मंगलवार, 23 जून 2009

कनैल: वनस्पति, पौधा, लता, वृक्ष - 2

पौधा है : कनैल , वैज्ञानिक (Botanical) नाम: Thevetia neriifolia, अन्य नाम - अश्वमारक,कर्वीर(संस्कृत), करबी (बंगला)

कनैल एक निहायत ही सुन्दर और देसी टाइप का 'सर्वहारा' पौधा है। पत्तियाँ, फूल और बीज - सबकी छटा निराली है। इसके फूलों का रंग प्रमुखत: पीला होता है लेकिन ललछौहें, सफेद, रंगहीन तरह के फूल भी देखे गए हैं। पौधा बढ़ कर पेंड़ाकार भी हो जाता है, वैसे हमारे विद्वान इसे झाड़ी श्रेणी में रखते हैं।

जन जन उपयोगी यह 'थेथर' श्रेणी का पौधा कहीं भी उग आता है। घूरा, कोला, बाँस के झुरमुट, काली माई वाले बरगद के नीचे, घर के आँगन, बाग बगइचा, गँवारू मन्दिर, शहरी रोड डिवाइडर, अगाड़, पिछवाड़ कहीं भी लगा दो बेचारा टनाटन्न हरा भरा रहता फूलों की बरसात करता रहता है। निस्पृह इतना कि जोगी भी फेल !


हम अधम मानवों ने अपनी जाति या वर्ग व्यवस्था चारो तरफ थोप रखी है। पौधा जगत भी अपवाद नहीं है। सर्वसुलभ और सर्व-उपयोगी होने से इसे सर्वहारा की तरह ही उपेक्षित रखा गया है। मेरी बात पर ऑबजेक्सन करने के पहले जरा बताइए कि अपने प्रेमी या प्रेमिका को कभी कनैल का फूल भेंट किया है? नहीं। क्यों? क्या यह सुन्दर नहीं होता कि इसमें सुगन्धि नहीं होती?

उपेक्षा का आलम यह है कि:

- कभी इसे 'बुके' में स्थान नहीं मिलता।
- किसी लेखक ने इसके बारे में नहीं लिखा।
- दुष्ट कवियों ने जूही, मोगरा, गुलाब, कमल, चम्पा, चमेली, रजनीगन्धा आदि को लेकर तो खूब उपमाएँ गढ़ीं लेकिन कनैल की कहीं चर्चा तक नहीं हुई।
- एक और सर्वहारा गेंदा फूल पर भी फिल्मी गाना रच दिया गया, लेकिन बेचारा कनैल !
- पौधारोपण करने जब हस्तियाँ आती हैं तो अशोक, अमलतास, गुलमोहर वगैरह ही लाए जाते हैं, कनैल नहीं।
- नारी समाज की निजी टाइप के पूजा पाठ में एकमात्र उपयोगी फूल होने पर भी वे इसे कभी जूड़े में स्थान नहीं देतीं।

बच्चे इसके सूखे बीजों से गोट्टी खेलते निशाना साधने का अभ्यास करते हैं। है कोई माई का लाल पौधा जिसके बीजों में इतना दम हो? आखिर यह क्यों उपेक्षित है? गँवई होने के कारण?

गाँवों में अभी एक पीढ़ी पहले तक इसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। पीले फूल किसी भी सात्त्विक टाइप की पूजा के लिए सर्वोत्तम माने जाते थे। गुरुवार व्रत में तो इसके फूलों का आदर देखने लायक होता था।

नई नवेली दुल्हनें नैहर सन्देशा देते समय बटोही को बाबा के घर की पहचान बताती थीं ," कुववाँ जगतिया कनइल बन फूले, दुवरे निबिया के गाछ हो.” ( मेरे पिता के घर के आगे कुआँ है, उससे लग कर कनैल का झुरमुट फूलता है और दरवाजे पर नीम का पेंड़ है)। इतना आदर कि कुएँ जैसी सार्वजनिक जगह पर एक दो नहीं कनैल के पूरे झुरमुट को स्थान दिया जाता था और इतना स्नेह कि बेटी को बाबा के घर की पहचान बताते समय यह थेथर पौधा ही याद आता था नीम से भी पहले!

लेकिन जिस तरह से मुए खम्भे अशोक ने आकर नीम की इज्जत का फालूदा बना दिया वैसे ही कमबख्त पूँजीवादी समाज प्रिय गुलाब ने गाँवों में पदार्पण कर कनैल को उसके आसन से नीचे कर दिया।

कनैल इतना अत्याचार होते हुए भी फूल, पत्ती या डाल तोड़ने पर निस्पृह भाव से दूध स्रवित करता है मानों आशीर्वाद दे रहा हो फलो फूलो, हम तो ऐसे ही हैं। मुझे बड़ी करुणा होती है। लेकिन कर भी क्या सकता हूँ, सिवाय एक अदद लेख के?

11 टिप्‍पणियां:

  1. लेख का अंतिम पहलू जहाँ आपने इसकी सौतनों के बारे में चर्चा की!!

    अच्छा लगा!!

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  2. बहुत ही सुंदर आलेख। चलिए कवियों की उपेक्षा का आपने थोड़ा-बहुत परिहार कर दिया। चित्र की कमी रह गई, लेकिन आप तो ठहरे आलसी!

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  3. अपने गांव के इन्दारा की याद आ गई। इन्दारा पर नहाते थे और वहीं कनैल के फूल ले कर शंकर जी को मन्त्र बुदबुदाते अर्पित!
    पता नहीं वह पेड़ होगा या नहीं। इन्दारा तो पाइप पानी की सप्लाई से डिसयूज में आ गया।

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  4. कनइला के फूल. अच्छा याद दिलाया आपने अभी भी है हमारे घर के पिछवाडे में.

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  5. कनैल को लेकर एक और बात प्रचलित है पता नहीं झूठ कि सच. बचपन में कहा जाता है इसका फल विषैला होता है भूल कर भी मत खाना. कनैल का फल चखने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाया. लोगों को उपेक्षित लगता होगा लेकिन मुझे एक अजीब सा सुकून देती है इसकी सदाबहार हरियाली-निर्मल, निश्छल, निरपेक्ष. आपकी सेंस्टिविटी को सलाम.

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  6. मेरे गाँव में इसे कन‍इल कहा जाता है। साहित्यकार शायद इसे ही ‘कनेर’ कहते हैं। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता।

    नवरात्र के समय गाँव में घर-घर फूलों की खपत बढ़ जाती है। लाल गुड़हल के बाद इसी फूल की माँग होती है। मेरे गाँव में सभी घरों के बच्चे और कुछ बुजुर्ग पुजारी टाइप लोग भोर होते ही इन फूलों के सिकार पर निकल पकड़ते थे। जो सबसे पहले जग गया वह गाँव के सभी पेड़ों के फूल समेट लेने का प्रयास करता। इसमें कम उम्र और हल्के वजन के बच्चे ज्यादा सफल होते थे क्योंकि इस पेड़ की नाजुक डालियों पर चढ़ना सबके वश का नहीं होता था। सुबह रोज चर्चा होती कि आज किसने बाजी मारी और किसके घर के देवता बिना फूलों के रह गये। :)

    यह पोस्ट रही मजेदार और संवेदनशील, दोनो एक साथ।

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  7. टाइपिंग मिस्टेक:) अर्थात्‌ टंकड़ की त्रुटि:- ‘सिकार’ को ‘शिकार’ पढ़ें।

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  8. ई त बिलकुल सही बात कहेन आप -कनईर क फूलवा केवल शंकरै जी का चढाई जाथ बस !

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  9. यह पौधा सुगंधित एव सूंदर होते हुए भी उपेक्षा पात्र इसलिये होता है क्योकि यह पौधा विषैला होता है , कण मे इसके विष होता है , इसको आयुर्वेद शास्त्र मे अश्वमार भी कहा गयाहै , इसकी कई प्रजातियाँ होती है \

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