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बुधवार, 29 दिसंबर 2010

स्त्री जीवन हाय...

टाइम्स ऑफ इंडिया के आज के फ्रंट पेज पर एक समाचार है: 
SC woman judge lists daughters as 'liabilities'. 
समाचार के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की एक न्यायाधीश ने सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर सम्पत्ति घोषणा करते हुए लायबिल्टी कॉलम के अंतर्गत 'दो विवाह योग्य पुत्रियाँ' भी दिखाया है। सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर इसे यहाँ देखा जा सकता है: 
वहाँ यह भी लिखा है: The above declaration of assets is purely on voluntary basis.

कल ही किसी से चैट पर मैं एक काल्पनिक स्थिति पर बात कर रहा था कि अगर कोई स्त्री मित्र साथ में हो, होटल में एक ही कमरा मिल रहा हो तो क्या उस कमरे में स्त्री मित्र के साथ रात उसी सहजता से बिताई जा सकती है जैसे पुरुष मित्र के साथ बिताई जा सकती थी? तब जब कि स्वयं स्त्री को कोई आपत्ति न हो? 
मुझे असहज सी स्थिति लगी और  नकार गया। चैट के दौरान ही यह स्पष्ट हुआ कि ऐसा इसलिए था कि 'भेद खुलने' पर समाज की स्त्री के प्रति प्रतिक्रिया और उसकी स्थिति के बारे में सोच कर मैं भयभीत था। 
इस समय मन में 'अबला जीवन हाय ...' नहीं 'स्त्री जीवन हाय...' आ रहा है।  

गुजर रही है जिन्दगी डरते डरते 
ये जीना भी कोई जीना है प्यारे? 

शनिवार, 16 जनवरी 2010

बाउ और मरा हुआ सिध्धर -2 : लंठ महाचर्चा

ममहर में खलिहान पहुँचते ही आदतन गाड़ा पर से बाउ कूद पड़े। गाड़े को मामा के दुआर की तरफ ले जाते बैलों को देख बाउ बुदबुदाए,
” जानल बूझल  गलती मानुख करेला, डंगर नाहीं। जानते बूझते भी गलती मनुष्य करता है, बैल नहीं।
पिपराइच की मंडी में गुड़ की लदनी करते बाउ बैलों को लीक पकड़ा सो जाया करते थे, मजाल क्या कि बैलों ने कभी भी पहुँचने या लौटने में गलती की हो! अधराति एक बार जब उनकी नींद टरक के भोंपा से खुली तो देखा कि टरक और गाड़ा आमने सामने खड़े थे और बीच डगर बिसाल निलबाछा मरा पड़ा था। उस दिन डलएबर ने बैलों की खूब तारीफ की थी।  खड़े हुए बैलों की चमकती आँखें नहीं दिखी होतीं तो काने टरक के साथ अनहोनी निश्चित थी।...
   खलिहान पर इकठ्ठे लोगों को पयलग्गी करते ही उनकी नज़र परबतिया के माई पर पड़ी। शायद उसी समय उसने भी बाउ को देखा था – लगा कि सुखरिया की कटी मूड़ी हवा में तैरती आ रही है,टप टप खून।
गोरा, सुदर्शन मुस्कुराता सुखरिया !
काला कुरूप अट्टाहस करता बनमानुख  - लाल लाल आँखें ज्यों रात में धू धू कर जलती बखारें...renu
सुखरिया, बनमानुख , मुसकान, अट्टाहस, सुखरिया, अट्टाहस, बाउ, मुस्कान, अट्टाहस  – हा, हा, हा,....
 परबतिया के माई के चेहरे का रंग उतरता चला गया ।
झाड़ा फिरने निकला पेचिश का मरीज सोहिता रिक्शा वाली दिल्लगी सुनने के बहाने बहोरना के साथ उस समय वहीं खड़ा था। उसके चेहरे की पल भर में उतरी रंगत दिखी और फिर बाउ!
रक्कतसोख बरमराछस !! 
इस तरह से आदमी की रंगत बदलती उसने आज तक न देखी थी। परेत, बरमराछ्स की सुनी हुई कथाएँ यकायक याद हो आईं और लगा कि पेट में धनकुट्टी चलने लगी हो !  हाथ में हरदम रहने वाला पानी भरा लोटा छूट जमीन पर ढुलक ढुलक बह चला और खड़े खड़े वहीं धोती में ही
छेरने लगा
बहोरना तो मारे बदबू के नाक पर गमछा लगाए हट गया – धुत्त इयार, ई का धत्त दोस्त, ये क्या ?
सबको भारी अचरज में डालते हुए परबतिया के माई अपने घर की ओर भाग चली। जिसके लिए दस कदम भी एक साँस चलना मुहाल था, वह ऐसे दौड़े जा रही थी जैसे
पँचई की रेस लगी हो!
मधया तो मुँह बाए कभी अपना रिक्शा देख रहा था तो कभी बाउ को ! अचानक पीपल के पत्ते कुछ अधिक ही डोलने लगे थे ।
बरमराछस !
उस शाम घर घर पुरानी बातें नमक मिर्च कलेवा हो गई थीं ।

(उ)
अपनी झोंपड़ी में पहुँच परबतिया के माई ने
चेंचरा लगा दिया। चेंचरा पीटती मधया की आवाज फैलती रही। उसकी मैभा महतारी सरापती विलपती अपने बेटे को खींचती घर ले गई – “मुँहझौंसी कुटनी ! रेक्सा पर घुम्मे खतिरा भेस बनवले रहलि हे एतना दिन । कलमुँही, कुटनी! रिकशे पर घूमने के लिए इतने दिनों से भेष बनाए थी..” । फिर किसी ने कुछ कहना उचित नहीं  समझा – बिहाने देखल जाई सुबह देखी जाएगी
जिस मरद से इतने बरस
घिरना ही घिरना रही, जिसका गला काटते एक पल भी नहीं सोचा, जिसको सुखरिया कह कर बुलाते आज तक शरम नहीं आई, काला पानी की सजा के दौरान भी जिसकी याद में एक आँसू तक न गिरा था वह आज क्यों ... ? ऐसा क्या था इस बनमानुख में जो कत्ल की रात बिना सोचे समझे उसकी बात मान अपने मरद को ही काट डाला था? कैसा भी था , आपन मनई था !
परबतिया की लाज और उसको मार से बचाने के लिए टाट फाड़
परगट हुए बाउ याद आए, साथ ही फिर याद आया सिर कटा दुआरे सुलाया गया सुखरिया ! फूट फूट कर रोते जमीन पर गिर पड़ी । देह में इतना दाहा, इतनी गरमी जैसे उस दिन बखारें जल रही थीं .... परबतिया के माई ने सारे कपड़े शरीर से नोच कर फेंक दिए।
मरा हुआ सुखरिया इतने दिनों के बाद बदला ले रहा था !
(ऊ)  
स्तब्ध हुए थे बाउ और फिर पहचान भी गए थे। ...  मामा से पूरी कहानी सुनते सुनते जाने कब आँख लग गई।  
अधराति नींद खुली तो पाया कि तकिया के दोनों और नमी थी। आँखें अभी भी नम सी थीं। बेचैनी हुई और बाहर निकल परबतिया के माई की झोपड़ी की ओर चल पड़े।
झोपड़ी में रोशनी थी। चेंचरे से छ्न छन कर दिखती रोशनी -
लपर लपर। बाउ ने धीमी पहचान वाली आवाज लगाई – मामी!
जैसे पुकार का कोई असर ही न पड़ा हो। थोड़ा और नजदीक आने पर हिचकियों की आवाजें आने लगी थीं ।  जमीन पर बैठ कर चेंचरे के थोड़े
फरकोर हिस्से पर आँख लगाई । ये क्या ? एकदम उघारे थुलथुल काया जमीन पर बैठ विलाप कर रही थी – कोई आवाज नहीं, बस हिचकियाँ । लय में झोंटा खोले सिर उपर ले आती फिर जमीन से छुआती।
ह हँ – ढेबरी की लौ बुझने को होती 

ह हँ – ढेबरी की लौ जी उठती ... 
अधेड़, देह पर लदर लदर मास लिए एकदम नंगी औरत ! - बाउ एक क्षण को जुगुप्सा से भर उठे थे लेकिन फिर जैसे सब कुछ जी उठा। यहीं तो ... ! कटी हुई मूड़ी – मरा हुआ सुखरिया।
वापस जाने का मन न हुआ। जमीन पर ही लेट गए -  ठीक उसी जगह ।
थोड़ी देर में ढेबरी भी बुझ गई लेकिन हिचकियाँ सुनाई दे रही थीं । बाउ दुबारा सो गए।

(ए)
महतारी की नजर बँचा मधया सुबह अपने काकी के घर आया तो पाया कि अभी तक चेंचरा बंद था। 
काकी काकी पुकारता चेंचरा देर तक पीटता रहा तब कहीं चेंचरा खुला। काकी बाहर आई – उसकी आँखें सूजी थीं और चेहरा बेरंग। हिकारत से उसे देखते बोली,

”का बिहाने बिहाने बजर डरले बाड़े ? भागु इहाँ से क्या सुबह सुबह शोर कर रहे हो, भगो यहाँ से!
आज तक काकी ने उससे इस तरह बात तक नहीं की थी - भगाना तो नामुमकिन था। लेकिन आज ..!
उदास सा वह अपने घर वापस चला गया। परबतिया के माई के शरीर में सुखरिया की लाश जल रही थी। शरीर में जाने कहाँ से इतनी जान आ गई थी कि चलने फिरने के लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं रही।  लेकिन वह जलन । ताप बढ़ता गया और फिर उसके मुँह से जाप सा निकला – सुखरिया, सुखरिया .... पहले बुदबुदाहट फिर सुनाई दे सके वैसी आवाजें लय के साथ –
मरल सुखरिया, मरल सुखरिया, मरल सुखरिया ....
गाँव मे बात फैल गई – मधया के काकी पगला गइलि बा, उसे अब कोई परबतिया के माई नहीं कहता था ।
बाउ ने सुना लेकिन हाल पूछने नहीं गए। रात का देखा नजारा अभी भी दिमाग पर हाबी था – अपशकुन सा।   मन ही मन तय किया कि सुत्ता पड़ने के बाद रोज परबतिया के माई के दुआरे जा कर सोया करेंगे।
(ऐ)
रात की बेला। ढेबरी की लपर लपर । हिचकियों की आवाज। बाउ ने झाँका ।
आज भी परबतिया के माई उसी अभिचार में लगी थी लेकिन शरीर पर कपड़े थे। जाने क्यों बाउ ने संतोष की साँस ली और सो गए।
भिनसारे से कुछ पहले अचानक जोर की आवाज से नींद खुली तो देखा कि थुलथुल औरत तेज कदमों से गाँव के बाहर जा रही थी। चुपचाप पीछे लग लिए।
बसगित से बाहर आते ही परबतिया के माई दौड़ चली। बाउ पीछे पीछे इस तरह लगे रहे कि उसको पता न चला। पोखरे के किनारे आ कर थोड़ी देर खड़ी बड़बड़ाती रही – मरल सुखरिया,
जरल सुखरिया, मरल सुखरिया .... और अचानक छपाक से पोखरे में कूद गई। आव न देखा ताव बाउ ने भी छ्लाँग लगा दी।
उसे पोखरे से बाहर निकाला तो बेहोश थी ।  दोनों बाहों में उसे उठाया तो लगा कि उसके शरीर में कुछ
तड़फड़ा रहा था। जो शरीर देखने में इतनी भारी लगती थी, असल में उसमें वजन जैसा कुछ था ही नहीं।
उसकी बेहोश देह को बाहों में उठाए बाउ चोरों की तरह गाँव में जब वापस आए तो अभी अँधेरा था। चुपचाप उसे झोपड़ी में लिटाया और मामा के घर चले गए।

(ओ)
परबतिया के माई की पगलाई बढ़ गई थी। झोंटा लहराए अस्त व्यस्त कपड़ों में वह अकेले गाँव में घूमने लगी, वही बुदबुदाहट, बड़बड़ाहट – मरल सुखरिया, जरल सुखरिया ....    
किसी ने कुछ दिया तो खा लिया नहीं तो बस बहुत धीमे धीमे घूमना और जपना ! आश्चर्य था कि बाउ के पास नहीं गई। उसकी देह
बस्साने लगी। दिन चढ़ते चढ़ते बदबू इतनी तेज हो गई कि उसके पास खड़े होना भी मुहाल हो गया।
और शाम होते होते बच्चों और बड़ों को मनोरंजन का एक साधन मिल गया ।
उसको घेर कर नाक पर हाथ धरे बच्चे लकार लेने लगे 
“मार बढ़नी काकी बसइलि का ?” मर परे, काकी बदबू मार रही है क्या ? 

मनचले जवान पूरा करने लगे
“ काका मुअवलि डेरइलि का ?” काका की जान लेते डरी थी क्या?

अधिक बरस नहीं बीते थे, सुखरिया अत्याचार और शोषण का खलनायक था जिसकी मौत पर सबने मौन उत्सव मनाया था। आज चन्द क्षणों के मनमनसायन के लिए वह ‘काका’ हो गया था। उसकी मौत से सहानुभूति जताते लोग जीवित काकी के दु:खों से निस्संग मजा लेने में व्यस्त हो रहे थे।  हाय रे जन!
बाउ ने जाना सुना और बेचैन हो गए। उस बदबू का क्या कारण हो सकता था ? कहीं मन में अपराधबोध सा घर कर गया। उनके आने से इस ‘मर्दानी’ औरत की दु:ख यातनाएँ काटने के बाद सुखी हो चली जिन्दगी फिर नरक हो गई थी।
... उनको देखते ही परबतिया के माई का दौड़ पड़ना ... अचानक पागलपन - मरल सुखरिया, जरल सुखरिया ... नंगी हो स्यापा करती अधेड़ औरत ... पोखरे में कूदना ... बेहोश थुलथुल देह में वह अजीब सी तड़फन ... और बदबू । इनका आपस में  क्या सम्बन्ध हो सकता था?  उस रात बाउ सो नहीं पाए।

भोर में आँख लगी तो सपना देखा – हाथ मे सड़ी गली मछली लिए परबतिया के माई घर घर घूम रही थी, इसे कहाँ फेंकूँ ? लोग पागल से  हँस रहे थे। अचानक उसने बाउ के हाथ में रख दिया – बाउ ने देखा तो मछली की जगह सुखरिया का सिर था। नींद खुल गई । फिर नींद आई तो पोखरे में डूबती परबतिया के माई दिखाई दी ।
(औ)

सिर भारी था। एक बहुत ही उटपटांग निर्णय लेने के बाद बाउ दुविधा में पड़े थे। आखिरकार बैलों को खिला कर गाड़ा नाध कर खलिहान पर खड़ा कर आए । वापस आ मामा से बातें करने लगे:
”मामा एगो कार करेके बा। परबतिया के माई के दु:ख नाहिं देखल जाता।“ मामा, एक काम  करना है। परबतिया के माई का दु:ख नहीं देखा जा रहा।
”हँ, बताव।“ हाँ, बताओ।
”बताइब नाहिं। खरिहाने गाड़ा खड़िया देहेले बानी। अगर कुछ ऊँच नीच भइल त ओनहे से अपने गाँवे चलि जाइब । फेर कब्बो एइजा नाहिं आइब।“ बताऊँगा नहीं। खलिहान पर बैलगाड़ी खड़ी कर दी है। अगर कुछ ऊँच नीच हुई तो उधर से ही अपने गाँव चला जाऊँगा। फिर कभी यहाँ नहीं आऊँगा।
बाउ की बात पहेली सी लगी लेकिन कुछ तो अपने इस विचित्र भांजे का स्वभाव और कुछ बाउ के चेहरे का भाव, मामा सिर हिला कर रह गए।
(अं)
... खलिहान पर परबतिया के माई को घेरे लोग मनमनसायन में व्यस्त थे - मार बढ़नी काकी बसइलि का ?, काका मुअवलि डेरइलि का ?
वहीं पीपल के पेंड़ तले  मधया उदास आँखों से नजारा देख रहा था।
बाउ को लगा कि समय आ गया। चुपचाप गाड़ा को वहाँ ले गए, खडा किए और कूद कर घेरे में घुस गए।
परबतिया के माई बड़बड़ा रही थी – मरल सुखरिया .... बाउ ने उसके पेट और छातियों को झकझोरा जैसे मांस की पर्तों से कुछ निकालने की कोशिश कर रहे हों और फिर सामने से उसकी कमीज को उठा दिया – गला सड़ा गन्धाता एक सिद्धर जमीन पर गिरा। चिढ़ाना बन्द हो गया। उपस्थित लोग अवाक रह गए!  सरेआम उघर गई! मारे लाज के परबतिया के माई वहीं बैठ गई।
… बुदबुदाना बन्द हो गया था। आँखें मुँदीं थीं। चेहरे पर ऐसे भाव जैसे किसी और दुनिया को देख रही हो – अजीब सी बदबू लिए सुखरिया का सिर धू धू कर जल रहा था । सिर राख हुआ और बदबू खत्म हो गई। ...
... आँखें खुलीं तो सबने देखा काकी के चेहरे पर पुरानी रंगत लौट आई थी। अपार शांति।
काकी ने पुकारा,” अरे ए माधो ! रेक्शा ले आव घरे नाहिं जा पाइब।“
अरे माधो ! रिक्शा ले आओ, घर नहीं जा पाऊँगी।
मधया भागता  रिक्शा ले आया। काकी सवार हुई और बाउ को देख बोली,

” अरे भैने! तुहूँ आव बइठ। बड़ा बढ़िया बयार लागेला।“ अरे भांजे! तुम भी आओ बैठो। बहुत अच्छी हवा लगती है।   
बहोरना बोल पड़ा,” अरे काकी, फेर न ढिमिला जइह।“
अरे काकी, फिर न रिक्शे से नीचे जमीन पर लुढ़क जाना!
भौंचक्के से उपस्थित लोग लुगाई जोरों से हँस पड़े।

... बुढ़वा पीपल के पत्ते जोर जोर से डोल रहे थे। (प्रसंगांत) 
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शब्द संपदा:
(1) ममहर - मामा का घर (2)गाड़ा  बैलगाड़ी (3) लीक - सड़क (4) अधराति - अर्धरात्रि(5) टरक के भोंपा - ट्रक का हॉर्न(6) बिसाल निलबाछा - विशाल नर नीलगाय (7) डलएबर - ड्राइवर(8) काने टरक - ऐसा ट्रक जिसकी एक हेडलाइट न जल रही हो (9) पयलग्गी - अभिवादन(10) मूड़ी - सिर (11) झाड़ा फिरने - मलत्याग करने हेतु खेत की तरफ निकलना (12) रक्कतसोख बरमराछस - रक्तशोषी ब्रह्मराक्षस (13) छेरने लगा - दस्त होने लगे (14) पँचई की रेस - नागपंचमी की दौड़  (15) चेंचरा - चीरे हुए बाँस से बना झोंपड़ी का दरवाजा (16) सरापती - शाप देती (17) घिरना - घृणा (18) आपन मनई - गृहस्वामी (19) परगट - प्रकट (20) लपर लपर - लपलपाती (21) फरकोर - झिर्री (22) उघारे - नंगी (23) मरल - मर गया (24) बसगित - बस्ती (25) जरल - जल गया (26) तड़फड़ा - तड़पने के अर्थ में प्रयुक्त (27) बस्साने लगी - बदबू आने लगी (28) मनमनसायन - मनोरंजन (29) सिद्धर -एक प्रकार की छोटी मछली, उससे भी छोटी को सिधरी कहते हैं। 
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लंठ महानिष्कर्ष:
हर युग, हर समाज में ऐसे लोग रहे हैं जिन्हों ने दूसरों जैसा ही देखा सुना लेकिन सोचा और किया - अलग ढंग से। इन साहसी लोगों ने वह सोचने का खतरा उठाया जिसके पास दूसरे फटक भी नहीं सके। .. तमाम वर्जनाओं और जड़ता से मुक्ति पा उन्हों ने जब अपनी सोच को कार्यरूप दिया तो चमत्कार हुए। 


मंगलवार, 18 अगस्त 2009

बाउ मण्डली और बारात एक हजार - प्रसंगांत

पिछ्ले भाग से जारी . . .
दिन की घनी छाई अन्हरिया जैसे खत्म हो गई हो - बजनिओं के मेठ नोखे ने चैती छेड़ी। फिर कहरवा, फगुआ और कजरी की धुनों ने खलिहान पर बारहमासी बयार बहा दिया। समधी भात खाने चले थे।
दुल्हन के घर की ओर समधी के साथ प्रस्थान करते नोखे ने सोहर धुन शुरू की। अष्टभुजा नहा धो वस्त्र बदल कर साथ हो लिए।
कृषक बाला के आँगन में खेलते नन्हें नन्हें छौनों की सम्भावना से नाहरसिंह गुलगुल हो गए। गाछे कटहर ओठे तेल - भीतर की सारी कटुता और अभिमान भूल मन ही मन नोखे की धुन पर सोहर गाने लगे।
कहवाँ से आवेला पियरिया ललना ss पियरी पियरिया लागा झालर हो s
कहवाँ से आवेला सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
नैहर से आवेला पियरिया ललना ss पियरी पियरिया मोती झालर हो s
ललना ससुरा से आवेला सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
कहवाँ धरबे पियरी पियरिया लागा झालर हो ललना ss
कहवाँ धरबे सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो s
पेटिया में धरबे पियरिया ललना पियरी पियरिया लागा झालर हो ss
कोहबर धरबे सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो ललना ss
फाटि चुटि जैहें पियरिया ललनाss पियरी पियरिया लागा झालर होs
जुगे जुगे बाढ़ो सिन्होरवा सिन्होरवा भरल सेनुर हो s, ललना ss।“
धुन सुनते मिसिर जैसे बाउ को सोहर का भाष्य सुना रहे थे – “देख ss , सोहर में नइहर के पियरी के फटहा बना देहल बा लेकिन ससुरा के सेनुर त सोहाग ह । वोके जुग जुग बढ़ावल बा। गुलरि के फूल परि गइल बा का? अरे, सोहाग हे।(1)“
बाउ,” हूँ ss। सारे ए बेरा बजाई कबो सोचलो नाहीं रहलीं हे। नीक लागता।(2)“ मिसिर गमछा सँभालते और बाउ को पीछे छोड़ते विवाह के घर की ओर झड़क चले।
झलकारी ने बाजा की आवाज सुनी तो भाग दौड़ शुरू करा दीं। खलिहान काण्ड की खबर उन्हें लग चुकी थी। लेकिन बनमानुख बेटे पर भरोसा था. .
“समधी आवतने। जल्दी कर सो।(3)” उनकी जल्दी को कोसती बालाएँ काम में लग गईं।
(व)
झिनिया चावल का महर महर सुगन्धित भात, घी से बघारी अरहर की दाल, दहिबाड़ा, रिंकवच, सजाव दही, बरी कढ़ी, अँचार, चटनी, करैली, पाकल कोंहड़ा, केला और परवल की सब्जियाँ – यह थे मिसिर के बारह व्यञ्जन।
सब्जियों का चयन मिसिर की पाककला के ज्ञान का परिचायक था – करैली (तीत), पाकल कोंहड़ा (मीठ), केला (कसैला) और परवल (सुन्न) जैसे जीवन के चार रसों के परिचायक थे। समधी को सूक्ष्म सन्देश , हमारी बेटी तुम्हारे परिवार में सभी रस भर देगी, इस भात की शपथ उसकी बेकदरी न करना।
नाहरसिंह ने मंडप की गाँठ खोली और हिला कर स्थिर कर दिया। सम्बन्ध पक्का हो गया। सगोतियों के साथ खाने बैठे तो बगल में अष्टभुजा बाबा भी आकर बैठ गए। ब्राह्मण राजपूत के साथ पंक्ति में! सभी संकोच में आ गए। बाबा बहके,” रजा बाभन अगिनमुख होलें। अरे, हमार तोहार गोत्र त एके ह। साथे नाहिं बइठब त गारी कइसे सुनSब?(4)”। मिसिर ने सहमति में सिर हिलाया। आँखों में शरारत नाच रही थी। उधर परोसना शुरू किए और इधर भीतर से अंचरा से मुँह ढाँप झलकारी देवी ने आलाप लिया:
कंचन मड़वा बिसकरमा बनवलें भात रचली अनपुरना हे
बइठीं समधी दशरथ जी पिढ़इया जनि करिं मन काठ हे........
स्वर्ण मंडप विश्वकर्मा से बनवाया है। अन्नपूर्णा से भोजन रचाया, हे राजा दशरथ भोजन करने के लिए पीढ़े पर बैंठें लेकिन काठ के आसन पर बैठ मन को काठ न करें।“ ओरहन को समझ और खलिहान की घटना याद कर नाहरसिंह लजा कर रह गए।
बेटी की माँ। आँखों से गंगा जमुना बह रही लेकिन रीत तो निभानी है। सुरसतिया की माई ने बोल उठाए:
ओरियन ओरियन बइठे बरियतिया
मुहवाँ झुरइले ए बेटी नयना बहे लोरिया
केकरा के सौंपी ए समधी अपनी पुतरिया
हँसेलें समधी दशरथ जी
हमरा के सौंपि ए समधिन अपनी पुतरिया
रहिया खियइबे समधिन पाकल पनवा
घरवा पिअइबे सुरहिया गाइ के दुधवा
रउरा पुतरिया ए समधिन हमरे घर के लछमिनिया
हमरा के सौंपि ए समधिन अपनी पुतरिया।
युगों युगों से चले आ रहे उलाहने के स्वर। राजा दशरथ तुमने तो बहुत वादे किए थे। राह चलती पतोहू पान खाएगी इसका तक खयाल रखा था, लेकिन निकाल दिया न चौदह साल के लिए ! मेरी बेटी सीता को याद कर रो रही है समधी। कैसे तुम्हें सौंप दूँ अमानत? तुम भी तो उसी दगाबाज दशरथ की श्रेणी के हो।
बाउ का गला भर आया। नाहर मन्डली चुपचाप मिसिर का बनाया स्वादिष्ट भोजन भकोस रही थी।
मिसिर ने भारीपन महसूसा तो लकार लगाई,” अरे, गरियो शुरू होखे।(5)“
झलकारी देवी ने उत्तर सा दिया।
जेवन बइठेलें समधी राजा दशरथ बोलेलें सकुचि लजाइ जी
भितरा से समधिन हमरा के देखीं हम रउरा मेहमान जी
अँगना से बोलेलें राजा जनक जी अदला के बदला न लजाइँ जी
दशरथ - अरे समधिन हम तुम्हारे मेहमान हैं। थोड़ा हमरी ओर भी नजरिया हो। आँगन से जनक जी उत्तर दिए ,लजाना मत । अदला बदली होगी।“
राजा दशरथ उर्फ नाहर सिंह और राजा जनक उर्फ पँड़ोही सिंह घरैतिनों की अदला बदली करेंगे ! बाउ को इस सम्भावना से ही गुदगुदी हो चली – अच्छे भइल बियाह नाँइ कइनी(6)। उसी रौ में मिसिर को इशारा किए । दही परोसते मिसिर ने अचानक तउला पटका और कछाड़ बाँध दुसह गारी गायन कढ़ा दिए। बेटे हरिहर ने बाप का यह रूप देखा तो हतप्रभ सा लजाते हुए दुआरे भाग गया।
सब सखियाँ मिलि जेवना परोसें हो
समधी बिगड़ल बैला हाय सीताराम से बनी।
अरे समधी तो बिगड़ा बैल है, उसे सुन्दरी सखियाँ मिल व्यञ्जन क्यों परोस रही हैं?
वृद्ध गरिमामय मिसिर का यह रूप ! न तो नाहर ने सोचा था और न अष्टभुजा ने। बिचारे खिसियाए से मजे लेने लगे। मिसिर तो झगड़ालू फूआ की भूमिका पूरी करने पर आमादा थे। एक के बाद एक गालियाँ निकलती चली गईं:
समधी के बहिना के तीनि गो भतरवा
भरवा, कोंहरा, सोनरा हाय सीताराम से बनी
समधी ने अपनी बहन ऐसे दरिद्र घर ब्याही है कि उसका भरण पोषण करने के लिए तीन तीन भतार लगे हैं – वो भी कौन? भर, कुम्हार और सोनार। अब तो सीताराम ही बिगड़ी बना पाएँगे“
कटाक्ष गजब का था ! उपर से एक पुरुष को यह सब गाता कभी देखा ही नहीं था। नरसिंघवा मगन हो गया।
मिसिर बउरा गए थे। हाथ चमकाते अगली फुलझड़ी छोड़ी,
समधी के भगिना दबले बा जोबना
सुतल रहली खरिहाने, रचना राम से बनी।
समधी की बहन यौवन भार से दबी इतनी बौरा गई है कि खलिहान में सोती पाई गई है। ऐसी रचना भी विधाता ने इसके घर ही रचाया ।“ राजा दशरथ तुम्हारी कोई बहन भी थी क्या?
मार मुधइ के, बाबा त मउगा बानें(7) - बुढ़ऊ के इस अन्दाज पर नारियाँ भी मुँह दबाए भीतर भाग चलीं। बाउ ने हाथ पकड़ चेताया तो मिसिर चुपाए। अष्टभुजा की गारी सुनने की पिपाशा तृप्त हो चुकी थी। डकार लेते उठ गए।
विदाई के रूप में बाउ ने नाहरसिंह के हाथ में अपनी भुअरी भैंस का पगहा पकड़ा दिया। नरसिंघवा नाम जेहन से गायब हो चुका था। नाहर से इनकार करते न बना। हाथ जोड़ कर बाउ बोले,” कहल सुनल माफ कइ दीं। रउरे बहिन के खयाल राखब । गाँव के दुलारी रहलि हे . . .”(8)। आगे मारे भावुकता के कुछ बोल न पाए।
(श)
लोचना फिर बोलने लगा था। लेकिन नाहरसिंह के पास उसकी सफाई सुनने वाला मन ही नहीं रहा . . आने वाले छोटे छोटे छौनों की किलकारी को मन के आँगन में बसा रहे थे। . . .बरस भितरे पहले की आस थी। नाती ! .. हाथी गए हाथीशाला की ओर। घोड़े दौड़े घुड़साल। बारात विदा हो गई।
(ष)
परछावन और खोंइछा की रस्म पूरी हुई । उस समय आम तौर पर पाया जाने वाला अनासक्त वातावरण गायब था।
बुढिया काली माई के स्थान पर गमगीन भींड़। गाँव जवार से उखड़ती बेल दु:ख के सहारे लिपट विलाप कर रही थी ! बिदाई के समय का रूदन, सुरसतिया ने किसी को नहीं छोड़ा। रुला दिया सबको। रूदन ने कारुणिक लय ले ली थी:
अरे ए हमार बहिना ....अरे ए हमार भइया...
काका, केकरा खातिर टिकोरवा तू तूरब . .
काकी तोहार बरवा के झारी
के तोहार ढेंका चलाई...(9) हो अ ह ह हँ....
रोते हुए पँडोही ने बेटी को दुल्हे के साथ पिनिस में बिठाया। कहाँरों ने पिनिस उठाया कि अचानक दहाड़ मारती भइया भइया करती सुरसतिया कूद कर बाउ से लिपट पड़ी। औरतों ने सँभाल कर वापस चढ़ाया। फूट फूट कर रोते बाउ ने मुँह में गमछा ठूँसा और पोखरे की ओर भाग चले।
निबिया के पेंड़ जनि कटिह हो बाबा चिरइया खोतवना झोंझ हे ss,
भइया के जनि कुछ बोलिह हो बाबा, भइया बड़ी बरजोर हे ss
नीम के पेंड़ पर रहने वाली चिड़िया, उसके घोंसले और भइया के जिद्दी स्वभाव के बारे में बाबा को चेताती बेटी विदा हो गई। लगे हाथ दुआरे की नीम को न काटने का अनुरोध भी करती गई। सावन में आने पर झूला जो झूलना था ! हर घर का एक सदस्य कम हो गया। घरघुमनी जो चली गई थी।. . .
(ह)
सोहर मंत्र पढ़ते मानव प्रेत ने कट चुके ‘पोखरा पर के बाबा’ की जगह आँसुओं से सींच एक शीशम रोप दिया। मन्नत सी माँगी, बाबा गाँव की सब बेटी बहिनों को सुखी रखना !
पोखरे का तिलस्म टूट गया। जलप्रेत खत्म हो गए। अब बेटियाँ वहाँ पिंड़िया दहवाने जाती हैं। (प्रसंगांत)
अगला अंक – बित्तन बाबा
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लण्ठ महानिष्कर्ष: संकट से निपटने में सफलता त्वरित गति से सही दिशा में उठाए गए सही कदम पर निर्भर करती है। 'सही' का निर्धारण व्यक्ति के भीतर विद्यमान सनातन लण्ठई की मात्रा और उसकी बेवकूफी के अनुपात से होता है।
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अनुवाद:
(1) देखो, सोहर में नैहर की पियरी को फटा हुआ बताया गया है। लेकिन ससुराल का सिन्दूर तो सुहाग है सो उसे युगों युगों तक बढ़ता बताया गया है। जैसे सिन्होरा में गूलर का फूल पड़ गया हो – कभी खत्म नहीं होने की नियति लिए।
(2) साला इस समय बजाएगा सोचा ही नहीं था। अच्छा लग रहा है।
(3) समधी आ रहे हैं। तुम लोग जल्दी करो।
(4) राजा, ब्राह्मण अग्निमुख होते हैं। हमारा तुम्हारा गोत्र तो एक है। साथ नहीं बैठूँगा तो भोजन करते गाली गायन का आनन्द कैसे उठाऊँगा।
(5) अरे, कोई गाली भी शुरू करो।
(6) अच्छा हुआ जो मैंने विवाह नहीं किया।
(7) मुँह पकड़ कर मारो (औरतों का निजी गालीनुमा तकियाकलाम)। बाबा तो मउगा हैं।
(8) कहा सुना माफ करिए। आप बहन का खयाल रखिएगा। सारे गाँव की दुलारी है।
(9) काका किसके लिए तुम अमिया तोड़ोगे? काकी कौन तुम्हारे केश सँवारेगा और कौन तुम्हारा ढेंका (अनाज से छिलका निकालने और साफ करने का एक देहाती घरेलू यंत्र ) चलाएगा?
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शब्द सम्पदा:
मेठ – नायक; झड़क चलना – तेजी से चलना; झिनिया चावल – महीन चावल जिसे हमारी ओर काला नमक के नाम से जाना जाता है – धान काला होता है। वैसा सुगन्ध, स्वाद और रूप बासमती में क्या मिलेगा?; चैती – चैत के महीने में गाया जाने वाला ग्राम गीत;
गुलगुल – परमानन्द की स्थिति; गाछे कटहर ओठे तेल – एक भोजपुरी कहावत, पेंड़ में तो कटहल अभी लगा ही है। फल खाने के लिए अभी से होठों पर तेल लगाए बैठे हो ?; पियरिया – शुभ पीला वस्त्र; सिन्होरवा – सिन्दूर रखने का लकड़ी का बना पात्र; भात – पका हुआ चावल; रिंकवच - गहरी हरी अरबी के पत्ते को बेसन लपेट बनाई गई पकौड़ी; सजाव दही – उपले की आँच पर जला कर गाढ़े किए दूध से जमाई गई दही; पाकल कोंहड़ा – पका हुआ मीठा कद्दू; मीठ – मीठा; तीत – कड़वा; सुन्न – उदासीन स्वाद वाला; अँचरा – आँचल; ओरहन – उलाहना; तउला – दही जमाने का बड़ा मिट्टी का पात्र; कछाड़ – धोती को उपर उठा कस कर बाँधना; परछावन – दुल्हे की लोढ़ा (सिलबट्टा का बट्टा)से विदाई के समय की जाने वाली परीक्षा जिसमें नारियों द्वारा मंगल कामना और विदाई की जाती है; खोंइछा – दुल्हन की ओढ़नी में बाँधा जाने वाला मंगल अक्षत और धन; पिनिस – एक प्रकार की बड़ी पालकी जिसमें लम्बी यात्रा को काटने के सारे सुख साधन होते थे। सोलह कहाँर उठाते थे; पिंड़िया दहवाने – गोवर्धन पूजा के गोबर से बनी पिण्डिओं से लड़कियाँ महीने भर पूजा करती हैं। मन्नते माँगती हैं। बाद में जल में प्रवाहित कर देती हैं।


शनिवार, 4 जुलाई 2009

लंठ महाचर्चा : बाउ और परबतिया के माई . . अंतिम भाग

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आप से अनुरोध है कि इस कथामाला को थोड़ा समय ले कर पढ़ें और पिछले को पढ़ने के बाद आगे के प्रसंग पढ़ें, आनन्द आएगा। यात्रा आगे बढ़ने के साथ साथ इसमें सारे रस मिलेंगे। भुलाई जा चुकी 'लंठई' को पुन: प्रकाशित और प्रतिष्ठित करने का यह एक विनम्र प्रयास है। साथ ही इस धारणा को ठेंगा भी कि ब्लॉग में साहित्य नहीं है।
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पिछले भाग से जारी...

शिवचरन, यही नाम था बाउ के बाप का। उनकी मिट्टी(मृत शरीर) जब दुवारे उतरी तो गाँव में हाहाकार मच गया। इस गाँव में ब्याह कर आने के बाद मजमें के बीच पहली बार झलकारी निकली थीं। बावरी सी दुवारे की हर चीज को पति से जोड़ याद करती, भाई के कन्धे पर विलपती, पछाड़ खाती मृत शरीर पर ढेर सी हो गईं। गाँव को जैसे काठ मार गया था। सब चुप्प! एक ऐसा आदमी जिसने अपने सामने की थाली तक जरूरतमन्द को दे दी, अनाज के एवज में ऐसे कैसे जान दे सकता था?
और बाउ! जैसे खड़ी फसल को रातो रात बतास मार गया हो। खामोश! आँख में एक कतरा आँसू तक नहीं। दाहा (दाह संस्कार) के बाद ही बाउ बोल पाए थे - माई, अब आगे सोचु (माँ, अब आगे सोचो)। जिसने भी सुना काठ हो गया।

बहनों और मामा के चले जाने के बाद बाउ बावरे से घूमते - खेत, खलिहान, पोखरा, चँवर, मेंड़, बगइचा जैसे बापू का साया ढूढ़ रहे हों। काले चेहरे पर ऐसे भाव कि गाँव का कोई आदमी इस बच्चे से कुछ कह नहीं पाता था। भैंस बिसुक कर औने पौने दाम बिक गई। खेतों की फसल कैसे कटी, कब घर आई? माँ बेटे ने नहीं जाना। कोदो, मड़ुवा और चटनी यही आहार रह गए थे - माँ बेटे के।

ऐसे में प्रकट हुआ गोनई नट्ट- शिवचरन का इयार (यार)। बंजारा, जिसकी दोस्ती हमेशा रहस्य रही। नीम के नीचे बैठ आधे दिन रोता रहा। फिर बाउ का हाथ पकड़ा और खेतों की ओर निकल गया।. . . बाउ को छाँह मिली और भैंस खरीद दीक्षा शुरू हुई। गरमी की भरी दुपहर जब सरेह (देहाती भूदृश्य) में प्रेत घूमते, दोनों सूने बागीचे में जाने क्या क्या करते रहते? गुरु की भूमिका निभाता यह नट्ट बाउ को कुछ कुछ सिखाता और फिर गायब हो जाता। बाउ वैसे ही लगे रहते, एकाध महीने बाद फिर गुरु शिष्य साथ साथ.. समय उड़ता रहा लेकिन न तो झलकारी की खोई हँसी वापस आई और न हीं बाउ की आँखों में कभी आँसू दिखे।
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परबतिया को मारने के सुखरिया के सारे उद्योग सजग माँ ने असफल कर दिए। बढ़ती कन्या का वज़ूद पापी बाप के रुख पर अमरबेल की तरह छा सा गया। सुखरिया रोज मरता और रोज मारने के जुगाड़ लगाता। (उसकी निहायत ही अतार्किक मनोग्रंथि आज तक मैं समझ नहीं पाया)। लोगों को सताना तो जैसे सुखरिया का शौक हो गया था। परबतिया की माई रोज पति को कोसती, "अरे मोछिउखरना, केकरे खातिर एतना पाप बटोरतड़े (अरे मुए, किसके लिए इतना पाप बटोर रहे हो?)"। बदले में मिलतीं गालियाँ और चइला (चुल्हे की लकड़ी) से पिटाई। परबतिया माँ से लिपट जाती और वह नराधम उसे भी नहीं छोड़ता। मरद मेहरारू का रिश्ता अनवरत चलने वाली गालियों और मार पीट की बाढ़ में बह गया। जो बेटी गाँव में सबसे सुन्दर सबकी दुलारी हो उसका अपना बाप ही . .?
गजकरन का शोषण जाल फैलता ही गया और एक दिन ! उसकी अब तक सोई नजर बारह साल की हो चली परबतिया पर जाग उठी। धन की अति हो तो मनुष्य पशु से भी गया बीता हो जाता है। सुखरिया से फरमाइश की गजकरना ने - मतलब था परबतिया को हवेली भेज दिया करे, बहू जी को मदद हो जाएगी। गजकरना को और क्या चाहिए था लेकिन गवने को तैयार होती बेटी(परबतिया बचपने ही ब्याह दी गई थी) को उस भ्रष्ट के यहाँ भेजने को माँ तैयार नहीं हुई। उस दिन से बाप की नजर भी बेटी पर मैली हो गई। आज जब यह लिख रहा हूँ तो अंगुलियाँ जैसे काँप रही हैं.... न जाने कैसे और कितनी बार बाप की वासना दृष्टि से माँ ने बेटी को बचाया। गवना करने का नाम बाप न ले और. . उस घर का माहौल? . . एक छत के नीचे तीन जन रह रहे थे, एक बाकी दो का शत्रु। शत्रु से बेटी को हर पल बचाती चौबीस घण्टे आतंक में जीती माँ। परिवार का विध्वंस पूर्ण हो चुका था।
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करीब आठ वर्षों के बाद पूस महीने के एक दिन बाउ ननिहाल आए। साथ में था अनाज का गाड़ा(बैलगाड़ी)- उपर तक चढ़ा कर भरा हुआ।दिल की चुभन इतने वर्षों में समझ बढ़ने के साथ साथ और बढ़ती चली गई थी। बर्दाश्त के बाहर! जिस गाँव में पैर न रखने की कसम सी खा रखी थी, आज आना पड़ा- बाप के माथे का कलंक और माँ के होठों की खोई हँसी!
गाँव का भैने घर घर घूमा। आतंक राज्य। सुखरिया की मन्नी-करनी अपने पूरे शबाब पर थी। उससे मिला तो भैने ने अपने चेहरे और उसके चेहरे के अंतर को मन में बिठा लिया। सुखरिया जब तगादे पर निकला तो बाउ उसके घर परबतिया के माई से ममिऔरा (मामी का रिश्ता) जोड़ने में लग गए। यह प्रयास कितना सही था, भगवान जाने लेकिन बाउ को सही गलत से फर्क पड़े तब न! कुरूप होने के बावजूद बाउ के वजूद में कुछ ऐसा था जो नारी मन को मोह लेता था। उस दुपहर बाउ ने एक और मामी बना लिया। घृणा के कारण वर्षों से जिस आँगन कोई दूसरा झाँकने तक नहीं आया था, वह आँगन एक गैर के अपनापन की गरमी पा फुला सा गया था। मन की गाँठें, घर की बातें और दु: सब खुलते चले गए जैसे गमछे की गाँठ सरक गई हो और बँधी सरसो फुर फुर सरकती जाय।. . बाउ ने परबतिया को देखा - दो जोड़ी सूनी आँखों ने जैसे सारा कुछ कह सुन लिया हो ! उस रात नराधम सुखरिया ने बेटी का शील लूटने की कोशिश की। चीख सुन माई दौड़ी तो मिली सिर की चोट। चीखती बेहोश हो गिर पड़ी। ऐन मौके टाट फाड़ कन्हैया बन पहुँचे थे बाउ। सुखरिया का हाथ पकड़ा तो जैसे कलाई मसल देंगे- नट्ट गुरु का दाँव। लेकिन दो औरतें ! एक बेहोश और एक बदहवास। सुखरिया को पलखत मिला और वह अन्धेरे में गुम हो गया। जुट गए लोगों को भरमा कर वापस भेजने के बाद बाउ वहीं सो गए। अगले दिन शाम को जब छाँटी (जानवरों का चारा) काटने के लिए बाउ के मामा उसी दिन का खरीदा गँड़ासा ढूढ़ने लगे तो बाउ और गँड़ासा दोनों गायब थे। मामा ने सोचा बँसवारी में पैना काटने गया होगा।
वह रात बाउ के लिए निशापूजा की रात थी! सुत्ता पड़ते ही बाउ गजकरना के दुवारे जा अँधेरे में कुछ करने लगे। एक बखार, दूसरी बखार,तीसरी बखार.....रात गहराती गई। बाउ ने उपर आसमान देखा। कुछ नहीं सूझा लेकिन सन्नाटे और बागीचे से आती निशाचर धुन ने बता दिया करीब तीन बजे होंगे। कलुवा की रखवार मण्डली ठिठुरते जाड़े में दुबक नासिका गर्जन द्वारा निशाचर धुन का साथ दे रही थी।...अचानक सारी बखारों और गजकरन के बंगले (मेहमानों के लिए मुख्य घर से अलग बना बैठका) में एक साथ आग भड़क उठी। धू धू कर जल उठी थी रामनामी लंका! ... रखवारों ने सुना अमानुषी किलकारी और अट्टाहस। देखा हवेली की छ्त से भी ऊँचा खड़ा ब्रह्मराक्षस अब लम्बी कुलाँचे मारता दूर जा रहा था।. . कलुवा के हाथ पिटने के बाद मरते हुए पंडित का शाप ..गजकरन एक दिन यहाँ बरम(ब्रह्मराक्षस) नाचेगा, तुम्हारी लंका जलेगी पापी। जलेगी। . . .रखवारे बेसुध हो गिर पड़े। गजकरन के देखते देखते लंका राख हो गई। तमाशा देखते लोग चुपचाप अपने घरों को चल दिए।
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लोग रात की घटना से उनींदे देर तक सोते रहे थे कि कोलाहल उठने लगा! जिसे देखो वही सुखरिया के घर की ओर भागता जा रहा था। वहाँ. . .दरवाजे पर सुखरिया की सिर कटी लाश पड़ी थी। एक ओर खून से भीगी परबतिया की माँ, उससे लिपटी परबतिया और किनारे खड़े बाउ-लाल लाल आँखें, जैसे बनमानुष। दूसरी तरफ मामा चुपचाप जमीन पर पड़ा गँड़ासा देखते, पूरा टोला और गजकरना हतप्रभ . . .बाउ की आवाज गूँजी, "गाँव के भैने हँई। हाथ जोड़ माँगतनी, कौनो पंचाइत नाहीं होई। सभे जानता कि सुखरिया कइसन रहल। केहू केतना सहित। चौकी पर खबर जा। अंग्रेज बहादुर के न्याव होई। (मैं गाँव का भांजा हाथ जोड़ प्रार्थना करता हूँ कोई पंचायत नहीं होगी। सभी जानते हैं सुखारी कैसा था। कोई कितना सहता? चौकी पर खबर कर दी जाय। अंग्रेज न्याय करेंगे)" सभी स्तब्ध।गजकरन कुछ कह पाया। अपने मामा की ओर मुखातिब हो बाउ बोले, " मामा, परबतिया के गवना तू करा दीह। तोहसे होखे हमके बताव। (मामा, परबतिया का गौना आप करा दीजिएगा। आप से हो सकता हो तो मुझे बताएँ)" मामा ने सिर हिलाया-मौन स्वीकृति में।
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पूरे घटनाक्रम से उदासीन बन बाउ उछल कर गाड़ा पर चढ़ गजकरन से बोले,"गज्जा मामा, आठ साल के सूद अउरी मूल सहित्ते अन्जा लौटावे आइल बानी। बड़ी तकलीफ बा कि कुल हो गइल। बिधि के लिखनी, का करब? चल नपवा ल। अबकी कम होई। भीतरे रखवा लीह (गज्जा मामा, आठ साल का मूल सूद जोड़ अनाज लौटाने आया हूँ। बड़ी तकलीफ है कि यह सब हो गया। विधि की लेखनी, क्या करेंगे? चल कर नपवा लीजिए। इस बार कम नहीं होगा। घर के भीतर ही रखवा लीजिएगा)" कटाक्ष समझ कर भी गजकरन को खून का घूँट पी कर रह जाना पड़ा। पूरा गाँव उत्साह में था और पुलिस कभी भी आने वाली थी। बाउ ने गाड़ा को उल्लड़ (आगे से उठा) कर सारा अनाज उलट दिया और घर की ओर बैलों को हाँक चले। . . . पुलिस आई और परबतिया के माई को ले गई।
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झलकारी ने बैलों के गले की घण्टी सुनी तो बाहर आईं। गाड़ा खाली दिखा। भागी घर के भीतर गईं। . . . माँ दही मिश्री ले खड़ी थी और बेटा सुना रहा था। सब सुनने के बाद झलकारी ने इतना ही बोला, " बेटा, हारि गइल होखब दही मिश्री खा (बेटा, थक गए होगे। दही मिश्री खा लो)" और मुस्कुराने लगीं। . . .
आठ सालों के बाद माँ मुस्काई थी! बाउ के भीतर सातों समुन्दर के तूफान उमड़ से पड़े, अन्दर की आग बड़वाग्नि बन हहरा उठी और हिचकिओं के साथ आँखों से गंगा जमुना बह निकलीं। . . . ब्रह्मराक्षस रो रहा था।
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लंठ महानिष्क़र्ष- लंठ जन के उपर छोड़ता हूँ। इस समय अपने पात्रों से हारा मैं कुछ सोचने समझने लायक नहीं हूँ।
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उत्तर कथा: परबतिया के माई को काला पानी की सजा हुई थी। वह सजा काट लौट कर वापस भी आई और बाउ उससे मिले भी थे। इस बार मामला हास्यप्रद रहा। कभी सुनाऊँगा।
अगली कथा: बारात एक हजार और बाउ मंडली

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अपनी बात: यह प्रसंग खुद गोनई नट्ट ने मुझे सुनाया था। शायद उस समय उनकी उमर 90 के उपर रही होगी। गरमी की उस रात छत पर इसे खत्म करते करते वे फूट फूट कर रो पड़े थे। मैं भी खूब रोया। उसके बाद वे फिर नहीं लौटे।
आज इतने सालों के बाद भी इसे लिखते मैं रीता हो गया हूँ। आँखों में आँसू हैं और दिमाग बन्द है। कौन कहता है कि लंठ ऐसे वैसे होते हैं। वे होते हैं बस प्यार करने लायक। उन्हें समझ सको तो।