बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

बाउ, क़ुरबानी मियाँ और दशहरा - प्रसंगांत

पिछले भाग बाउ, क़ुरबानी मियाँ और दशहरा -1 से जारी ..
(उ)
सबेर के बेरा भैंस खोलने में देर हो गई थी, लहा लह धान के खेत किनारे बाउ भैंस चरा रहे थे। ये साल बाढ़ अच्छी थी। सरेह में फैले शीशो के पेंड़ों को दुलरा रही बयार धीमे बह रही थी। भैंस चरती चरती एक फतिंगे से जैसे खिलवाड़ कर रही थी – कभी वो मुँह मारे तो कभी फतिंगा उसकी नाक पर बैठ जाय। छोटी छोटी पीली पीली तितलियाँ घसियारू फूलों पर मँडरा रही थीं। पास के पीपल पर कठफोरवा किटिर किट्ट कर रहा था। अचानक झींसा पड़ना शुरू हो गया।
ए बेरा झींसा? - धन्न महादेव । बयार, झींसा और कठफोरवा ने कुछ ऐसा मन पुलकाया कि बारहमासा गाने लगे:
. . .भादो गगन गंभीर पीर अति हृदय मंझारी,
करि के क्वार करार सौत संग फंसे मुरारी,
तजो बनवारी।
कातिक रास रचे मनमोहन, दुई पाव में पायल भारी,
तजो बनवारी।
अगहन अपित अनेक विकल वृषभानु दुलारी,
पूस लगे तन जाड़ देत कुबजा को गारी।
आवत माघ बसंत जनावत, झूमर चौतार झमारी,
तजो बनवारी। ...
दूर से गड़वा गाँव का हजाम अनरूद आता दिखाई दिया - "ई का करे आवता ?" (ये क्या करने आ रहा है?)
. . .
पास आकर सलाम करने के बाद बोला," सनेसा बा।" (सन्देश है।)
"कहु"
"मालिक कहलें हे कि अब सतवरिया जोड़ बन्न होई अउर दसहरा के खुली।" (मालिक ने कहा है कि अब हर सातवें दिन होने वाली कुश्ती बन्द होगी और दशहरा को मुक़ाबला होगा)
"कौन मालिक ?"
" सबरन सिंघ।"
" काहें.. शौक खत्तम हो गइल ?" (क्यों? शौक खत्म हो गया ?)
"...."
"बोलत काहे नइखे?” (बोल क्यों नहीं रहे?)
"कहत के बड़ा डर लागता।" (कहते हुए बहुत डर लग रहा है।)
" सरऊ बड़ी मारब। बोलु.." (साले, बहुत मारूँगा। बोल..)
अनरूद हाथ जोड़ जमीन पर बैठ गया। बोला,
"माफ करिह बाबू। सनेसिया के कार ऐसने होला। कहनाम बा कि असल बाप के बेटा हउअ त दसहरा के दुपहरिया में नवका दंगल में गड़वा खरिहाने लड़े अइह। तमाशा देखे के मुसमतियो के लेहले अइह।"
(माफ करिए बाबू। सन्देशवाहक का काम ऐसा ही होता है। कहलवाया है कि असल बाप के बेटे हो तो दशहरे के दिन दुपहर मे नएअ दंगल में लड़ने गड़वा गाँव के खलिहान पर आ जाना। उस विधवा को भी तमाशा देखने के लिए ले आना।)
" !!"
बाउ इस अभद्र चुनौती पर काठ हो गए। मृत बापू और माँ के वैधव्य को चुनौती में समेटने की यह कैसी नीचता? पैना उठाया और अनरूद के चूतड़ पर जड़ दिया। वह ऐसा भागा कि फिर नहीं रुका . .
भागते हुए भी उसके कानों में स्वीकार नाद घुसता रहा," कहि दिए सबरना के हम त अक्केले आइब, ऊ आपन पूरा खनदान लेहले आई।" (सबरना से कह देना मैं तो अकेले आऊँगा। वह अपना पूरा खानदान जुटा लेगा।)
भैंस को वापस ले आते मन में घुन्नाते रहे, गजकरना, सबरना, .. का जाने केतना बाड़ें सो ! (जाने कितने हैं?) झींसा, कठफोरवा और बारहमासी बयार तीनों रुक गए थे।
(ऊ)
दशहरे से आठ दिन पहले अबरन सिंघ को नाती हुआ था। छटिहार बीत जाने पर इमिरती बी को बोलावा था - काजर टीका करने का। जवार में उनके जैसा सुरमा कोई नहीं बनाता था । काजर और सुरमा मिला कर बच्चे की आँख में नियमित लगाने से फुल्ली नहीं होती थी और आँख की रोशनी भी बढ़ती थी। पहला काजल सन्ध्या के समय लगता था। क्या परख थी !
हाथ में कजरौटा लिए संझा की बेल बँगले के नजदीक पहुँची ही थीं कि साँय फुस फुस सुन रुक गईं कान लगा सुनने लगीं - तीन मरदों की आवाज थी, दो पहचानी - सबरन और कमानी की, तीसरी अनजानी थी।
सबरन - “.. पाँच नेटुआ चाहीं।" (पाँच नेटुए चाहिए।)
कमानी - " सोहेला आई कि नाहीं।" (सोहेल आएगा कि नहीं?)
तीसरी आवाज - " आई काहे नाहीं? वोहि से त बउआ ठेकाने लागी।" (आएगा क्यों नहीं? बाउ को वही तो ठिकाने लगाएगा।)
कमानी - " दंगल में खलीफा तोहि के रहे के बा कल्लन वस्ताद। फेंकू वस्ताद त बड़ा कयदा कनून बतियावेलें। " (दंगल में आप को ही खलीफा रहना है, कल्लन उस्ताद ! फेंकू उस्ताद कायदे कानून की बातें कुछ अधिक ही करते हैं।)
कल्लन ! नेटुए, सोहेल - इमिरती बी ने सुना, जोड़ा और जो आगम दिखा उस पर सन्न रह गईं। छठिहार के बाद का पहला दिन! उल्टे पाँव कैसे वापस जाएँ? जल्दी जल्दी शिशु को काजल किया, दुआ पढ़ी और नजराना घर भेजवाने को बोल पीर को गोहराती भाग चली। बच्चे की माँ और बाकी औरतें देखती ही रह गईं।
(ए)
अकरम को गोद में लिए क़ुरबानी मियाँ उसे हिज्जे सिखा रहे थे। इमिरती की घबराहट देखी तो पूछ बैठे। जो सुना तो यकीन नहीं हुआ लेकिन कमानी के आखाड़े में कल्लन के वस्ताद बनने पर मन में उपजी शंका ?
नेटुए। हिन्दू और मुसलमानी दोनों धरम के मानने वाले। दुनिया का कोई ऐसा जरायम पेशा नहीं जो न करते हों। चोरी, डकैती, हत्या, ढोर भगा ले जाना, धरकोशवा बन बच्चों को उठा लेना, चन्द आनों के लिए खड़ी फसल को आग लगा देना, रातो रात धान गेहूँ काट इस गाँव से उस गाँव पहुँचा देना . . .
इनकी औरतें तो पक्की कुटनी - सुरूपा बालाओं को कोठे पर पहुँचाते देर न लगे। मर्द जानवरों की ताकत और लामर सा काइयाँपन लिए हुए। ईमान धरम सब जर ।
दशहरे के मेले और वह भी आखाड़े में उनका क्या काम? सोच क़ुरबान अली सोच !
सोहेल ! नेटुए सरदार का बड़ा बेटा। जालिम। पहाड़ सी शरीर और बैलों की ताकत। खूँखार हत्यारा।
हत्या !
और अचानक कुहासा फटा। बउटा की जान खतरे में है। उनका लंगोटिया इयार इनके हाथों ...? क्या इसी दिन के लिए उसे बसकौटी के मेले में बचाया था? नहीं.. आगे क़ुरबानी सोच नहीं सके।
तुरंत घरौठा की ओर अन्धेरे में ही जाने को निकले कि दरवाजे पर कमानी सिंघ को खड़ा पाया। विकृत मुस्कान।
"मियाँइन बिना नजराना लेहले भागि अइली ह। ऊहे देवे आइल रहली हें। " (मियाँइन बिना नजराना लिए ही भाग आई थीं।)
इतने नौकर चाकर और कमानी खुद नजराना देने आएँ ! क़ुरबानी की बुद्धि इस दूसरे झटके से चौन्हा गई।
"बड़ी मेहरबानी बाबू। ललना जुग जुग जिएँ। अल्ला के करम हो।"(बाबू, बहुत मेहरबानी। बच्चा युग युग जिए। अल्लाह का करम हो।)
" अरे देख त ss का ले आइल बानी?" (अरे देखो तो क्या लाया हूँ?)कहते हुए कमानी ने गमछा उठा दिया।
चाँदी की हँसुली ढेबरी की रोशनी में लपर लपर चमक रही थी।
क़ुरबानी ने हाथ जोड़ लिए,
"बाबू बड़ी मेहरबानी। राति के सबके नज़र चोरा के काहें ले अइल ह? ले जा। बिहाने आ के खुदे ले लेब। लछमी के राति के घर में से नाहीं निकालेके।" (बाबू, बड़ी मेहरबानी। रात को सबकी नजर च्रा कर क्यों लाए हो? ले जाओ। सुबह मैं आकर खुद ले लूँगा। लक्ष्मी को रात में घर से बाहर नहीं निकाला जाता।)
कमानी ऐंठता हुआ चला गया।
जाने क्यों क़ुरबानी को लगा कि उनके बदन में चीटियाँ घुस गई हैं। हजारो चीटियाँ। दोहर उतार फेंका। धोती खोल सिर्फ लंगोट में खटिया पर चर्र से भहरा गए। सारे बदन में चुनचुनाहट! हजारों सूइयाँ पेशानी में पेवस्त हो रही थीं। इमिरती बी जल्दी जल्दी ठंढई घोंटने लगीं ... कल दशहरा था।
(ऐ)
आखाड़े को जाने को तैयार बाउ जब फेंटा बाँध रहे थे तो माता झलकारी के नयन उनकी गठीली देह को पखार रहे थे। नजर न लगे ! माँ ने हाथ पर थुकथुकाया और आँखों पर लगा लिया।
बाउ गड़वा की ओर चल पड़े । ठीक उसी जगह जहाँ अनरुद मिला था, क़ुरबानी मियाँ दो लाठियों को लिए खड़े मिले। बाउ को हैरानी सी हुई। दुआ बन्दगी के बाद क़ुरबानी एकदम से बात पर आ गए:
"बउटा ! हमार बाति मान s। आज जनि जा। नेटुआ आइल बाड़ें सो। जान लेवे देवे के जोगाड़ बा।" (बउटा, मेरी बात मान लो। आज मत जाओ। नेटुए आए हैं। जान को खतरा है।)
" जान लेहल देहल सबरना कबसे सीखि लेहलसि क़ुरबानी मियाँ ? धोखइत खनदान-नीची जात।" (क़ुरबानी मियाँ, सबरन ने जान लेने देने के खेल कब से सीख लिए? धोखेबाज खानदान – नीची जाति।)
"एहि से त कहतनी। वो कुल्हिन के कवन ईमान !" (इसी से तो कह रहा हूँ। उन सबका कोई ईमान तो है नहीं।)
" इयार, रुकि जइतिं। तू गलत थोड़े कहब S। लेकिन किरिया खइले बानी।" (यार, रुक जाता। तुम गलत थोड़े कह रहे होगे ! लेकिन मैंने शपथ ले ली है।)
बाउ ने हजाम वाली घटना सुना दी। क़ुरबानी का शक पक्का हो गया। सरेआम गुनाह !
" नइख मानत त हमहूँ चलब।" (नहीं मान रहे हो तो मैं भी चल रहा हूँ।) 
" सोचि लीह क़ुरबानी वोहि गाँवे में रहे के बा। गगरा कूआँ से कइसे बची?"(सोच लेना क़ुरबानी। उसी गाँव में तुम्हें रहना है। गागर कुएँ से कैसे बच सकती है?)
" धुर बउटा, तेहूँ कब्बो कब्बो तिरछोल बतियावेले।" (धुत्त बउटा, तुम भी कभी कभी तिर्यक बातें करते हो!)
बाउ चुप हो गए। दोनों चल पड़े लेकिन क़ुरबानी ने लाठियाँ अपने पास ही रखीं . .
(ओ)
नए नवेले आखाड़े की शोभा का वर्णन सिर्फ पहलवान ही कर सकते हैं। दाँव दिखाने को बनाई गई नई जमीन बहुत आदर और गुरुता की पात्र हो जाती है।
आखाड़ा आम के पेड़ों की छाया में बना था। अबरन, सबरन और कमानी संग भाई पट्टिदार चौकियों पर विराजमान थे तो बुलाए गए नेटुए जमीन पर। बीसियों लठैत आखाड़े को घेरे खड़े थे और जनता पेड़ों और धरती पर अपनी अपनी गोल जमाए थी। कुत्ते तक आस पास डंट गए थे गो कि भतवानि का पत्तल चाटना हो। आखाड़े पर खलीफा के रूप में फेंकू और कल्लन पैंतरा दे दे छुटभैये पहलवानों को हाथ मिलाने का न्यौता दे रहे थे।
धन की महिमा, केवल कुटी चितामन के पहलवान नहीं आए थे। जनता कयास लगा रही थी- कुटी की कुश्ती फीकी हो गई कि बाउ और खेलाड़ी वस्ताद उर्फ क़ुरबानी मियाँ की जोड़ी ने आखाड़े पर पैर रखा। हर्ष की कहकही और चिल्लाहट के चटकारों से वहाँ जन जन जीवन पसर गया।
किसी अति उत्साही ने जैसे भीड़ को ललकारा," बोल कुटी चितामन की ssS"
"जय" – भीड़ ने ललकार का जवाब दिया। आखाड़े की मिट्टी को माथे और सीने पर लगा दोनों वहीं किनारे बैठ गए।
कमानी ने बुरा मुँह बनाया। बुदबुदाया, "आज चितामन के हिरामन चिता चढ़िहें।"(आज चितामन की शोभा चिता पर चढ़ेगी।)
पहली जोड़ बराबरी पर छूटी - घर परिवार का मामला था। सगुन अच्छा होना चाहिए।
क़ुरबानी ने नज़र सोहेल नेटुए पर जमा दी। चौड़ा गबरू जवान साढ़े पाँच हाथ के करीब ऊँचा होगा। उजड्ड बैल जैसा सबसे अलग नजर आता था। गोरा चिट्टा, कंजी आँखों से मक्कारी टपकती हुई।
कमानी सिंघ जाने क्यों बीच बीच में खड़े हो दायें पैर की ओर झुकता और फिर बैठ जाता।
जिस बैल के पैर में चोट हो वह हल नहीं जोता जाता !
उपर आम की डाल में एक लाठी फँसाई जा चुकी थी। सूरज दिखा रहा था कि नमाज में अभी कुछ वक्त बाकी था।
कुछ जोड़ और हो जाने के बाद भीड़ की तरफ से फरमाइश हुई - खेलाड़ी वस्ताद, खेलि देखाव।
क़ुरबानी ने लंगोट कसी और आखाड़े में चुपचाप आ गए। भीड़ मायूस हो गई!
आ SSSSली sssss क्या सिर्फ कुटी चितामन के लिए था ?
एक चक्कर लेने के बाद ही एक नेटुए ने हाथ मिला लिया। उसके बाद किसी को निराशा नहीं हुई। दस दफे भी आँखें नहीं झपकी होंगी कि कैंचा और कालाजंग दाँवों के समन्वय से हारा नेटुआ आसमान ताक रहा था।..
.. ऊ पटकलस ... (वो मारा !)
इतना शोर उठा कि कुत्ते डर के मारे खलिहान छोड़ भाग चले !
खेलाड़ी वस्ताद ने सबरन सिंघ को सलाम किया, साफा इनाम पाया, साथ ही धीरे से और न लड़ने की छूट भी ले ली। सबरन तो यही चाहता था। घड़ी नजदीक आ गई थी।
कमानी पहलवान ! आखाड़े पर। बाउ को खुली चुनौती – आर पार की लड़ाई का।
"युद्धम् देहि"
"ले सारे !" (लो साले!)
बाउ जा s s S बजरंगी चिल्लाते कूद पड़े थे। दोनों गुत्थम गुत्था हुए कि बीच में ही फेंकू वस्ताद को हटा दिया गया। कल्लन अब अकेला खलीफा था।
 . . सोहेल खड़ा हुआ। बाउ आदतन थोड़ी कला दिखाने के बाद चित्त करने को सोच रहे थे कि सोहेल का वार पीछे से हुआ। एक से दो दो - वह भी धोखे से ! एक पल को सन्नाटा पसर गया। लठैतों ने घेरा सा बना लिया था आखाड़े के चारो ओर और अचानक भींड़ पागल हो उठी।
"खलीफा ! ई का।" (खलीफा ! ये क्या?)
कल्लन वस्ताद कहाँ का खलीफा? उसके मन में 'खिलाफत' की क्या इज्जत? चुप रहा। सोहेल ने भरपूर घूँसा बाउ के सिर पर मारा था और उनकी आँखों के आगे अन्धेरा छा गया। बनमानुख वहीं भहरा गया। सोहेल बाउ का गला घोंटने लगा तो कमानी उनकी पूरी शरीर पर वजन दे बैठ गया।
भीड़ को समझते देर न लगी लेकिन बीसियों लठैत! और आतंक !!
फिर भी लोग आखाड़े में आने को गुथ्थम गुथ्था हो गए।. . .
माई रे ! बाउ के मन में जैसे गोहार सी मच रही थी। पहली बार गुरु गोनई नट्ट भूल गए थे। मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम हो चला था। आँखें निकलने को आ रही थीं।
बस एक दफा क़ुरबानी ने खलीफा को धिक्कारा था, फिर चिल्लाए:
"उठु बउटा, कुटी के नाव हँसइएबे का? उठु बउटा ss!" (बउटा उठो ! कुटी का नाम हँसावोगे क्या? उठो बउटा !!)
कोई हरकत न होता देख शिकायत भरी नजर से आसमान की ओर देखा- ई कइसन अनरथ मौला? (ये कैसा अनर्थ मौला ?)..
…सूरज ! नमाज का वक्त हो चला था।
पेंड़ में बंधी लाठी पर जोर दे दूसरी लाठी को टेक छलांग मारी...किलकारी निकली, मियाँ ने बजरंगी को जगाने को हाँक लगाई
" . . जा s s S बजरंगी ssss......
...ज़िबह होते जानवर की अंतिम पुकार, करुणा, अविश्वास, आह्वान, सन्धान, चुनौती...जाने क्या क्या समा गए थे इस एक पुकार में !
"... आ SSSSली sssss”
बाउ के मन में जैसे प्रतिध्वनि सी गूँजी। पहली बार कुटी चितामन के आखाड़े में सुना स्वर याद आया।
ईयार अबहिन बाड़ें ! (यार अभी यहीं है !)
सारी चेतनाओं को संजीवनी सी मिल गई। शरीर की सारी शक्तियों ने एक साथ उफान मारा।
माई रे !...
सोहेलवा का एक कान बाउ के हाथ में आया और फिर खून का फव्वारा !
बाउ ने उसका कान उखाड़ लिया था। छटपटाता सोहेल वहीं बेहोश हो गया।
ठीक उसी समय जैसे बाँस तड़का हो ... तड़ाक ! क़ुरबानी ने कमानी का पैर उस पर कूद कर तोड़ दिया।
..आ... जा...
खाजा। ...
भीड़ लठैतों को धून रही थी और दो दो हाथ कर रही थी। अबरन और सबरन परिवार बेहोश पड़े कमानी को संभालने में लगे थे।
बाउ ने क़ुरबानी का हाथ पकड़ा और दोनों इयार लाठियाँ संभाले भाग चले जैसे मदरसे से छुट्टी होने पर बच्चे चट्टी और पटरी संभालते भाग रहे हों। एकाध लठैतों ने रोकने की कोशिश की लेकिन शनि और गुरु साथ हों तो उनके सामने कवन ससुरा गर्रह टिकता है !
सीवान पर आ दोनों रुके और प्रगाढ़ आलिंगन में बँध गए। दुपहरी के बाद का सूरज चकाचक चमक रहा था।
"क़ुरबानी आज घरे मति जा।" (क़ुरबानी आज घर मत जाओ।)
"अरे नाहीं, अक़रम अउर मियाँइन अक्केले कइसे रही लोग? लइका के गोड़ टूटल बा- जाने सबरन सिंघ का करिहें?" (अरे नहीं, अकरम और उसकी माँ अकेले कैसे रहेंगे? लड़के का पैर टूटा है-जाने सबरन सिंघ क्या करेंगे?)
"एहि से त कहतनि।"(इसी से तो कह रहा हूँ)
"मौला रखवार बाने।" (मौला रखवाला है।)
... सारा किस्सा माँ को सुनाने के बाद जाने क्यों बाउ उदास हो गए। माँ के लाख समझाने के बाद भी कदम दशहरे के दिन होने वाली पारम्परिक नमस्ते बन्दगी के लिए नहीं उठ सके।
(औ)
अरुणोदय की बेला में जब बाउ भैंस खोलने दुआरे निकले तो किसी को सिसकता सुन ठिठक गए। पास गए तो इमिरती बी अक़रम को साथ लिए जमीन पर ही बैठी सिसक रही थी।
बाउ को देखा और धीरज का बाँध टूट गया।
गढ्ढे में अचानक गिरी गाय की पुकार जैसा विलाप !
" आरे ss ए बउटा ! मारि देहले सों... अ हाँ ssss " ...(अरे ये बउटा ! उन सबों ने जान ले ली !) 
इतना तेज रूदन!
झलकारी देई भागती बाहर निकलीं तो इमिरती बी उनसे लिपट गईं। अकरम धाड़े मार रोने लगा।
पहली बार इमिरती बी बाउ से बोली थीं, इस शोक में भी नाम दुलार वाला ही पुकारा था।
सुबह की शीतल बेला में भी बाउ पसीने पसीने हो गए !
फिर याद आया गजकरना। जाने कितने हैं उस जैसे? अब की जीत गया क्या? पास में घूमते मैनवा को एक धौल दे गरियाते बोले, "भाग बहानचो. मुनरा अउर मुनेसरा के बोलाइ ले आउ। कहि दीहे गड़वा जाए के बा। अब्बे।"(भाग बहनचो_, मुन्नर अये मुनेसर को बुला लाओ। कह देना गड़वा जाना है। अभी।“)
अकरम को झलकारी देई गोद में उठाए भीतर चली गईं। चेहरा आँसुओं से तर था।
बैलों को जोत मुन्नर, मुनेसर और मैना को इमिरती के साथ चढ़ा बाउ गाड़ा दौड़ा चले। मूहाँ मूहीं बात फैलती गई और घरौठा के सारे मर्द पीछे पीछे एक एक कर गड़वा की ओर चल दिए।
(अं)
क़ुरबान अली की देह बाहर लिटा दी गई थी। लाश उठाने के लिए दो बँसफोर टिकठी बना रहे थे। सारे जोलहे दुआर पर इकठ्ठा थे। चेहरे जैसे भादो का आसमान - गुमुन्द अब बरसा कि तब ! बाउ एक क्षण में ही सौ मूठ से एक मूठ हो गए -चादर हटाई तो पूरी देह पर लाठियों की चोट के निशान थे। छुआ तो ऐसी लगी कि जैसे मरी चिड़िया की देह हो !
गोनई गुरू की सीख मन में खुसफुस करने लगी, " कइ बेरा मारि से अदमी मुएला नाहीं लेकिन बुझाला कि मरि गइल बा। परान बरमंड में समा गइल रहेला . . "। (कई बार मार पड़ने के बाद आदमी मरता नहीं है। बस ऐसा प्रतीत होता है क्यों कि प्राण ब्रह्मरन्ध्र में समा गया रहता है।)
आश की रेख पतली आई और फिर अचानक जैसे मन के अँधियारे में चहाचह अंजोरिया फैल गई - दोहाई गुरु! बाउ ने देह को पैर की तरफ से टटोलना शुरू किया तो कुछ लोगों ने रोका। बाउ ने सिर उठाया। उस नजर में जाने क्या था ! सब चुप्प हो गए। ... धुकधुकी और साँस का कोई चिह्न नहीं नज़र आ रहा था। सीने पर बाउ ने कान लगाया
तो!.
..बहुत धीमी धुकधुकी, रुक रुक कर !!
तो !!!
जिन्दगी अभी बाकी थी। इमिरती बी से पहली बार बाउ बोले थे, " भउजी हो, कल राखss। तेल गरमाव।" (भाभी, धीरज रखो। तेल गरम करो।) मन ही मन गुरु गोनई को प्रणाम कर बाउ ने हुक्म फरमाया, " ए मुनेसर, ए मुन्नर। इनारे से पानी भर ss जा। कपारे पर तब ले पानी गिराव जा जब ले होश न आ जा। "(मुनेसर और मुन्नर! कुएँ से पानी ले आ सिर पर तब तक गिराते रहो जब तक होश न आ जाय)
सरसो का गरम तेल पैरों के तलवों पर बाउ ने रगड़ना शुरू किया, उधर मुन्नर मुनेसर क्या दो तीन लोग और सिर पर पानी उड़ेलने में लग गए। प्राण को वापस देह में उतारना था ... आध घड़ी बीत गई। कोई हरकत नहीं हुई।
भीड़ से एक बूढ़े ने हिम्मत कर कहा, " अब रहे द बबुना। माटी के काहें ..?" (बबुना, अब रहने दो। मिट्टी को क्यों...?)
"हमरे इयार के देहिं हे ई। माटी कहब s त अब्बे तोहके माटी बना देइब।" (यह मेरे यार की देह हैं। मिट्टी कहोगे तो अभी तुमको मिट्टी बना दूँगा।)
बूढ़ा सहम कर चुप हो गया। सूरज के चढ़ने के साथ साथ ही काम में तेजी आई। .. दो घड़ी के बाद क़ुरबानी ने आँखें खोलीं। धीमी कराह सी निकली ।
"पा ss नी ss!” पानी गिराना बन्द करा हर्ष से बाउ चिल्ला उठे,"भउजी हो! दूध गरमाव।"(भौजी, दूध गरम करो।)
क़ुरबानी ने इयार को देखा, चेहरे पर जीवन की आब फैल गई।
बाउ के हाथों थोड़ा सा दूध पिया और फिर प्रगाढ़ निद्रा में सो गए। साँसे नियमित हो चली थीं।... …
बिना कुछ पूछे ही बाउ समझ चुके थे, कि सब करनी सबरन और कमानी सिंघ की थी। रात के अंधेरे में ,वह भी भिनसारे जब सब गहरी नींद में रहते हैं, धोखे से हमला कराया गया था। नहीं तो लठैत खेलाड़ी वस्ताद का क्या बिगाड़ पाते। 
बाउ चुपचाप सबरन सिंघ के घर की ओर चल पड़े। हाथ में लाठी थी। पीछे पीछे लोग - घरौठा के, जोलहे - कई तमाशबीन, कई कौतुक और कौतुहल में, तो कई वास्तव में क्रोध के अधीन।
(अ:)
सबरन सिंघ के दरवाजे पर मजमा लगा था। लठैत, नेटुए और उधारी वाले। नौकर चाकर जानवरों को सँभाल रहे थे। टूटे पाँव पर कैंचा बंधवा कर कमानी ओसारे में आराम कर रहा था। बगल में शराब और गिलास रखी थी। टूटने पर शराब की मालिश और पान बहुत लाभदायक होते हैं। सब कुछ सामान्य था जैसे कुछ हुआ ही न हो।अचानक भींड़ घिर आई। आगे, बीच में बाउ, दोनों किनारे मनसुख और मुन्नर। अगली पाँत में घरौठा गाँव, पीछे जोलहे।
सबरन सिंघ ने लठैतों को तैयार रहने का इशारा कर भींड़ को जैसे सम्बोधित किया - उपेक्षा का तेवर।
“का हे sss?” (क्या है?)| 
बाउ ने प्रथम और अंतिम उत्तर दिया, ”सबरन कक्का! पता नाहीं बा कि के क़ुरबानी के ई हाल कइल हे ए से अँइठतनी लेकिन कुछ क नइखीं पावत। लेकिन तब्बो सुबहा तोहनिए पर बा। कान खोल के सुन ल ! (सबरन चाचा! पता नहीं है कि क़ुरबानी का यह हाल किसने किया है, इसीलिए ऐंठ कर रह जा रहा हूँ, कुछ कर नहीं पा रहा। लेकिन तब भी तुम्ही लोगों पर शक है। कान खोल के सुन लो)
... उपस्थित जनसमूह को भी संबोधित करते हुए बाउ ने बात जारी रखी, क्रोध नियंत्रण से जैसे बाहर हो चला
.. सब पंचे रउरहूँ सुनि लीं जा। जबले हम जीयतनि सबरनवा तोरे खानदान से केहू अखाड़ा में उतरल त निरबंस कइले के बदिए मानब। ... ए कमानी! सुनि लिहल ss? बाउ ई कहि के जातने। अबहिन ये खनदान में तूही न कहे सुने के पहलवान बाड़ ss । अखाड़ा में गइल ss त ग़ोड़ नाहीं जान ले लेब !” ...(सभी लोग ! आप भी सुनें। जब तक मैं जीवित हूँ सबरन के खानदान से कोई आखाड़े में उतरा तो सबको मारने के बाद ही मानूँगा। ... कमानी सुन लिए न ! मैं कह कर जा रहा हूँ। अभी तो इस खानदान में तुम्हीं कहने सुननए के पहलवान हो । आखाड़े में गए तो मैं पैर नहीं जान ले लूँगा।)  दुआरे की नीम की पैकरमा कर बाउ बुदबुदाते हुए चल दिए। 
सबरन सिंघ क्या उनके परिवार के किसी ने आज तक ऐसी कुभख्खा नहीं सुनी थी। उन्हों ने लठैतों को ललकारा,” मारि द सो !” । लेकिन उतारू लठैतों को अबरन सिंघ ने रोक दिया। पहले नाती की बरही भी अभी नहीं हुई थी और इतने काण्ड ! मन किसी अशुभ संकेत से डोल गया था। भाई का हाथ थाम बोले,” भैया ! ई सारे अदमी नाहीं परेत हे। एसे डोल डाल छोड़ि द । देखत नइख कइसे नीबिया के घुमरियवलसि हे ? कवन जरूरत बा पहलवानी के ? ... अरे अपने नतियो के त कुछ सोच ss। राति खेलड़िया के मारि के का मीलल ss?” (भैया ! यह साला इंसान नहीं प्रेत है। इससे खतरा मोलना छोड़ दो। देखे नहीं कैसे नीम की परिक्रमा कर के गया है? पहलवानी की क्या जरूरत है? .. अरे अपने पोते के बारे में भी कुछ सोचो। रात खेलाड़ी पहलवान को पिटवा कर क्या मिला ?)बाउ के साथ ही भीड़ भी चल दी थी। 
टिटिहरी बोली थी टिर किट टिर टिर्र ... टिटिहरी के बोल सुन सबरन ब का करेजा काँप उठा। नौकरों को आँगन में पानी डालने को कह गरियाने लगीं .. मुँहझौंसा, एगो जोलहा खातिर तमाशा देखावे आइल रहल हे।“ (मुआ, एक मुसलमान के लिए तमाशा दिखाने आया था।)
(क)


बाउ ने अपनी भैंस खोली और मुन्नर के दरवाजे बँधी काली गाय से बदली कर दी। कुछ तो रोज डेढ़ सेर दूध की जगह चार सेर दूध का मिलना और कुछ बाउ का डर, मुनरा चुप रहा।
घूमना ... पोखरा, सरेह, जवार, खेत, खलिहान सब सर्वग्रासी अवसाद की भॆंट से चढ़ गए। चुप्प बाउ रोज डेढ़ सेर कच्चा दूध और कच्ची सुखाई हल्दी ले गड़वा जाने लगे। क़ुरबानी जब तक हल्दी वाला दूध न पी लें, बाउ न टकसें। इमिरती बी को ठण्ढई घोंटने से मना कर दिया था। खामोशी ने जैसे सब कुछ अपनी गोद में ले लिया था। एक घर घरौठा में – मुसमात और बाउ और एक घर गड़वा में – क़ुरबानी, बी और अकरम। केवल खामोशी रह गई थी।...
डेढ़ महीने के बाद क़ुरबानी खटिया छोड़ पाए। अपने इयार का हाथ थाम चलने लगे थे।... .. समय उड़ता रहा। .. घनघोर जाड़े के अंत का सन्देश ले माघ का महीना आ पहुँचा। माघ महीना बड़ा मजबूत। शरीर में रस पुष्ट होते हैं। कहते हैं माघ के लइका बाघ।
लेकिन कुछ दिनों से क़ुरबानी के चेहरे का रंग उतरने लगा था। एक दिन सबेरे बाउ बोल पड़े, ”क़ुरबानी हो। अब तss ठीक हो गइल। बिहने से दण्ड सरो शुरू होखे। एकाध दाँव अउर जोड़ो हो जा !”(क़ुरबानी ! अब तो ठीक हो गए हो। कल से दण्ड बैठक शुरू की जाय। कुश्ती की एकाध जोड़ भी हो जाय !) सुनना था कि क़ुरबानी पुक्का फाड़ रोने लगे। इमिरती बी भी मुँह में कपड़ा ठूँस घर में भाग गईं। जैसे हतियारी लग गई हो बाउ अवाक रह गए थे।
बहुत निहोरा के बाद पता चला कि पिछले करीब एक महीने से क़ुरबानी चुपचाप अपने को साधने की और आखाडा में उतारने लायक बनाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन देंह जवाब दे रही थी। बाउ ने पहले तो समझा कि इतने दिन छूटने से और मन में कहीं डर समाने से ऐसा हो रहा होगा लेकिन क़ुरबानी की बोलती आँखों का क्या करें?
याद आया अपने से दूने पहलवानों को पलक झपकते धूल चटाता क़ुरबानी.. बसकौटा के मेले में चलती तलवारों के बीच अकेले लाठी के बल कूदने वाला क़ुरबानी ...मना करने पर भी अपने ही गाँव के जमींदार के खिलाफ खड़ा क़ुरबानी, दशहरे के दिन की किलकारी जा s s S बजरंगी ssss.. निर्भय भाव कमानी का पैर तोड़ता क़ुरबानी !. . .
नहीं! इसे कोई डरा नहीं सकता। जरूर कहीं ऐसा भीतरघाव लगा है जो ... बाउ आगे सोच न सके। नैनों से आँसू बह चले।.. दोनों इयार लिपट कर चुपचाप रोते रहे। थोड़ी देर के बाद बाउ चल दिए। इमिरती बी दूर तक उन्हें जाता देखती रहीं।
(ख)
बाउ पागल हो गए। लाल लाल चढ़ी आँखें, बिखरे बाल। केवल गाँव, सरेह का चक्कर लगाते और किसी के मिलने पर कहते,” तिसि के तेल नाहिं पादे मँगरुआ पुर्र पाँय . . .” फिर अट्टाहस – हा हा हा। झलकारी किसी तरह बेटे को पकड़ कर मँगवातीं, खिलातीं लेकिन पानी पीते ही बाउ शुरू हो जाते ...तिसि ... हा हा हा ...।
पोखर, चँवर, गँड़ुका .. यहीं ठाँव पाते। घण्टों बैठते और फिर गाँव का फेरा ..तिसि ..। मुनेसर चुप चाप परछाईं की भाँति पहरा देता लगा रहता। बाद में मुन्नर भी साथ चलने लगा।
...
और एक दिन ! कमानी सिंघ घर से गायब हो गया। एक स्वस्थ सुखी इंसान ऐसे कैसे गायब हो सकता था? सबरन अबरन बहुत खोजवाए लेकिन कमानी नहीं मिला तो नहीं मिला। बाउ पर शक हुआ लेकिन पता चला कि पागल हो गया है सो हताश हो कर बैठ गए।
..
 उस घटना के तेरहवें दिन बाउ अचानक ठीक हो गए। हजाम को बुला बाल, दाढ़ी, मोछ सब मुड़वा दिए और गाय को खोल कर भगा दिए .. बाकी जिन्दगी गाय का दूध पीना तो दूर कभी गाय के दूध की बनी चीज तक नहीं खाई।...
बरसभीतरे क़ुरबानी मियाँ चल बसे। उस दिन बाउ तनिक नहीं रोए थे ...
इमिरती बी अकरम को ले उसके फूफी के गाँव जा बसीं। बाउ फिर कभी चितामन कुटी और गड़वा गाँव नहीं गए। आखाड़े पर भी बाकी जिन्दगी उनके पैर नहीं उतरे।....
बाउ और खेलाड़ी वस्ताद के कारनामे किम्वदंती बन फैलते रहे। घरौठा में तो उनके बाद भी दूसरी पीढ़ी तक पहलवान होते रहे लेकिन गड़वा गाँव में फिर कोई मल्ल नहीं हुआ। जमींदार के घर आज भी आँखों में अन्जन लगाना गुनाह के बराबर है।
.........
बहुत वर्षों के बाद !
चँवर दरेसी में दो भाइयों के अलग्यौझा के झगड़े में बंटवारे के बाद जब मेड़ मरम्मत के लिए खोदी गई तो एक सिर विहीन कंकाल मिला। ... लोग आज भी उस घटना का नाम ले जाने क्या क्या कहते हैं ! .. प्रसंगांत
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शब्द संपदा:
(1) झींसा- बहुत महीन बूँदों वाली वर्षा, (2)बाढ़ – फसल की उठान, (3) पुलकाया – प्रसन्न किया, (4) नाती – पोता, (5)छटिहार, छठिहार – बच्चे के जन्म के 6 दिन बाद होने वाला उत्सव, (6) काजर – काजल, (7) जवार – इलाका, (8) सुरमा – अंजन, (9) फुल्ली – आँख की एक बिमारी जिसमें रोशनी जाती रहती है।, (10) कजरौटा – काजल रखने का छोटा सा ढक्कनदार पात्र, (11) धरकोसवा – पुराने जमाने के बच्चे चुराने वाले। कहते हैं कि अकेले पा बच्चों को बेहोश कर बोरे में भर फरार हो जाते थे।, (12) आना – पुराने जमाने का पैसा, सोलह आने = एक रुपया, (13) जर – धन, (14) इयार – यार, मित्र (15) मियाँइन – मुसलमान औरत। आदरसूचक। है न ताज्जुब वाली बात! (16) चौन्हा – चौंधियाना (17) हँसुली - गले में पहना जाने वाला पुराने जमाने का भारी आभूषण, (18) फेंटा – साफा, (19) थुकथुकाया – हाथ पर थूकने की भंगिमा बनाना, एक तरह का टोटका, (20) भतवानि – विवाह समय कच्चा खाना (भात, दाल, सब्जी ) खिलाने से सम्बन्धित एक उत्सव, (21) गोहार – पुकार, (22) चट्टी और पटरी – जमीन पर बिछने को टाट और लकड़ी का चिकना किया छोटा आयताकार टुकड़ा जिस पर बच्चे लिखते थे। (23) गर्रह – ग्रह, (24) सीवान – सीमा, (25) मूहाँ मूहीं – बात का लोगों द्वारा एक दूसरे से कह कर फैलाना, (26) बंसफोर – बांस का काम करने वाली अंत्यज जाति, डोम, (27) जोलहा – मुसलमानों को बताती एक सामूहिक संज्ञा, (28) गुमुन्द – उपद्रव के पहले की तनावपूर्ण कष्टदायी शांति, (29) सौ मूठ से एक मूठ – मुहावरा। अरमानों या उम्मीदों का एक झटके में क्षीण हो जाना, (30) अँजोरिया – चाँदनी, (31) दोहाई – दुहाई, (32) आब – आभा, (33) मालिश – अंग भंग होने पर उसे सहारा देने के बाद उस पर शराब चुआई जाती थी। मान्यता थी कि इससे हड्डियाँ जुड़ जाती थीं।, (34) पैकरमा – परिक्रमा, (35) कुभख्खा – कुभाषा, बुरी बात, (36) बरही – शिशु जन्म के बारहवें दिन वाला उत्सव, (37) सबरन ब – सबरन की पत्नी, ब अक्षर बहू के अर्थ में प्रयुक्त, (38) करेजा- कलेजा, (39) माघ के लइका बाघ – माघ के महीने में पैदा हुए लड़के बाघ की तरह शक्तिशाली होते हैं, एक मान्यता, (40) पुक्का फाड़ रोना – फूट फूट कर रोना, (41) हतियारी – हत्या का आरोप (42) भीतरघाव – अन्दरूनी चोट, (43) बरसभीतरे – एक साल के भीतर ही।

15 टिप्‍पणियां:

  1. जब भी आपको पढता तो ...ठहर सा जाता हूं...बाऊ कथा तो गांव के खेत खलिहान, दलान, पोखर, कलम जाने क्या क्या चलचित्र की तरह मन के सामने से घुमा देती हैं..शायद यही कारण है कि कम से कम दो बार पढ्ता हूं पोस्ट को...मुझे नहीं पता ..पर इतना लगता है ..आप जो ये और जिस शैली में लिख रहे हैं....एक अमर कथा तैयार हो रही है.....हिंदी ब्लोग्गिंग के लिये फ़क्र करने वाली कथा....कभी आपकी इस कथा को ...छपा हुआ पाकर अपनी लाईब्रेरी में भी सहेज सकूंगा...मुझे इसका विश्वास है.....आजा तो शब्द संपदा भी गज़ब मिली...

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  2. बहुत मर्मान्तक कथा है -एक युग बोध को कुरेदती ! क्या बाऊ कथा का समापन हो गया ? और क्या कहूं ? निःशब्द !

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  3. बाउ के व्यक्तित्व को आपकी लेखनी ने एक अदम्य ऊँचाई दी है । मैं विस्मित हूँ । अनेक घात-प्रतिघात, वर्ग-संघर्ष,प्रतिकूलता-अनुकूलता, मानवीय उदात्तता, पौरुष, स्वाभिमान, क्लेश-करुणा और न जाने क्या-क्या इस बाउ-कथा में इकट्ठा हो कर एक आत्यन्तिक प्रभाव की सृष्टि करते हैं । सबसे बड़ी बात कि इस बाउ कथा का एक-एक शब्द जैसे अपने सम्पूर्ण अर्थ के साथ बाउ को प्रमाणित करता चलता है । अदभुत है यह !

    मुझे बाउ असली सृजनशील व्यक्तित्व लगते हैं - नैतिक मूल्यों से सजग, प्रेरणा, प्रेम और अभीप्सा से सम्पन्न असली स्वतंत्र व्यक्तित्व ! आपकी अभिव्यक्ति से बाऊ की उपस्थिति व्यापक हो उठी है ।

    मैं नत हूँ ! आदमी विचार से जाना जाता है, जाना जा सकता है; आदमी और भी बहुत बातों से जाना-पहचाना जा सकता है, पर वस्तुतः यह बाऊ ही हैं जो सिर्फ अपनी उपस्थिति मात्र से जाने जा सकते हैं - अपने ’होने’ मात्र से !

    हमें इस देश के लिये कुछ बाऊ चाहियें- सम्पूर्णतः बाऊ - मतलब कार्य भी, विचार भी, क्रान्ति भी !

    इसे जल्दी से छपवाओ मेरे भईया !

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  4. अद्भुत. जैसा कई मित्र निवेदन कर चुके हैं, कथा को एक प्रवाह में उपलब्ध करायें. आदर.

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  5. हतप्रभ और क्या कहूं?
    जाने क्या है कथा मे जो जाने नही देता
    आपको बहुत शुभकामनाएं

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  6. हमारा त इ बुझाता कि रउरो कपार प कौनो बरह्म बा. ना त अइसन कैसे लिखी दी केहू? कउनो परेत? :) बाऊ के त खीसा आवते रहे के चाहीं.

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  7. लगता है जैसे पूर्व परिचय हो कथा के इन पात्रों से. शायद लेखन शैली का कमाल है.

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  8. अद्वितीय प्रस्तुति.
    हार्दिक बधाइयाँ!!!!!!!!!!!!!!

    अ से लेकर अः और फिर क, ख तक का सफ़र जोरदार रहा. बाकी का सफ़र प्रतीक्षित है.,
    यह अच्छा रहा कि लगे हाथों भूल चुके से स्वर-व्यंजनों को फिर से पढ़ने को मिल रहा है, शायद याददाश्त ताज़ा हो जाये.....

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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  9. अद्वितीय । शब्द नहीं हैं मेरे पास । गिरिजेश राव जैसा सिर्फ गिरिजेश राव ही लिख सकते हैं । जय हो लंठाधिराज की ।

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  10. दादा रे गिरिजेश जी आप तो गजराज हैं. इतना उगलते हैं तो खाते कितना होंगे. आपके लिखने की खुराक देख हम जैसे कीट पतंगों की सिट्टी-पिट्टी गुम है. इतने हाईवोल्टेज में मेरा फ्यूज उड़ गया है..अब क्या कमेंट करें और क्या शब्दकोष देखें. वैसे 'पढैं़ फारसी बचैं तेलÓ वाला जुमला आप पर बिल्कुल फिट है. आपके बाउ की तरह एक रीयल पात्र थे हमारे दादाजी के भाई तंदुरुस्ती गुरू, प्रेमचंद की कहानी के रीयल पात्र. साढ़े छह फुट के तंदुरुस्ती गुरू के किस्से कम रोचक नही हैं. जल्द लिखता हूं.

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  11. हतप्रभ और क्या कहूं?
    जाने क्या है कथा मे जो जाने नही देता
    आपको बहुत शुभकामनाएं

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  12. हां............
    इस बार कुछ बात बनी है..........
    लिखने में देर तो लगाई लेकिन एक क्लासिक रच डाला!
    आपकी लेखनी नि:संदेह नमनीय है ......


    सादर नमन

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  13. गिरिजेश जी,
    आपकी लेखनी को नमन . अद्वितीय पात्र है बाऊ.कुरबानी और बाऊ को आज ईद के दिन देखने का मौका मिला है. अद्भुत . और कुछ भी कहना कम है.

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  14. ये भी ब्लॉग्गिंग के दौर की यादों में से एक है :)

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