टहल सकता नहीं और न कोई साँसों का व्यायाम कर सकता हूँ। महामुद्रायें बेवफा हो ही जाती हैं अगर आप ने रोज उनसे प्रेम नहीं जताया। उस कमबख्त के लिये दिल्ली जैसे कबाबी शराबी शहर में मैं साल भर संन्यासी रहा - मीट मछली क्या, आलू प्याज तक छोड़ दिया था! साल भर बाद धिरवन मिली कि तुम्हारा चेहरा काला पड़ गया है, टी बी के मरीज दिखते हो, छोड़ो यह सब। मैं था कि अमल आनन्द में लोट पोट रहा था। 

उसकी तैयारी हमेशा अचरज में डालती रही - दस मिनट के सुख के लिये पूरे पैतीस मिनट तक दुस्सह कलाबाजियाँ और नट नृत्य! मुझे लगता कि इतनी तैयारी तो नशीले धुँआ के लिये स्मैकिये भी नहीं करते! फिर भी करता रहा। तभी छूटी जब मैं पूरी तरह से निचुड़ गया। एक बात पक्की रही कि साल भर जुकाम तक नहीं हुआ। छुड़ाने में निचुड़ने से अधिक योगदान संगी साथियों का था जो यह समझने लगे थे कि बहुत जल्द ही मैं संन्यासी बन प्रवचन देने लगूँगा। ऐसे में एक दिन साल भर का सँजोया संयम एक घपलेबाज की मलामत पर खर्च दिया। नमो नमस्ते स्वाहा, स्वाहा! लेकिन आज लगता है कि महामुद्रा वाकई कारगर थी। ओं मणि पद्मे हुम्म!  
बस एक प्रश्न ही आजकल मुँह बाये रहता है - कहाँ जाऊँ? दिल्ली या उज्जैन या झुमरीतलैया या बैतालपुरआजकल ट्रांसफर का सीजन है। शून्य शिखर पर वाकई अनहद बज रहा है और हम जैसे पतित गलित इस प्रतीक्षा में हैं कि कब अमृत टपके और चट कर जायँ! तापस जन हैं कि टपका ही नहीं रहे! विकट स्थिति है। इतनी विकट है कि आजकल कोई मेरी कार में बैठे तो बजते गीतों के रेंज से ही पगला जाय!
 जसराज का राग सोरठ खत्म होते ही शकीरा का आइ माइट स्टील योर क्लॉद्स शुरू हो जाता है, फिर कवन नगरिया मोरे पियवा का बासा जिसकी करुणा समर ऑफ सिक्स्टी नाइन की गरमी से शांत होती है और ऑफिस आ जाता है।
कुर्सी पर बैठ आठ दस बार छींकता हूँ। अगल बगल कोई नहीं रहता सिवाय पोंछा लगाने वाली के जिससे मैं कह नहीं पाता कि फिनॉयल का प्रयोग कम किया करो, कोई जरूरी नहीं कि मुफ्त में मिले जहर को बोतल भर गटक लिया जाय! (इसलिये नहीं कह पाता कि वह समझ ही नहीं पायेगी, कह देगी साहेब दो ढक्कन तो डाला बाल्टी भर पानी में। क़्वालिटी की शिकायत की कभी मैंने? आप ही लोग तो खरिदवाते हो!)।
 पंखा चलाऊँ तो ठंड, न चलाऊँ तो पसीना! ए सी में हाल-ए-जिस्म और दुखफहम। शाम तक तमाम एक्स वाइ ज़ेड डियो के बावजूद अपनी ही देह गन्धाने लगती है (परफ्यूम का यूज कर ही नहीं सकता, मौत हो जायेगी)। मैं अकारण ही खुश हो जाता हूँ हालाँकि बैसाख का महीना अभी कम से कम महीना भर दूर है। खुशी के दौरान ही पाता हूँ कि मैं मूलत: बहुत जॉली किस्म का मनई हूँ। दिन में जिनसे चैट होती रहती है, वे जन इस बात की पुष्टि करेंगे तो फिर यह भठ्ठरई क्यों? काहे की फैल है जो ढंग का कुछ भी नहीं लिखने दे रही?  
इसका उत्तर यह है कि लेखन औषधि भी होता है। सामान्य खाने और पथ्य कुपथ्य में जैसे अंतर होता है वैसे ही उस तरह का लेखन जो कि लिखने वाले को स्वस्थ करे, उस वाले से अलग होता है जो जनरंजन करता है। आजकल वही हो रहा है - प्रतिदिन कुछ लिखो! सुबह एक चम्मच गद्य तो शाम को दस बूँदें कविता कप भर करुणा में डाल कर! दिन भर चैट वाली शीशी से मीठी गोलियाँ चुभलाते रहो, बीच बीच में गरियाते भी रहो। जिसने इलाज बताया है उसने कहा है कि ऐसा नियमित करता रहा तो बैसाख तक ठीक हो जाऊँगा। मुझे बैसाख की प्रतीक्षा है। इस सुबह का चम्मच भर गद्य समाप्त। सेत्ताराम! सेत्ताराम!!     

गुरुवार, 10 मार्च 2011

69-2

पिछले भाग से जारी ...
इस दृष्टि से उन्हें विपरीत या विरुद्ध न कह कर पूरक कहना अधिक उपयुक्त है। यह बात अलग है कि ऐसी दृष्टि पाने के लिये बहुत तपना पड़ता है। नैसर्गिक अधूरापन ही आकर्षण को जन्म देता है। खालीपन को प्रकृति स्वीकार नहीं पाती लेकिन अधूरेपन को सनातन बनाये रखती है ताकि यह विधान जारी रहे, सृष्टि चलती रहे और संतुलन भी बना रहे। विधान, सृष्टि और संतुलन भी कैसे? एक दूसरे पर निर्भर लेकिन फिर भी स्वतंत्र तत्त्वों की एक दूजे की परिक्रमा जैसे।
69 की बात हो और नर नारी, उनके आपसी आकर्षण और मिलन संभोग की बात न हो! – हो ही नहीं सकता। पाश्चात्य और पूर्वी कामशास्त्रों में संभोग की एक सबसे उत्तेजक और विवादास्पद मुद्रा 69 वर्णित है जिसमें स्त्री पुरुष एक साथ एक दूसरे के यौनांगों का मुख द्वारा उत्तेजन करते हैं और चरम आनन्द की प्राप्ति करते हैं।
khajuraho
69_2
  खजुराहो के मन्दिरों पर इस मुद्रा के शिल्प हैं और पश्चिमी सभ्यता के चित्रों और शिल्पों में भी यह मुद्रा पाई जाती है। पुरुष प्रधान समाज की सबसे पूर्ण कामकला विषयक कृति कामसूत्र में वात्स्यायन ऐसी संभोग मुद्रा को काकवृत्ति से जोड़ते हैं (2/9) – कौआ गन्दी चीजों पर मुँह मारता है। वह औपरिष्टक नाम से चर्चित विभिन्न मुख मैथुन मुद्राओं का प्रयोग विवाहिताओं के साथ करने से मना करते हैं।
संभोग को साधना के एक मार्ग या यज्ञ की तरह देखने की परम्परा के दर्शन प्रश्नोपनिषद, छान्दोग्य, वृहदारण्यक और वामाचारी मान्यताओं में होते हैं। वामाचार में तो इसका पूरा तंत्र ही है। वहाँ ‘प्रज्ञा’ को नारी तत्व और ‘उपाय’ को नर तत्व माना गया है। दोनों के मिलन अर्थात संभोग को ‘प्रज्ञोपाय’ कह कर उसे समाधि जैसी श्रेणी में रखा गया है। वैदिक बलि यूप का शैव मत में योनिपीठ पर विराजमान लिंग में परिवर्तन भी साधना के इस मार्ग की ओर संकेत करता है। जाग्रत लिंग को कुंडलिनी के जागरण से भी जोड़ा गया है। उल्लेखनीय है कि 69 मुद्रा में गर्भाधान हो ही नहीं सकता। अर्थ यह कि यह या तो केवल आनन्द प्राप्ति के लिये है या केवल साधना के लिये। ऐसी और मुद्रायें भी हो सकती हैं लेकिन उनमें ऐसी बराबरी नहीं होती। पूरक तत्वों के एक दूसरे को उठान देने की प्रवृत्ति पर सोचने पर इस मुद्रा का साधना पक्ष ही अधिक प्रबल लगता है। यिन और यांग का उन्मुक्त, प्रगाढ़ और पूर्णत: वर्जनाहीन संयोग – अस्तित्त्व बनाये रखते हुये भी सर्वस्व निछावर कर देने की साधना। शारीरिक दृष्टि से भी सबसे प्रकट और सबसे गुह्य अंगों का संयोग, आलोड़न, विलोड़न। प्रतीत होता है कि ऐसी मुद्रायें कभी रहे मातृप्रधान समाज की ध्वंसावशेष हैं। विलुप्त हो चुके उस समाज की प्रवृत्तियों ने वज्रयान, तंत्र, वामाचार आदि मार्गों में पैठ बना ली। हाँ, रूप अवश्य बहुत परिवर्तित हो गया होगा।
आप को लग रहा होगा कि अचानक 69 पर लिखने की मुझे क्यों सूझी? बेटा क्रिकेट का नया नया फैन हुआ है और उसके चक्कर में अभी जारी विश्वकप के रिक्शाखींचू उद्घाटन समारोह को मुझे देखना पड़ा। संतान जो न कराये वरना क्रिकेट से घृणा करने वालों में मैं भी सम्मिलित हूँ। उस समारोह में प्रसिद्ध रॉक गायक ब्रायन एडम्स ने अपना एक बहुत प्रसिद्ध गीत Summer of 69 प्रस्तुत किया। ‘69 की गर्मी’ ने 69 अंक के भूले बिसरे संयोगों की याद दिला दी। उत्सुकता हुई कि इस गीत का 69 है क्या बला जो यह इतना मशहूर हुआ? कोफ्त भी हुई कि मैंने आज तक इसे सुना क्यों नहीं? रॉक संगीत के शब्द पल्ले नहीं पड़ते सो शब्दों के लिये नेट खँगालना पड़ा। पता चला कि ब्रायन एडम्स और जिम वल्लांसे द्वारा लिखा यह गीत ‘रेकलेस’ अलबम में 1985 में रिलीज हुआ था। अपन राम उस समय बज्र भोजपुरी इलाके में इश्क़ के शुरुआती पाठ पढ़ रहे थे – खाक पता चलता! गीत को पढ़ा तो लग गया कि दोनों लिखने वाले बला के लंठ हैं।
अभी सोच ही रहा था कि दो दिनों पहले बारह वर्षों के बाद एक मित्र ने मुझे फेसबुक पर ढूँढ़ निकाला। बेचारा मनु आज तक फेसबुक पर ऊर्मि को नहीं ढूँढ़ पाया है। बागी बलिया के निवासी यह मित्र फाइनाइट एलीमेंट एनलिसिस के जटिल सबरूटीन एक ही बार में कॉपी पर लिख देते थे जिन्हें रन कराते त्रुटि सन्देश भी नहीं आते थे! कमरा नं. एस-69 में आलसी राम निवास करते थे और उसी विंग की सत्तरी शृंखलानामधारी किसी कमरे में यह महाशय।
...  69 पर लिखना अपरिहार्य हो गया।
’69 की गर्मी’ पर वापस आते हैं। इस गीत में दो पर्ते हैं जिनकी चर्चा अपने कवितायें और कवि भी ब्लॉग पर इस शृंखला की समापन कड़ी के रूप में करूँगा। चलते चलते बस एक बात – जिस तरह से अकेली कहानी जैसी कोई बात नहीं होती वैसे ही किसी कविता या गीत का कोई अकेला अर्थ नहीं होता ... अब सात दिनों के लिये आलसी राम को विदा दीजिये।

बुधवार, 9 मार्च 2011

69 -1

संयोग जीवन के अनिवार्य अंग हैं। हम सबका इनसे पाला पड़ता है। संयोग किसी भी रूप में घट सकते हैं। आप को अन्धविश्वासी बना सकते हैं, विश्वासी बना सकते हैं, कौतुहल से भरे बचपन को पुन: पुन: आप के भीतर जगा कर जीवनपर्यंत खिलन्दड़ बनाये रख सकते हैं। यह इस पर निर्भर है कि आप कितने सम्वेदनशील हैं और जीवन को गम्भीरता और हल्केपन के मिश्रण के रूप में कितना देख पाते हैं।
मेरे जीवन में 69 अंक का संयोग निर्माणकाल के दौरान बना रहा। इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के अनुक्रमांक से प्रारम्भ हुआ यह संयोग सेवायोजन के आखिरी चरण में एक साथी के इनकार और बाद में उसके त्यागपत्र तक बना रहा। जाने वह कहाँ है? आज भी यह जानने की उत्सुकता है कि मेरे भाग्यांक    को जानते हुये भी काटने वाला आज किस स्थिति में है? मैं इसे बचपना नहीं बचपन मानता हूँ जो अभी भी मेरे भीतर जीवित है। अंकों के साथ खिलवाड़ और उनसे जुड़े संयोगों से आँखमिचौनी की मेरी प्रवृत्ति दिन ब दिन बढ़ती रही है। मजे की बात यह है कि न तो मुझे अंकज्योतिष में विश्वास है और न उससे जुड़ी तमाम शाखाओं पर ‘शाखा ते शाखा पर जाहीं’ जैसी कोई खिलन्दड़ प्रवृत्ति है।
47 कड़ियों में भी अधूरे रह गये प्रेमपत्र पिनकोड 273010 में अंक संयोगों की छाया अंत तक दिखती रहेगी। अंक को गिनती से जुड़ा ही समझें, कुछ और नहीं । इसे लिखते हुये भी संयोगों से पाला पड़ता रहा है। सबसे नये वाले का तो पता अभी हाल में चला – मैं दंग रह गया। सम्बन्धित व्यक्ति को बताया भी और साथ ही दु:खी भी हुआ। फिर यह सोच कर स्वयं को बहला लिया कि संयोग घटते ही रहते हैं और एक अकेली कहानी जैसी कोई बात नहीं होती।
गणितीय दृष्टि से 69 एक अर्द्ध अभाज्य अंक है। यह विभाजित तो होता है लेकिन अभाज्य संख्याओं से। विभाजन का यह स्वभाव अकड़ और झुकाव के सामंजस्य को दर्शाता है। यह बात तो आप ने सुनी ही होगी - इतने न झुको कि दूसरे तुम्हें गलीचों की तरह रौदें और इतने अकड़ू भी न बनो कि टूट जाओ!
यह संयोग ही है कि धनु राशि में पाया जाने वाला आकाशीय तारक समूह एम-69 clip_image002हमारी आकाशगंगा के घूर्णन केन्द्र के बहुत निकट है। अब इसका नाम एम-46 भी हो सकता था लेकिन संयोग तो संयोग है। यह माना जाता है कि आकाशगंगा के घूर्णन केन्द्र में एक अति विशाल ब्लैक होल है। संतुलन के लिये घूमना आवश्यक है और घूमने के लिये एक शक्तिशाली केन्द्र। clip_image004ऐसा हमारे जीवन में भी है। हमारे मस्तिष्क में भी चेतना का एक अतिशक्तिशाली केन्द्र है और हम सारा जीवन उसके इर्द गिर्द घूमते रहते हैं। हमारे जीवन की गुणवत्ता उस केन्द्र की शक्ति पर निर्भर है। ऐसा सब के साथ है केवल धनुराशि वालों के साथ नहीं  
69 घूर्णन सममिति, प्राकृतिक संतुलन और विरुद्धों के सामंजस्य का प्रतीक है। प्रतीक तो प्रतीक होते हैं और यह बस संयोग है कि अंतर्राष्ट्रीय भारतीय लिपि (अज्ञानता के कारण लोग अरेबिक स्क्रिप्ट भी कहते हैं) में यह अंक ऐसा दिखता है कि इसे इन सबसे जोड़ा जा सके अन्यथा देवनागरी लिपि का उनहत्तर इनका प्रतीक नहीं बन सकता। 

ताओवाद में प्रयुक्त दो विरुद्ध शक्तियों के प्रतीक ताइजीतू में भी इस अंक की छटा दिखती है। प्रकृति में परस्पर विरुद्ध प्रतीत होती दो शक्तियों यिन यांग के आपसी जुड़ाव, पारस्परिक निर्भरता और एक दूसरे को उठान देने के स्वभाव को दर्शाता यह प्रतीक अरस्तू के स्वर्णिम माध्य, कंफ्यूसस के मध्यमान मत,बौद्धों के मज्झिम मार्ग और सनातनी योग के संतुलन मार्ग से भी जुड़ता है। विपरीत शक्तियाँ एक दूसरे के सापेक्ष ही अस्तित्त्व में होती हैं। [क्रमश:]
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इस आलेख के लिये कुछ सामग्री वीकीपीडिया से ली गई है, लेखक आभारी है।

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

दिल, नागिन और मूँछें

यह ऐसा आलेख है जिसके लिये टिप्पणी न करने की शपथ भी तोड़ी जा सकती है। परिवेश की बेहूदगियों पर झुँझलाते हुये 'आर्ट ऑफ लिविंग' में सिमटने या 'पॉलिटिकली करेक्ट' हो कर बेहूदगियों का समर्थन करने से अच्छा है कि हो हल्ले में दबा दिये गये, अनदेखे कर दिये गये और किये जा रहे तथ्यों पर लिखा जाय। 
इसे पढ़ते हुये जाने कितनी 'नर्कगामी' सचाइयाँ स्वर्ग की ओर कुलाचें मारने लगती हैं। मजे की बात यह है कि रम्यता भी बनी रहती है। ब्लॉगरी साहित्य को समृद्ध कर रही है, यह आलेख प्रमाण है। 
अधिक नहीं कहूँगा, स्वयं पढ़ कर देखिये: