रविवार, 21 जून 2009

अथ लंठ महाचर्चा

(1) अथ लंठ महाचर्चा।
(2) बहुत दिनों तक टालने के बाद आज अंगुलियाँ इस बिषै (विषय नहीं) पर चल ही पड़ीं। आलस की भी एक सीमा होती है !
चिट्ठा जगत के शिशुओं, जवानों और बुजुर्गों सबको (नारी जाति को भी सम्मिलित समझा जाय) पहले यह स्पष्टीकरण कि न तो मैं शब्दशास्त्री हूँ और न ही पंडित। इस लेखमाला में मैं जो भी लिखूँगा वह काफी खतरनाक है और मात्र अनुभव अर्जित है या श्रौत परम्परा से आया है जिसे मैं सत्य मानता हूँ। खतरनाक मेरे लिए क्यों कि अनुभववादी, मनोगतवादी , प्रतिक्रियावादी , संशोधनवादी , समाजद्रोही , राष्ट्रद्रोही , साम्प्रदायिक , अश्लील...आदि टाइप की गालियों के मिलने की पूरी सम्भावना है और आप के लिए क्यों कि आप की संस्कारवान आँखों और मस्तिष्क को तेज़ झटके लगेंगे। अत: कमजोर दिल वाले न पढ़ें । .... घबरा गए? ऐसा नहीं भी हो सकता है। और अगर ऐसा नहीं होता है तो आप या तो ‘लंठ’ हैं या ‘भठ्ठर’ टाइप के व्यक्ति। इसकी व्याख्या इस तर्ज पर कि प्रकाश अति अधिक हो या एकदम न हो, दोनों ही स्थितियों में चीजें नहीं दिखती हैं।
“ ?!@#$%*:(:)”
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हरि अनन्त हरि कथा अनंता । यह बिषै बहुत ही गूढ़ है और प्रस्तुत कर्त्ता मूढ़ है। दुस्साहस इसलिए कर रहा है कि महारथियों और अतिरथियों की असफलता के बाद ब्याख्या की इस सनातन समस्या से जूझने का बीड़ा उठाने को यह पैदल (अक्ल से या चाहे जैसे) सैनिक ही बचता है।
अविगत गति कछु कहत न आवै। गूँगे का गुड़। सो महाचर्चा ‘विपरीत पंचतंत्र’ की शैली में होगी।
विपरीत इसलिए कि पंचतंत्र वाले विष्णु शर्मा महापंडित थे और शिष्य महामूढ़ लेकिन यहाँ प्रवक्ता महामूढ़ और श्रोता (ब्लॉग रचयिताओं/पढ़ाकुओं से अर्थ लें) महापंडित। लेकिन महापंडितों को भी महामूढ़ों के समझ की आवश्यकता होती है। बोधकथाओं पर या तो तथागत टाइप के मानुषों का अधिकार है या मूढ़ों का। इतिहास भरा पड़ा है ऐसी कहानियों से। श्रोता कहानी के बाद ‘लंठई’ से उसके सम्बन्ध जोड़ने और अपनी व्याख्या देने के लिए स्वतंत्र होंगें। आवश्यकता हुई तो यह मूढ़ अपनी समझ बताएगा।
अगर आप फॉर्मेट में कुछ और जोड़ना चाहते हैं तो अभी बता दें । मूढ़मति बाद में अपनी ढपली और अपना राग बजाएगा। अस्तु ..प्रारम्भ करते हैं। .. जारी

11 टिप्‍पणियां:

  1. जारी रहो..अभी तक तो स्थितियाँ सामान्य सी ही हैं. :)

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  2. मैने श्रीराम शर्मा आचार्य की उक्ति दुहरा ली है कि मूर्ख विद्वानों से उतना नहीं सीख पाते जितना विद्वान मूर्खों से सीख लेते हैं। अब इस प्रवचन में देखते हैं कि कौन किससे कितना सीखता है। इसे लंठई न समझा जाय। :)

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  3. wahi....

    alsa itna ki itni choti post ke bhi 2 (ya shayad zayad ) tukde kar daale...

    jaari.... ka intzaar rahega !!

    jab bhi neend se jaag jaiyen !!

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  4. लंठ को इतना सरल भी न माना जाये। हमने बड़े कॉम्प्लीकेटेड लण्ठ देखे हैं - इण्टेलेक्चुअल छाप!

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  5. भूमिका में ही खिंच ले गए आप तो... आगे लाइए कहीं हम भी ना फिट हो जाएँ लंठई में :)

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  6. शानदार भूमिका । आपकी अगली कड़ी से आ रहे हैं मुड़कर इधर । आभार ।

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  7. @ ज्ञानदत्त जी हमारी आपकी तो अभी मुलाकात ही नहीं हुयी . ये दूसरे वाले पहले ही मिल गए :) .

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  8. आपकी लेखनी का पैनापन अतुलनीय है,
    अब देखिये हमहूँ 'लंठे' कहायेंगे अब काहेकी इ कथा में हम 'अश्लील' 'सांप्रदायिक' ऐसा कुछो नहीं पाए, सबकुछ गरिमा के भीतरे था, बस इ समझिये मन बहुते खुस हो गया, आगे भी लिखते रहिएगा हम आइबे करेंगे पढने.....

    स्वप्न मंजूषा 'अदा'
    http://swapnamanjusha.blogspot.com/

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  9. लंठ को इतना सरल भी न माना जाये। हमने बड़े कॉम्प्लीकेटेड लण्ठ देखे हैं - इण्टेलेक्चुअल छाप!

    Raj G Gyan Kaka ki apse mulakat nahi huyee hai, mujhse mil chuke hain. Shayad meri taraf ishara hai unka.

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